कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
औपनिषदिक नामक चौदहवें अधिकरण में अद्भुतोत्पादन नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।
७५० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण
(१) अनिष्टै रद्भुतोत्पातैः परस्योद्वेगमाचरेत् ।
आराज्यायेति निर्वादः समानः कोप उच्यते ॥
इति औपनिषदिके चतुर्दशेऽधिकरणे प्रलम्भनेऽद्भुतोत्पादनं नाम द्वितीयोऽध्यायः;
आदितः षट्चत्वारिंशदधिकशततमः ।
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मरे हुए छोटे बच्चों को श्मशान भूमि में ही अभिषव करके उनके शरीर से निकली हुई चर्बी को पैर, जूते आदि में लेप करके बिना थकावट ही सौ योजन तक जाया जा सकता है ।
( १ ) इस प्रकार विजिगीषु राजा को चाहिए कि इन आश्चर्यजनक अद्भुत तथा अनिष्टकारक उत्पातों से वह अपने शत्रु को अच्छी तरह बेचैन करे । यद्यपि इस प्रकार का व्यापार अनिष्टकारी, और कलंकित कर देने वाला होता है, फिर भी पारस्परिक वैमनस्य बढ़ जाने के कारण, उसको उपयोग में लाना ही पड़ता है । इसलिए यहाँ पर इसका निरूपण किया गया ।
औपनिषदिक नामक चौदहवें अधिकरण में अद्भुतोत्पादन नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।
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प्रकरण १७८ | # प्रलम्भने भैषज्यमन्त्रप्रयोगः
अध्याय ३ |
(१) मार्जारोष्ट्रवृकवराहश्वाविद्वागुलीनप्तृकाकोलुकानामन्येषां वा निशाचराणां सत्त्वानामेकस्य द्वयोर्बहूनां वा दक्षिणानि वामानि वाक्षीणि गृहीत्वा द्विधा चूर्णं कारयेत् । ततो दक्षिणं वामेन वामं दक्षिणेन समभ्यज्य रात्रौ तमसि च पश्यति ।
(२) एकाम्लकं वराहाक्षि खद्योतः कालशारिबा ।
एतेनाभ्यक्तनयनो रात्रौ रूपाणि पश्यति ॥
(३) त्रिरात्रोपोषितः पुष्ये शस्त्रहतस्य शूलप्रोतस्य वा पुंसः शिरः-कपाले मृत्तिकायां यवानावाप्याविक्षीरेण सेचयेत्, ततो यवविरूढमालामा-बध्य नष्टच्छायारूपश्चरति ।
(४) त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण श्वमार्जारोलूकवागुलीनां दक्षिणानि वामानि चाक्षीणि द्विधा चूर्णं कारयेत् । ततो यथास्वमभ्यक्ताक्षो नष्ट-च्छायारूपश्चरति ।
प्रलम्भन योग में औषधि तथा मंत्र का प्रयोग
( १ ) रात में घूमनेवाले : बिल्ली, ऊँट, भेड़िया, सूअर, साही, बागुली, नप्ता, कौआ और उल्लू अथवा रात्रि में विचरण करने वाले इसी प्रकार के दूसरे प्राणी, इनमें से एक, दो या अनेकों की दोनों आँखों को निकाल कर उनका अलग-अलग चूर्ण बनाया जाय । तदनन्तर बाईं आँखों से बना चूर्ण दाईं आँख पर और दाईं आँख से बना चूर्ण बाईं आँख पर अञ्जन कर देने से मनुष्य भी रात के समय घोर अंधकार में प्रत्येक वस्तु को देख सकता है ।
( २ ) एक बड़हल ( अम्ल क ), सूअर की आंख, जुगूनू और काली शारिवा नामक औषधि को एक साथ मिलाकर आंख में लगाने से रात में सभी चीजें दिखाई देती हैं ।
( ३ ) तीन रात तक उपवास करने वाला व्यक्ति पुष्य नक्षत्र में हथियार से मारे हुए अथवा फाँसी पर चढ़ाये गये आदमी की खोपड़ी में मिट्टी भर कर उसमें जौ बो दे और उसको भेंड़ के दूध से सींचता जाय । जब वे जौ उग आते हैं तब उनकी माला पहिन कर चलने वाले व्यक्ति की न तो छाया दिखाई देती है और न रूप ही ।
( ४ ) अथवा तीन रात तक उपवास करने वाला व्यक्ति पुष्य नक्षत्र में कुत्ता,
७५२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण
(१) त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण पुरुषघातिनः काण्डकस्य शलाकामञ्जनीं च कारयेत्, ततोऽन्यतमेनाक्षिचूर्णेनाभ्यक्ताक्षो नष्टच्छायारूपश्चरति ।
(२) त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण कालायसीमाञ्जनीं शलाकां च कारयेत्; ततो निशाचराणां सत्त्वानामन्यतमस्य शिरःकपालमञ्जनेन पूरयित्वा मृतायाः स्त्रिया योनौ प्रवेश्य दाहयेत्; तदञ्जनं पुष्येणोद्धृत्य तस्यामञ्जन्यां निदध्यात् । तेनाभ्यक्ताक्षो नष्टच्छायारूपश्चरति ।
(३) यत्र ब्राह्मणमाहिताग्निं दग्धं दह्यमानं वा पश्येत्, तत्र त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण स्वयम्मृतस्य वाससा प्रसेवं कृत्वा चिताभस्मना पूरयित्वा तमाबध्य नष्टच्छायारूपश्चरति ।
(४) ब्राह्मणस्य प्रेतकार्ये या गौर्मार्यते, तस्या अस्थिमज्जाचूर्णपूर्णाऽहिभस्त्रा पशूनामन्तर्धानम् ।
बिल्ली, उल्लू और बागुली इन चारों जानवरों की दोनों आंखों का अलग-अलग चूर्ण बनाये । तदनन्तर दाईं आंखों से बने चूर्ण को दाईं आंख पर और बाईं आंखों से बने चूर्ण को बाईं आंख पर लगाने वाले व्यक्ति की छाया और काया नहीं दिखाई देती है ।
( १ ) अथवा तीन रात तक उपवास करने के बाद पुष्य नक्षत्र में जिस बाण से कोई व्यक्ति मारा गया हो उसी वाण के लोहे की एक सलाई और सुरमादानी बनवा कर कुत्ता, बिल्ली, उल्लू और बागुली इनमें से किसी की भी दाईं-बाईं आँख का अलग-अलग चूर्ण बनाकर उसी सलाई तथा सुरमादानी के द्वारा आँखों में लगाने वाला पुरुष रूप तथा छाया से रहित होकर विचरण कर सकता है ।
( २ ) अथवा तीन रात तक उपवास करने के बाद पुष्य नक्षत्र में फौलाद के लोहे की सुरमादानी-सलाई बना दी जाय और रात में घूमने वाले किसी भी जानवर की खोपड़ी को अञ्जन से भरकर उसे किसी मरी हुई स्त्री की योनि में डाल कर जला दिया जाय । तदनन्तर पुष्य नक्षत्र में उस अञ्जन को उक्त लोहे की सुरमादानी में भर दिया जाय और उसी सलाई से उस अंजन को आँखों में लगाने से भी रूप तथा छाया से रहित होकर विचरण किया जा सकता है ।
( ३ ) अथवा जहाँ पर कोई अग्निहोत्री ब्राह्मण जलाया गया हो या जलाया जा रहा हो, उस स्थान पर तीन रात तक उपवास करने के बाद पुष्य नक्षत्र में अपनी मृत्यु से मरे हुए किसी व्यक्ति के वस्त्र से एक थैली बनाकर उसमें उसी मनुष्य की चिता की राख भर दी जाय और उस पोटली को अपने किसी अंग पर बाँध दिया जाय, ऐसा करने से वह पुरुष छाया-रूप से रहित यथेच्छ कहीं भी विचरण कर सकता है ।
( ४ ) ब्राह्मण के श्राद्धकार्य में जो गाय मारी जाय उसकी हड्डी और मज्जा
प्र० १७८ : अ० ३ ] भैषज्यमन्त्रप्रयोग ७५३
(१) सर्पदष्टस्य भस्मना पूर्णा प्रचलाकभस्त्रा मृगाणामन्तर्धानम् ।
(२) उलूकबागुलीपुच्छपुरीषजान्वस्थिचूर्णपूर्णाऽहिभस्त्रा पक्षिणामन्तर्धानम् ।
(३) इत्यष्टावन्तर्धानयोगाः ।
(४) बलिं वैरोचनं वन्दे शतमायं च शम्बरम् ।
भण्डीरपाकं नरकं निकुम्भं कुम्भमेव च ॥
देवशं नारदं वन्दे वन्दे सावणिगालवम् ।
एतेषामनुयोगेन कृतं ते स्वापनं महत् ॥
यथा स्वपन्त्यजगराः स्वपन्त्यपि चमूखलाः ।
तथा स्वपन्तु पुरुषा ये च ग्रामे कुतूहलाः ॥
भण्डकानां सहस्रेण रथनेमिशतेन च ।
इमं गृहं प्रवेक्ष्यामि तूष्णीमासन्तु भाण्डकाः ॥
नमस्कृत्वा च मनवे बद्ध्वा शूनकफेलकाः ।
ये देवा देवलोकेषु मानुषेषु च ब्राह्मणाः ॥
अध्ययनपारगाः सिद्धा ये च कैलासतापसाः ।
एते च सर्वसिद्धेभ्यः कृतं ते स्वापनं महत् ॥
अतिगच्छति च मय्यपगच्छन्तु संहताः ।
अलिते वलिते मनवे स्वाहा ॥
(५) एतस्य प्रयोगः—त्रिरात्रोपोषितः कृष्णचतुर्दश्यां पुष्ययोगिन्यां
के चूर्ण से भरी हुई साँप की केंचुल को यदि किसी पशु पर बाँध दिया जाय तो उसको भी कोई नहीं देख पाता है ।
(१) यदि सर्प से कटे हुए किसी जानवर की राख को मोरपेंच की बनी हुई थैली में भर दिया जाय और वह थैली किसी जंगली जानवर के अङ्ग पर बाँध दी जाय तो वह जानवर दृष्टि से अन्तर्धान हो जाता है ।
(२) यदि उल्लू तथा बागुली दोनों की पूँछ, विष्ठा, टाँग और हड्डियों के चूर्ण को साँप की केंचुल में भर दिया जाय तो वह सभी पक्षियों के अंतर्धान का योग है ।
(३) यहाँ तक अंतर्धान होने के संबंध में आठ प्रकार के योगों का निरूपण किया गया है ।
(४) प्रस्वापन मंत्र : ( 'बलिं वैरोचनम्' आदि ये जो मंत्र दिये गये हैं इनका संबंध आगे बताये गये चार प्रकार के प्रस्वापन ( सबको सुला देने वाले ) योगों से है । अर्थ की दृष्टि से ये मंत्र सर्वथा सुबोध हैं और अर्थ की अपेक्षा उनका उपयोग उनके मूलपाठ में ही है ।
(५) उक्त मंत्रों के प्रयोग का प्रकार : तीन रात तक उपवास करने के
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७५४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण
श्वपाकीहस्ताद्बिलखावलेखनं क्रीणीयात् । तन्माषैः सह कण्डोलिकायां कृत्वा असङ्कीर्ण आदहने निखानयेत् । द्वितीयस्यां चतुर्दश्यामुद्धृत्य कुमार्या पेषयित्वा गुलिकाः कारयेत् । तत एकां गुलिकामभिमन्त्रयित्वा यत्रैतेन मन्त्रेण क्षिपति, तत्सर्वं प्रस्वापयति ।
(१) एतेनैव कल्पेन श्वाविधः शल्यकं त्रिकालं त्रिश्वेतमसङ्कीर्ण आदहने निखानयेत् । द्वितीयस्यां चतुर्दश्यामुद्धृत्यादहनभस्मना सह यत्रैतेन मन्त्रेण क्षिपति, तत्सर्वं प्रस्वापयति ।
सुवर्णपुष्पीं ब्रह्माणीं ब्रह्माणं च कुशध्वजम् ।
सर्वांश्च देवता वन्दे वन्दे सर्वांश्च तापसान् ॥
वशं मे ब्राह्मणा यान्तु भूमिपालाश्च क्षत्रियाः ।
वशं वैश्याश्च शूद्राश्च वशतां यान्तु मे सदा ।
स्वाहा । अमिले किमिले वसुजारे प्रयोगे फक्के वयुद्धे विहाले दन्त-कटके स्वाहा ।
सुखं स्वपन्तु शुनका ये च ग्रामे कुतूहलाः ।
श्वाविधः शल्यकं चैतत्त्रिश्वेतं ब्रह्मनिर्मितम् ॥
प्रसुप्ताः सर्वसिद्धा हि एतत्ते स्वापनं कृतम् ।
यावद् ग्रामस्य सीमान्तः सूर्यस्योद्गमनादिति ॥ स्वाहा ।
(२) एतस्य प्रयोगः—श्वाविधः शल्यकानि त्रिश्वेतानि । सप्तरात्रो-
पोषितः कृष्णचतुर्दश्यां खादिराभिः समिधाभिरग्निमेतेन मन्त्रेणाष्टशत-
बाद कृष्ण पक्ष के पुष्य नक्षत्र में किसी चण्डाल की स्त्री के हाथ से चूहे का एक टुकड़ा खरीद लिया जाय । उसको उड़दों के साथ एक डिब्बे में बन्द कर किसी खुले श्मशान में गढ़ा खोदकर उसमें गाड़ दिया जाय । अगली चतुर्दशी को उस डिब्बे को गढ़े से निकाल कर किसी कुमारी के द्वारा उसको पिसवा दिया जाय और उस चूर्ण की गोलियां बना दी जांय । उसके बाद एक-एक गोली को उक्त मंत्रों से अभिमंत्रित कर जिस स्थान पर फेंक दिया जाय उस स्थान के सभी प्राणी सो जाते हैं । यह पहिला योग है ।
(१) ऊपर बताये नियम के अनुसार किसी चाण्डालिनी के हाथ से साही के ऐसे कांटे खरीदे जांय, जो तीन जगह से सफेद और तीन जगह से काले हों । उन कांटों को पूर्ववत् किसी खुले श्मशान में गाड़ दिया जाय । १५ दिन के बाद अगली चतुर्दशी को उसे उखाड़ कर श्मशान की राख के साथ उपर्युक्त मंत्रों से अभिमंत्रित करके जिस स्थान पर वह कांटा फेंका जायेगा वहाँ के सभी प्राणी सो जायेंगे । यह दूसरा योग है । तीसरे प्रस्वापन योग के लिए 'सुवर्णपुष्पीं' आदि मंत्रों का विधान है—
(२) प्रयोग-विधि : पूर्वोक्त विधि के अनुसार तीन स्थानों से सफेद साही के
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सम्पातं कृत्वा मधुघृताभ्यामभिजुहुयात् । तत एकमेतेन मन्त्रेण ग्रामद्वारि गृहद्वारि वा यत्र निखन्यते, तत्सर्वं प्रस्वापयति ।
बलिं वैरोचनं वन्दे शतमायं च शम्बरम् ।
निकुम्भं नरकं कुम्भं तन्तुकच्छं महासुरम् ॥
अर्मालवं प्रमीलं च मण्डोलूकं घटोबलम् ।
कृष्णकंसोपचारं च पौलोमीं च यशस्विनीम् ॥
अभिमन्त्रयित्वा गृह्णामि सिद्धार्थं शवशारिकाम् ।
जयतु जयति च नमः शलकभूतेभ्यः स्वाहा ।
सुखं स्वपन्तु शुनका ये च ग्रामे कुतूहलाः ।
सुखं स्वपन्तु सिद्धार्थं यमर्थं मार्गयामहे ॥
यावदस्तमयादुदयो यावदर्थं फलं मम ॥ इति स्वाहा ।
**(१) एतस्य प्रयोगः—**चतुर्भक्तोपवासी कृष्णचतुर्दश्याम सङ्कीर्ण आदहने बलिं कृत्वा एतेन मन्त्रेण शवशारिकां गृहीत्वा पोत्रीपोट्टलिकां बध्नीयात् । तन्मध्ये श्वाविधः शल्यकेन विद्ध्वा यत्रैतेन मन्त्रेण निखन्यते, तत्सर्वं प्रस्वापयति ।
(२) उपैमि शरणं चार्गिण दैवतानि दिशो दश ।
अपयान्तु च सर्वाणि वशतां यान्तु मे सदा ॥ स्वाहा ।
**(३) एतस्य प्रयोगः—**त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण शर्करा एकविंशति-
कांटों को श्मशान भूमि में गाड़ दिया जाय । तदनन्तर सात रात्रि तक उपवास रखने के बाद कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को खैर आदि की समिधाओं से उक्त मंत्रों द्वारा शहद तथा घी मिलाकर उससे १०८ बार अग्नि में हवन किया जाय । उसके बाद श्मशान में गड़े हुए उन कांटों को उखाड़ कर उनको उक्त मंत्रों द्वारा अभिमंत्रित कर घर, गाँव या दरवाजा, जहाँ पर भी गाड़ दिया जाता है वहाँ के सब लोग निद्राग्रस्त हो जाते हैं । यह तीसरा योग है । चौथे प्रस्वापन योग के लिए ‘बलिं वैरोचनम्’ आदि मंत्रों का उपयोग किया जाय ।
(१) प्रयोग-विधि : चार रात तक उपवास करने के बाद कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को खुले हुए श्मशान के मैदान में पशुबलि देकर एक मरी हुई मैना को कपड़े की पोटली में बाँध लिया जाय । उसके बीच में साही का एक काँटा छेद कर उपर्युक्त मंत्र को पढ़ते हुए उस पोटली को जिस स्थान में भी गाड़ दिया जाय वहीं के सब प्राणी सो जायेंगे । यह चौथा योग है ।
( २ ) द्वार खोलने का मंत्र : बंद दरवाजा खोलने के लिए ‘उपैमि शरणम्’ आदि मंत्र का प्रयोग किया जाय ।
( ३ ) प्रयोग-विधि : तीन रात तक उपवास करने के बाद पुष्य नक्षत्र काल
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सम्पातं कृत्वा मधुघृताभ्यामभिजुहुयात् । ततो गन्धमाल्येन पूजयित्वा निखानयेत् । द्वितीयेन पुष्येणोद्धृत्यैकां शर्करामभिमन्त्रयित्वा कवाटमाहन्यात् । अभ्यन्तरं चतसृणां शर्कराणां द्वारमपाव्रियते ।
(१) चतुर्थभक्तोपवासी कृष्णचतुर्दश्यां भग्नस्य पुरुषस्यास्थ्ना ऋषभं कारयेत्; अभिमन्त्रयेच्चैतेन, द्विगोयुक्तं गोयानमाहृतं भवति; ततः परमाकाशे विक्रामति ।
(२) सदा रविरविः सगण्डपरिघाति सवं भणाति । चण्डालीकुम्भोत्तम्बकटुकसारीघः सनारीभगोऽसि स्वाहा ।
(३) तालोद्घाटनं प्रस्वापनं च ।
(४) त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण शस्त्रहतस्य शूलप्रोतस्य वा पुंसः शिरःकपाले मृत्तिकायां तुवरीरावास्योदकेन सेचयेत् । जातानां पुष्येणैव गृहीत्वा रज्जुकां वर्तयेत् । ततः सज्ज्यानां धनुषां यन्त्राणां च पुरस्ताच्छेदनं ज्याच्छेदनं करोति ।
में बहुत-सी खोपड़ियों या कंकड़ियों को लेकर उनके ऊपर अग्नि में शहद और घी से इक्कीस वार आहुति डाल कर हवन किया जाय । उसके बाद गंधमाल्य से उनकी पूजा करके एक गढा खोद कर उसमें उन्हें गाड़ दिया जाय । दूसरे पुष्य नक्षत्र में उन्हें उखाड़ कर उनमें से एक कंकड़ी को उपर्युक्त मन्त्र द्वारा अभिमंत्रित करके बंद दरवाजे पर मार दिया जाय । उसके मारने से चार कंकड़ी के बराबर किवाड़ में छेद हो जायेगा । इसी प्रकार सारे दरवाजे पर छेद करके उसको तोड़ा या खोला जा सकता है ।
( १ ) चार रात तक उपवास करने के बाद कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को किसी पुरुष की टूटी हुई हड्डी पर बैल की मूर्ति बनायी जाय । तदनन्तर उपर्युक्त विधि एवं उपर्युक्त मंत्र के द्वारा होम-पूजा आदि करके उस मूर्ति को अभिमंत्रित किया जाय । ऐसा करने से दो बैलों से जुती हुई गाड़ी वहाँ उपस्थित हो जाती है । उसके द्वारा वह साधक आकाश या पृथ्वी पर कहीं भी घूम सकता है ।
( २ ) ताला तोड़ने तथा सुला देने का मंत्र : 'सदा रविरविः' आदि मंत्र के प्रयोग की वही विधि है, जो दरवाजा खोलने वाले मंत्र के प्रसंग में बतायी गयी है ।
( ३ ) उक्त मंत्र को विधिवत् सिद्ध करके ताला तोड़ा जा सकता है और सुलाया भी जा सकता है ।
( ४ ) धनुष की डोरी काटने का प्रयोग : तीन रात तक उपवास करने के बाद पुष्यनक्षत्र काल में किसी ऐसे पुरुष की खोपड़ी में, जो हथियार से मारा गया हो या शूली पर चढ़ाया गया हो, मिट्टी भर कर उसमें तोर या अरहर बो
प्र० १७८ : अ० ३ ] भैषज्यमन्त्रप्रयोग ७५७
(१) उदकाहिभस्त्रामुच्छ्वासमृत्तिकया स्त्रियाः पुरुषस्य वा पूरयेत्, नासिकाबन्धनं मुखग्रहश्च ।
(२) वराहवस्तिमुच्छ्वासमृत्तिकया पूरयित्वा मर्कटस्नायुनावबध्नीयाद्, आनाहकारणम् ।
(३) कृष्णचतुर्दश्यां शस्त्रहताया गोः कपिलायाः पित्तेन राजवृक्षमयीममित्रप्रतिमामञ्जयात्, अन्धीकरणम् ।
(४) चतुर्भक्तोपवासी कृष्णचतुर्दश्यां बलिं कृत्वा शूलप्रोतस्य पुरुषस्यास्थ्ना कीलकान्कारयेत् । एतेषामेकः पुरीषे मूत्रे वा निखात आनाहं करोति; पादेऽस्यासने वा निखातः शोषेण मारयति; आपणे क्षेत्रे गृहे वा वृत्तिच्छेदं करोति ।
(५) एतेन कल्पेन विद्युद्दग्धस्य वृक्षस्य कीलका व्याख्याताः ।
दिया जाय और उसको जल से निरंतर सींचा जाय । जब उसमें अंकुर निकल आयें तो दूसरे पुष्यनक्षत्र काल में उसको उखाड़ कर उसकी रस्सी बनवाई जाय । उस रस्सी के द्वारा धनुष की डोरी और यंत्रों का भी छेदन किया जा सकता है ।
( १ ) जल में रहने वाले सांप की केंचुल को किसी स्त्री या पुरुष की चिता के ऊपर की मिट्टी से भर लिया जाय । यह योग जिस पर भी प्रयोग किया जाय उसका मुँह और नाक बंद हो जाते हैं ।
( २ ) इसी तरह सूअर की आंत में चिता के ऊपर की मिट्टी भर कर उसे किसी बन्दर की नाड़ी से बाँध दिया जाय तो उस योग के प्रयोग से पाखाना रुका रह जाता है ।
( ३ ) यदि कृष्ण चतुर्दशी की तिथि में हथियार से मारी गयी कपिला के पित्ते को अमलतास की शलाका से शत्रु की प्रतिमा की आंखों पर अंजन की तरह लगाया जाय तो शत्रु अंधा हो जाता है ।
( ४ ) चार रात तक उपवास करने के बाद कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी में विधिपूर्वक बलि देकर फांसी से मरे हुए किसी आदमी की हड्डी से बहुत-सी कीलें बनवायी जाँय । उनमें से एक कील को जिसके भी पेशाब या पाखाने में गाड़ दिया जाता है उसका पाखाना-पेशाब बंद हो जाता है । यदि किसी के जूते या आसन में इस कील को गाड़ दिया जाय तो वह व्यक्ति सूख-सूख कर मर जाता है । जिसकी दूकान, खेत या घर में यह कील गाड़ दी जाय उसकी आजीविका नष्ट हो जाती है ।
( ५ ) इसी प्रकार वज्र पड़े पेड़ की लकड़ी से बनाई गई कीलों के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए ।