कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
४२२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवां अधिकरण
४२२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवां अधिकरण
(१) आर्ययुक्तारोहकमाणवकशैलखनकाः सर्वोपस्थायिन आचार्या विद्यावन्तश्च पूजावेतनानि यथार्हं लभेरन् पञ्चशतावरं सहस्रपरम् ।
(२) दशपणिको योजने दूतो मध्यमः । दशोत्तरे द्विगुणवेतन आयोजन-शतादिति ।
(३) समानविद्येभ्यस्त्रिगुणवेतनॊ राजा राजसूयादिषु ऋतुषु राज्ञः सारथिः साहस्रः ।
(४) कापटिकोदास्थितगृहपतिकवैदेहकतापसव्यञ्जनाः साहस्राः ।
(५) ग्रामभृतकसत्रीतीक्ष्णरसदभिक्षुक्यः पञ्चशताः ।
(६) चारसञ्चारिणोऽर्धतृतीयशताः । प्रयासवृद्धवेतना वा ।
(७) शतवर्गसहस्रवर्गाणामध्यक्षा भक्तवेतनलाभमादेशं विक्षेपं च कुर्युः । अविक्षेपे राजपरिग्रहदुर्गराष्ट्ररक्षावेक्षणेषु च नित्यमुख्याः स्युरनेकमुख्याश्च ।
( १ ) आर्य ( सत्पुरुष ), युक्तारोहक ( विगड़ैल घोड़े का सवार ), माणवक ( वेदाध्यायी विद्यार्थी ) शैलखनक ( पत्थर आदि पर नक्काशी करने वाला ), सर्वोपस्थायिन आचार्य ( निपुण गायनाचार्य ) और विद्वान्, इन लोगों को योग्यतानुसार पाँच सौ से हजार पण तक वेतन प्रति वर्ष दिया जाय ।
( २ ) मध्यगति से एक योजन तक जाने-आने वाले दूत को दस पण वेतन दिया जाय । दस योजन से सौ योजन तक चलने वाले को बीस पण वेतन दिया जाय ।
( ३ ) राजा को चाहिए कि वह राजसूय आदि यज्ञों पर मंत्री, पुरोहित आदि को उनके निर्धारित वेतन से तिगुना वेतन दे; इसी प्रकार राजा को यज्ञ स्थान में लाने वाले सारथि को एक हजार पण वेतन दिया जाय ।
( ४ ) कापटिक, उदास्थित, गृहपतिक, वैदेहक, और तापस आदि के वेश में कार्य करने वाले गुप्तचरों को प्रतिवर्ष हजार पण वेतन दिया जाय ।
( ५ ) धोबी, नाई आदि गाँव के नौकर, गाँव के मुखिया, खत्री, तीक्ष्ण तथा भिक्षुकी आदि के वेश में काम करने वाले गुप्तचरों को पाँच सौ पण वेतन दिया जाय ।
( ६ ) गुप्तचरों को इधर-उधर भेजने वाले कर्मचारियों को ढाई सौ पण वेतन दिया जाय । अथवा मेहनत के अनुसार सबको अधिक वेतन दिया जाय ।
( ७ ) शतवर्ग के या सहस्रवर्ग के अध्यक्षों को चाहिए कि वे नौकरों को यथोचित वेतन दिलायें, उनसे राजाज्ञा का पालन करायें, और आवश्यकतानुसार उनकी नियुक्ति तथा उनका स्थानान्तरण ( विक्षेप ) करायें । विभागीय अध्यक्षों को चाहिए कि वे जिस विभाग में ठीक तरह से कार्य न होता हो, वहाँ के लिए अधिक कर्मचारियों की नियुक्ति करें; और प्रत्येक विभाग के कर्मचारियों को चाहिए कि वे अपने
प्र० ९१ : अ० ३ ] भृत्यों का भरण-पोषण ४२३
(१) कर्मसु भृतानां पुत्रदारा भक्तवेतनं लभेरन् । बालवृद्धव्याधिताश्चैषामनुग्राह्याः । प्रेतव्याधितसूतिकाकृत्येषु चैषामर्थमानकर्म कुर्यात् ।
(२) अल्पकोशः कुप्यपशुक्षेत्राणि दद्यात् । अल्पं च हिरण्यम् । शून्यं वा निवेशयितुमभ्युत्थितो हिरण्यमेव दद्यात्, न ग्रामं ग्रामसञ्जातव्यवहारस्थापनार्थम् ।
(३) एतेन भृतानामभृतानां च विद्याकर्मभ्यां भक्तवेतनविशेषं च कुर्यात् । षष्टिवेतनस्याढकं कृत्वा हिरण्यानुरूपं भक्तं कुर्यात् ।
(४) पत्त्यश्वरथद्विपाः सूर्योदये बहिः सन्धिदिवसवज्र्जं शिल्पयोग्याः कुर्युः । तेषु राजा नित्ययुक्तः स्यात् । अभीक्ष्णं चैषां शिल्पदर्शनं कुर्यात् । कृतनरेन्द्राङ्कं शस्त्रावरणमायुधागारं प्रवेशयेत् । अशस्त्राश्चरेयुरन्यत्र मुद्रानुज्ञातात् । नष्टं विनष्टं वा द्विगुणं दद्यात् । विध्वस्तगणनां च कुर्यात् ।
अध्यक्ष के अनुशासन में रह कर ठीक तरह से कार्यों को करें । अध्यक्ष भी अनेक होने चाहिए ।
( १ ) यदि कार्य करते हुए किसी कर्मचारी की मृत्यु हो जाय तो उसका वेतन उसके पुत्र-पत्नी ले लें । अपने मृत कर्मचारियों के बालकों, वृद्धों और बीमार परिजनों पर राजा कृपा-दृष्टि बनाये रखे । उनके घरों पर मृत्यु; बीमारी या बच्चा हो जाने पर उसकी आर्थिक तथा मौखिक सहायता करता रहे ।
( २ ) यदि खजाने में कमी हो तो आर्थिक सहायता की जगह राजा कुप्य, पशु तथा जमीन आदि से अपने कृपार्थियों की सहायता करे । ऐसी अवस्था में वह सुवर्ण आदि बहुत थोड़ी मात्रा में दे किन्तु राजा यदि निर्जन मैदानों को आबाद करना चाहे तो सुवर्ण ही अधिक दे, जमीन आदि न दे, जिससे बसे हुए गाँव के मूल्य आदि का निर्णय, व्यवहार की स्थापना के लिए ठीक तौर पर किया जा सके ।
( ३ ) इसी प्रकार स्थायी या अस्थायी कर्मचारियों की योग्यता और कार्यक्षमता के अनुसार कम या ज्यादा वेतन भत्ता दिया जाय । सामान्यतया साठ पण वेतन पाने वालों को एक आढक भर अन्न दिया जाय । इसी क्रम से भक्त भत्ता न्यून या अधिक दिया जाय ।
( ४ ) अमावस्या-पूर्णमासी आदि संधिदिनों को छोड़कर सूर्योदय के बाद पैदल, अश्वारोही, रथारोही और गजारोही सेनाओं को कवायद (शिल्पदर्शन) सिखायी जाय । राजा को चाहिए कि वह सेनाओं पर बराबर ध्यान रखे और उनकी कवायद का भी निरीक्षण करता रहे । उसके बाद हथियारों और कवचों को राजमुद्रा से चिह्नित करके ही आयुधागार में प्रविष्ट किया जाय । लाइसेंस ( मुद्रानुज्ञात ) सुदा हथियार-बंदों के अलावा कोई भी सिपाही हथियार लिये इधर-उधर न घूमें । जिससे जो हथि-
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(१) सार्थिकानां शस्त्रावरणमन्तपाला गृह्णीयुः, समुद्रमवचारयेयुर्वा । यात्रामभ्युत्थितो वा सेनामुद्योजयेत् । ततो वैदेहकव्यञ्जनाः सर्वपण्यान्यायुधीयेभ्यो यात्राकाले द्विगुणप्रत्यादेयानि दद्युः । एवं राजपण्यविक्रयो वेतनप्रत्यादानं च भवति ।
(२) एवमवेक्षितायव्ययः कोशदण्डव्यसनं नावाप्नोति ।
(३) इति भक्तवेतनविकल्पः ।
(४) सत्रिणश्चायुधीयाना वेश्याः कारुकुशीलवाः ।
दण्डवृद्धाश्च जानीयुः शौचाशौचमतन्द्रिताः ॥
इति योगवृत्ते पञ्चमेऽधिकरणे भृत्यभरणीयं नाम तृतीयोऽध्यायः, आदितः त्रिनवतितमः ।
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यार खो जाय या टूट जाय उससे उसका दुगुना मूल्य वसूल किया जाय । आयुधागार में टूटे एवं नष्ट हुए हथियारों का पूरा रिकार्ड रहना चाहिए ।
(१) विदेश से आने वाले व्यापारियों के हथियार सीमा-निरीक्षक अंतपाल ले ले । जिनके पास लाइसेंस हों उन्हें हथियार साथ रखकर प्रविष्ट होने दे । चढ़ाई करने वाले राजा को चाहिए कि अपनी सेना को वह संगठित कर ले । युद्ध के समय व्यापारियों के वेष में फौजियों को दुगुने दाम पर रसद दी जाय । इस प्रकार सरकारी वस्तुएँ भी विक जायेंगी और सिपाहियों को दिये गए वेतन में से कुछ धन खजाने में वापिस मिल जायेगा ।
(२) इस प्रकार आय-व्यय पर ध्यान रखने वाले राजा पर कभी भी आर्थिक या सैनिक आपत्तियाँ नहीं आ पातीं ।
(३) यहाँ तक भत्ता व वेतन के संबंध में बारीकी से विचार किया गया ।
(४) सत्री, वेश्या, कारीगर और वृद्ध सिपाहियों को चाहिए कि वे पूरी सावधानी के साथ सैनिकों के अच्छे बुरे कार्यों का सदा निरीक्षण करते रहें ।
योगवृत्त नामक पंचम अधिकरण में भृत्यभरणीय नामक तीसरा अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ९२ |
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| अध्याय ४ |
अनुजीविवृत्तम्
(१) लोकयात्राविद् राजानमात्मद्रव्यप्रकृतिसम्पन्नं प्रियहितद्वारेणा-
श्रयेत् । यं वा मन्येत–यथाहमाश्रयेप्सुरेवमसौ विनयेप्सुरभिगामिकगुणयुक्त
इति, द्रव्यप्रकृतिहीनमप्येनमाश्रयेत ।
(२) न त्वेवानात्मसम्पन्नम् । अनात्मवान् हि नीतिशास्त्रद्वेषादनर्थ-
संयोगाद्वा प्राप्यापि महदैश्वर्यं न भवति ।
(३) आत्मवति लब्धावकाशः शास्त्रानुयोगं दद्यात् । अविसंवादाद्धि
स्थानस्थैर्यमवाप्नोति । मतिकर्मसु पृष्टः तदात्वे च आयत्यां च धर्मार्थ-
संयुक्तं समर्थं प्रवीणवदपरिषद्भीरुः कथयेत् । ईप्सितः पणेत—धर्मार्थानु-
योगम् अविशिष्टेषु बलवत्संयुक्तेषु दण्डधारणं मत्संयोगे तदात्वे च दण्ड-
राजकर्मचारियों का राजा के प्रति व्यवहार
( १ ) जो व्यक्ति सांसारिक व्यवहारों में कुशल हों उनको चाहिए कि वे राजा के प्रिय एवं हितैषी व्यक्तियों के द्वारा, सत्कुलीन, बुद्धिमान् एवं योग्य अमात्यों से सम्पन्न राजा का आश्रय प्राप्त करें । यदि ऐसा राजा न मिले तो योग्य व्यक्तियों की तलाश करने वाले आत्मसम्पन्न राजा का आश्रय ग्रहण करें ।
( २ ) भले ही आत्म-सम्पन्न राजा के सुयोग्य आमात्य न हों, तब भी उसी का आश्रय लेना चाहिए, किन्तु सुयोग्य अमात्य आदि से सम्पन्न आत्मसंपत्तिरहित राजा का आश्रय कदापि न लेना चाहिए ! क्योंकि आत्म-संपत्ति शून्य राजा नीतिशास्त्र को न जानने के कारण अथवा अनर्थकारी मृगयाद्यूत आदि का व्यसनी होने के कारण, या इस प्रकार के लोगों की संगति करने के कारण पितृ-पितामह के उपलब्ध महान् ऐश्वर्य को भी नष्ट-भ्रष्ट कर देता है ।
( ३ ) यदि राजा आत्मसम्पन्न हो तो अवसर आने पर उसको शास्त्रानुकूल संमति दी जाय । शास्त्र के साथ संमति का मिलान जानकर उसको यह विश्वास हो जाता है कि अमुक व्यक्ति नीतिज्ञ है, और तब उसकी नियुक्ति किसी अधिकार पद पर कर दी जाती है । अति आवश्यक विषयों के सम्बन्ध में राजा जब उससे कुछ प्रश्न पूछे तो उस समय या किसी भी समय वह धर्मार्थविद् अति निपुण लोगों की भाँति निर्भीकता-पूर्वक भरी सभा में उत्तर दे । यदि राजा उसको अमात्य पद पर नियुक्त करना चाहे तो राजा के सामने वह इस प्रकार की शर्तें रखे : जो लोग साधारण बुद्धि के हों और धर्म तथा अर्थ के तत्त्वों को न समझते हों, जिज्ञासा के तौर पर भी उनसे कभी भी
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धारणमिति न कुर्याः । पक्षं वृत्तिं गुह्यं च मे नोपहन्याः । संज्ञया च त्वां कामक्रोधदण्डनेषु वारयेयम् इति ।
(१) आयुक्तप्रदिष्टायां भूमावनुज्ञातः प्रविशेत् । उपविशेच्च पार्श्वतः सन्निकृष्टविप्रकृष्टः । वरासनं विगृह्यकथनमसभ्यमप्रत्यक्षमश्रद्धेयमनृतं च वाक्यमुच्चैरनर्मणि हासं वातष्ठीवने च शब्दवती न कुर्यात् । मिथः कथनमन्येन, जनवादे द्वन्द्वकथनं, राज्ञो वेषमुद्धतकुहकानां च, रत्नातिशयप्रकाशाभ्यर्थनम्, एकाक्ष्योष्ठनिर्भोगं, भ्रुकुटीकर्म, वाक्यावक्षेपं च ब्रुवति । बलवत्संयुक्तविरोधं स्त्रीभिः स्त्रीदर्शिभिः सामन्तदूतैर्द्वेष्यापक्षावक्षिप्तार्थैश्च प्रतिसंसर्गमेकार्थचर्यां सङ्घातं च वर्जयेत् ।
(२) अहीनकालं राजार्थं स्वार्थं प्रियहितैः सह ।
परार्थं देशकाले च ब्रूयाद् धर्मार्थसंहितम् ॥
इस विषय में कुछ न पूछा जाय, बलवान् या बलवान् सहायकों वाले शत्रु पर आक्रमण न किया जाय, मेरे सम्बन्ध में भी सहसा दण्ड-प्रयोग न किया जाय, मेरे पक्ष को, मेरे व्यवहार या मेरे जीविका के रहस्यों को कदापि भी न खोला जाय न तो नष्ट ही किया जाय, काम-क्रोध के वशीभूत अनुचित दण्ड देने को प्रस्तुत आपको जब मैं इशारों से वारित करूँगा, तो बुरा न मानते हुए इसका ध्यान रखा जाय । मेरी इन शर्तों को पूरा करना होगा ।
( १ ) जिस अधिकार पद पर राजा उसे नियुक्त करे उसी पर वह कार्य करे और राजा के समीप अगल-बगल में, न तो अधिक दूर और न अधिक नजदीक ही यथोचित आसन पर बैठकर वह कार्य करे । आक्षेप लगाकर, असभ्य, परोक्ष विषयक, अविश्वसनीय और झूठी बात वह कदापि न बोले । बेमौके ऊँची आवाज से न बोले । बोलते हुए खकार या डकार कभी न करे । इसके अतिरिक्त राजा की उपस्थिति में किसी दूसरे से बातचीत करना, किसी अफवाह को निश्चित रूप से हाँ या ना कहना, राजा का या पाखण्डियों का वेष धारण करना, राजा के धारण करने योग्य रत्नों के लिए खुले तौर पर प्रार्थना करना, एक आँख या एक ओठ टेढा करके बोलना, भौं चढ़ाना, राजा की बात को बीच में ही काट देना, बलवान् के सम्बन्धी से झगड़ा करना, स्त्रियों के साथ, स्त्रियों को चाहने वालों के साथ, विदेशी दूतों के साथ एवम् राजा के दुश्मनों-या अनर्थकारी व्यक्तियों के साथ सम्पर्क रखना, एक ही बात को करते रहना, और गुटबाजी बनाकर रहना, इत्यादि सभी कार्यों का परित्याग कर दे ।
( २ ) राजा के मतलब की बात तत्काल ही राजा से कह देनी चाहिए, अपने मतलब की बात राजा के प्रिय तथा हितकारी व्यक्तियों से कहनी चाहिए, दूसरे के मतलब की बात उचित समय एवं स्थान देखकर करनी चाहिए, और जो कुछ भी कहे वह धर्म-अर्थ से समन्वित होना चाहिए ।
प्र० ९२ : अ० ४ ] राजकर्मचारियों का व्यवहार ४२७
(१) पृष्टः प्रियहितं ब्रूयान्न ब्रूयादहितं प्रियम् ।
अप्रियं वा हितं ब्रूयाच्छृण्वतोऽनुमतो मिथः ॥
(२) तूष्णीं वा प्रतिवाक्ये स्याद् द्वेष्यादींश्च न वर्णयेत् ।
अप्रिया अपि दक्षाः स्युस्तद्भावाद् ये बहिष्कृताः ॥
अनर्थ्याश्च प्रिया दृष्टाश्चित्तज्ञानानुवर्तिनः ।
अभिहास्येष्वभिहसेद् घोरहासांश्च वर्जयेत् ॥
(३) परात् संक्रामयेद् घोरं न च घोरं स्वयं वदेत् ।
तितिक्षेतात्मनश्चैव क्षमावान् पृथिवीसमः ॥
(४) आत्मरक्षा हि सततं पूर्वं कार्या विजानता ।
अग्नाविव हि सम्प्रोक्ता वृत्ती राजोपजीविनाम् ॥
एकदेशं दहेदग्निः शरीरं वा परङ्गतः ।
सपुत्रदारं राजा तु घातयेद् वर्धयेत वा ॥
इति योगवृत्ते पञ्चमेऽधिकरणे अनुजीविवृत्तं नाम चतुर्थोऽध्यायः
आदितस्त्रिनवतितमः ।
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( १ ) राजा के पूछने पर उसकी अनुमति से प्रिय एवं हितकारी बात को कह देनी चाहिए, प्रिय होती हुई भी अहितकारी बात को न कहना चाहिए, किन्तु हितकारी बात अप्रिय भी हो तब भी कह देनी चाहिए ।
( २ ) उत्तर देते समय यदि अप्रिय बात सुनाने में डर मालूम हो तो चुप हो जाना चाहिए, राजा के द्वेष्य पुरुषों से सम्बन्ध भी नहीं रखना चाहिए, क्योंकि राजा की इच्छा पर न चलने वाले निपुण लोग भी राजा के अप्रिय बन जाते हैं । इसके विपरीत राजा के इच्छानुसार चलने वाले अनर्थकारी लोग भी राजा के प्रिय होते देखे गये हैं । राजा के हँसने पर, काठ की तरह खड़ा न रहकर, हँसना चाहिये, किन्तु अट्टहास पर सदा नियन्त्रण रखना चाहिए ।
( ३ ) किसी भयावह संदेश को स्वयं न कहकर किसी के द्वारा राजा को कहलावे । यदि अपने ही ऊपर ऐसी किसी बात का दायित्व आ जाय तो पृथ्वी के समान क्षमाशील बनकर उसके परिणाम को सहन करे ।
( ४ ) इसलिए समझदार राजकर्मचारी को चाहिए कि सर्वप्रथम वह अपनी रक्षा की सोचे, क्योंकि राज्याश्रित व्यक्तियों की स्थिति आग में खेल करने से बढ़कर खतरनाक कही गई है । क्योंकि अग्नि तो शरीर के एक अङ्ग या पूरे शरीर को ही जलाती है, किन्तु राजा समस्त परिवार को भस्म कर सकता है, और यदि अनुकूल हो गया तो सर्व सम्पन्न भी कर देता है ।
योगवृत्त नामक पञ्चम अधिकरण में चौथा अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ९३ |
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| अध्याय ५ |
समयाचारिकम्
(१) नियुक्तः कर्मसु व्ययविशुद्धमुदयं दर्शयेत् ।
(२) आभ्यन्तरं बाह्यं गुह्यं प्रकाश्यमात्ययिकमुपेक्षितव्यं वा कार्यम् 'इदमेवम्' इति विशेषयेच्च ।
(३) मृगयाद्यूतमस्त्रीषु प्रसक्तं चानुवर्तेत प्रशंसाभिः । आसन्नश्चास्य व्यसनोपघाते प्रयतेत । परोपजापातिसन्धानोपधिभ्यश्च रक्षेत् ।
(४) इङ्गिताकारौ चास्य लक्षयेत् । कामद्वेषहर्षदैन्यव्यवसायभयद्वन्द्व-विपर्यासमिङ्गिताकाराभ्यां हि मंत्रसंवरणार्थमाचरन्ति प्रज्ञाः ।
(५) दर्शने प्रसीदति । वाक्यं प्रतिगृह्णाति । आसनं ददाति । विविक्ते दर्शयते । शंकास्थाने नातिशंकते । कथायां रमते । परज्ञाप्येष्वपेक्षते । पथ्य-
व्यवस्था का यथोचित पालन
( १ ) अपने अपने कार्यों पर नियुक्त हुए कर्मचारियों को चाहिए कि वे खर्चे को घटाकर शुद्ध आमदनी ( उदय ) राजा को दिखायें ।
( २ ) कर्मचारियों को चाहिए कि दुर्ग में होने वाले तथा बाहर होने वाले कार्यों का, खुले रूप में तथा छिपकर होने वाले कार्यों का, विघ्नयुक्त एवं उपेक्षायुक्त कार्यों का विवरण स्पष्टरूप में राजा के सामने पेश करें और उन सभी बातों का लेखा रजिस्टर में दर्ज कर दें ।
( ३ ) यदि राजा शिकार, जुआ या स्त्रियों में आसक्त हो तो उसका अनुगामी बन कर, उसकी खुशामद या प्रशंसा करके उसको दुर्व्यसनों से विमुख करने का यत्न करना चाहिए । इसी प्रकार शत्रु के भेदियों, ठगों और विष देने वाले लोगों से भी राजा की रक्षा की जानी चाहिए ।
( ४ ) राजा की चेष्टाओं और आकार-प्रकारों को बड़ी कुशलता से हृदयंगम करना चाहिए, क्योंकि बुद्धिमान् लोग अपने रहस्य को छिपाये रखने के लिए काम, द्वेष, हर्ष, दैन्य; व्यवसाय, भय और सुख-दुःख को चेष्टाओं द्वारा तथा विशेष आकृतियों से ही प्रकट किया करते हैं ।
( ५ ) राजा की प्रसन्नता को इन बातों से भांपना चाहिए : वह देखने पर ही प्रसन्न हो जाता है; बात को बड़े ध्यान एवं आदर से सुनता है, बैठने के लिये उचित
प्र० ९३ : अ० ५ ] राजा के प्रति व्यवहार ४२९
मुक्तं सहते । स्मयमानो नियुङ्क्ते । हस्तेन स्पृशति । श्लाघ्ये नोपहसति । परोक्षे गुणं ब्रवीति । भक्ष्येषु स्मरति । सह विहारं याति । व्यसनेऽभ्यवपद्यते । तद्भक्तीन् पूजयति । गुह्यमाचष्टे । मानं वर्धयति । अर्थं करोति । अनर्थं प्रतिहन्ति । इति तुष्टज्ञानम् ।
(१) एतदेव विपरीतमतुष्टस्य । भूयश्च वक्ष्यामः—सन्दर्शने कोपः, वाक्यस्याश्रवणप्रतिषेधौ, आसनचक्षुषोरदानं, वर्णस्वरभेदः, एकाक्षिभ्रुकुटचोष्ठनिर्भोगः, स्वेदश्च, श्वासस्मितानामस्थानोत्पत्तिः, परिमन्त्रणम्, अकस्माद् व्रजनम्, वर्धनम् अन्यस्य, भूमिगात्रविलेखनम्, अन्तस्योपतोदनम्, विद्यावर्णदेशकुत्सा, समनिन्दा, प्रतिदोषनिन्दा, प्रतिलोमस्तवः, सुकृतानवेक्षणम्, दुष्कृतानुकीर्तनम्, पृष्ठावधानम्, अतित्यागः, मिथ्याभिभाषणम् । राजदर्शिनां च तद्वृत्तान्यत्वम् ।
आसन देता है, एकान्त में या अंतःपुर में ले जाकर मिलता है, विश्वास के कारण शंकित नहीं होता है, वार्तालाप में रुचि लेता है, समझी हुई बात में भी सलाह करने की इच्छा रखता है, मुस्कुराता हुआ कार्य पर नियुक्त करता है, हितकर कठोर बात को भी सहन करता है, बात करने में हाथ से छू लेता है, प्रशंसा योग्य कार्यों पर प्रसन्न होता है, गुणों की प्रशंसा परोक्ष में करता है, भोजन के समय स्मरण करता है, यात्रा, विहार में साथ में रहता है, दुःख दूर करने में पूरी सहायता देता है, अनुराग रखने वालों का सम्मान करता है, अपने गुप्त रहस्यों को बता देता है, मान-सत्कार बढ़ाता है, इच्छित आर्थिक सहायता देता है और अनर्थ का निवारण करता है ।
( १ ) यदि उक्त सभी बातें राजा में उल्टी पायी जाँय तो समझना चाहिए कि वह क्रुद्ध है । इसके अतिरिक्त राजा की अप्रसन्नता को इन बातों से भाँपना चाहिए, वह देखते ही कुपित हो उठता है, कही गई बात को नहीं सुनता या बीच ही में रोक देता है, बैठने के लिए स्थान नहीं देता, उसकी ओर आँख नहीं उठाता, मुख चढ़ाकर एवं आवाज बदल कर बोलता है; आँख-भौ चढ़ाकर या आँख सिकोड़ कर बोलता है, उसे पसीना आ जाता है, साँस फूलने लगती है, अकस्मात् ही मुस्कुराने लगता है, दूसरे के साथ बात करने लगता है, बीच ही में उठकर चला जाता है, दूसरा ही प्रसंग छेड़ देता है, भूमि एवं शरीर को नाखून से कुरेदने लगता है, किसी को मारने लगता है, विद्या, वर्ण तथा देश की निन्दा करने लगता है, दूसरे समान व्यक्ति के दोष की निन्दा करने लगता है, व्याज-स्तुति करने लगता है, अच्छी तरह किये गये कार्य की भी परवाह नहीं करता है, बिगड़े हुए कार्य को सर्वत्र कह डालता है, लौटते