कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context| प्रकरण | १६०-१६१ |
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| अध्याय | १ |
भेदोपादानानि, उपांशुदण्डश्च
(१) सङ्घलाभो दण्डमित्रलाभानामुत्तमः । सङ्घा हि संहतत्वादधृष्याः परेषाम् । ताननुगुणान् भुञ्जीत सामदानाभ्याम् । विगुणान् भेददण्डाभ्याम् ।
(२) काम्बोजसुराष्ट्रक्षत्रियश्रेण्यादयो वार्ताशस्त्रोपजीविनः । लिच्छिविकवृजिकमल्लकद्रककुकुरपाञ्चालादयो राजशब्दोपजीविनः ।
(३) सर्वेषामासन्नाः सत्रिणः सङ्घानां परस्परन्यङ्गद्वेषवैरकलहस्थानान्युपलभ्य क्रमाभिनीतं भेदमुपचारयेयुः—‘असौ त्वा विजलपति’ इति । एवमुभयतः । बद्धरोषाणां विद्याशिल्पद्यूतवैहारिकेष्वाचार्यव्यञ्जना बालककलहानुत्पादयेयुः । वेशशौण्डिकेषु वा प्रतिलोमप्रशंसाभिः सङ्घमुख्यमनुष्याणां तीक्ष्णाः कलहानुत्पादयेयुः । कृत्यपक्षोपग्रहेण वा ।
भेदक प्रयोग और उपांशुदण्ड
(१) भेदक प्रयोग : संघलाभ, सेनालाभ और मित्रलाभ, इन तीनों में संघ-लाभ उत्तम है; क्योंकि संगठित होने से संघों को शत्रु दबा नहीं पाता है । इन संघों के अनुकूल होने पर विजिगीषु को साम और दान के द्वारा उनका उपभोग करना चाहिए और प्रतिकूलावस्था में भेद तथा दण्ड के द्वारा उनका उपभोग करना चाहिए ।
(२) कम्बोज और सौराष्ट्र देशों के क्षत्रिय, वैश्य आदि वर्गों के संघ कृषि, व्यापार और शस्त्र के द्वारा जीविकोपार्जन करते हैं । लिच्छविक, व्रजिक, मल्लक, मद्रक, कुकुर, कुरु और पांचाल देशों के राजाओं के केवल नाममात्र के संघ होते हैं ।
(३) विजिगीषु को चाहिए कि उक्त सभी प्रकार के संघों में अपने सत्री नामक गुप्तचरों को नियुक्त करे और वे सत्री उन संघों के पारस्परिक दोष, द्वेष, वैर और कलह के कारणों को पकड़ कर धीरे-धीरे उन्हें प्रकाश में लाकर उन संघों में इस तरीके से कि 'अमुक संघ आप की ऐसी निंदा करता है' भेद डाल दे । इसी प्रकार दूसरे को भी पहिले के विरुद्ध भड़काने का यत्न करे । परस्पर द्वेष रखने वाले संघों के राजकुमारों के कपटी आचार्य बनकर गुप्तचर विद्या, शिल्प, द्यूत और प्रश्नोत्तर आदि के विषय में कलह उत्पन्न करा दे । अथवा वेश्या तथा सुरापान आदि में आसक्त संघ के मुख्य व्यक्तियों की उल्टी प्रशंसा कराकर तीक्ष्ण गुप्तचर उनमें कलह उत्पन्न करा दें । अथवा संघमुख्यों के प्रति जो कुछ, लुब्ध या भीत आदि भृत्य व्यक्ति हों उनको अपने वश में करके फिर संघों के साथ उनका कलह करा दे ।