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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

दसवाँ अधिकरण

दसवाँ अधिकरण

साङ्ग्रामिक

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प्रकरण १४७## स्कन्धावारनिवेशः
अध्याय १

(१) वास्तुकप्रशस्ते वास्तुनि नायकवर्धकिमौहूर्तिकाः स्कन्धावारं वृत्तं दीर्घं चतुरस्रं वा, भूमिवशेन वा, चतुर्द्वारं षट्पथं नवसंस्थानमापयेयुः । खातवप्रसालद्वारारट्टलकसम्पन्नं भये स्थाने च ।

(२) मध्यमस्योत्तरे नवभागे राजवास्तुकं धनुःशतायाममर्धविस्तारं पश्चिमार्धे तस्यान्तःपुरम् । अन्तर्वैशिकसैन्यं चान्ते निविशेत । पुरस्तादुपस्थानं, दक्षिणतः कोशशासनकार्यकरणानि, वामतो राजौपवाह्यानां हस्त्यश्वरथानां स्थानम् । अतो धनुःशतान्तराश्चत्वारः शकटमेथीप्रततिस्तम्भ-


छावनी का निर्माण

(१) भवन-निर्माण-कला के विशेषज्ञों द्वारा प्रशंसित क्षेत्र में सेनापति (नायक), कारीगर (वर्धकि) और ज्योतिषी (मौहूर्तिक) ये तीनों पारस्परिक परामर्श से गोलाकार, लंबा, चौकोर या जैसी भूमि हो उसी के अनुसार चारों दिशाओं में चार दरवाजों, छह मार्गों और नौ संस्थानों (डिविजन्स = वर्गों) से युक्त सैनिक छावनी (स्कंधावार) का निर्माण करायें। खाई, सफील, परकोटा, एक प्रधान द्वार और अट्टालिकाओं से युक्त स्कंधावार उसी अवस्था में बनवाया जाय, जबकि आक्रमण का भय तथा अधिक समय तक वहाँ टिके रहने की संभावना हो।

(२) स्कंधावार के बीच में उत्तर की ओर नौवें हिस्से में सौ धनुष लंबा तथा पचास धनुष चौड़ा और राजा का निवास-स्थान बनवाया जाय। उसके आधे हिस्से में पश्चिम की ओर अंतःपुर का निर्माण कराया जाय और अन्तःपुर के समीप ही अन्तःपुररक्षकों के लिए भी स्थान बनवाये जाँय। राजगृह के सामने राजा का विश्रामस्थान (उपस्थान) होना चाहिए। राजगृह की दाहिनी ओर खजाना, सेक्रेट्रिएट (शासनकरण) और कार्य-निरीक्षकों (कार्यकरण) के स्थान बनवाये जाँय। राजगृह के बाँई ओर हाथी, घोड़ा, रथ आदि वाहनों के लिए स्थान होना चाहिए। राजगृह के कुछ दूर चारों ओर रक्षार्थ चार बाड़ बनवाये जायें, जिनमें पहली बाड़ गाड़ियों की, दूसरी बाड़ कांटेदार लताओं की, तीसरी बाड़ मजबूत

६३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवाँ अधिकरण

सालपरिक्षेपाः प्रथमे पुरस्तान्मन्त्रिपुरोहितौ, दक्षिणतः कोष्ठागारं महानसं च, वामतः कुप्यायुधागारम्, द्वितीये मौलभृतानां स्थानम्, अश्वरथानां, सेनापतेश्च। तृतीये हस्तिनः श्रेण्यः प्रशास्ता च। चतुर्थे विष्टिनायको मित्रामित्राटवीबलं स्वपुरुषाधिष्ठितम्। वणिजो रूपाजीवाश्चानुमहापथम्। बाह्यतो लुब्धकश्वगणिनः सत्यग्नयो गूढाश्चारक्षाः।
(१) शत्रूणामापाते कूपकूटावपातकण्टकिनीश्च स्थापयेत्। अष्टादशवर्गाणारक्षविपर्यासं कारयेत्। दिवायामं च कारयेदपसर्पज्ञानार्थम्।
(२) विवादसौरिकसमाजद्यूतवारणं च कारयेत्। मुद्रारक्षणं च। सेनानिवृत्तमायुधीयमशासनं शून्यपालोऽनुबध्नीयात्।

लकड़ी के खंभों की और चौड़ी बाड़ मजबूत चहार-दीवारी के ढंग की होनी चाहिए। प्रत्येक बाड़ का फासला सौ-सौ धनुष का होना चाहिए। पहली बाड़ के बीच में सामने की ओर मंत्रियों और पुरोहितों के स्थान बनवाने चाहिए। दाहिनी ओर भोजन-भंडार और रसोईघर होने चाहिए। बाँई ओर लोहा, ताँबा, लकड़ी आदि रखने की जगह और आयुधागार होने चाहिए। दूसरी बाड़ के बीच में मौलभृत आदि सेनाओं के स्थान और घोड़ों तथा सेनापति के स्थान होने चाहिए। इसी प्रकार बाड़ के तीसरे-घेरे में हाथियों, श्रेणीबल तथा प्रशास्ता (कंटकशोधन का अध्यक्ष) के स्थान होने चाहिए। बाड़ के चौथे घेरे में कर्मचारीवर्ग (विष्ट), नायक (दस सेनापतियों का प्रधान) और अपने विश्वस्त अधिकारी से संरक्षित मित्रसेना शत्रुसेना तथा आटविकसेना के स्थान बनवाये जाँय। व्यापारी और वेश्याओं के स्थान, बड़े बाजार (महापथ) में बनवाये जाँय। बहेलिये, शिकारी, बाजे तथा अग्नि आदि के इशारे से शत्रु के आगमन की सूचना देने वाले और ग्वाले आदि के वेष में रहने वाले रक्षकों को सबसे बाहर की ओर बसाया जाय।

(१) जिस मार्ग के शत्रु के आने की संभावना हो वहाँ कुएँ, गढे आदि खोदकर और लोहे की कीलों या काँटों से युक्त तख्तों को बिछाकर शत्रु को रोकने का प्रबन्ध किया जाय। हर समय पहरे के लिए अठारह वर्गों को बारी-बारी से नियुक्त किया जाय। शत्रु के गुप्तचरों का पता लगाने के लिए दिन-रात अपने आदमियों को घूमने के लिए नियुक्त करना चाहिए।

(२) आपसी झगड़ों, मदिरापान और जुआ आदि खेलने से सैनिकों को सर्वथा रोक लिया जाय। छावनी के भीतर-बाहर जाने-आने के लिए राजकीय मुहर का पास बनाया जाय। राजा की लिखित आज्ञापत्र के बिना युद्धभूमि से लौटने वाले सैनिकों को, शून्यपाल (राजधानी का रक्षण-अधिकारी) गिरफ्तार कर ले।

प्र० १४७ : अ० १ ] छावनी का निर्माण ६३९

(१) पुरस्तादध्वनः सम्यक्प्रशास्ता रक्षणानि च ।
यायाद्वर्द्धकिविष्टिभ्यामुदकानि च कारयेत् ॥

इति सांग्रामिके दशमेऽधिकरणे स्कन्धावारनिवेशो नाम प्रथमोऽध्यायः;
आदितोऽष्टाविंशदुत्तरशततमः ।

—: ० :—


( १ ) प्रशास्ता ( कंटकशोधन-अधिकारी ) को चाहिए कि वह सेना और राजा के प्रस्थान करने से पहिले कारीगरों, मजदूरों तथा अध्यक्षों को साथ लेकर चला जाय और मार्गरक्षा का तथा आवश्यकतानुसार जल आदि का अच्छी तरह प्रबंध करे ।

इति सांग्रामिक नामक दसवें अधिकरण में स्कन्धावारनिवेश नामक
पहला अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

प्रकरण १४८-१४९स्कन्धावारप्रयाणां बलव्यसनाव-
अध्याय २स्कन्दकालरक्षणं च

(१) ग्रामारण्यानामध्वनि निवेशान् यवसेन्धनोदकवशेन परिसंख्याय स्थानासनगमनकालं च यात्रां यायात् । तत्प्रतीकारद्विगुणं भक्तोपकरणं वाहयेत् । अशक्तो वा सैन्येष्ववायोजयेत् । अन्तरेषु वा निचिनुयात् ।
(२) पुरस्तान्नायकः । मध्ये कलत्रं स्वामी च । पार्श्वयोरश्वा बाहूत्सारः । चक्रान्तेषु हस्तिनः । प्रसारवृद्धिर्वा सर्वतः । वनाजीवः प्रसारः । स्वदेशादन्वायतिर्वीवधः । मित्रबलमासारः । कलत्रस्थानमपसारः । पश्चात्सेनापतिः पर्यायान्निविशेत ।


छावनी का प्रमाण और आपत्ति एवं आक्रमण के समय सेना की रक्षा

( १ ) गावों, जंगलों तथा मार्गों में ठहरने योग्य स्थानों का घास, लकड़ी तथा जल आदि के अनुसार निर्णय कर और वहाँ पर पहुँचने, ठहरने, वहाँ से जाने आदि का पहिले ही से समय का निश्चय करके फिर विजिगीषु को यात्रा के लिए घर से निकलना चाहिए । उस यात्रा में खाने-पीने और पहनने ओढ़ने के लिए जितने समान की आवश्यकता हो, उससे दुगुना सामान साथ रखना चाहिए । यदि इतना सब सामान सवारियों पर ही न जा सके तो उसमें से थोड़ा-थोड़ा सैनिकों को दिया जाय । अथवा पड़ाव के लिए नियुक्त स्थानों से आवश्यक सामान को संग्रह करके साथ ले जाना चाहिए ।

( २ ) सेना के सबसे आगे दस सेनापतियों के प्रमुख नायक को चलना चाहिए, बीच में अन्तःपुर तथा राजा चले, अगल-बगल में भुजाओं से ही शत्रु के आघात को रोकने वाली घुड़सवारसेना चले, पिछले भाग में हाथी चलें, और अन्न, घास, भूसा आदि सब सामान चारों ओर से ले जाया जाय । जंगल में पैदा होने वाले अन्न, घास आदि आजीविका-योग्य वस्तुओं को प्रसार कहते हैं । अपने ही देश से अनाज आदि द्रव्यों के आयात को वीवध कहते हैं । मित्र की सेना को आसार कहा जाता है । रानियों के ठहरने के स्थान को अपसार कहते हैं । यात्राकाल में अपनी-अपनी सेना के सबसे पीछे सेनापति रहे ।

प्र० १४८-१४९ : अ० २ ] छावनी-सम्बन्धी विचार ६४१

(१) पुरस्तादभ्याघाते मकरेण यायात्, पश्चाच्छकटेन, पार्श्वयोर्वज्रेण, समन्ततः सर्वतोभद्रेण, एकायने सूच्या ।
(२) पथि द्वैधीभावे स्वभूमितो यायात् । अभूमिष्ठानां हि स्वभूमिष्ठा युद्धे प्रतिलोमा भवन्ति । योजनमधमा, अध्यर्धं मध्यमा, द्वियोजनमुत्तमा, संभाव्या वा गतिः ।
(३) आश्रयकारी, सम्पन्नघाती, पार्ष्णिरासारो मध्यम उदासीनो वा प्रतिकर्त्तव्यः, संकटो मार्गः शोधयितव्यः, कोशो दण्डो मित्रामित्राटवीबलं विष्टिरृतुश्च प्रतीक्ष्याः कृतदुर्गकर्मनिचयरक्षाक्षयः क्रीतबलनिर्वेदो मित्रबलनिर्वेदश्चागमिष्यति, उपजपिलारो वा नातित्वरयन्ति, शत्रुरभिप्रायं वा पूरयिष्यति इति शनैर्यायात् । विपर्यये शीघ्रम् ।


( १ ) यदि सामने की ओर से शत्रु के आक्रमण की आशंका हो तो 'मकराकार व्यूह' की रचना करके शत्रु की ओर बढ़ना चाहिए, यदि आक्रमण की पीछे से संभावना हो तो 'शकटव्यूह' बनाकर आगे बढ़ना चाहिए, यदि अगल-बगल से आक्रमण की संभावना हो तो 'चक्रव्यूह' बनाकर आगे बढ़ना चाहिए, और यदि चारों ओर से आक्रमण की संभावना हो तो 'सर्वतोभद्रव्यूह' बनाकर, यदि मार्ग इतना तंग हो कि उससे एक साथ न जाया जाय तो 'सूचीव्यूह' बनाकर आगे बढ़ना चाहिए ।

( २ ) यदि मार्ग में किसी प्रकार की द्विविधा हो तो उसी मार्ग से प्रस्थान करना चाहिए जिससे चतुरंगिनी सेना आसानी से जा सके, क्योंकि अनुकूल मार्ग से चलने वाले राजा पर प्रतिकूल मार्ग से चलने वाला राजा आक्रमण नहीं कर सकता है । प्रतिदिन एक योजन ( चार कोस ) चलना अधम गति है, डेढ़ योजन चलना मध्यम गति और दो योजन चलना उत्तम गति कहलाती है । अथवा सुविधानुसार प्रतिदिन जितना चला जा सके, उतना चलना चाहिए ।

( ३ ) विजिगीषु जब यह सोचे कि 'अपनी उन्नति के लिए मुझे किसी राजा को अपना आश्रय बनाना चाहिए, अथवा धनधान्य-सम्पन्न किसी शत्रुदल को नष्ट करना है, या पार्ष्णिग्राह, आसार, मध्यम और उदासीन राजा का प्रतीकार करना है, तो धीरे से यात्रा करे । ऊबड़-खावड़ मार्ग को साफ करने के लिए भी धीरे से ही यात्रा करे । अथवा जब कोष, अपनी सेना, मित्रसेना, शत्रुसेना, आटविक सेना, कारीगर और अपनी सेना के अनुकूल ऋतु की प्रतीक्षा करनी हो तो तब भी धीरे-धीरे यात्रा करे । अथवा जब यह संभावना हो कि शत्रु का दुर्ग बेमरम्मत है, उसका संगृहीत धान्य भी समाप्त प्राय है, उसके रक्षा-साधन भी विनष्ट हैं, धन देकर अपने वश में की हुई सेना भी उससे खिन्न है और मित्रसेना भी उससे विरक्त है, तो भी धीरे-धीरे यात्रा करे । अथवा जब समझे कि शत्रुद्रोही लोग अभी जल्दी में नहीं हैं,

४१ कौ०