कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में स्वाम्यधिकार नामक
प्र० ६९ : अ० १३ ] दास और श्रमिक सम्बन्धी नियम ३१५
(१) नदीवेगज्वालास्तेनव्यालोपरुद्धः सर्वस्वपुत्रदारात्मदानेनार्त-स्त्रातारमाहूय निस्तीर्णः कुशलप्रदिष्टं वेतनं दद्यात् । तेन सर्वत्रार्तदानानुशया व्याख्याताः ।
(२) लभेत पुंश्चली भोगं सङ्गमस्योपलिङ्गनात् ।
अतियाच्ञा तु जीयेत दौर्मत्याविनयेन वा ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे स्वाम्यधिकारो नाम त्रयोदशोऽध्यायः,
आदित एकोनसप्ततितमः ।
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( १ ) नदी के प्रवाह में बहता हुआ या अग्नि, चोर, सांप और हिंसक पशुओं से घिरा हुआ कोई व्यक्ति यदि जान बचाने की गरज से किसी को अपना सर्वस्व, स्त्री, पुत्र धन आदि, देने का वायदा कर आपत्ति से बच जाय तो उस पर तत्कालीन चतुर व्यक्ति जो भी निर्णय दे दें उसी के अनुसार रक्षक को दिया जाय । इसी प्रकार आपद्युक्त लोगों के दूसरे प्रणों के सम्बन्ध में भी जान लेना चाहिए ।
( २ ) वेश्या को चाहिए कि वह संभोग शुल्क को पहिले ही ले ले । यदि वह बुरी नियत से या डरा-धमका कर अनुचित तरीके से अधिक धन लेना चाहे तो उसे वह कदापि न दिया जाय ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में स्वाम्यधिकार नामक
तेरहवाँ अध्याय समाप्त
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प्रकरण ७०
अध्याय १४
कर्मकरकल्पः, सम्भूयसमुत्थानम्
(१) गृहीत्वा वेतनं कर्म अकुर्वतो भृतकस्य द्वादशपणो दण्डः । संरोधश्चाकारणात् ।
(२) अशक्तः कुत्सिते कर्मणि व्याधौ व्यसने वा अनुशयं लभेत, परेण वा कारयितुम् । तस्य व्ययकर्मणा लभेत, भर्ता वा कारयितुम् ।
(३) नान्यस्त्वया कारयितव्यो मया वा नान्यस्य कर्तव्यमित्यवरोधे भर्तुरकारयतो भृतकस्याकुर्वतो वा द्वादशपणो दण्डः । कर्मनिष्ठापने भर्तुरन्यत्र गृहीतवेतनो नासकामः कुर्यात् ।
(४) उपस्थितमकारयतः कृतमेव विद्यादित्याचार्याः ।
(५) नेति कौटिल्यः । कृतस्य वेतनं, नाकृतस्यास्ति । स चेदल्पमपि कारयित्वा न कारयेत्, कृतमेवास्य विद्यात् । देशकालातिपातनेन कर्मणा-
मजदूरी के नियम और साझेदारी का हिस्सा
(१) वेतन लेकर जो नौकर कार्य न करे उस पर बारह पण दण्ड किया जाय । यदि अकारण ही वह कार्य न करे तो उसे कारावास में बन्द कर दिया जाय ।
(२) किसी अशक्त, कुत्सित कार्य के आ जाने पर, बीमारी में या किसी आपत्ति में फँस जाने के कारण नौकर आकस्मिक छुट्टी (अनुशय) ले सकता है; अथवा अपनी एवज में किसी दूसरे व्यक्ति को रखकर छुट्टी ले सकता है। स्थानापन्न नौकर की मजदूरी उसके कार्य से ही पूरी की जाय अथवा मालिक ही किसी दूसरे से कार्य ले ।
(३) 'न तो आप किसी से कार्य करवायेंगे और न मैं ही किसी का कार्य करूँगा' इस प्रकार के आपसी समझौते को यदि मालिक भंग करे तो बारह पण दण्ड और यदि नौकर भंग करे तो भी बारह पण दण्ड दिया जाय । यदि किसी मजदूर ने दूसरी जगहों से अग्रिम वेतन ले लिया हो, तो पहिले मालिक का कार्य पूरा करने पर ही, वह दूसरी जगह जा सकता है ।
(४) कुछ आचार्यों का अभिमत है कि हाजिर हुआ मजदूर यदि कुछ कार्य न भी करे तो हाजिरी मात्र से ही उसका कार्य समझ लिया जाय ।
(५) परन्तु आचार्य कौटिल्य ऐसा नहीं मानते हैं। उनका कथन है कि वेतन कार्य करने का दिया जाता है, खाली बैठने का नहीं। यदि मालिक थोड़ा ही काम
प्र० ७० : अ० १४ ] मजदूरी के नियम ३१७
मन्यथाकरणे वा नासकामः कृतमनुमन्येत । सम्भाषितादधिकक्रियायां प्रयासं न मोघं कुर्यात् ।
(१) तेन संघभृता व्याख्याताः । तेषामाधिः सप्तरात्रमासीत । ततोऽन्यमुपस्थापयेत्; कर्मनिष्पाकं च । न चानिवेद्य भर्तुः संघः कंचित्परिहरेदुपनयेद्वा । तस्यातिक्रमे चतुर्विंशतिपणो दण्डः । संघेन परिहृतस्यार्धदण्डः । इति भृतकाधिकारः ।
(२) सघंभृताः सम्भूयसमुत्थातारो वा यथासम्भाषितं वेतनं समं वा विभजेरन् ।
(३) कर्षकवैदेहका वा सस्यपण्यारम्भपर्यवसानान्तरे सन्नस्य यथाकृतस्य कर्मणः प्रत्यंशं दद्युः । पुरुषोपस्थाने समग्रमंशं दद्युः । संसिद्धे तूद्धृतपण्ये सन्नस्य तदानीमेव प्रत्यंशं दद्युः । सामान्या हि पथि सिद्धिश्चासिद्धिश्च ।
कराके फिर न कराये तो नौकर का पूरा काम किया हुआ समझा जाय । मालिक के आज्ञानुसार ठीक स्थान और समय पर काम न करने से या कार्यों को उलटा कर देने से नौकर काम किया हुआ न समझा जाय । मालिक जितना काम बताये नौकर यदि उससे अधिक कार्य कर डाले तो वह अतिरिक्त मेहनत व्यर्थ समझनी चाहिए ।
( १ ) मिल, कारखाना और कम्पनियों में काम करने वाले मजदूरों के लिए भी यही नियम समझना चाहिए । ठीक तरह से कार्य न करने वाले मजदूरों की सात दिन की मजदूरी दबाये रखनी चाहिए, इतने पर भी यदि वे ठीक तरह से कार्य न करें तो वह कार्य दूसरे को दे देना चाहिए, और उस कार्य को ठीक कराकर दूसरे को उचित मजदूरी दे देनी चाहिए । मजदूरों को चाहिए कि मालिक को बिना सूचित किये वे न तो किसी वस्तु को नष्ट करें और न ले जाँय । इस नियम का उल्लंघन करने पर चौबीस पण दण्ड दिया जाय यदि सभी मजदूर मिलकर ऐसा करें तो उनको आधा दण्ड दिया जाय । यहाँ तक मजदूरों ( भृतकों ) के सम्बन्ध में निरूपण किया गया ।
( २ ) संघ से एक मुष्ट मजदूरी पाने वाले या मिलकर ठेके आदि पर काम करने वाले मजदूर पहले से तय की हुई मजदूरी आपस में बराबर-बराबर बांट लें ।
( ३ ) किसान को चाहिए कि वह फसल के आरम्भ से अन्त तक और खरीद-फरोख्त करने वाले व्यापारी को चाहिए कि माल खरीदने से लेकर बेचने तक वे अपने साझीदार को उसके कार्य के अनुसार हिस्सा दें । यदि कोई साझीदार अपनी एवज में किसी दूसरे व्यक्ति को नियत कर दे तब भी उसका पूरा हिस्सा दिया जाय, माल बिक जाने पर दुकान उठने से पहिले ही साझीदार को उसका हिस्सा भी दिया जाय; क्योंकि आगे कार्य करने सफलता और असफलता समान है ।
३१८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) प्रक्रान्ते तु कर्मणि स्वस्थस्यापक्रामतो द्वादशपणो दण्डः । न च प्राकाम्यमपक्रमणे ।
(२) चोरं त्वभयपूर्वं कर्मणः प्रत्यंशेन ग्राहयेद्, दद्यात्प्रत्यंशमभयं च । न पुनस्तेये प्रवासनमन्यत्र गमने च । महापराधे तु दूष्यवदाचरेत् ।
(३) याजकाः स्वप्रचारद्रव्यवजं यथासम्भाषितं वेतनं समं विभजेरन् ।
(४) अग्निष्टोमादिषु च ऋतुषु दीक्षणादूर्ध्वं याजकः सन्नः पंचममंशं लभेत । सोमविक्रयादूर्ध्वं चतुर्थमंशम् । मध्यमोपसदः प्रवर्त्योद्वासनादूर्ध्वं तृतीयमंशम् । माध्यादूर्ध्वमर्धमंशम् । सुत्ये प्रातस्सवनादूर्ध्वं पादोनमंशम् । माध्यन्दिनात् सवनादूर्ध्वं समग्रमंशं लभेत । नीता हि दक्षिणा भवन्ति । बृहस्पतिसवनवर्जं प्रतिसवनं हि दक्षिणा दीयन्ते । तेनाहर्गणदक्षिणा व्याख्याताः ।
( १ ) कार्य चालू रहते हुए यदि कोई स्वस्थ व्यक्ति कार्य को छोड़कर चला जाय तो उसे बारह पण दण्ड दिया जाय; क्योंकि इस प्रकार काम छोड़कर चले जाना किसी की इच्छा पर निर्भर नहीं होता ।
( २ ) यदि कोई साझीदार चोरी कर ले तो उसको क्षमाकर उससे सच-सच बात बतला देने एवं उसका पूरा हिस्सा देने के लिए कहा जाय; और यदि वह सच-सच बतला दे तो उसको पूरा हिस्सा देकर माफ किया जाय । यदि वह फिर भी चोरी करे और यदि दूसरे देश में जाकर के चोरी करे तो उसे साझीदारी से अलग कर देना चाहिए, यदि वह कोई बड़ा अपराध करे तो उसके साथ राजकीय अपराधी जैसा व्यवहार किया जाय ।
( ३ ) याज्ञिकों का बँटवारा : यज्ञ करने वाले निजी उपयोग में आने वाली वस्तुओं को छोड़कर बाकी सारे वेतन को पूर्व निश्चय के अनुसार या बराबर-बराबर बाँट लें ।
( ४ ) अग्निष्टोम आदि यज्ञों में दीक्षा के बाद ही यदि अकस्मात् याजक बीमार पड़ जाय तो उसे पूर्व निश्चित सामग्री वेतन आदि का पाँचवाँ हिस्सा दिया जाय । यदि याजक सोम-विक्रय के बाद बीमार पड़े तो चौथा हिस्सा; मध्यमोपषद सम्बन्धी प्रवर्त्योद्वासन ( सोम तैयार करने सम्बन्धी क्रिया ) के बाद बीमार पड़े तो दूसरा हिस्सा; मध्यमोपषद के बाद बीमार पड़े तो आधा हिस्सा; सोम के अभिषव काल में प्रातःसवन के बाद बीमार पड़े तो तीन हिस्से; और माध्यन्दिन सवन के बाद बीमार पड़े तो सम्पूर्ण दक्षिणा ले ले, क्योंकि यज्ञ की समाप्ति पर दक्षिणा पूरी हो जाती है । बृहस्पति सवन को छोड़कर शेष सभी सवनों में दक्षिणा दी जाती है । इसी प्रकार अहर्गण आदि में दी जाने वाली दक्षिणाओं के सम्बन्ध में भी समझना चाहिये ।