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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में चौथा अध्याय समाप्त ।

९४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

लोहचर्माङ्गारस्नायुविषविषाणवेणुवल्कलसारदारुप्रहरणावरणाश्मनिचयान-
नैकवर्षोपभोगसहान् कारयेत् । नवेनानवं शोधयेत् ।
(१) हस्त्यश्वरथपादातमनेकमुख्यमवस्थापयेत् । अनेकमुख्यं हि परस्परभयात् परोपजापं नोपैतीति ।
(२) एतेनान्तपालदुर्गसंस्कारा व्याख्याताः ।
(३) न च बाहिरिकान्कुर्यात्पुरराष्ट्रोपघातकान् ।
क्षिपेज्जनपदस्यान्ते सर्वान्नादापयेत्करान् ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे दुर्गनिवेशश्चतुर्थोऽध्यायः;
आदितश्चतुर्विशः ॥

—: ० :—


होना चाहिये कि कई वर्षों तक उपयोग में लाने के लिए वे पर्याप्त हों । उनमें पुरानी वस्तु की जगह नई वस्तु रख देनी चाहिए ।

( १ ) हाथी, घोड़े, रथ और पैदल इन चारों प्रकार की सेनाओं को अनेक सुयोग्य सेनाध्यक्षों के संरक्षण में रखा जाना चाहिए । क्योंकि अनेक सेनाध्यक्षों की नियुक्ति से पहिला लाभ तो यह है कि पारस्परिक भय के कारण वे शत्रु में जाकर नहीं मिल पाते और दूसरा लाभ यह है कि एक अध्यक्ष के फूट जाने पर दूसरा अध्यक्ष उसका कार्य सम्भाल सकता है ।

( २ ) इन नगरदुर्गों के निर्माण के नियमों के अनुसार ही जनपद की सीमा के दुर्गों और उनके प्रबन्ध का विधान समझ लेना चाहिये ।

( ३ ) राजा को चाहिए कि वह नगर में ऐसे लोगों को न बसने दे, जिनके कारण राष्ट्र तथा नगर का नैतिक, धार्मिक एवं राष्ट्रीय स्तर गिरता हो । यदि इनको बसाना ही हो तो सीमा-प्रान्त में बसाया जाय और उनसे राज्यकर वसूल किया जाय ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में चौथा अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

प्रकरण २१सन्निधातृनिचयकर्म
अध्याय ५

(१) सन्निधाता कोशगृहं पण्यगृहं कोष्ठागारं कुप्यगृहमायुधागारं बन्धनागारं च कारयेत् ।
(२) चतुरश्रां वापीमनुदकोपस्नेहां खानयित्वा पृथुशिलाभिरुभयतः पार्श्वं मूलं च प्रचित्य सारदारुपञ्जरं भूमिसमत्रितलमनेकविधानं कुट्टिमदेशस्थानतलमेकद्वारं यन्त्रयुक्तसोपानं देवतापिधानं भूमिगृहं कारयेत् । तस्योपर्य्युभयतोनिषेधं सप्रग्रीवमैष्टकं भाण्डवाहिनीपरिक्षिप्तं कोशगृहं कारयेत्, प्रासादं वा । जनपदान्ते ध्रुवनिधिमापदर्थमभित्यक्तैः पुरुषैः कारयेत् ।
(३) पक्वेष्टकास्तम्भं चतुःशालमेकद्वारमनेकस्थानतलं विवृतस्तम्भा-


कोशगृह का निर्माण और कोषाध्यक्ष के कर्त्तव्य

( १ ) सन्निधाता ( कोषाध्यक्ष ) को चाहिए कि वह कोषगृह, पण्यगृह ( राजकीय विक्रेय वस्तुओं का स्थान ), कोष्ठागार ( भाण्डारगृह ), कुप्यगृह ( अन्नागार ), शस्त्रागार और कारागार का निर्माण करवाये ।

( २ ) सीलरहित स्थान में बावड़ी के समान एक चौरस गढ़ा खुदवाकर चारों ओर से उसकी दीवारों और उसके फर्श को मोटी मजबूत शिलाओं से चुनवाना चाहिए। उसके बीच में मजबूत लकड़ियों से बने हुए पिंजरे के समान अनेक कोठरियां हों; उसमें तीन मंजिलें हों; तीनों मंजिलों में बढ़िया दरवाजे तथा सुन्दर फर्श हों; ऊपर-नीचे चढ़ने-उतरने के लिए उसमें लिफ्ट लगा हो, उसके दरवाजों पर देवताओं की मूर्तियाँ अंकित हों, इस प्रकार का एक भूमिगृह ( तहखाना, अण्डर-ग्राउण्ड ) बनवाना चाहिए। उस भूमिगृह के ऊपर एक कोषगृह ( खजाना ) बनवाना चाहिए, उस पर भीतर-बाहर से बन्द की जाने वाली अर्गलाएँ हों, एक बरामदा हो, पक्की ईंटों से उसको बनाया गया हो, एवं वह चारों ओर अनेक पदार्थों से भरे हुए मकानों से घिरा हो । जनपद के मध्यभाग में प्राणदण्ड पाये पुरुषों के द्वारा, आपत्ति में काम आने वाला एक ध्रुवनिधि ( गुप्त खजाना ) बनवाना चाहिए ।

पण्यगृह और गोष्ठागार

( ३ ) पक्की ईंटों से चुना हुआ, चार भवनों से परिवृत, एक दरवाजे वाला,

९६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

पसारमुभयतः पण्यगृहं, कोष्ठागारं च, दीर्घबहुलशालं कक्ष्यावृतकुड्य-
मन्तः कुप्यगृहं, तदेव भूमिगृहयुक्तमायुधागारं, पृथग् ।
(१) धर्मस्थीयं महामात्रीयं विभक्तस्त्रीपुरुषस्थानमपसारतः सुगुप्त-
कक्षं बन्धनागारं कारयेत् ।
(२) सर्वेषां शालाखातोदपानवच्च स्नानगृहाग्निविषत्राणमार्जार-
नकुलारक्षाः स्वदैवपूजनयुक्ताः कारयेत् ।
(३) कोष्ठागारे वर्षमानमरत्निमुखं कुण्डं स्थापयेत् ।
(४) तज्जातकरणाधिष्ठितः पुराणं नवं च रत्नं सारं फल्गु कुप्यं वा


अनेक कक्षों एवं मंजिलों से युक्त और चारों ओर खुले हुए खम्भों वाले चबूतरे से घिरा हुआ पण्यगृह (विक्रेय वस्तुओं को रखने का घर) तथा कोष्ठागार (कोठार) बनवाना चाहिए ।

कुप्यगृह और शस्त्रागार

अनेक लम्बे दालानों से युक्त, चारों ओर अनेक कोठरियों से घिरी हुई दीवारों वाला, भीतर की ओर कुप्यगृह बनवाना चाहिए । उसी में एक तहखाना बनवाकर शस्त्रागार बनवाया जाय ।

कारागृह

(१) धर्मस्थ (न्यायाधीश) और महायाम (सन्निधाता, समाहर्त्ता आदि) से सजा पाये हुए लोगों को कारागृह में रखना चाहिए । कारागृह में स्त्री-पुरुषों के लिए अलग-अलग स्थान होने चाहिए । उसके बहिर्मार्ग तथा चारों ओर की अच्छी तरह रक्षा होनी चाहिए ।

(२) उक्त सभी कोशगृह आदि स्थानों में शाला, परिखा और कूपों की तरह स्नानागार भी बनवाने चाहिए। अग्नि और विष से भी उनकी रक्षा की जानी चाहिए । विष की रक्षा के लिए बिल्ली और नेवला आदि को पालना चाहिए । इन स्थानों की भलीभांति रक्षा की जानी चाहिए । उनके अधिष्ठित देवताओं जैसे, कोष-गृह का कुबेर, पण्यगृह तथा कोष्ठागार की श्री, कुप्यगृह का विश्वकर्मा, शस्त्रागार का यम और बन्दीगृह का वरुण आदि की पूजा करवानी चाहिए ।

(३) वर्षाजल को मापने के लिए कोष्ठागार में एक ऐसा-कुण्ड बनवाया जाना चाहिए जिसके मुँह का घेरा एक अरत्नि (चौबीस अंगुल) हो ।

(४) कोष्ठागाराध्यक्ष, प्रत्येक वस्तु के विशेषज्ञों की सहायता से नये और पुराने का भेद समझकर रत्न, चन्दन, वस्त्र, लकड़ी, चमड़ा, बाँस आदि उपयोगी वस्तुओं का संग्रह करे । यदि कोई व्यक्ति असली रत्न की जगह नकली रत्न दे और

प्र० २१ : अ० ५ ] कोषाध्यक्ष के कर्तव्य ९७

प्रतिगृह्णीयात् । तत्र रत्नोपधावुत्तमो दण्डः कर्तुः कारयितुश्च, सारोपधौ मध्यमः, फल्गुकुप्योपधौ तच्च तावच्च दण्डः ।
(१) रूपदर्शकविशुद्धं हिरण्यं प्रतिगृह्णीयाद्, अशुद्धं छेदयेत् । आहर्तुः पूर्वः साहसदण्डः ।
(२) शुद्धं पूर्णमभिनवं च धान्यं प्रतिगृह्णीयात् । विपर्यये मूलद्विगुणो दण्डः ।
(३) तेन पण्यं कुप्यमायुधं च व्याख्यातम् ।
(४) सर्वाधिकरणेषु युक्तोपयुक्ततत्पुरुषाणां पणद्विपणचतुष्पणाः, परमपहारेषु पूर्वमध्यमोत्तमवधा दण्डाः ।
(५) कोषाधिष्ठितस्य कोशावच्छेदे घातः । तद्वैयावृत्यकाराणामर्धदण्डः । परिभाषणमविज्ञाते । चोराणामभिप्रधर्षणे चित्रो घातः ।

छल से असली रत्न का अपहरण कर ले जाय तो अपहरण करने वाले और कराने वाले, दोनों को उत्तम साहसदंड दिया जाय । चन्दन आदि वस्तुओं में कपट करने पर मध्यम साहसदंड दिया जाना चाहिए । वस्त्र, लकड़ी और चमड़ा जैसे पदार्थों में छल करने वाले व्यक्ति से वैसी ही दूसरी वस्तु ले ली जाय या उसका मूल्य ले लिया जाय और उतना ही उससे दण्डरूप में वसूल कर लिया जाय ।

(१) सिक्कों के पारखी पुरुषों द्वारा स्वर्णमुद्रा का संग्रह किया जाना चाहिए । सिक्कों में से जो नकली मालूम हो उसको तत्काल ही काट दिया जाय, जिससे उसको व्यवहार में न लाया जा सके । नकली सिक्कों को लाने वाले पुरुष भी प्रथम साहस-दण्ड के अपराधी हैं ।

(२) धान्याधिकारी पुरुष को चाहिए कि वह शुद्ध, पूरा तथा नया अन्न ले । यदि वह ऐसा न करे तो उससे दुगुना दण्ड वसूल किया जाय ।

(३) इसी प्रकार पण्य, कुप्य और आयुध के सम्बन्ध में भी नियम समझने चाहिए ।

(४) प्रत्येक अधिकारी पुरुष को, उसके सहकारियों को तथा उन दोनों के बीच काम करने वाले पुरुषों को, पहली बार किसी वस्तु का अपहरण करने पर क्रमशः एक पण, दो पण और चार पण का दण्ड दिया जाना चाहिए । यदि वे फिर भी अपहरण करें तो क्रमानुसार उन्हें प्रथम साहस, मध्यम साहस और उत्तम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए । इस पर भी वे न मानें तो उन्हें प्राणदण्ड दिया जाय ।

(५) कोषाध्यक्ष यदि सुरंग आदि उपाय से कोष का अपहरण करे तो उसे प्राणदण्ड दिया जाय । इसमें अधीनस्थ लोगों को उसका आधा दण्ड दिया जाय । यदि कोष का अपहरण करने में अधीनस्थ लोगों का हाथ न हो तो उन्हें दण्ड न

७ कौ०