कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
( ११ ) वृत्तसंघ : ग्यारहवाँ अधिकरण
( ८० )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ४ : युद्धयोग्य भूमि और पदाति, अश्व, रथ तथा हाथी आदि सेनाओं के कार्य | ६५१ |
| ५ : पक्ष, कक्ष तथा उरस्य आदि विशेष व्यूहों का सेना के परिणाम के अनुसार व्यूह विभाग, सार तथा फल्गु वलों का विभाग और चतुरङ्ग सेना का युद्ध | ६५५ |
| ६ : प्रकृतिव्यूह, विकृतिव्यूह और प्रतिव्यूह की रचना | ६६२ |
( ११ ) वृत्तसंघ : ग्यारहवाँ अधिकरण
१ : भेदक प्रयोग और उपांशुदण्ड | ६६९
( १२ ) आबलीयस : बारहवाँ अधिकरण
१ : दूतकर्म | ६७९
२ : मन्त्र-युद्ध | ६८३
३ : सेनापतियों का वध और राजमण्डल की सहायता | ६८८
४ : शस्त्र, अग्नि तथा रसों का गूढ़ प्रयोग और वीवध, आसार तथा प्रसार का नाश | ६९२
५ : कपट उपायों या दण्ड-प्रयोगों द्वारा और आक्रमण के द्वारा विजयोपलब्धि | ६९६
( १३ ) दुर्गलम्भोपाय : तेरहवाँ अधिकरण
१ : उपजाप | ७०५
२ : कपट उपायों द्वारा राजा को लुभाना | ७०६
३ : गुप्तचरों का शत्रु-देश में निवास | ७१५
४ : शत्रु के दुर्ग को घेरकर अपने अधिकार में करना | ७२२
५ : विजित देश में शान्ति की स्थापना | ७३१
( १४ ) औपनिषदिक : चौदहवाँ अधिकरण
१ : शत्रु-वध के प्रयोग | ७३७
२ : प्रलम्भन योग में अद्भुत उत्पादन | ७४४
३ : प्रलम्भन योग में औषधि तथा मन्त्र का प्रयोग | ७५१
४ : शत्रु द्वारा किये गये घातक प्रयोगों का प्रतीकार | ७६०
( १५ ) तन्त्रयुक्ति : पन्द्रहवाँ अधिकरण
१ : अर्थशास्त्र की युक्तियाँ | ७६५
चाणक्य-सूत्र | ७७५
पारिभाषिक शब्दकोश | ८०१
शब्द-सूची | ८१७
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॥ श्रीः ॥
कौटिलीयम्
अर्थशास्त्रम्
ॐ
नमः शुक्रबृहस्पतिभ्याम् ।
(१) पृथिव्या लाभे पालने च यावन्त्यर्थशास्त्राणि पूर्वाचार्यैः प्रस्था-
पितानि प्रायशस्तानि संहृत्यैकमिदमर्थशास्त्रं कृतम् ।
(२) तस्यायं प्रकरणाधिकरणसमुद्देशः ।
कौटिल्य का
अर्थशास्त्र
ॐ
शुक्राचार्य और बृहस्पति के लिए नमस्कार है ।
( १ ) पृथिवी की प्राप्ति और उसकी रक्षा के लिए पुरातन आचार्यों ने जितने भी अर्थशास्त्र-विषयक ग्रन्थों का निर्माण किया उन सबका सार-संकलन कर प्रस्तुत अर्थशास्त्र की रचना की गई है ।
( २ ) इस अर्थशास्त्र के प्रकरणों और अधिकरणों का निरूपण इस प्रकार है :