Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished918 pages

About this granth

The Kautiliya Arthashastra (कौटिलीय अर्थशास्त्रम्) is the most detailed ancient Indian treatise on government, administration, economy, law and war. Tradition ascribes it to Kautilya (Chanakya, Vishnugupta), minister of Chandragupta Maurya. It is divided into fifteen books, covering the training of the king, the duties of departmental superintendents, civil and criminal justice, secret operations, the circle of neighbouring states, the six measures of foreign policy, calamities of the state, campaigns, battle, dealings with confederacies, the weaker king, the capture of forts, occult practices and the methods of the treatise itself.

This is No. 75 of the Vidyabhawan Sanskrit Granthamala, Chowkhamba Vidyabhawan, Varanasi, third edition 1984. It was edited with introduction, Hindi translation and glossary by Vachaspati Gairola of the Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad, and also includes the Chanakya Sutras. The book is dedicated to the memory of Mahamahopadhyaya T. Ganapati Shastri. Gairola's long introduction surveys early Indian assemblies such as the sabha and samiti and the growth of the state.

Page 732Permalink
६४८कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दसवां अधिकरण

(१) सूतमागधाः शूराणां स्वर्गमस्वर्गं भीरूणां जातिसङ्घकुलकर्मवृत्तस्तवं च योधानां वर्णयेयुः । पुरोहितपुरुषाः कृत्याभिचारं ब्रूयुः । सत्रिकवर्धकिमौहूर्तिकाः स्वकर्मसिद्धिमसिद्धिं परेषाम् ।

(२) सेनापतिरर्थमानाभ्यामभिसंस्कृतमनीकमाभाषेत—'शतसाहस्रो राजवधः । पञ्चाशतसाहस्रः सेनापतिकुमारवधः । दशसाहस्रः प्रवीरमुख्यवधः । पञ्चसाहस्रो हस्तिरथवधः । साहस्रोऽश्ववधः । शत्यः पत्तिमुख्यवधः । शिरो विंशतिकम् । भोगद्वैगुण्यं स्वयंग्राहश्चेति । तदेषां दशवर्गाधिपतयो विद्युः ।


पर सवार होकर चले और उसकी रक्षा के लिए साथ में अश्वारोही सैनिक हों । अथवा जिन सवारियों पर प्रायः सेना चल रही हो उसी प्रकार की सवारी में या जिस सवारी में चढ़ने का राजा का अच्छा अभ्यास हो, उसमें चढ़कर चले । व्यूहरचना का अधिष्ठाता किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त किया जाय, जो राजा से अविकल रूप में मिलता-जुलता हो ।

(१) सूतों ( ऐतिहासिक गाथाओं के गायकों ) और मागधों ( स्तुतिवाचकों ) को चाहिए कि वे—शूर-वीर सैनिकों को स्वर्ग, कायरों को नरक और अन्य जाति संघी ( बटालियनों ) को उनके कुल, कर्म, शील, स्वभाव तथा व्यवहार के अनुसार ओजोमयी उत्साहवर्धक वाणी सुनाकर स्तुतिगान करें । पुरोहितों को चाहिए कि वे अथर्ववेद में निर्दिष्ट शत्रुनाशक कृत्याभिचार का अनुष्ठान करें । सत्री, बढ़ई और ज्योतिषियों को चाहिए कि वे सदा ही अपने कार्यों की सिद्धि और शत्रुकार्यों की असफलता के सम्बन्ध में प्रचार करते रहें ।

(२) युद्ध के लिए तैयार, धन-सत्कार से संवर्द्धित सेना को ललकार कर सेनापति यों कहे, 'आप लोगों में से जो भी सैनिक शत्रुराजा को मार डालेगा उसे एक लाख स्वर्णमुद्राएँ पुरस्कार में दी जायेंगी । जो सैनिक शत्रु के सेनापति या राजकुमार को मार डालेगा, उसे पचास हजार स्वर्णमुद्रायें इनाम में दी जायेंगी । इस प्रकार शत्रु के वीर सैनिकों में से मुख्य सैनिकों को मारने वाले को दस हजार, हाथी तथा रथों को नष्ट करने वाले को पाँच हजार, घुड़सवारों को नष्ट करने वाले को एक हजार, पैदल सेना के मुख्य सैनिकों को नष्ट करने वाले को एक सौ और साधारण सिपाही का शिर काट कर लाने वाले को बीस स्वर्ण मुद्राएँ इनाम में दी जायेंगी । इसके अतिरिक्त युद्ध में भाग लेने वाले प्रत्येक सैनिक का वेतन, भत्ता दुगुना कर दिया जायेगा और शत्रु के यहाँ से लूट-पाट में मिला हुआ सारा माल भी उन्हें ही दिया जायेगा ।' इस प्रकार बताये गये राजवध का समाचार केवल पदिक सेनापति और नायक ही जान पायें ।

Page 733Permalink

प्र० १५०-१५२ : अ० ३ ] कूटयुद्ध और सेना-प्रयोग [ ६४९

(१) चिकित्सकाः शस्त्रयन्त्रागदस्नेहवस्त्रहस्ताः, स्त्रियश्चान्नपानरक्षिण्यः पुरुषाणामुद्धर्षणीयाः पृष्ठतस्तिष्ठेयुः ।
(२) अदक्षिणामुखं पृष्ठतः सूर्यमनुलोमवातमनीकं स्वभूमौ व्यूहेत । परभूमिव्यूहे चाश्वांश्चारयेयुः ।
(३) यत्र स्थानं प्रजवश्चाभूमि व्यूहस्य, तत्र स्थितः प्रजवितश्चोभयथा जीयेत । विपर्यये जयति । उभयथा स्थाने प्रजवे च ।
(४) समा विषमा व्यामिश्रा वा भूमिरिति । पुरस्तात्पार्श्वाभ्यां पश्चाच्च ज्ञेया । समायां दण्डमण्डलव्यूहाः, विषमायां भोगसंहतव्यूहाः । व्यामिश्रायां विषमव्यूहाः ।
(५) विशिष्टबलं भङ्क्त्वा सन्धि याचेत । समबलेन याचितः सन्दधीत । हीनमनुहन्यात् । न त्वेव स्वभूमिप्राप्तं त्यक्तात्मानं वा ।


( १ ) सैनिकों के स्वास्थ्य-संरक्षण और मनोविनोद के लिए चिकित्सक, काटने के औजार, चिमटी, दवाई, घी, तेल, मरहम-पट्टी, सहचिकित्सक, खाने-पीने की सामग्री और सैनिकों को प्रसन्न करने वाली स्त्रियाँ, इन सबको युद्धभूमि के लिये प्रस्थान करते समय सेना के पिछले हिस्से में रखा जाय ।

( २ ) विजिगीषु को चाहिए कि युद्धकाल में अमंगल-सूचक दक्षिण दिशा की ओर सैनिकों का मुँह करके खड़ा न करे । इस बात पर पूरा ध्यान दिया जाय कि सूर्य की किरणें सेना के पीठ पीछे और वायु का रुख अनुकूल हो, इस प्रकार व्यूह-रचना करके सैनिकों को खड़ा किया जाय । यदि युद्ध भूमि शत्रु के अनुकूल हो और वहीं पर विजिगीषु को भी व्यूह-रचना करनी पड़े, तो विजिगीषु को चाहिए कि वह घोड़े दौड़ा कर शत्रु के मोर्चे को विघटित कर दे ।

( ३ ) जिस स्थान पर ठहर कर विजिगीषु बहुत दिनों तक कार्य करता ही रह जाय या समयाभाव में जल्दी ही कार्य को करता हुआ, दोनों ही परिस्थितियों में, वहाँ पर अवश्य ही वह शत्रु द्वारा मारा जाता है ।

( ४ ) व्यूहभूमि तीन प्रकार की होती है, १. सम २. विषम और ३. व्यामिश्र । व्यूह-रचना के आगे, पीछे या बगल में, कहीं भी सम भूमि का होना आवश्यक है । इसी प्रकार विषम भूमि के संबंध में भी समझना चाहिए । तीनों प्रकार की उक्त समभूमि में दण्डाकार सेना की स्थापना ( दण्ड व्यूह ) और गोलाकार सेना की स्थापना ( मंडल व्यूह ) की जाय । इसी प्रकार तीनों तरह की विषम भूमि में भोग-व्यूह और संहत व्यूह की रचना की जाय । तीनों प्रकार की व्यामिश्र भूमि में विषमव्यूहों की रचना की जाय ।

( ५ ) विजिगीषु को चाहिए कि पहले वह अधिक शक्तिशाली शत्रु की सेना को

Page 734Permalink

६५० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) पुनरावर्तमानस्य निराशस्य च जीविते ।
अधार्यो जायते वेगस्तस्माद्भग्नं न पीडयेत् ॥

इति सांग्रामिके दशमेऽधिकरणे कूटयुद्धविकल्पाः स्वसैन्योत्साहनं स्वबलान्य-बलव्यायोगश्चेति तृतीयोऽध्यायः; आदितस्त्रिंशदुत्तरशततमः ।

—: ० :—


नष्ट-भ्रष्ट कर फिर स्वयं ही उससे संधि के लिए प्रार्थना करे । यदि शत्रु समान शक्ति का हो तो उसकी प्रार्थना करने पर ही विजिगीषु संधि के लिए तैयार हो । अपने से हीन शक्ति राजा को तो ऐसा तहस-नहस कर देना चाहिए कि फिर कभी भी वह उठ न सके । किन्तु यदि हीनशक्ति राजा-अनुकूल स्थान पर हो या जीवन से निराश हो चुका हो तो उसको न मारा जाय ।

( १ ) जीवन से निराश हुआ शत्रु यदि युद्धक्षेत्र से बचकर वापिस आता है तो उसका युद्धावेश ठंडा पड़ जाता है । इसलिए पहिले ही से निराश एवं कमजोर शत्रु को पीड़ा पहुँचा कर कुपित नहीं करना चाहिए ।

सांग्रामिक नामक दसवें अधिकरण में कूटयुद्ध-सैन्यव्यायोग नामक तीसरा अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

Page 735Permalink
प्रकरण १५३-१५४युद्धभूमयः, पत्त्यश्वरथहस्तिकर्माणि च
अध्याय ४

(१) स्वभूमिः पत्त्यश्वरथद्विपानामिष्टा युद्धे निवेशे च ।
(२) धान्वनवननिम्नस्थलयोधिनां खनकाकाशदिवारात्रियोधिनां च पुरुषाणां नादेयपार्वतानूपसारसानां च हस्तिनामश्वानां च यथास्वमिष्टा युद्धभूमयः कालश्च ।
(३) समा स्थिराभिकाशा निरुत्खातिन्यचक्रखुरोऽनक्षग्राहिणी अवृक्षगुल्मप्रततिस्तम्भकेदारश्वभ्रवल्मीकसिकतापङ्कभङ्गुरा दरणहीना च रथभूमिः ।
(४) हस्त्यश्वयोर्मनुष्याणां च समे विषमे हिता युद्धे निवेशे च ।
(५) अण्वश्मवृक्षा ह्रस्वलङ्घनीयश्वभ्रा मन्ददरणदोषाचाश्वभूमिः । स्थूलस्थाण्वश्मवृक्षप्रततिवल्मीकगुल्मा पदातिभूमिः । गम्यशैलनिम्नविषमा मर्दनीयवृक्षा छेदनीयप्रततिः पङ्कभङ्गुरदरणहीना च हस्तिभूमिः ।


युद्धयोग्य भूमि और पदाति, अश्व, रथ तथा हाथी आदि सेनाओं के कार्य

(१) पैदल, घुड़सवार, रथारोही तथा हस्त्यारोही सैनिकों को युद्ध के लिए और ठहरने के लिए उपयुक्त भूमि का होना अत्यंत आवश्यक है ।

(२) धान्वनदुर्ग, वनदुर्ग, जल, स्थल, खाई, आकाश, दिन-रात, नदी, पहाड़, जलमय प्रदेश तथा तालाब आदि में युद्ध करने वाले हस्त्यारोही और अश्वारोही सैनिकों के लिए अनुकूल युद्धयोग्य भूमि तथा उपयुक्त ऋतु आदि का होना अत्यन्त आवश्यक है ।

(३) समतल, दलदल रहित एकदम ठोस, साफ-सुथरी, चिकनी, घनी बेलों से अच्छादित, खाई-खंधक से रहित, झुरमुट, ठूंठ, क्यारियाँ, बाँबी, गढ़े, रेत, कीचड़ और टेढ़ेपन आदि से रहित जमीन एवं दर्रों से रहित ( दरणहीना ) भूमि रथसेना के युद्धार्थ उपयुक्त समझनी चाहिए ।

(४) उपर्युक्त रथयोग्य भूमि ही अश्वारोही, हस्त्यारोही और पदाति सेनाओं के लिए भी सम, विषम देश में युद्ध के लिए उपयुक्त समझनी चाहिए ।

(५) छोटे-छोटे कंकड़ तथा वृक्षों से युक्त, छोटे-छोटे लांघने योग्य गढों से युक्त और इधर-उधर छोटे-छोटे दर्रों से युक्त भूमि अश्वारोही सेना के ठहरने—युद्ध के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है । मोटे-मोटे पेड़ों के ठूंठ, मोटे-मोटे पत्थर वा कंकड़,

Page 736Permalink

६५२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) अकण्टकिन्यबहुविषमा प्रत्यासारवतीति पदातीनामतिशयः ।
(२) द्विगुणप्रत्यासारा कर्दमौदकखञ्जनहीना निःशर्करेति वाजिनामतिशयः ।
(३) पांसुकर्दमौदकनलशराधानवती श्वदंष्ट्राहीना महावृक्षशाखाघातवियुक्तेति हस्तिनामतिशयः ।
(४) तोयाशयाश्रयवती निरुत्खातिनी केदारहीना व्यावर्तनसमर्थेति रथानामतिशयः । उक्ता सर्वेषां भूमिः ।
(५) एतया सर्वबलनिवेशा युद्धानि च व्याख्यातानि भवन्ति ।
(६) भूमिवासनवनिचयो विषमतोयतीर्थवातरश्मिग्रहणं वीवधासारयोर्घातो रक्षा वा, विशुद्धिः स्थापना च बलस्य, प्रसारवृद्धिर्बाहूत्सारः,

वृक्ष, लता, बांबी तथा झुरमुट आदि से युक्त भूमि पैदल सैनिकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है । हाथियों के चढ़ सकने योग्य पहाड़, ऊँची-नीची जमीन, हाथियों के खुजलाने योग्य वृक्षों से युक्त, काटने योग्य लताओं से पूर्ण और गढों एवं दरारों से रहित भूमि हाथियों के लिए अधिक उपयुक्त है ।

( १ ) कंटकरहित, न अधिक ऊँची न अधिक नीची और अवसर आने पर लौट आने की सुविधा वाली भूमि पैदल सेना के पड़ाव-युद्ध के लिए अत्यन्त उत्तम है ।

( २ ) जिस भूमि में आगे बढ़ने की अपेक्षा पीछे लौटने में अधिक सुविधा रहती है और जिसमें कीचड़, जल, दलदल तथा कंकरीली मिट्टी का सर्वथा अभाव हो वह भूमि अश्वारोही सेना के लिए अतीव उत्तम है ।

( ३ ) धूल, कीचड़, जल, नरसल, मूंज और नरसल-मूंज की जड़ से युक्त तथा गोखुरुओं से रहित एवं बड़े-बड़े घने वृक्षों से रहित भूमि हस्त्यारोही सेना के लिए अति उत्तम है ।

( ४ ) स्नान योग्य जलाशयों, विश्राम करने योग्य स्थानों से युक्त, ऊबड़-खाबड़ रहित, क्यारियों से रहित, अवसर के समय में लौटने की सुविधाओं वाली भूमि रथ-सेना के लिए अधिक उपयोगी है । यहाँ तक उपयुक्त युद्धभूमि के सम्बन्ध में निरूपण किया गया ।

( ५ ) इसी प्रकार सेनाओं के ठहरने और युद्धादि कार्यों के सम्बन्ध में भी विचार कर लेना चाहिए ।

( ६ ) भूमि, निवास तथा वन की सफाई घोड़ों के द्वारा की जानी चाहिए । ( छिपे हुए शत्रु को हटाना भूमिनिश्चय; सेना के पड़ाव में उपद्रव को दूर करना वासनिश्चय; और जंगली मार्गों में चोरों को साफ करना वननिश्चय कहलाता है ) । विषम ( जहाँ पर शत्रु आक्रमण न कर सके ), तोय ( जहाँ पर जल से भरे तालाब हों ), तीर्थ ( नदी के घाट ), वात ( जहाँ पर शुद्ध वायु आ-जा सके ) और रश्मि

Page 737Permalink

प्र० १५३-१५४ : अ० ४ ] युद्धभूमि और सैन्यकर्म ६५३

पूर्वप्रहारो व्यावेशनं, व्यावेधनमाश्वासो, ग्रहणं, मोक्षणं, मार्गानुसारविनिमयः, कोशकुमाराभिहरणं, जघनकोटचभिघातो, हीनानुसारणमनुयानं, समाजकर्मेत्यश्वकर्माणि ।

(१) पुरोयानमकृतमार्गवासतीर्थकर्म बाहूत्सारस्तोयतरणावतरणे स्थानगमनावतरणं विषम सम्बाधप्रवेशोऽग्निदानशमनमेकाङ्गविजयः, भिन्नसन्धानमभिन्नभेदनं व्यसने त्राणमभिघातो विभीषिका त्रासनमौदार्यं ग्रहणं मोक्षणं सालद्वाराट्टालकभञ्जनं कोशवाहनापवाहनमिति हस्तिकर्माणि ।


( जहाँ सूर्य का पूर्ण प्रकाश हो ), आदि सुविधाजनक स्थानों को पहिले ही से अपने कब्जे में कर लेना चाहिए, शत्रुदेश से आने वाले जीविकोपार्जन योग्य पदार्थों तथा शत्रु के मित्र की सेना का नाश और अपने पदार्थों एवं सेना की रक्षा, छिपकर प्रविष्ट हुई शत्रुसेना की सफाई और अपनी सेना की दृढ़ स्थिति, धान्य तथा घास आदि का संग्रह, शत्रु सेना को तितर-वितर करना, भुजाओं के समान शत्रुसेना को हटाना, शत्रुसेना पर पहिले चढ़ाई करना, शत्रुसेना में घुसकर उसको चौंका देना, शत्रुसेना को तरह-तरह की तकलीफ देना, अपनी सेना को धैर्य देना, शत्रुसेना को घेरना, शत्रुद्वारा गिरफ्तार अपने सैनिकों को छुड़ाना. अपनी सेना के मार्ग पर शत्रुओं के अधिकार करने पर शत्रुसेना के मार्ग को अपने अधीन कर लेना, शत्रु के कोष तथा राजकुमार का अपहरण करना, पीछे तथा सामने की ओर आक्रमण करना, जिनके घोड़े मर गये हों, ऐसे सैनिकों का पीछा करना, भागी हुई शत्रुसेना का पीछा करना और बिखरी हुई अपनी सेना को संगठित करना—ये सभी कार्य घोड़ों के द्वारा आसानी से कराये जा सकते हैं, इसीलिए इन्हें अश्वकर्म कहते हैं ।

( १ ) अपनी सेना के आगे-आगे चलना, पहिले से तैयार न हुए मार्ग, निवास घाट आदि का बनाना, भुजाओं के समान शत्रुसेना को तितर-वितर करना, नदी की गहराई बताने के लिए उसके भीतर प्रवेश करना, पंक्ति में खड़ा होकर शत्रु के आक्रमण को रोकना, इसी प्रकार मार्ग में चलना; इसी प्रकार नीचे उतरना, घने जंगलों तथा शत्रु की सेना में घुसना, शत्रु के पड़ाव में आग लगाना और अपने पड़ाव में लगी हुई आग को बुझाना, अकेले ही शत्रु पर विजय प्राप्त करना, अपनी बिखरी हुई सेना को संगठित करना, शत्रु की संगठित सेना को तितर-वितर करना, आपत्ति के समय अपनी सेना की रक्षा करना और शत्रु की सेना को कुचलना, अपने को दिखाने मात्र से ही शत्रु को घबड़ा देना, मदविह्वल होकर शत्रु को विचलित कर देना, अपने अस्तित्व से अपनी सेना के महत्त्व को प्रकट करना, शत्रु के योद्धाओं को पकड़ना, अपने योद्धाओं को छुड़ाना, शत्रु के परकोटे, प्रधान द्वार तथा अटारी आदि को ध्वस्त करना, शत्रु के कोष तथा सवारी आदि को भगा ले जाना, ये सभी कार्य हाथियों के द्वारा संपादित होने के कारण हस्तिकर्म के नाम से कहे जाते हैं ।

Page 738Permalink

६५४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) स्वबलरक्षा चतुरङ्गबलप्रतिषेधः संग्रामे ग्रहणं मोक्षणं भिन्नसन्धानमभिन्नभेदनं त्रासनमौदार्यं भीमघोषश्चेति रथकर्माणि ।
(२) सर्वदेशकालशस्त्रवहनं व्यायामश्चेति पदातिकर्माणि ।
(३) शिबिरमार्गसेतुकूपतीर्थशोधनकर्म यन्त्रायुधावरणोपकरणग्रासवहनमायोधनाच्च प्रहरणावरणाप्रतिविद्धापनयनमिति विष्टिकर्माणि ।

(४) कुर्याद्गवाश्वव्यायोगं रथेष्वल्पहयो नृपः ।
खरोष्ट्रशकटानां वा गर्भमल्पगजस्तथा ॥

इति सांग्रामिके दशमेऽधिकरणे युद्धभूमयः पत्त्यश्वरथहस्तिकर्माणि नाम चतुर्थोऽध्यायः; आदित एकत्रिंशदुत्तरशततमः ।

—: ० :—


(१) अपनी सेना की रक्षा करना, आक्रमण के समय शत्रु सेना को रोकना, शत्रु के बलवान् सैनिकों को पकड़ना, अपने गिरफ्तार सैनिकों को छुड़ाना, अपनी सेना को संगठित करना तथा शत्रु सेना को तितर-बितर करना, भयभीत करके शत्रु की सेना को घबड़ाना, अपनी सेना का महत्त्व प्रकट करना और भयंकर आवाज करना; ये सभी कार्य रथकर्म अर्थात् रथसेना के द्वारा संपादित होते हैं ।

(२) सम-विषम आदि सभी स्थानों और वर्षा-शरद् आदि सभी ऋतुओं में युद्ध के लिए तैयार हो जाना, नियम पूर्वक कवायद करना और अवसर आने पर युद्ध करना; ये सब कार्य पदाति सेना के हैं ।

(३) अस्त्र-शस्त्र न रखकर फौज में कार्य करने वाले कर्मचारियों को विष्टि कहा जाता है । सैनिक शिविर बनाना, सैनिक मार्ग, नदी के पुल, बाँध, कुएँ, घाट आदि तैयार करना, घास आदि उखाड़ कर मैदान साफ करना, युद्ध की मशीनें, अस्त्र-शस्त्र, कवच आदि युद्धोपयोगी सामान तथा हाथी, घोड़ों के लिए घास ढोना, उनकी रक्षा का प्रबन्ध करना, युद्धभूमि में कवच, हथियार तथा घायल आदि सैनिकों को दूसरी जगह ले जाना, ये सभी कार्य विष्टि नामक कर्मचारियों के हैं ।

(४) जिस राजा के पास घोड़ों की तादाद कम हो उसको चाहिए कि वह घोड़ों के साथ रथों में बैलों को भी जोड़ कर काम ले । इसी प्रकार जिस राजा के पास हाथियों का अभाव हो वह अपनी सेना को गधों या ऊँटों द्वारा चलाई जाने वाली गाड़ियों के बीच में सुरक्षित रखे ।

सांग्रामिक नामक दसवें अधिकरण में युद्धभूमि-पत्त्यश्वरथहस्तिकर्म नामक चौथा अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

Page 739Permalink
प्रकरण १५५-१५७## पक्षकक्षोरस्यानां बलाग्रतो व्यूहविभागः सारफल्गुबलविभागः,
अध्याय ५## पत्त्यश्वरथहस्तियुद्धानि च

(१) पञ्चधनुःशतावकृष्टदुर्गमवस्थाप्य युद्धमुपेयाद्, भूमिवशेन वा। विभक्तमुख्यामचक्षुर्विषये मोक्षयित्वा सेनां सेनापतिनायकौ व्यूहेयाताम्।

(२) शमान्तरं पत्तिं स्थापयेत्। त्रिशमान्तरमश्वम्। पञ्चशमान्तरं रथं, हस्तिनं वा। द्विगुणान्तरं त्रिगुणान्तरं वा व्यूहेत। एवं यथासुखम-सम्बाधं युध्येत।

(३) पञ्चारत्नि धनुः, तस्मिन् धन्विनं स्थापयेत्। त्रिधनुष्यश्वम्। पञ्चधनुषि रथं हस्तिनं वा। पञ्चधनुर्नीकसन्धिः पक्षकक्षोरस्यानाम्।


पक्ष, कक्ष तथा उरस्य आदि विशेष व्यूहों का सेना के परिणाम के अनुसार व्यूहविभाग; सार तथा फल्गु-बलों का विभाग; और चतुरंग सेना का युद्ध

( १ ) युद्ध-भूमि से पाँच-सौ धनुष के फासले पर छावनी डालनी चाहिए, अथवा भूमि के अनुसार भी छावनी की दूरी इससे ज्यादा या कम की जा सकती है। मुख्य सैनिकों को अलग-अलग करके उन्हें इस प्रकार छिपाया जाय, जिससे शत्रुओं को कुछ भी पता न लगने पावे। उसके बाद सेनापति और नायक, दोनों उस सेना की व्यूह-रचना को यथोचित ढंग से सम्पन्न करें।

( २ ) पैदल ( पत्ति ) सेना के प्रत्येक सिपाही को एक-एक शम (चौदह अंगुल) के फासले पर खड़ा किया जाय। इसी प्रकार घुड़सवार सिपाहियों को तीन-तीन शम के फासले पर, और रथारोहियों तथा हस्त्यारोहियों को पाँच-पाँच शम के अन्तर पर खड़ा किया जाय अथवा भूमि की सुविधानुसार ही उनका फासला कम या ज्यादा किया जाय। ऐसी व्यूह-रचना करके निर्भीक होकर सुखपूर्वक युद्ध किया जाय।

( ३ ) पाँच अरत्नि ( हाथ ) का एक धनुष होता है। धनुर्धारी योद्धाओं को पाँच हाथ के फासले पर खड़ा किया जाय। तीन धनुष ( पन्द्रह हाथ ) के फासले पर अश्वारोहियों को और पाँच धनुष ( पच्चीस हाथ ) के फासले पर रथारोहियों को तथा हस्त्यारोहियों को खड़ा किया जाय। पक्ष ( आगे बगल में खड़े होकर लड़ने वाली ), कक्ष ( आगे अवान्तर भाग में खड़े होकर लड़ने वाली ) और उरस्य ( बीच में खड़े होकर लड़ने वाली ) पाँचों सेनाओं को पाँच-पाँच धनुष के फासले पर खड़ा किया जाय।

Page 740Permalink

६५६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवाँ अधिकरण

(१) अश्वस्य त्रयः पुरुषाः प्रतियोद्धारः, पञ्चदश रथस्य, हस्तिनो वा, पञ्च चाश्वाः । तावन्तः पादगोपाः वाजिरथद्विपानां विधेयाः ।
(२) त्रीणि त्रिकाण्यनीकं रथानामुरस्यं स्थापयेत् । तावत् कक्षं पक्षं चोभयतः । पञ्चचत्वारिंशदेवं रथा व्यूहे भवन्ति ।
(३) द्वे शते पञ्चविंशतिश्चाश्वाः, षट्शतानि पञ्चसप्ततिश्च पुरुषाः प्रतियोद्धारः । तावन्तः पादगोपा वाजिरथद्विपानाम् ।
(४) एष समव्यूहः । तस्य द्विरथोत्तरा वृद्धिरा एकविंशतिरथादित्येवमोजा दश समव्यूहप्रकृतयो भवन्ति ।
(५) पक्षकक्षोरस्यानामतो विषमसंख्याने विषमव्यूहः । तस्यापि द्विरथोत्तरा वृद्धिरा एकविंशतिरथादित्येवमोजा दशविषमव्यूहप्रकृतयो भवन्ति ।


( १ ) घुड़सवार सैनिक के आगे-आगे सहायतार्थ तीन प्रतियोद्धाओं को नियुक्त किया जाय । इसी प्रकार रथारोहियों या हस्त्यारोहियों के आगे पन्द्रह-पन्द्रह प्रतियोद्धाओं अथवा पाँच-पाँच घुड़सवार सैनिकों को खड़ा किया जाय । हस्ति तथा अश्व के सैनिकों के उतने ही ( पाँच ) खिदमतगार ( पादगोप ) नियुक्त किए जाँय । इसी प्रकार एक-एक रथ के आगे पाँच घोड़े, और एक-एक घोड़े के आगे तीन-तीन आदमी मिलाकर कुल पन्द्रह प्रतियोद्धा आगे चलने वाले और पाँच साईस, उसी तरह, हाथी के साथ भी समझने चाहिए ।

( २ ) व्यूहरचना के मध्यभाग (उरस्य) में इस प्रकार के नौ रथों (३ × ३ = ९) की नियुक्ति करनी चाहिए, अर्थात् तीन-तीन रथों की एक-एक पंक्ति बनाकर, तीन पंक्तियों में नौ रथों को खड़ा किया जाय । इसी प्रकार कक्ष और पक्ष स्थानों में दोनों ओर नौ-नौ रथों को खड़ा किया जाय । इस तरह एक व्यूह-रचना में ( ९ उरस्य, १८ कक्ष और १८ पक्ष = ४५ ) पैंतालीस रथ हो जाते हैं ।

( ३ ) प्रत्येक रथ के आगे पाँच-पाँच घोड़े होने के कारण पैंतालीस रथों के आगे दो सौ-पच्चीस घोड़े होने चाहिए । इसी प्रकार प्रत्येक रथ के आगे पन्द्रह सैनिक होने के कारण पैंतालीस रथों के आगे छः सौ पचहत्तर सैनिक एक-दूसरे की सहायतार्थ नियुक्त होने चाहिए । घोड़े, रथ और हाथियों के उतने ही साईस भी होने चाहिए ।

( ४ ) इस ढंग से तैयार किये गये व्यूह को समव्यूह कहते हैं । ऐसे व्यूह में दो-दो रथ बढ़ाकर इक्कीस रथों तक की वृद्धि की जा सकती है । इस प्रकार के अयुग्म में तीन रथों से लेकर इक्कीस रथों तक दस तरह की समव्यूह रचना की जा सकती है ।

( ५ ) आगे पीछे और बीच के स्थानों में यदि रथों की विषम संख्या हो जाय तो उसको विषमव्यूह कहते हैं । ऐसे व्यूह में भी उक्त रीति से दो-दो रथ बढ़ाकर

Page 741Permalink

प्र० १५५-१५७ : अ० ५ ] व्यूह-बल-विभाग एवं युद्ध ६५७

(१) अतः सैन्यानां व्यूहशेषमावापः कार्यः । रथानां द्वौ त्रिभागावङ्गे-
ष्वावापयेत् । शेषमुरस्यं स्थापयेत् । एवं त्रिभागोना रथानामावापः कार्यः ।
तेन हस्तिनामश्वानामावापो व्याख्यातः ।
(२) यावदश्वरथद्विपानां युद्धसम्बाधं न कुर्यात्, तावदावापः कार्यः ।
(३) दण्डबाहुल्यमावापः । पत्तिबाहुल्यं प्रत्यावापः । एकाङ्गबाहुल्य-
मन्वावापः । दूष्यबाहुल्यमत्यावापः ।
(४) परावापात् प्रत्यावापादाचतुर्गुणादाष्टगुणादिति वा विभवतः
सैन्यानामावापः कार्यः ।
(५) रथव्यूहेन हस्तिव्यूहो व्याख्यातः । व्यामिश्रो वा हस्तिरथाश्वा-
नाम् । चक्रान्तयोर्हस्तिनः, पार्श्वयोरश्वमुख्याः, रथा उरस्ये । हस्तिनामुरस्यं
रथानां कक्षावश्वानां पक्षाविति मध्यभेदी । विपरीतोऽन्तर्भेदी ।

इक्कीस रथों तक की वृद्धि कर अयुग्म रूप से दस विषमव्यूहों की रचना की जा सकती है ।

( १ ) इस प्रकार की व्यूह-रचना करने के बाद जो सेना बची रह जाय उसको भी व्यूह के भीतर इधर-उधर नियुक्त कर देना चाहिए । उस बची हुई सेना का दो-तिहाई भाग तो आगे-पीछे और बाकी एक हिस्सा बीच में रख देना चाहिए । रथसैन्य में यदि कुछ बचे हुए रथ बाद में मिलाने पड़ जायें तो उनकी संख्या, व्यूह की सेना से एक-तिहाई कम होनी चाहिए । इसी तरह बचे हुए हाथी और घोड़ों को मिलाने के सम्बन्ध में भी समझ लेना चाहिए ।

( २ ) जब तक युद्धकाल में घोड़े, रथ और हाथियों की पर्याप्त भीड़ न हो जाय तब तक उनमें बची हुई सेना को मिलाते रहना चाहिए ।

( ३ ) व्यूह-रचना के बाद बची हुई सेना को फिर से व्यूह में मिला लेने को अवाप कहते हैं । इस प्रकार केवल पैदल सेना ही मिलाई जाय तो उसे प्रत्यावाप कहते हैं । घोड़े, रथ या हाथी, इन तीनों में से किसी एक बचे हुए अंग को व्यूह-रचना के बाद उसमें मिला देने को अन्वावाप कहते है । इसी प्रकार राजद्रोही सैनिकों के द्वारा व्यूहसेना बढ़ाये जाने का नाम अत्यावाप है ।

( ४ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह शत्रुसेना की अपेक्षा चौगुने से लेकर अठगुने तक अपनी सेना में सैनिकों का अवाप करे, अथवा अपनी शक्ति के अनुसार अवाप द्वारा ही सेना को बढ़ाये ।

( ५ ) रथों की उक्त व्यूह-रचना के अनुसार ही हाथियों की व्यूह-रचना भी समझ लेनी चाहिए । अथवा हाथी, रथ और घोड़ों को मिलाकर इस प्रकार की व्यूह-रचना की जानी चाहिए : सेना के सामने दोनों ओर हाथियों को खड़ा कर दिया जाय, पीछे के दोनों हिस्सों में बढ़िया घोड़ों को खड़ा किया जाय, और बीच में

४२ कौ०

Page 742Permalink

६५८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) हस्तिनामेव तु शुद्धः । सान्नाह्यानामुरस्यम्, औपवाह्यानां जघनं, व्यालानां कोटचाविति ।
(२) अश्वव्यूहो वर्मिणामुरस्यं शुद्धानां कक्षपक्षाविति ।
(३) पत्तिव्यूहः पुरस्तादावरणिनः पृष्ठतो धन्विन इति । शुद्धाः ।
(४) पत्तयः पक्षयोरश्वाः पार्श्वयोः, हस्तिनः पृष्ठतो रथाः पुरस्तात्, परव्यूहवशेन वा विपर्यास इति । द्वयङ्गबलविभागः । तेन त्र्यङ्गबलविभागो व्याख्यातः ।
(५) दण्डसम्पत् सारबलं पुंसाम् ।
(६) हस्त्यश्वयोर्विशेषः । कुलं जातिः सत्त्वं वयःस्थता प्राणो वर्ष्म जवस्तेजः शिल्पं स्थैर्यमुदग्रता विधेयत्वं सुव्यञ्जनाचारतेति ।


रथों को खड़ा किया जाय । इसी व्यूह-रचना का एक दूसरा ढंग यह भी है कि मध्य में हाथी, पीछे की ओर रथ और आगे की ओर घोड़े खड़े किए जायँ । इस व्यूह-रचना में हाथियों को मध्य भाग में रखने के कारण मध्यभेदी कहते हैं । इसके विपरीत—पीछे हाथी, बीच में घोड़े और आगे रथों की व्यूह-रचना को अन्तर्भेदी कहते हैं ।

( १ ) केवल हाथियों द्वारा की गई व्यूह-रचना को शुद्ध कहते हैं । ऐसे व्यूह में युद्ध योग्य हाथियों को बीच में रखा जाय और जो उन्मत्त एवं दुष्ट स्वभाव के हों उन्हें आगे के दोनों भागों में नियुक्त किया जाय ।

( २ ) घोड़ों के शुद्ध व्यूह में कवचधारी घोड़ों को बीच में और कवचरहित घोड़ों को आगे-पीछे रखना चाहिए ।

( ३ ) इसी प्रकार पैदल सेना के शुद्ध व्यूह में कवचधारी सैनिकों को आगे के दोनों भागों में और धनुर्धारी सैनिकों को पीछे के दोनों भागों में खड़ा किया जाय ।

( ४ ) मिश्र व्यूहों में सेना के दो-दो अंगों को मिलाकर पैदल सिपाहियों को आगे के दोनों भागों में और घोड़ों को पीछे के दोनों भागों में रखा जाय, अथवा हाथियों को पीछे की ओर और रथों को आगे की ओर नियुक्त किया जाय, या शत्रु की व्यूह-रचना के वैपरीत्य में जैसा भी उचित हो वैसा किया जाय । इस प्रकार सेना के दो अंगों द्वारा तीन प्रकार की व्यूह-रचना की जा सकती है और इसी प्रकार सेना के तीन अंगों को लेकर व्यूह-रचना का विभाग किया जा सकता है ।

( ५ ) जो पैदल सेना वंश-परम्परा से नियमित रूप से चली आ रही हो, जो नित्य तथा वश में रहने वाली हो उसे सारबल कहते हैं ।

( ६ ) कुल, जाति, धैर्य, कार्यक्षमता, आयु, शारीरिक बल, ऊँचाई, चौड़ाई,

Page 743Permalink

प्र० १५५-१५७ : अ० ५ ] व्यूह-बल-विभाग एवं युद्ध ६५९

(१) पत्त्यश्वरथद्विपानां सारत्रिभागमुरस्यं स्थापयेद्, द्वौ त्रिभागौ कक्षं पक्षं चोभयतः । अनुलोममनुसारम् । प्रतिलोमं तृतीयसारम् । फल्गु प्रतिलोमम् । एवं सर्वमुपयोगं गमयेत् ।
(२) फल्गुबलमन्तेष्ववधाय वेगोऽभिहुतो भवति । सारबलमग्रतः कृत्वा कोटीष्वनुसारं कुर्यात् । जघने तृतीयसारं, मध्ये फल्गुबलमेतत् सहिष्णु भवति ।
(३) व्यूहं तु स्थापयित्वा पक्षकक्षोरस्यानामेकेन द्वाभ्यां वा प्रहरेत् । शेषैः प्रतिगृह्णीयात् ।
(४) यत्परस्य दुर्बलं वीतहस्त्यश्वं दूष्यामात्यकं कृतोपजापं वा, तत्प्रभूतसारेणाभिहन्यात् । यद्वा परस्य सारिष्ठं तद्द्विगुणसारेणाभिहन्यात् । यद्-


वेग, पराक्रम, युद्धनैपुण्य, स्थिरता, उन्नतशिर ( उदग्रता ), आज्ञाकारी, अनेक शुभ लक्षणों और शुभ चेष्टाओं आदि विशेष गुणों से युक्त हाथी और घोड़ों की सेना को सारबल कहते हैं ।

( १ ) पैदल, घोड़े, रथ, हाथी के सारभूत बल के एक-तिहाई भाग को बीच में और बाकी दो तिहाई भाग को आगे-पीछे स्थापित किया जाय । यह सर्वोत्तम सेना के खड़े होने का प्रकार है । उत्तम सेना की अपेक्षा जो सेना न्यूनशक्ति हो, उसे अनुसार कहा जाता है, ऐसी सेना के सारबल को पीछे की ओर खड़ा करना चाहिए । इससे भी कुछ न्यूनशक्ति वाली तृतीयसार नामक सेना के सारबल को आगे की ओर खड़ा करना चाहिए । उससे भी निर्बल या वंश-परम्परा से चले आते फल्गुबल को तृतीयसार सेना के आगे खड़ा करना चाहिए । इस प्रकार सभी तरह की सेनाओं को उपयोग में लाना चाहिए ।

( २ ) फल्गुबल को आगे की ओर खड़ा करने से शत्रु के आक्रमण का सारा वेग उसी के ऊपर शान्त हो जाता है । सारबल को आगे, अनुसारबल को बगल ( कोटि ), तृतीयसार को पीछे और फल्गुबल को बीच में करके भी व्यूह की रचना की जा सकती है; यह व्यूह भी शत्रु के आक्रमण को सहन करने वाला होता है ।

( ३ ) आगे, पीछे तथा बीच में व्यूह की यथोचित रचना करके तदनंतर सेना के एक अंग द्वारा या दो अंगों के द्वारा शत्रु पर आक्रमण करना चाहिए और सेना के बाकी अंगों से शत्रु के आक्रमण को रोकना चाहिए ।

( ४ ) शत्रु की दुर्बल, हाथी-घोड़ों से रहित, राजद्रोही अमात्यों से युक्त भेद डाली हुई सेना को सारभूत सेना के द्वारा नष्ट कर डालना चाहिए, और शत्रु की सारभूत सेना को अपनी दुगुनी सारभूत सेना के द्वारा नष्ट कर देना चाहिए । अपनी

६६० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

Page 744Permalink

६६० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

ङ्गल्पसारमात्मनस्तद्बहुनोपचिनुयात् । यतः परस्यापचयस्ततोऽभ्याशे व्यूहेत, यतो वा भयं स्यात् ।
(१) अभिसृतं परिसृतमतिसृतमपसृतमुन्मथ्यावधानं वलयो गोमूत्रिका मण्डलं प्रकीर्णिका व्यावृतपृष्ठमनुवंशमग्रतः पाश्र्वाभ्यां पृष्ठतो भग्नरक्षा भग्नानुपातः इत्यश्वयुद्धानि ।
(२) प्रकीर्णिकावर्जान्येतान्येव, चतुर्णामङ्गानां व्यस्तसमस्तानां वा घातः । पक्षकक्षोरस्यानां च प्रभञ्जनमवस्कन्दः सौप्तिकं चेति हस्तियुद्धानि ।
(३) उन्मथ्यावधानवर्जान्येतान्येव स्वभूमावभियानापयानस्थितयुद्धानीति रथयुद्धानि ।
(४) सर्वदेशकालप्रहरणमुपांशुदण्डश्चेति पत्तियुद्धानि ।

सेना के निर्बल अंग की सहायता के लिए अधिक सेना की नियुक्ति की जानी चाहिए । शत्रु सेना का जो निर्बल छोर हो उसी ओर से आक्रमण करना चाहिए; या जिस ओर से अपने ऊपर आक्रमण का भय हो उधर से ही व्यूह-रचना करनी चाहिए ।

(१) अभिसृत (अपनी सेना से शत्रु की सेना की ओर जाना), परिसृत (शत्रु की सेना के चारों ओर घूम कर प्रहार करना), अतिसृत (शत्रु की सेना के बीच से सुई की तरह वेध कर निकल जाना), अपसृत (उसी मार्ग से दुवारा निकलना), बहुत से घोड़ों के द्वारा शत्रु सेना का मंथन करके फिर एकत्र हो जाना, दो तरफ से सूई के समान मार्ग बनाकर जाना, गोमूत्र के समान टेढ़ी गति से जाना (गोमूत्रिका), मंडल (शत्रु सेना के बीच से निकल कर उसे घेर लेना), प्रकीर्णिका (सभी तरह की चालों का प्रयोग करना), अनुवंश (शत्रुसेना के सामने गयी हुई अपनी सेना का अनुगमन करना) और भग्नानुपात (छिन्न-भिन्न हुई शत्रुसेना का पीछा करना), ये तेरह प्रकार के अश्वयुद्ध होते हैं ।

(२) घोड़ों की प्रकीर्णिका गति को छोड़ कर शेष सभी युद्ध, बिखरे हुए या इकट्ठा हुए सेना के चारों अंगों का हनन करना, आगे, पीछे तथा मध्य में खड़ी हुई सेना को नष्ट करना, शत्रुसेना की निर्बलता पर प्रहार करना और सोती हुई शत्रुसेना को मार डालना, ये सब हस्तियुद्ध हैं ।

(३) उन्मथ्यावधान (अनेक हाथियों के द्वारा शत्रुसेना को उन्मथित करके फिर उनका एकत्र हो जाना) को छोड़ कर बाकी सभी तरह के हस्तियुद्ध, अनुकूल भूमि में रह कर शत्रु पर आक्रमण करना, शत्रु सेना को पराजित कर भाग जाना, सुरक्षित शत्रुसेना के चारों ओर घेरा डाल कर उससे युद्ध करना, ये सब रथ-युद्ध हैं ।

(४) हर समय तथा हर स्थान में हथियारों को धारण करना और चुपचाप शत्रु सेना को नष्ट करना, ये सब पदाति (पैदल) युद्ध हैं ।

सांग्रामिक नामक दसवें अधिकरण में पाँचवाँ अध्याय समाप्त ।

Page 745Permalink

प्र० १५५-१५७ : अ० ५ ] व्यूह-बल-विभाग एवं युद्ध ६६१

( १ ) एतेन विधिना व्यूहानोजान् युग्मांश्च कारयेत् ।
विभवो यावदङ्गानां चतुर्णां सदृशो भवेत् ॥
( २ ) द्वे शते धनुषां गत्वा राजा तिष्ठेत् प्रतिग्रहे ।
भिन्नसङ्घातनं तस्मान्न युध्येताप्रतिग्रहः ॥

इति साङ्ग्रामिके दशमेऽधिकरणे पक्षकक्षोरस्यानां बलाग्रतो व्यूहविभागः सारफल्गुबलविभागः पत्त्यश्वरथहस्तियुद्धानि चेति पञ्चमोऽध्यायः, आदितो द्वात्रिंशदुत्तरशततमः ।

— : ० : —


( १ ) इस प्रकार विजिगीषु राजा को अयुग्म तथा युग्म व्यूहों की रचना करनी चाहिए । अपने हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल अंगों के अनुसार ही अपने व्यूहों की रचना करनी चाहिए ।

( २ ) राजा को चाहिए कि युद्ध आरंभ हो जाने पर वह युद्धभूमि से दो-सौ धनुष की दूरी पर ठहरे । ऐसी स्थिति में वह शत्रु द्वारा छिन्न-भिन्न अपनी सेना को फिर एकत्र कर सकता है । इसलिए सेना के पृष्ठ भाग का आश्रय लिये बिना राजा को कदापि युद्ध न करना चाहिए ।

सांग्रामिक नामक दसवें अधिकरण में पाँचवाँ अध्याय समाप्त ।

— : ० : —

Page 746Permalink
प्रकरण १५८-१५९ <br> अध्याय ६## दण्डभोगमण्डलासंहतव्यूहव्यूहनं तस्य प्रतिव्यूहस्थापनं च

(१) पक्षावुरस्यं प्रतिग्रह इत्यौशनसो व्यूहविभागः । पक्षौ कक्षावुरस्यं प्रतिग्रहः इति बार्हस्पत्यः ।

(२) प्रपक्षकक्षोरस्या उभयोर्दण्डभोगमण्डलासंहताः प्रकृतिव्यूहाः । तत्र तिर्यग्वृत्तिर्दण्डः । समस्तानामान्वावृत्तिर्भोगः । सरतां सर्वतोवृत्तिर्मण्डलः । स्थितानां पृथगनीकवृत्तिरसंहतः ।

(३) पक्षकक्षोरस्यैः समं वर्तमानो दण्डः । स कक्षाभिक्रान्तः प्रदरः; स एव पक्षाभ्यां प्रतिक्रान्तो दृढकः; स एवातिक्रान्तः पक्षाभ्यामसहाः; पक्षाव-


प्रकृतिव्यूह; विकृतिव्यूह और प्रतिव्यूह की स्थापना

(१) आगे के दो हिस्से, बीच का एक हिस्सा और पीछे का एक हिस्सा—व्यूह के चार विभाग शुक्राचार्य (उशना) ने किये हैं। आगे का एक हिस्सा, पीछे दोनों ओर के दो-दो हिस्से, बीच का एक हिस्सा और पीछे का एक हिस्सा—व्यूह के ये छः विभाग आचार्य वृहस्पति ने किये हैं।

(२) शुक्राचार्य और वृहस्पति दोनों आचार्यों के मत से आगे, पीछे तथा बीच में अलग-अलग खड़ी होने वाली सेनाओं के दण्ड, भोग, मण्डल और असंहत नामों से चार प्रकार के व्यूह हुआ करते हैं। ये व्यूह प्रकृतिव्यूह के नाम से कहे जाते हैं। उनमें से सेना को तिरछे में खड़ा करके जो व्यूह बनाया जाता है उसे दण्डव्यूह कहते हैं। दोनों आचार्यों के उक्त चार और छः विभागों द्वारा लगातार कई बार घुमाव डाल कर जो व्यूह बनाया जाता है उसे भोगव्यूह कहते हैं। शत्रु की ओर जाती हुई सेनाओं का चारों ओर से घिर कर आक्रमण करना मण्डलव्यूह कहलाता है। आक्रमण के लिए छोटी-छोटी सेनाओं को अलग-अलग टुकड़ियों में खड़ा करना असंहतव्यूह कहलाता है।

(३) आगे, पीछे तथा बीच में समानरूप से नियुक्त सेनाओं के व्यूह को दण्डव्यूह कहते हैं। जब आगे के दोनों भागों से शत्रु पर आक्रमण किया जाता है तो उस दण्डव्यूह को प्रदरव्यूह कहते हैं। जब पीछे की सेना मुड़ कर शत्रु पर वार करे तो दण्डव्यूह की वह स्थिति दृढकव्यूह के नाम से कही जाती है। पीछे की सेना जब बड़े वेग से शत्रु-सेना के बीच में घुस जाय तब उस दृढकव्यूह को असह्यव्यूह

Page 747Permalink

प्र० १५८-१५९ : अ० ६ ] व्यूह-प्रतिव्यूह-स्थापना ६६३

वस्थाप्योरस्याभिक्रान्तः श्येनः; विपर्यये चापं चापकुक्षिः प्रतिष्ठः सुप्रतिष्ठश्च । चापपक्षः सञ्जयः; स एवोरस्यातिक्रान्तो विजयः; स्थूलकर्णपक्षः स्थूलकर्णः; द्विगुणपक्षस्थूलो विशालविजयः; त्र्यभिक्रान्तपक्षश्चमूमूखः; विपर्यये झषास्यः । ऊर्ध्वराजिर्दण्डः सूची; द्वौ दण्डौ वलयः; चत्वारो दुर्जयः । इति दण्डव्यूहाः ।

(१) पक्षकक्षोरस्यैर्विषमं वर्तमानो भोगः । स सर्पसारी गोमूत्रिका वा । स युग्मोरस्यो दण्डपक्षः शकटः; विपर्यये मकरः; हस्त्यश्वरथैर्व्यतिकीर्णः शकटः पारिपतन्तकः । इति भोगव्यूहाः ।

(२) पक्षकक्षोरस्यानामेकीभावे मण्डलः । स सर्वतोमुखः सर्वतोभद्रः; अष्टानीको दुर्जयः । इति मण्डलव्यूहाः ।


कहते हैं । आगे-पीछे के उपयुक्त भागों पर सेना को रखकर जब मध्यभाग के द्वारा सेना पर आक्रमण किया जाता है तब उस व्यूह को श्येनव्यूह कहते हैं । इन चार व्यूहों के सर्वथा विपरीत व्यूहों का नाम है क्रमशः चाप, चापकुक्षि, प्रतिष्ठ और सुप्रतिष्ठ । जिस व्यूह के पिछले भाग चाप ( धनुष ) के समान हों वह संजयव्यूह कहलाता है । जब बीच से शत्रु पर आक्रमण करके उसके बीच प्रवेश कर दिया जाता है, दण्डव्यूह की वह स्थिति विजयव्यूह कहलाती है । विजयव्यूह की अपेक्षा जिसके पिछले हिस्से दुगुने बड़े हों वह विशाल विजयव्यूह कहलाता है । जिस व्यूह के अगला, दो पिछले और मध्यभाग, तीनों बराबर हों वह चमूमुखव्यूह कहलाता है । इसके विपरीत होने पर वही चमूमुखव्यूह झषास्य व्यूह कहलाता है । जिस व्यूह की सेना ऊँची होकर शत्रुसेना पर आक्रमण करती है उस दण्डव्यूह को सूचीव्यूह कहते हैं । जब आगे, पीछे और मध्य, तीनों स्थानों में दो दण्डव्यूहों को तिरछा खड़ा किया जाय तब उसको वलय व्यूह कहते हैं । यदि इसी प्रकार चार दण्डव्यूहों को खड़ा कर दिया जाय तो उसको दुर्जयव्यूह कहते हैं । यहाँ तक दण्डव्यूहों का निरूपण हुआ ।

( १ ) आगे-पीछे आदि स्थानों के द्वारा विषम संख्या में रचा हुआ व्यूह भोग-व्यूह कहलाता है । भोगव्यूह दो प्रकार का होता है—एक सर्पहारी और दूसरा गोमूत्रिका । जब उसका मध्य भाग दो भागों में बँटकर दण्डाकार दोनों ओर स्थित हो जाता है उस स्थिति में उसको शकटव्यूह कहा जाता है । इसकी विपरीतावस्था में वही व्यूह मकरव्यूह कहलाता है । हाथी, घोड़े और रथों से युक्त शकटव्यूह को पारिपतन्तकव्यूह कहते हैं । यहाँ तक भोगव्यूहों का निरूपण हुआ ।

( २ ) जिस व्यूह में आगे-पीछे और बीच के सभी विभाग एक साथ मिल जायें उसको मंडलव्यूह कहते हैं । जब चारों ओर से शत्रु पर आक्रमण किया जाय तब वही

Page 748Permalink

६६४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) पक्षकक्षोरस्यानाम् असंहतादसंहतः । स पञ्चानीकानामाकृति-स्थापनाद्वज्रो गोधा वा । चतुर्णामुद्यानकः काकपदी वा । त्रयाणामर्धचन्द्रिकः कर्कटकशृङ्गी वा । इत्यसंहतव्यूहाः ।
(२) रथोरस्यो हस्तिकक्षोऽश्वपृष्ठोऽरिष्टः ।
(३) पत्तयोऽश्वा रथा हस्तिनश्चानुपृष्ठमचलः ।
(४) हस्तिनोऽश्वा रथाः पत्तयश्चानुपृष्ठमप्रतिहतः ।
(५) तेषां प्रदरं दृढकेन घातयेत्; दृढकमसह्येन, श्येनं चापेन, प्रतिष्ठं सुप्रतिष्ठेन, सञ्जयं विजयेन, स्थूलकर्णं विशालविजयेन, पारिपतन्तकं सर्वतोभद्रेण । दुर्जयेन सर्वान् प्रतिव्यूहेत ।

मण्डलब्यूह की स्थिति सर्वतोभद्रव्यूह कहलाती है और जब उस व्यूह में आठ सेनायें मिलकर शत्रु पर आक्रमण करें तो वही व्यूह दुर्जयव्यूह कहलाता है । यहाँ तक मण्डलब्यूहों का निरूपण हुआ ।

( १ ) आगे-पीछे आदि की सेनाओं को तितर-बितर कर जो युद्ध किया जाता है उसे असंहतव्यूह कहते हैं । उसके दो प्रकार हैं : एक वज्र और दूसरा गोधा । जब आगे-पीछे की सभी सेनाओं को वज्र के आकार में खड़ा कर दिया जाता है तब उसे वज्रव्यूह और जब उन्हें गोह के आकार में खड़ा कर दिया जाता है तब उसे गोधाव्यूह कहते हैं । जब कि आगे के दोनों हिस्से, बीच का एक हिस्सा और अंत का एक हिस्सा इन चार स्थानों में उक्त प्रकार से सेना को खड़ा कर दिया जाता है तब उस असंहत व्यूह को उद्यानकव्यूह या काकपक्षीव्यूह कहते हैं । जब आगे के दोनों हिस्सों और बीच के एक हिस्से में सेना को खड़ा कर दिया जाता है तब उस व्यूह को अर्धचन्द्रिक या कर्कटकशृङ्गीव्यूह कहते हैं । असंहत व्यूह के यही प्रमुख भेद हैं ।

( २ ) व्यूहों के तीन भेद और हैं : अरिष्ट, अचल और अप्रतिहत । जिस व्यूह के मध्य में रथ, अंत में घोड़े और आदि में हाथी हों उसको अरिष्टव्यूह कहते हैं ।

( ३ ) जिस व्यूह में पैदल, हाथी, घोड़े और रथ एक-दूसरे के पीछे हों, उसे अचलव्यूह कहते हैं ।

( ४ ) जिस व्यूह में हाथी, घोड़ा, रथ और पैदल एक-दूसरे के पीछे हों, उसे अप्रतिहतव्यूह कहते हैं ।

( ५ ) उक्त व्यूहों में से प्रदर को दृढक से, दृढक को असह्य से, श्येन को चाप से, प्रतिष्ठ को सुप्रतिष्ठ से, संजय को विजय से, स्थूलकर्ण को विशालविजय से और पारिपतंतक को सर्वतोभद्र से तोड़ा जाना चाहिए । दुर्जयव्यूह के द्वारा सभी व्यूहों को तोड़ा जाना चाहिए ।

Page 749Permalink

प्र० १५८-१५९ : अ० ६ ] व्यूह-प्रतिव्यूह-स्थापना ६६५

(१) पत्त्यश्वरथद्विपानां पूर्वं पूर्वमुत्तरेण घातयेत् । हीनाङ्गमधिकाङ्गेन चेति ।
(२) अङ्गदशकस्यैकः पतिः पदिकः, पदिकदशकस्यैकः सेनापतिः, तद्दशकस्यैको नायक इति । स तूर्यघोषध्वजपताकाभिर्व्यूहाङ्गानां संज्ञाः स्थापयेद् अङ्गविभागे सङ्घाते स्थाने गमने व्यावर्तने प्रहरणे च ।
(३) समे व्यूहे देशकालसारयोगात् सिद्धिः ।
(४) यन्त्रैरुपनिषद्योगैस्तीक्ष्णैर्व्यासक्तघातिभिः ।
मायाभिर्दैवसंयोगैः शकटैर्हस्तिभूषणैः ॥
(५) दूष्यप्रकोपैर्गोयूथैः स्कन्धावारप्रदीपनैः ।
कोटीजघनघातैर्वा दूतव्यञ्जनभेदनैः ॥
(६) दुर्गं दग्धं हृतं वा ते कोपः कुल्यः समुत्थितः ।
शत्रुराटविको वेति परस्योद्वेगमाचरेत् ॥


(१) पैदल, घोड़ा, रथ तथा हाथी इनको उत्तरोत्तर अंग से नष्ट करना चाहिए और हीन अंग को अधिक बलवान् अङ्ग से नष्ट करना चाहिए ।

(२) दस रथ और दस हाथियों के अधिकारी को पदिक; दस पदिकों के अधिकारी को सेनापति; और दस सेनापतियों के अधिकारी को नायक कहा जाता है । उस सर्वोच्चसत्ताधारी नायक को चाहिए कि वह विशेष वाद्य शब्दों द्वारा अथवा पताका-ध्वजाओं द्वारा व्यूह में खड़ी सेना के लिए सांकेतिक इशारों की व्यवस्था करे । युद्ध में खड़ी सेना को बिखराने के लिए, बिखरी हुई सेना को एकत्र करने के लिए, चलती हुई सेना को रोकने के लिए, रुकी हुई सेना को चलाने के लिए तथा आक्रमण करती हुई सेना को लौट आने के लिए तथा प्रहार करने के लिए यथावसर उक्त संकेतों का प्रयोग किया जाय ।

(३) शत्रु सेना और अपनी सेना में बराबर की व्यूह रचना होने पर देश, काल और योग के अनुसार विजय प्राप्त की जानी चाहिए ।

(४) जामदग्न्य आदि यंत्र, औपनिषदिक प्रकरण में निर्दिष्ट उपाय, तीक्ष्ण आदि गुप्तचरों, छल, कपट, ज्योतिष और हाथी के योग्य वेषों से ढके हुए रथ आदि के द्वारा शत्रु सेना को उद्विग्न करना चाहिए ।

(५) शत्रु के दूष्यों में कोप पैदा करके, आगे गायों का झुंड खड़ा करके, छावनी में आग लगाकर, सेना के आगे-पीछे छापा मारकर, गुप्तचरों को शत्रु सेना में घुसाकर शत्रु सेना को बेचैन करना चाहिए ।

(६) 'तेरे दुर्ग को आग लगा दी गई है, तेरे दुर्ग को जीत लिया गया है, तेरे कुल का ही कोई व्यक्ति तेरे विरुद्ध उठ खड़ा हुआ है, तेरा सामंत युद्ध के लिए तैयार

Page 750Permalink

६६६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुः क्षिप्तो धनुष्मता ।
प्राज्ञेन तु मतिः क्षिप्ता हन्याद् गर्भगतानपि ॥

इति सांग्रामिके दशमेऽधिकरणे दण्डभोगमण्डलासंहतव्यूहव्यूहनं तस्य प्रतिव्यूहस्थापनं चेति षष्ठोऽध्यायः; आदितस्त्रयस्त्रिंशदधिकशततमः ।

समाप्तमिदं सांग्रामिकं दशममधिकरणम् ।

—: ० :—


हो गया है, तेरा आटविक तेरे विरुद्ध उठ आया है, आदि अफवाहों को उड़ाकर भी विजिगीषु शत्रु सेना को उद्विग्न कर सकता है ।

(१) धनुर्धारी के धनुष से छोड़ा गया बाण, संभव है किसी एक व्यक्ति को ही मार डाले या न भी मारे; किन्तु बुद्धिमान् व्यक्ति के द्वारा किया गया बुद्धि का प्रयोग गर्भस्थ प्राणियों को भी नष्ट कर देता है । इसलिए युद्ध की अपेक्षा बुद्धि को ही अधिक शक्ति-संपन्न समझना चाहिए ।

सांग्रामिक नामक दसवें अधिकरण में व्यूहप्रतिव्यूहस्थापना नामक छठा अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

ग्यारहवाँ अधिकरण

Page 751Permalink

ग्यारहवाँ अधिकरण

सङ्घवृत्त