कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्र० १६०-१६१ : अ० १ ] भेदक-प्रयोग और उपांशुदण्ड ६७१
पयेत् । कार्तान्तिकादिश्चास्य वर्गो राजलक्षण्यतां सङ्घेषु प्रकाशयेत् । सङ्घ-मुख्यांश्च धर्मिष्ठानुपजपेत्—'स्वधर्मममुष्य राज्ञः पुत्रे भ्रातरि वा प्रतिपद्य-ध्वम्' इति । प्रतिपन्नेषु कृत्यपक्षोपग्रहार्थमर्थं दण्डं च प्रेषयेत् ।
(१) विक्रमकाले शौण्डिकव्यञ्जनाः । पुत्रदारप्रेतापदेशेन 'नैषेच-निकम्' इति मदनरसयुक्तान् मद्यकुम्भान् शतशः प्रयच्छेयुः ।
(२) चैत्यदैवतद्वाररक्षास्थानेषु च सत्रिणः समयकर्मनिक्षेपं सहिरण्या-भिज्ञानमुद्राणि हिरण्यभाजनानि च प्ररूपयेयुः, दृश्यमानेषु च सङ्घेषु 'राज-कीयाः' इत्यावेदयेयुः । अथावस्कन्दं दद्यात् ।
(३) सङ्घानां वा वाहनहिरण्ये कालिके गृहीत्वा संघमुख्याय प्रख्यातं द्रव्यं प्रयच्छेत् । तदेषां याचिते 'दत्तममुष्मै मुख्याय' इति ब्रूयात् ।
के रूप में नियुक्त करे और संबंधित ज्योतिषी तथा सामुद्रिक लिच्छवी-संघों में जाकर उस राजपुत्र को राज-लक्षणों से युक्त प्रकाशित करें । उन संघों के जो मुख्य धार्मिक व्यक्ति हैं उनको इस प्रकार बहकाया जाय कि 'अमुक राजपुत्र या राजमाता को संघ के लोग कैद में डाल कर बहुत कष्ट दे रहे हैं; आप ही इस बीच धर्मात्मा व्यक्ति हैं, इसलिए आप ही उस निर्दोष राजपुत्र की रक्षा करें ।' जब संघ के मुख्य लोग इस बात को स्वीकार कर लें तब क्रुद्ध, लुब्ध एवं भीत कृत्य व्यक्तियों को अपने अनुकूल बनाने के लिए संघ के मुख्य व्यक्तियों के पास सहायतार्थ धन तथा सेना भेजी जाय ।
( १ ) जब युद्ध की तैयारी हो जाय; तब शराब बेचने वाले छद्मवेष गुप्तचर अपने स्त्री-पुत्रों के मर जाने का बहाना बनाकर 'यह नैषेचनिक मद्य है, अपने दिवंगत स्त्री-पुत्रों के निमित्त इसको हम आप लोगों के लिए भेंट करते हैं' ऐसा कह कर विष-रस से भरे हुए सैकड़ों घड़े लाकर उन्हें थमा दें ।
( २ ) देवालय तथा अन्य पवित्र स्थानों के दरवाजों पर और रक्षास्थानों के सभी गुप्तचर संघ के मुखिया के साथ शर्त के तौर पर अमानत के रूप में दिया जाने वाला धन, अभिज्ञात सुवर्ण मुद्रा सहित तथा अन्य सुवर्ण के पात्र आदि वस्तुओं को संघ के अन्य व्यक्तियों के समक्ष इस प्रकार प्रकट करें कि वे इस बात को जान लें । बात के खुल जाने पर जब संघ के लोग यह पूछें कि 'यह सुवर्ण का सामान किसका है ?' तब उनको उत्तर दिया जाय कि 'यह राजा का है ।' इस प्रकार संघों में पारस्परिक फूट पड़ जाने के बाद विजिगीषु फौरन उन पर धावा बोल दे ।
( ३ ) अथवा सभी गुप्तचर किसी बहाने से संघ के लोगों से घोड़े, सवारी तथा हिरण्य आदि को नियत समय पर वापिस कर देने के वायदे पर ले ले, और समय आने पर सब लोगों के सामने उस सामान को संघ के मुखिया को वापिस कर दे ।