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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

७४० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

७४० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

(१) शारिकाकपोतबकबलाकाण्डमर्काक्षिपोलुकस्नुहिक्षीरपिष्टमन्धीकरणमञ्जनमुदकदूषणं च ।
(२) यवकशालिमूलमदनफलजातीपत्रनरमूत्रयोगाः प्लक्षविदारीमूलयुक्तो मूकोदुम्बरमदनकोद्रवक्वाथयुक्तो हस्तिकर्णपलाशक्वाथयुक्तो वा मदनयोगः । शृङ्गिगौतमवृक्षकण्टकारमयूरपदीयोगो गुञ्जालाङ्गलीविषमूलिकेङ्गुदीयोगः करवीराक्षिपोलुकार्कमृगमारणीयोगो मदनकोद्रवक्वाथयुक्तो हस्तिकर्णपलाशक्वाथयुक्तो वा मदनयोगः । समस्ता वा यवसेन्धनोदकदूषणाः ।
(३) कृतकण्डलकृकलासगृहगौलिकान्धाहिकधूमो नेत्रवधमुन्मादं च करोति ।
(४) कृकलासगृहगौलिकायोगः कुष्ठकरः ।
(५) स एव चित्रभेकान्त्रमधुयुक्तः प्रमेहमापादयति, मनुष्यलोहितयुक्तः शोषम् ।


( १ ) मैना, कबूतर, बगला और बगली इन पक्षियों की विष्ठा को आक, अक्षी पीलु तथा सेंहुड़ ( स्नुही ) के दूध में मिला कर जो अंजन बनाया जाता है वह प्राणियों को अंधा करने वाला तथा जल को विषाक्त कर देने वाला होता है ।

( २ ) जौ ( यव ), धान ( शाली ), इन दोनों की जड़, तथा मैनफल, चमेली, जावित्री और आदमी का पेशाब, इन सब चीजों को मिलाकर फिर उनमें पिलखन या लाख देने वाले पीपल तथा विदारी की जड़ों का योग कर दिया जाय, अथवा गंदे पानी में बने हुए गूलर, धतूरा और कोदों के क्वाथ का योग कर दिया जाय; या धनियाँ तथा पलाश के क्वाथ का योग कर दिया जाय तो मदनरस तैयार हो जाता है, जो कि आदमी को पागल या बेहोश बना देता है । श्रृंगी नामक मछली का पित्त ( शृंगिगौतम ), लोध, सेंमल तथा अजमोदा का योग; अथवा रत्ती, जल पीपल या नारियल, कालकूट आदि विष, तथा इंगुदी का योग; अथवा कनेर ( करवीर ), अक्षी ( बहेड़े के जैसा पेड़ ), पीलु, आक तथा मृगमारिणी औषधि का योग; धतूरा और कोदो के क्वाथ के साथ; या धनिया और पलाश के क्वाथ के साथ मिलाकर मदनयोग तैयार होता है । इस प्रकार के मदनयोग उन्माद पैदा करते हैं तथा घास, लकड़ी और पानी को विषयुक्त बना देते हैं ।

( ३ ) पकायी गयी नस-नाड़ियों वाले गिरगिट, छिपकली और अंधअहिक का धुआँ अंधा तथा पागल बना देता है ।

( ४ ) गिरगिट और छिपकली का मिश्रित धुआँ कोढ़ पैदा कर देता है ।

( ५ ) यदि गिरगिट और छिपकली का उक्त योग चितकबरे मेढ़क तथा शहद में मिला दिया जाय तो उससे प्रमेह पैदा हो जाता है । यदि इसी योग में मनुष्य का खून मिला दिया जाय तो उससे क्षयरोग पैदा हो जाता है ।

प्र० १७७ : अ० १ ] शत्रु-वध के प्रयोग ७४१

(१) दूषीविषं मदनकोद्रवचूर्णमुपजिह्विकायोगः मातृवाहकाञ्जलिकारप्रचलाकभेकाक्षिपीलुकयोगो विषूचिकाकरः ।
(२) पञ्चकुष्ठककौण्डिन्यकराजवृक्षपुष्पमधुयोगो ज्वरकरः ।
(३) भासनकुलजिह्वाग्रन्थिकायोगः खरीक्षीरपिष्टो मूकबधिरकरो मासार्धमासिकः । कलामात्रं पुरुषाणामिति समानं पूर्वेण ।
(४) भङ्गक्वाथोपनयनमौषधानां चूर्णं प्राणभृताम् । सर्वेषां वा क्वाथोपनयनम्, एवं वीर्यवत्तरं भवति । इति योगसम्पत् ।
(५) शाल्मलीविदारीधान्यसिद्धो मूलवत्सनाभसंयुक्तश्चुचुन्दरीशोणितप्रलेपेन दिग्घो बाणो यं विध्यति, स विद्धोऽन्यान् दश पुरुषान् दशति, ते दष्टा दशान्यान् दशन्ति पुरुषान् ।
(६) भल्लातकयातुधानापामार्गबाणानां पुष्पैरेल्काक्षिगुग्गुलुहालाहलानां च कषायं बस्तनरशोणितयुक्तं दंशयोगः । ततोऽर्धधरणिको योगः


( १ ) औषधियों से शुद्ध किया हुआ विष, धतूरा और कोदो का चूर्ण दीमक ( उपजिह्विका ) के साथ मिलाकर फिर मातृवाह पक्षी, अंजलिकार ओषधि, मोरपेंच ( प्रचालक ), मेंढ़क, सहिजन और पीलु के साथ तैयार किया हुआ योग हैजा पैदा कर देता है ।

( २ ) कूट वृक्ष के पाँचों अंग, कौण्डिन्य नामक कीड़ा, अमलतास ( राजवृक्ष ), शहद और महुआ ( पुष्पमधु ), इन सब चीजों का योग ज्वर उत्पन्न कर देता है ।

( ३ ) यदि गिद्ध, नेवला और मजीठ का योग गधी के दूध में पीसा जाय तो वह योग महीने या पन्द्रह दिन के भीतर मनुष्य को गूंगा और बहिरा बना देता है । इन सभी योगों की मात्रा मनुष्य के लिए एक कला, घोड़े, गधे के लिए उससे दुगुनी और हाथी, ऊँट आदि के लिए उससे चौगुनी होनी चाहिए ।

( ४ ) ऊपर बताये गये सभी योगों में जो औषधियाँ हैं कूट-कूट कर उनका क्वाथ बनाना चाहिए । प्राणियों के उपयोग के लिए उसका चूर्ण या क्वाथ बनाकर उपयोग में लाना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से औषधि अधिक प्रभावकारी हो जाती है । यहाँ तक विशेष-विशेष योगों का निरूपण किया गया ।

( ५ ) सेमर, बिदारी और धनियाँ की भावना देकर तथा पिप्पलीमूल एवं वत्सनाभ से युक्त और छछून्दर के रक्त से लेप किया हुआ बाण जिसको लगता है वह व्यक्ति दूसरे दस व्यक्तियों को काट लेता है; और वे दस व्यक्ति दूसरे दस-व्यक्तियों को काट खाते हैं । इस प्रकार विष के फैल जाने से सारी शत्रु सेना नष्ट हो जाती है ।

( ६ ) भिलावा, यातुधान, अपामार्ग और अर्जुन वृक्ष ( बाण ), इन सब चीजों के फूलों से सिद्ध किया हुआ; इलायची, अक्षी, गूगल तथा हलाहल को मिलाकर बनाया हुआ काढ़ा यदि बकरे और मनुष्य के रक्त में मिला दिया जाय तो वह दंश-

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प्र० १७७ : अ० १ ] शत्रु-वध के प्रयोग ७४३

(१) चण्डालाग्निं च मांसेन चिताग्निं मानुषेण च ।
समस्तान् बस्तवसया मानुषेण ध्रुवेण च ॥
जुहुयादग्निमन्त्रेण राजवृक्षकदारुभिः ।
एष निष्प्रतिकारोऽग्निर्द्विषतां नेत्रमोहनः ॥
(२) अदिते ! नमस्ते, अनुमते ! नमस्ते, सरस्वति ! नमस्ते, देव ! सवितर्नमस्ते । अग्नये स्वाहा, सोमाय स्वाहा, भूः स्वाहा, भुवः स्वाहा ।

इति औपनिषदिके चतुर्दशाऽधिकरणे परघातप्रयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः;
आदितः पञ्चचत्वारिंशदुत्तरशततमः ।

—: ० :—


किया जाय, व्यभिचारिणी स्त्री के घर से लायी गयी अग्नि में सरसों से हवन किया जाय; सूतिका गृह से लायी गयी अग्नि में दही से हवन किया जाय; अग्निहोत्री के घर से लायी गयी अग्नि में चावलों से हवन किया जाय ।

( १ ) चांडाल के यहाँ से लायी गयी अग्नि में मांस से हवन किया जाय; चिता से लायी गयी अग्नि में मनुष्य से हवन किया जाय; और तदनंतर इन सब अग्नियों को एकत्र करके उनमें बकरी की चर्बी से सूखी बरगद की लकड़ी से हवन किया जाय; तदनन्तर अग्नि के स्तुतिवाचक मंत्रों द्वारा अमलतास की लकड़ियों द्वारा हवन किया जाय । इस प्रकार की अग्नि का फिर कोई प्रतीकार नहीं है । यह अग्नि केवल दुर्ग आदि को ही नहीं जलाती, वरन् उसको देखने मात्र से ही शत्रुओं की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है ।

( २ ) इन मंत्रों से हवन किया जाय—आदिते ! नमस्ते । अनुमते ! नमस्ते । सरस्वति ! नमस्ते । देव ! सवितर्नमस्ते । अग्नये स्वाहा । सोमाय स्वाहा । भूः स्वाहा । भुवः स्वाहा ।

औपनिषदिक नामक चौदहवें अधिकरण में परघातप्रयोग नामक पहला अध्याय समाप्त

—: ० :—

प्रकरण १७८प्रलम्भने अद्भुतोत्पादनम्
अध्याय २

(१) शिरीषोडुम्बरशमीचूर्णं सर्पिषा संहृत्यार्धमासिकक्षुद्योगः ।
(२) कशेरुकोत्पलकन्देक्षुमूलबिसदूर्वाक्षीरघृतमण्डसिद्धो मासिकः ।
(३) माषयवकुलत्थदर्भमूलचूर्णं वा क्षीरघृताभ्यां, वल्लीक्षीरघृतं वा समसिद्धं सालपृश्निपर्णीमूलकल्कं पयसा पीत्वा, पयो वा तत्सिद्धं मधुघृताभ्यामशित्वा, मासमुपवसति ।
(४) श्वेतबस्तमूत्रे सप्तरात्रोषितैः सिद्धार्थकैः सिद्धं तैलं कटुकालाबौ मासार्धमासस्थितं चतुष्पदद्विपदानां विरूपकरणम् ।
(५) तक्रयवभक्षस्य सप्तरात्रादूर्ध्वं श्वेतगर्दभस्य लण्डयवैः सिद्धं गौरसर्षपतैलं विरूपकरणम् ।


प्रलम्भन योग में अद्भुत उत्पादन

( १ ) सिरण ( शिरीष ), गूलर और शमी इन तीनों के चूर्ण को घी के साथ मिलाकर खाने से पन्द्रह दिन तक भूख नहीं लगती है ।

( २ ) कसेरु, कमल की जड़, गन्ने की जड़, कमल डंडी, दूब, दूध, घी और मांड, इन सबको एक साथ मिलाकर खाने से एक महीने तक भूख नहीं लगती है ।

( ३ ) उड़द, जौ, कुलथी और कुशा की जड़ इन सब को दूध-घी के साथ मिलाकर पीने से एक मास तक भूखा रहा जा सकता है; अथवा अजमोद, दूध और घी को बराबर मिलाकर पी लेने पर भी एक महीने तक भूख नहीं लगती है । इसी प्रकार शालपर्णी ( सालवन ) और पृश्निपर्णी ( पिठवन ) की जड़ों के कल्क को दूध के साथ पीने से या शालपर्णी और पृश्निपर्णी के साथ दूध को पकाकर उसे शहद के साथ खाने से भी एक मास तक भूख नहीं लगती है ।

( ४ ) यदि सफेद बकरे के पेशाब में सात रात तक रखी हुई सरसों से निकाला हुआ तेल एक मास या पंद्रह दिन तक तूम्बी में रखा जाय तो उसके बाद जिन चौपायों या दुपायों पर वह तेल लगाया जायेगा, उनका रूप बदल जायेगा; इसको विरूपकरण ( दूसरा रूप बनाना ) योग कहते हैं ।

( ५ ) इसी तरह किसी आदमी को यदि सात दिन तक मट्ठा और जौ खिलाकर सफेद गधे की लीद तथा जौ के साथ पकाये हुये सफेद सरसों के तेल को लगाने या खाने को दिया जाय तो उसकी शक्ल बदल जाती है ।

प्र० १७८ : अ० २ ] प्रलम्भन योग में उत्पादन ७४५

(१) एतयोरन्यतरस्य मूत्रलण्डरससिद्धं सिद्धार्थकतैलमर्कतूलपतङ्ग-चूर्णप्रतिवापं श्वेतीकरणम् ।
(२) श्वेतकुक्कुटाजगरलण्डयोगः श्वेतीकरणम् ।
(३) श्वेतबस्तमूत्रे श्वेतसर्षपाः सप्तरात्रोषितास्तक्रमर्कक्षीरमर्कतूल-कटुकमत्स्यविडङ्गाश्च । एष पक्षस्थितो योगः श्वेतीकरणम् ।
(४) समुद्रमण्डूकीशङ्खसुधाकदलीक्षारतक्रयोगः श्वेतीकरणम् ।
(५) कदल्यवल्गुजक्षाररसशुक्ताः सुरायुक्तास्तक्रार्कतूलस्नुहिलवणं धान्याम्लं च पक्षस्थितो योगः श्वेतीकरणम् ।
(६) कटुकालाबौ वल्लीगते नगरमर्धमासस्थितं गौरसर्षपपिष्टं रोम्णां श्वेतीकरणम् ।
(७) अर्कतूलोऽर्जुने कीटः श्‍वेता च गृहगौलिका ।
एतेन पिष्टेनाभ्यक्ताः केशाः स्युः शङ्खपाण्डराः ॥


( १ ) सफेद गधा या सफेद बकरे के पेशाब तथा लीद के रस के साथ पकाये हुए सरसों के तेल को आक, पलास, पीपल और धान के चूर्ण के साथ मिलाकर श्वेतीकरण योग बनाया जाता है, इसके लगाने या खाने से शक्ल-सूरत सफेद हो जाती है ।

( २ ) सफेद मुर्गा और अजगर साँप, इन दोनों की विष्ठा को मिलाकर तैयार किया हुआ योग भी सफेद बना देता है ।

( ३ ) यदि सफेद बकरे के पेशाब में सात रात तक सफेद सरसों को रखा जाय और तदनन्तर पन्द्रह दिन तक उस सरसों को मठा, आक का दूध, आक, पारस पीपल, कड़वा परवल ( पटोल ), मछली तथा वायबिडंग के चूर्ण के साथ मिलाकर बनाया जाय तो वह भी आकृति को सफेद बना देता है ।

( ४ ) समुद्री मेढकी, शंख, सुधा, केला, जवाखार और मठा, इन सब चीजों का योग भी सफेद कर देता है ।

( ५ ) केला, बाकुची, जवाखार, पारा, और कोई खट्टा फल, इन सबको शराब में भिगो दिया जाय, तदनन्तर छाछ, आक, पारसपीपल, सेंहुड़, नमक और कंजा को उसमें मिलाकर पंद्रह दिन तक रखा रहने दिया जाय । इस तरह का योग भी सफेद बना देता है ।

( ६ ) बेल में लगी हुई कड़वी तूम्बी में सोंठ भरकर उसे पंद्रह दिन तक रख दिया जाय और बाद में उसको बंगा सरसों के साथ पीस लिया जाय, यह भी श्वेतीकरण योग है ।

( ७ ) आक, पारसपीपल, अर्जुन कीट और सफेद छिपकली, इन सबको एक साथ पीस कर यदि बालों में लगाया जाय तो बाल शंख के समान श्वेत हो जाते हैं ।

७४६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

(१) गोमयेन तिन्दुकारिष्टकल्केन मर्दिताङ्गस्य भल्लातकरसानुलिप्तस्य मासिकः कुष्ठयोगः ।
(२) कृष्णसर्पमुखे गृहगौलिकामुखे वा सप्तरात्रोषिता गुञ्जाः कुष्ठयोगः ।
(३) शुकपित्ताण्डरसाभ्यङ्गः कुष्ठयोगः ।
(४) कुष्ठस्य प्रियालकल्ककषायः प्रतीकारः ।
(५) कुक्कुटीकोशातकीशतावरीमूलयुक्तमाहारयमाणो मासेन गौरो भवति ।
(६) वटकषायस्नातः सहचरकल्कदिग्धः कृष्णो भवति ।
(७) शकुनकङ्गुतैलयुक्ता हरितालमनःशिलाः श्यामीकरणम् ।
(८) खद्योतचूर्णं सर्षपतैलयुक्तं रात्रौ ज्वलति ।
(९) खद्योतगण्डूपदचूर्णं समुद्रजन्तूनां भृङ्गकपालानां खदिरकर्णिकाराणां पुष्पचूर्णं वा शकुनकङ्गुतैलयुक्तं तेजनचूर्णं पारिभद्रकत्वङ्मषी मण्डूकवसया युक्ता गात्रप्रज्वलनमग्निना ।


( १ ) गोबर, छोटा तेंदुआ और नीम के कल्क से शरीर पर मालिश करने के बाद, यदि भिलावा और पारा मिला कर शरीर में लगा दिया जाय तो एक महीने के अन्दर कोढ़ उपज आता है ।

( २ ) काले सांप के या छिपकली के मुँह में सात रात तक रखी हुई रत्ती को यदि देह पर रगड़ा जाय तो कोढ़ हो जाता है ।

( ३ ) तोते के पित्ते तथा अंडे के रस से शरीर पर मालिश करने से कोढ़ हो जाता है ।

( ४ ) चिरौंजी के कल्क से बनाया हुआ काढ़ा कुष्ठ रोग का प्रतीकार है ।

( ५ ) मुर्गी, कड़वी तोरई, परवल और शतावरी की जड़ को एक मास तक खाने से शरीर गौरवर्ण हो जाता है ।

( ६ ) यदि बरगद के काढ़े से स्नान कर फिर पियाबांस के कल्क की मालिश की जाय तो शरीर काला पड़ जाता है ।

( ७ ) गिद्ध और काँगनी के तेल में हड़ताल तथा मैनसिल मिलाकर मालिश करने से भी शरीर साँवला हो जाता है ।

( ८ ) यदि जुगुन्तू का चूर्ण सरसों के तेल के साथ मिला दिया जाय तो वह रात में जलने लगता है ।

( ९ ) जुगनू और गेंहुए का चूर्ण तथा इसी प्रकार के छोटे-छोटे समुद्री जानवरों का चूर्ण भृंग नामक पक्षी के सिर की हड्डियों का चूर्ण, खैर तथा कनेर के फूलों का चूर्ण, गिद्ध तथा कांगनी के तेल में मिला बांस का चूर्ण और मेढ़क की चर्बी से मिली

प्र० १७८ : अ० २ ] प्रलम्भन योग में उत्पादन ७४७

(१) पारिभद्रकत्वग्वज्रकदलीतिलकल्कप्रदिग्धं शरीरमग्निना ज्वलति ।
(२) पीलुत्वङ्मषीमयः पिण्डो हस्ते ज्वलति । मण्डूकवसादिग्धोऽग्निना ज्वलति ।
(३) तेन प्रदिग्धमङ्गं कुशाम्रफलतैलसिक्तं समुद्रमण्डूकीफेनकसर्जरस-चूर्णयुक्तं वा ज्वलति ।
(४) मण्डूकवसासिद्धेन पयसा कुलीरादीनां वसया समभागं तैलं सिद्ध-मभ्यङ्गो गात्राणामग्निप्रज्वालनम् । मण्डूकवसादिग्धोऽग्निना ज्वलति ।
(५) वेणूमूलशैवललिप्तमङ्गं मण्डूकवसादिग्धमग्निना ज्वलति ।
(६) पारिभद्रकप्रतिबलावञ्जुलवज्रकदलीमूलकल्केन मण्डूकवसा-दिग्धेन तैलेनाभ्यक्तपादोऽङ्गारेषु गच्छति ।
(७) उपोदका प्रतिबला वञ्जुलः पारिभद्रकः ।
एतेषां मूलकल्केन मण्डूकवसया सह ॥


नीम की छाल की स्याही, इनमें से प्रत्येक चूर्ण को देह पर मलने से बिना किसी पीड़ा या जलन के शरीर पर आग जलने लगती है ।

( १ ) नीम की छाल, थूहर, केला और तिल के कल्क से पोते हुए शरीर पर बिना किसी पीड़ा के अग्नि जलने लगती है ।

( २ ) पीलु वृक्ष की छाल की स्याही का बना हुआ गोला, बिना अग्नि-संसर्ग के ही, हाथ में जलने लगता है। मेढक की चर्बी से सना हुआ वही गोला आग के संसर्ग से जलने लगता है।

( ३ ) उस गोले को अंग में लपेट कर कुशा के तेल और आम की गुठली के तेल से शरीर में चुपड़े अथवा समुद्री मेढ़की, समुद्रफेन और राल, इन सब के चूर्ण को देह में लगाया जाय तो अग्नि का संसर्ग होते ही देह जलने लगती है ।

( ४ ) मेढ़क की चर्बी के साथ पके हुए दूध तथा केंकड़े की चर्बी में उतना ही तेल मिलाकर यदि उससे मालिश की जाय तो शरीर में अग्नि की लपटें उठने लगती हैं । मेढ़क की चर्बी से सना हुआ व्यक्ति अग्नि का संसर्ग पाते ही जल उठता है ।

( ५ ) बाँस की जड़ और सेंवार से लिपा हुआ अंग तथा मेढक की चर्बी से लिपा हुआ अंग अग्नि के संसर्ग से जलने लगता है ।

( ६ ) नीम ( पारिभद्रक ), खरेंटी ( प्रतिबला ), वंजुल ( तेंदुआ, बेत, अशोक ) थूहर और केला, इन सब पेड़ों की जड़ों का कल्क बनाकर तथा उसमें मेढक की चर्बी एवं तेल मिला लिया जाय और तब उस योग की पैरों में मालिस की जाय तो अंगारों कें ऊपर चला जा सकता है ।

( ७ ) पोदीना ( उपोदका ), खरेंटी, वंजुल और नीम, इनके पेड़ों की जड़ों का कल्क बनाकर उसमें मेढक की चर्बी मिला दी जाय तो उस तेल का साफ पैरों