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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

४४४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ छठा अधिकरण

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४४४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ छठा अधिकरण

(१) अरिवर्जाः प्रकृतयः सप्तैताः स्वगुणोदयाः ।
उक्ताः प्रत्यङ्गभूतास्ताः प्रकृता राजसम्पदः ॥
(२) सम्पादयत्यसम्पन्नाः प्रकृतीरात्मवान्नृपः ।
विवृद्धाश्चानुरक्ताश्च प्रकृतीर्हन्त्यनात्मवान् ॥
(३) ततः स दुष्टप्रकृतिश्चातुरन्तोऽप्यनात्मवान् ।
हन्यते वा प्रकृतिभिर्याति वा द्विषतां वशम् ॥
(४) आत्मवांस्त्वल्पदेशोऽपि युक्तः प्रकृतिसम्पदा ।
नयज्ञः पृथिवीं कृत्स्नां जयत्येव न हीयते ॥

इति मण्डलयोनौ षष्ठेऽधिकरणे प्रकृतिसम्पदं नाम प्रथमोऽध्यायः,
आदितः षण्णवतितमः ।

—: ० :—


( १ ) आत्मसंपन्न राजा : शत्रु को छोड़कर ( क्योंकि वह राजा होने से स्वामिप्रकृति है ) शेष सात प्रकृतियाँ अपने-अपने गुणों से युक्त बता दी गई हैं । परस्पर सहायक ये अंगभूत प्रकृतियाँ अपने-अपने कार्यों में लगी हुई राजसम्पत्ति नाम से कही जाती हैं ।

( २ ) आत्मसम्पन्न राजा गुणहीन प्रकृतियों को भी गुणी बना लेता है, और आत्मसम्पन्नहीन राजा गुणसमृद्ध तथा अनुरक्त प्रकृतियों को भी नष्ट कर देता है ।

( ३ ) यही कारण है कि दुष्ट प्रकृति राजा चारों समुद्र पर्यन्त पृथ्वी का अधिपति होता हुआ भी या तो अपनी प्रकृतियों द्वारा ही विनष्ट हो जाता है या शत्रु के कब्जे में चला जाता है ।

( ४ ) किन्तु आत्मसंपन्न नीतिज्ञ राजा थोड़ी भूमि का स्वामी होता हुआ भी आत्मप्रकृति के द्वारा सारी पृथ्वी का आधिपत्य प्राप्त कर लेता है और कभी भी क्षीण नहीं होता है ।

मण्डलयोनि नामक षष्ठ अधिकरण में प्रकृतिसम्पदा नामक पहला अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

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प्रकरण ९७
अध्याय २

शमव्यायामिकम्

(१) शमव्यायामौ योगक्षेमयोर्योनिः ।
(२) कर्मारम्भाणां योगाराधनो व्यायामः । कर्मफलोपभोगानां क्षेमाराधनः शमः ।
(३) शमव्यायामयोर्योनिः षाड्गुण्यम् ।
(४) क्षयस्थानं वृद्धिरित्युदयास्तस्य ।
(५) मानुषं नयापनयौ दैवमयानयौ ।
(६) दैवमानुषं हि कर्म लोकं यापयति । अदृष्टकारितं दैवम् । तस्मिन्निष्टेन फलेन योगोदयः । अनिष्टेनानयः ।
(७) दृष्टकारितं मानुषम् । तस्मिन् योगक्षेमनिष्पत्तिर्नयः । विपत्तिरपनयः । तच्चिन्त्यम् । अचिन्त्यं दैवमिति ।


शांति और उद्योग

( १ ) क्षेम का कारण शांति और योग का कारण व्यायाम है ।

( २ ) दुर्ग संबन्धी तथा संधि आदि कार्यों में कुशल व्यक्तियों को नियुक्त करना ही व्यायाम कहलाता है । दुर्ग तथा सन्धि आदि कर्मफलों के उपयोग में विघ्नों के नाश का साधन ही शुभ ( शांति ) है ।

( ३ ) शम और व्यायाम के कारण हैं—संधि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय और द्वैधीभाव आदि छह गुण ।

( ४ ) उन्नति ( वृद्धि ), अवनति ( क्षय ) और समानगति ( स्थान ) ये तीन, उक्त छह गुणों के फल हैं ।

( ५ ) इन तीन फलों को प्राप्त करने वाले दो प्रकार के कर्म हैं : मानुष और दैव । नय तथा अपनय मानुषकर्म हैं और अय तथा अनय दैवकर्म हैं ।

( ६ ) ये दैव और मानुष कर्म ही लोक-जीवन को चलाने वाले दो पहिये हैं । अदृष्ट द्वारा कराया हुआ धर्म तथा अधर्म रूप कर्म दैव कहाता है । उससे इष्ट फल का संबंध जुड़ जाने की स्थिति को अय कहते हैं । यदि प्रतिकूल फल के साथ सम्बन्ध हुआ तो वही अनय की स्थिति है ।

( ७ ) प्रभुशक्ति, मन्त्रशक्ति या उत्साहशक्ति आदि के कारण, संधि, विग्रह

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४४६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ छठा अधिकरण

(१) राजा आत्मद्रव्यप्रकृतिसम्पन्नो नयस्याधिष्ठानं विजिगीषुः । तस्य समन्ततो मण्डलीभूता भूम्यनन्तरा अरिप्रकृतिः । तथैव भूम्येकान्तरा मित्रप्रकृतिः ।

(२) अरिसम्पद्युक्तः सामन्तः शत्रुः । व्यसनी यातव्यः । अनपाश्रयो दुर्बलाश्रयो वोच्छेदनीयः । विपर्यये पीडनीयः कर्शनीयो वा । इत्यरिविशेषाः ।

(३) तस्मान्मित्रममित्रं मित्रामित्रम् अरिमित्रमित्रं चानन्तर्येण भूमीनां प्रसज्यते पुरस्तात् । पश्चात्पाष्णिग्राह आक्रन्दः पाष्णिग्राहासार आक्रन्दासार इति ।

(४) भूम्यनन्तरः प्रकृत्यमित्रः तुल्याभिजनः सहजः । विरुद्धो विरोधयिता वा कृत्रिमः ।


आदि गुणों के प्रयोग द्वारा जो कार्य कराया जाय वही मानुषकर्म कहलाता है । उसके होने पर यदि योग, क्षेम की सिद्धि हो जाय तो नय है, और विपत्ति आ जाय तो अपनय कहा जाता है । योग-क्षेम की सिद्धि और विपत्ति के प्रतीकार का साधनभूत मानुषकर्म के संबंध में ही यहाँ विचार किया जायेगा । अचिंत्य दैवकर्म के सम्बन्ध में कुछ कहना सर्वथा असंभव है ।

( १ ) जो राजा आत्मसंपन्न, अमात्य आदि द्रव्यप्रकृतिसंपन्न और नीति का आश्रय लेने वाला हो उसको विजिगीषु कहते हैं । विजिगीषु राजा के चारों ओर के राजा अरिप्रकृति कहलाते हैं । अरिप्रकृति राजाओं की सीमाओं से लगे हुए राजा मित्रप्रकृति कहलाते हैं ।

( २ ) शत्रु के गुणों से युक्त सामन्त शत्रु कहलाता है । व्यसनी शत्रु-राजा पर आक्रमण कर देना चाहिए । आश्रयहीन अथवा दुर्बल शत्रु-राजा पर भी आक्रमण कर देना चाहिए । आश्रययुक्त और सबल शत्रु राजा किसी अपकारक द्वारा तंग किया जाना चाहिए अथवा अन्य उपायों से उसकी सेना और उसके धन की क्षति करनी चाहिए । शत्रु राजा के ये चार भेद हैं ।

( ३ ) विजिगीषु राजा की विजय-यात्रा में आगे क्रमशः शत्रु, मित्र, अरिमित्र, मित्रमित्र और अरिमित्र-मित्र ये पाँच राजा आते हैं । इसी प्रकार उसके पीछे क्रमशः पाष्णिग्राह, आक्रंद, पाष्णिग्राहासार और आक्रंदासार ये चार राजा होते हैं । विजिगीषु राजा के सहित आगे-पीछे के राजाओं को मिलाकर एक राज-मंडल कहलाता है ।

( ४ ) विजिगीषु राजा सीमा से लगा हुआ स्वाभाविक शत्रु और विजिगीषु के वंश में उत्पन्न दायभागी, ये दोनों सहजशत्रु कहलाते हैं । स्वयं विरुद्ध होने वाला अथवा किसी दूसरे को विरोधी बना देने वाला कृत्रिम शत्रु कहलाता है ।

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प्र० ६७ : अ० २ ] शान्ति और उद्योग ४४७

(१) भूम्येकान्तरं प्रकृतिमित्रं मातृपितृसम्बन्धं सहजं धनजीवितहेतो-
राश्रितं कृत्रिममिति ।
(२) अरिविजिगीष्वोर्भूम्यनन्तरः संहतासंहतयोरनुग्रहसमर्थो निग्रहे
चासंहतयोर्मध्यमः ।
(३) अरिविजिगीषुमध्यानां बहिः प्रकृतिभ्यो बलवत्तरः संहतासंह-
तानामरि‌विजिगीषुमध्यमानामनुग्रहे समर्थो निग्रहे चासंहतानामुदासीनः ।
इति प्रकृतयः ।
(४) विजिगीषुमित्रं मित्रमित्रं वास्य प्रकृतयस्तिस्रः । ताः पञ्चभि-
रमात्यजनपददुर्गकोशदण्डप्रकृतिभिरेकैकशः संयुक्ता मण्डलमष्टादशकं
भवति । अनेन मण्डलपृथक्त्वं व्याख्यातमरिमध्यमोदासीनानाम् ।
(५) चतुर्मण्डलसंक्षेपः । द्वादश राजप्रकृतयः, षष्टिर्द्रव्यप्रकृतयः,
संक्षेपेण द्विसप्ततिः ।
(६) तासां यथास्वं सम्पदः ।
(७) शक्तिः सिद्धिश्च । बलं शक्तिः । सुखं सिद्धिः ।


( १ ) विजिगीषु के राज्य से एक राज्य को छोड़ कर उसके बाद का स्वभावतः मित्र राजा और विजिगीषु का ममेरा या फुफेरा भाई, ये सहजमित्र हैं । धन या जीवन-जीविका के लिए आश्रय लेने वाला कृत्रिममित्र कहलाता है ।

( २ ) अरि और विजिगीषु राजाओं की संधि में संधि का समर्थक और विग्रह में विग्रह का समर्थक राजा मध्यम कहलाता है ।

( ३ ) अरि विजिगीषु और मध्यम की प्रकृतियों के अतिरिक्त, शक्तिशाली मध्यम राजा से भी बलवान्, अरि, विजिगीषु और मध्यम की संधि में संधि का समर्थक और उनके विग्रह में विग्रह का समर्थक राजा उदासीन कहलाता है । इस प्रकार बारह राजप्रकृतियों का निरूपण किया गया ।

( ४ ) विजिगीषु, मित्र और मित्रमित्र ये तीन प्रकृति हैं । इन तीनों की अलग-अलग अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष और दण्ड, ये पाँच प्रकृतियाँ, एक साथ मिलकर अठारह प्रकृतियों का एक मंडल होता है । अरि, मध्यम और उदासीन आदि के मंडलों का यही क्रम समझना चाहिए ।

( ५ ) इस प्रकार चार मंडलों का संक्षेप में निरूपण किया गया । बारह राज-प्रकृतियाँ और साठ अमात्य आदि द्रव्य प्रकृतियाँ मिलकर बहत्तर प्रकृतियाँ कही जाती हैं ।

( ६ ) उनकी संपत्तियों का विवेचन पहिले किया जा चुका है ।

( ७ ) इसी प्रकार शक्ति और सिद्धि के संबंध में भी समझना चाहिए । शक्ति को बल और सिद्धि को सुख कहा जाता है ।

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४४८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ छठा अधिकरण

(१) शक्तिस्त्रिविधा-ज्ञानबलं मन्त्रशक्तिः, कोशदण्डबलं प्रभुशक्तिः, विक्रमबलमुत्साहशक्तिः।
(२) एवं सिद्धिस्त्रिविधैव मंत्रशक्तिसाध्या मंत्रसिद्धिः, प्रभुशक्तिसाध्या प्रभुसिद्धिः उत्साहशक्तिसाध्या उत्साहसिद्धिरिति। ताभिरभ्युच्चितो ज्यायान् भवति। अपचितो हीनः। तुल्यशक्तिः समः। तस्माच्छक्तिं सिद्धिं च घटेतात्मन्यावेशयितुम्। साधारणो वा द्रव्यप्रकृतिष्वानन्तर्येण शौचवशेन वा दूष्यामित्राभ्यां वाऽपकृष्टुं यतेत।
(३) यदि वा पश्येत्—'अमित्रो मे शक्तियुक्तो वाग्दण्डपारुष्यार्थदूषणैः प्रकृतिरुपहनिष्यति, सिद्धियुक्तो वा मृगयाद्यूतमद्यस्त्रीभिः प्रमादं गमिष्यति, स विरक्तप्रकृतिरुपक्षीणः प्रमत्तो वा साध्यो मे भविष्यति, विग्रहाभियुक्तो वा सर्वसन्दोहेनैकस्थो दुर्गस्थो वा स्थास्यति, स संहतसैन्यो मित्रदुर्गवियुक्तः साध्यो मे भविष्यति, बलवान् वा राजा परतः शत्रुमुच्छेत्तुकामस्तमुच्छिद्य-मानमुच्छिन्द्यात्' इति। 'बलवता प्रार्थितस्य मे विपन्नकर्मारम्भस्य वा


(१) शक्ति अर्थात् बल के तीन भेद हैं : ज्ञानवल, कोषबल और विक्रमवल। ज्ञानबल ही मंत्रशक्ति है, कोष-सेना बल ही प्रभुशक्ति है और विक्रमवल ही उत्साह-शक्ति है।

(२) इसी प्रकार सिद्धि के भी तीन भेद हैं : मंत्रसिद्धि, प्रभुसिद्धि और उत्साह-सिद्धि। मंत्रशक्ति से होने वाली सिद्धि मंत्रसिद्धि, प्रभुशक्ति से होने वाली सिद्धि प्रभु-सिद्धि और उत्साहशक्ति से होने वाली सिद्धि उत्साहसिद्धि कहलाती है। इन शक्तियों से संपन्न राजा श्रेष्ठ; उनसे रहित अधम और समान शक्ति वाला मध्यम कहा जाता है। इसलिए राजा को चाहिए कि वह अपनी शक्ति तथा सिद्धि को बढ़ाने के लिये निरंतर यत्नशील रहे। जो राजा स्वयं अपनी शक्ति-सिद्धि को बढ़ाने में असमर्थ हो वह इस कार्य को अपनी अमात्य आदि द्रव्य प्रकृतियों के द्वारा या अपनी सुविधा के अनुसार संपन्न करे; और दूष्य तथा शत्रु की शक्ति-सिद्धि को नष्ट करने का यत्न करे।

(३) यदि वह राजा ऐसा देखे कि : मेरा शक्तिशाली शत्रुराजा वाक्पारुष्य, दण्डपारुष्य और अर्थदोष से अपनी अमात्य आदि द्रव्यप्रकृतियों से रुष्ट कर देगा; अथवा वह मृगया, द्यूत और स्त्रियों में आसक्त होकर प्रमादी बन जायेगा; तब निश्चित ही वह प्रकृतियों से विरक्त और प्रमादी शत्रुराजा को 'मैं आसानी से जीत सकूंगा, अथवा जब मैं अपनी संपूर्ण सैन्यशक्ति को लेकर उससे युद्ध करने जाऊँगा तो वह अपनी शक्ति पर गर्वित हो कर किसी स्थान या दुर्ग में अकेला मेरे मुकाबले की प्रतीक्षा में रहेगा'—ऐसी स्थिति में वह मेरी सेना से घिर जायेगा तथा उसको मित्र एवं दुर्ग से कोई सहायता न मिल पावेगी और तब उसे मैं आसानी से जीत सकूंगा,