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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 763 of 918

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Page 763
प्रकरण १६२दूतकर्माणि
अध्याय १

(१) बलीयसाऽभियुक्तो दुर्बलः सर्वत्रानुप्रणतो वेतसधर्मा तिष्ठेत् । 'इन्द्रस्य हि स प्रणमति यो बलीयसो नमति' इति भारद्वाजः ।

(२) 'सर्वसन्दोहेन बलानां युध्येत, पराक्रमो हि व्यसनमपहन्ति । स्वधर्मश्चैष क्षत्रियस्य, युद्धे जयः पराजयो वा' इति विशालाक्षः ।

(३) नेति कौटिल्यः । सर्वत्रानुप्रणतः कुलैडक इव निराशो जीविते वसति । युध्यमानश्चाल्पसैन्यः समुद्रमिवाप्लवोऽवगाहमानः सीदति । तद्विशिष्टं तु राजानमाश्रितो दुर्गमविषह्यं वा चेष्टेत ।


दूतकर्म

(१) 'जब किसी दुर्बल राजा पर कोई बलवान् राजा आक्रमण करे तो उसे चाहिए कि वह हर प्रकार का अपमान सहन करता हुआ उसके सामने बेत की तरह झुक जाय। जो अपने से बलवान् राजा के सामने झुकता है, वह दंड के सामने झुकता है'—यह आचार्य भारद्वाज का मत है।

(२) किन्तु इसके विरुद्ध आचार्य विशालाक्ष की राय है कि 'दुर्बल राजा को चाहिए कि वह अपनी सारी सैन्य-शक्ति को लगाकर बलवान् राजा के साथ युद्ध करे; क्योंकि पराक्रम ही आपत्तियों को नष्ट करता है और पराक्रम तो क्षत्रिय का धर्म है। युद्ध में विजय हो या पराजय, क्षत्रिय को अपने क्षात्रधर्म का पालन करना चाहिए; शत्रु के आगे कदापि न झुकना चाहिए।'

(३) किन्तु आचार्य कौटिल्य उक्त दोनों मतों से सहमत नहीं है। उसका कहना है कि 'जो दुर्बल राजा हर तरह का अपमान होने पर भी नम्र ही बना रहता है उसका जीवन वैसा ही दूभर हो जाता है, जैसा कि अपने समूह से अलग हुए मेंढे का। इसी प्रकार थोड़ी सेना को लेकर जो युद्ध में जाता है उसकी वही स्थिति है; जो तैरने के साधनों को साथ लिये बिना ही समुद्र में कूद पड़ता है। इसलिए दुर्बल राजा को चाहिए कि वह अपने प्रतिद्वंद्वी राजा के सामने या उससे भी अधिक शक्तिशाली किसी दूसरे राजा का आश्रय प्राप्त करे। अथवा ऐसे दुर्ग में जाकर शत्रु का मुकाबला करे, जो कि अभेद्य हो।