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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में दसवाँ अध्याय समाप्त।

प्र० ६ : अ० १० ] गुप्तचरों की नियुक्ति ३१

(१) तदस्य गूढाः सत्रिरणश्च संवादयेयुः। सत्त्वप्रज्ञावाक्यशक्तिसम्पन्नानां राजभाव्यमनुव्याहरेन्मन्त्रिसंयोगं च। मन्त्री चैषां वृत्तिकर्मभ्यां विद्यतेत।
(२) ये च कारणादभिक्रुद्धास्तानर्थमानाभ्यां शमयेत्, अकारणक्रुद्धान् तूष्णींदण्डेन राजद्विष्टकारिणश्च।
(३) पूजिताश्चार्थमानाभ्यां राज्ञा राजोपजीविनाम्।
जानीयुः शौचमित्येताः पञ्च संस्थाः प्रकीर्तिताः॥

इति कौटलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे गूढपुरुषोत्पत्तौ संस्थोत्पत्तिर्नाम दशमोऽध्यायः॥

—: ० :—

(१) इस प्रश्नोत्तर प्रसंग में 'तापस' गुप्तचर की दूसरे सत्री आदि गुप्तचर सहायता करें। प्रश्नकर्ताओं में यदि धीर, बुद्धिमान्, चतुर लोग हों तो उनसे वह, राजा की ओर से, धन प्राप्त होने की बात कहे; मन्त्री के साथ भी उनकी मुलाकात का संयोग बताये। जब मंत्री से इन लोगों की मुलाकात हो तो उचित यह होगा कि ऐसे लोगों को मंत्री धन तथा आजीविका आदि देकर, गुप्तचर की भविष्यवाणी को सच्ची सिद्ध कर दे।

(२) जो लोग किसी कारणवश क्रुद्ध हो गए हों उन्हें धन एवं सम्मान देकर संतुष्ट किया जाय। जो बिना कारण ही क्रुद्ध हों तथा राजा से द्वेष रखते हों, उनका चुपचाप वध करवा डाले।

(३) इस प्रकार धन और मान से राजा द्वारा सम्मानित गुप्तचर तथा अमात्य आदि राजोपजीवी पुरुषों के सद्व्यवहारों को भली-भांति जान लें। पाँच प्रकार के गुप्तचर पुरुषों की नियुक्ति और उनके कार्यों के विवरण का यही विधान है।

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में दसवाँ अध्याय समाप्त।

—: ० :—

प्रकरण ७गूढपुरुषप्रणिधिः
अध्याय ११

(१) ये चास्य सम्बन्धिनोऽवश्यभर्तव्यास्ते लक्षणमङ्गविद्यां जम्भकविद्यां मायागतमाश्रमधर्मं निमित्तमन्तरचक्रमित्यधीयानाः सत्रिणः संसर्गविद्या वा।
(२) ये जनपदे शूरास्त्यक्तात्मानो हस्तिनं व्यालं वा द्रव्यहेतोः प्रतियोधयेयुस्ते तीक्ष्णाः।
(३) ये बन्धुषु निःस्नेहाः क्रूराश्चालसाश्च ते रसदाः।
(४) परिव्राजिका वृत्तिकामा दरिद्रा विधवा प्रगल्भा ब्राह्मण्यन्तःपुरे कृतसत्कारा महामात्रकुलान्यधिगच्छेत्। एतया मुण्डावृषल्यो व्याख्याताः। इति सञ्चाराः।


गुप्तचरों की नियुक्ति

(भ्रमणशील गुप्तचर)

(१) जो राजा के संबंधी न हों; किन्तु जिनका पालन-पोषण करना राजा के लिए आवश्यक हो; जो सामुद्रिक विद्या, ज्योतिष, व्याकरण आदि अंगों का शुभाशुभ फल बताने वाली विद्या; वशीकरण; इन्द्रजाल; धर्मशास्त्र; शकुनशास्त्र; पक्षिशास्त्र; कामशास्त्र तथा तत्संबंधी नाचने-गाने की कला में निपुण हों वे 'सत्री' कहलाते हैं। [ १०वें अध्याय में जिन गुप्तचरों का वर्णन किया गया है वे एक ही स्थान पर रहकर कार्य करने के कारण 'संस्था' कहलाते हैं। इस अध्याय में वर्णित गुप्तचर 'संचार' कहलाते हैं, जो कि घूम-घूम कर कार्य करते हैं।]

(२) अपने देश में रहने वाले ऐसे व्यक्ति, जो द्रव्य के लिए अपने प्राणों की भी परवाह न करके हाथी, बाघ और सांप से भी भिड़ जाते हैं, उन्हें 'तीक्ष्ण' कहते हैं।

(३) अपने भाई-बंधुओं से भी स्नेह न रखने वाले, क्रूरप्रकृति और आलसी स्वभाव वाले व्यक्ति 'रसद' (जहर देने वाला) कहलाते हैं।

(४) आजीविका की इच्छुक, दरिद्र, प्रौढ, विधवा, दबंग ब्राह्मणी, रनिवास में सम्मानित, प्रधान अमात्यों के घर में प्रवेश पानेवाली 'परिव्राजिका' (संन्यासिनी के वेश में खुफिया का काम करने वाली) नाम की गुप्तचरी कहलाती है। इसी प्रकार मुंडा (मुंडित बौद्ध-भिक्षुणी) और वृषली (शूद्रा) आदि नारी गुप्तचरियों को भी जान लेना चाहिए। ये सभी 'संचार' नामक गुप्तचर हैं।

प्र० ७ : अ० ११ ] गुप्तचरों की नियुक्ति ३३

(१) तान् राजा स्वविषये मन्त्रिपुरोहितसेनापतियुवराजदौवारिकान्तर्वंशिकप्रशास्तृसमाहर्तृसन्निधातृप्रदेष्टृनायकपौरव्यावहारिककार्मान्तिकमन्त्रिपरिषदध्यक्षदण्डदुर्गान्तपालाटाविकेषु श्रद्धेयदेशवेषशिल्पभाषाभिजनापदेशान् भक्तितः सामर्थ्ययोगाच्चापसर्पयेत् ।
(२) तेषां बाह्यं चारं छत्रभृङ्गारव्यजनपादुकासनयानवाहनोपग्राहिणस्तीक्ष्णा विद्युः । तं सत्त्रिणः संस्थास्वर्पयेयुः ।
(३) सूदारालिकस्नापकसंवाहकास्तरककल्पकप्रसाधकोदकपरिचारका रसदाः कुब्जवामनकिरातमूकबधिरजडान्धच्छद्मानो नटनर्तकगायनवादकवाग्जीवनकुशीलवाः स्त्रियश्चाभ्यन्तरं चारं विद्युः । तं भिक्षुक्यः संस्थास्वर्पयेयुः ।


( १ ) राजा को चाहिए कि वह, इन सत्री आदि गुप्तचरों को मंत्री, पुरोहित, सेनापति, युवराज, ड्योढ़ीदार, अन्तःपुररक्षक, छावनी-रक्षक, कलक्टर, कोषाध्यक्ष, कमिशनर, हवलदार, नगरमुखिया, खदान-निरीक्षक, मन्त्रि-परिषद् का अध्यक्ष, सेना-रक्षक, दुर्गरक्षक, सीमारक्षक और अटवीपाल आदि अधिकारियों के समीप, वेष, बोली, कौशल, भाषा तथा कुलीनता के आधार पर उनकी भक्ति और उनके सामर्थ्य की परीक्षा करके, तब रवाना करे ।

( २ ) उनमें से तीक्ष्ण नामक गुप्तचर का कर्तव्य है कि वह छत्र, चामर, व्यजन, पादुका, आसन, शिविका ( पालकी ) और घोड़े आदि बाहरी उपकरणों की देख-रेख करता हुआ अमात्य आदि की सेवा करे और उनके व्यवहारों को जाने । तीक्ष्ण गुप्तचर द्वारा जानी हुई बातों को सत्री नामक गुप्तचर स्थानिक कापटिक आदि गुप्तचरों को बता दे ।

( ३ ) सूद ( रसोइया ), आरालिक ( मांस पकाने वाला ), स्नापक ( नहलाने वाला ), संवाहक ( हाथ-पैर दबाने वाला ), आस्तरक ( विस्तर बिछाने वाला ), कल्पक ( नाई ), प्रसाधक ( श्रृंगार करने वाला ) और उदक-परिचारक ( जल भरने वाला ) आदि विभिन्न रूप-नामों में रह कर रसद नामक गुप्तचर, मन्त्री आदि उच्च अधिकारियों के भेदों का पता लगाये । इसी प्रकार कुबड़े, बौने, किरात ( जङ्गली आदमी ), गूँगे, बहरे, मूर्ख, अन्धे आदि के वेष में गुप्तचर और नट, नाचने-गाने-बजाने वाले, कहानी कहने वाले, कूद-फाँद कर खेल दिखाने वाले, आदि के वेष में स्त्री गुप्तचर सब रहस्यों का पता लगा ले । भिक्षुकी वेष धारण करने वाली गुप्तचर महिला को चाहिये कि वह रसद आदि पुरुष गुप्तचरों से प्राप्त समाचारों को कापटिक आदि गुप्तचरों तक पहुँचा दे ।

३ कौ०

३४कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ पहला अधिकरण

(१) संस्थानामन्तेवासिनः संज्ञालिपिभिश्चारसञ्चारं कुर्युः । न चान्योन्यं संस्थास्ते वा विद्युः ।
(२) भिक्षुकीप्रतिषेधे द्वाःस्थपरम्परा मातापितृव्यञ्जनाः शिल्पकारिकाः कुशीलवा दास्यो वा गीतपाठचवाद्यभाण्डगूढलेख्यसंज्ञाभिर्वा चारं निर्हरेयुः । दीर्घरोगोन्मादाग्निरसविसर्गेण वा गूढनिर्गमनम् ।
(३) त्रयाणामेकवाक्ये सम्प्रत्ययः । तेषामभीक्ष्णविनिपाते तूष्णींदण्डः प्रतिषेधो वा ।
(४) कण्टकशोधनोक्ताश्चापसर्पाः परेषु कृतवेतना वसेयुः सम्पातनिश्श्रारार्थं, त उभयवेतनाः ।


( १ ) संस्थाओं ( कापटिक आदि गुप्तचरों ) के विद्यार्थी अपनी विशिष्ट संकेत-लिपि द्वारा उस सूचना को राजा तक पहुँचावें । ऐसा करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि संस्था-गुप्तचरों को संचार-गुप्तचर और संचार-गुप्तचरों को संस्था-गुप्तचर बिलकुल न जानने पावें ।

( २ ) यदि अमात्य आदि के घरों में भिक्षुकी का अंतःप्रवेश निषिद्ध हो तो वह समाचार द्वारपालों के माध्यम से बाहर भिक्षुकी तक पहुँचे । यदि इसमें भी कुछ आशंका या असम्भव जान पड़े तो अंतःपुर के नौकरों के माता-पिता बनने का बहाना करके वृद्धा स्त्री-पुरुष भीतर प्रवेश करके रहस्य का पता लगायें । या तो रानियों के बाल सवाँरने वाली या नाचने-गाने वाली स्त्रियों अथवा दासियों द्वारा, अथवा निजी संकेतों वाले गीतों, श्लोकों, प्रार्थनाओं, या तो बाजों, बर्तनों, टोकरियों में गुप्त लेख रखकर, अथवा अन्य विधियों से, जैसा भी समय के अनुसार अपेक्ष्य हो, अंतःपुर के समाचारों को बाहर लाया जाय । यदि इन युक्तियों से भी सफलता न मिले तो गुप्तचर को चाहिए कि वह किसी भयङ्कर बीमारी अथवा पागलपन के बहाने से आग लगाकर या किसी को जहर देकर ( जिससे अंतःपुर में कोलाहल मच जाये ) चुपचाप बाहर निकल आवे ।

( ३ ) परस्पर अपरिचित तीन गुप्तचरों द्वारा लाये गये समाचार यदि एक ही तरह से मिलें तो उन्हें ठीक समझना चाहिए । यदि वे परस्पर विरोधी समाचारों को लायें तो उन्हें या तो नौकरी से अलग कर दिया जाय अथवा चुपचाप पिटवाया जाय ।

( ४ ) उक्त गुप्तचरों के अतिरिक्त ‘कंटकशोधन’ प्रकरण में आगे बताये गए गुप्तचरों को भी नियुक्त करना चाहिये । ऐसे गुप्तचर विदेशों में जाकर वहाँ की सरकार के वेतनभोगी नौकर बनें और उनके गुप्त रहस्यों को समझें । ये गुप्तचर मित्र-पक्ष और शत्रु-पक्ष दोनों ओर से वेतन लें ।

प्र० ७ : अ० ११ ] गुप्तचरों की नियुक्ति ३५

(१) गृहीतपुत्रदारांश्च कुर्यादुभयवेतनान् ।
तांश्चारिप्रहितान् विद्यात् तेषां शौचं च तद्विधैः ॥
(२) एवं शत्रौ च मित्रे च मध्यमे चावपेच्चरान् ।
उदासीने च तेषां च तीर्थेष्वष्टादशस्वपि ॥
(३) अन्तर्गृहचरास्तेषां कुब्जवामनषण्डकाः ।
शिल्पवत्यः स्त्रियो मूकाश्चित्राश्च म्लेच्छजातयः ॥
(४) दुर्गेषु वणिजः संस्था दुर्गान्ते सिद्धतापसाः ।
कर्षकौदास्थिता राष्ट्रे राष्ट्रान्ते व्रजवासिनः ॥
(५) वने वनचराः कार्याः श्रमणाटविकादयः ।
परप्रवृत्तिज्ञानार्थाः शीघ्राश्चारपरम्पराः ॥
(६) परस्य चैते बोद्धव्यास्तादृशैरेव तादृशाः ।
चारसञ्चारिणः संस्था गूढाश्चागूढसंज्ञिताः ॥


( १ ) उभयवेतनभोगी इस प्रकार के गुप्तचरों के सम्बन्ध में विजय की इच्छा रखने वाले राजा को चाहिए कि वह उनके स्त्री-बच्चों को सत्कारपूर्वक अपने आधीन रखे । शत्रु की ओर से नियुक्त इस प्रकार के उभयवेतनभोगी गुप्तचरों की भी राजा जानकारी रखे और उनके माध्यम से अपने उभयवेतनभोगी गुप्तचरों की पवित्रता की भी परीक्षा करता रहे ।

( २ ) इस प्रकार विजिगीषु राजा को चाहिए कि वह शत्रु, मित्र, मध्यम तथा उदासीन राजाओं और उनके मन्त्री, पुरोहित, सेनापति आदि अठारह प्रकार के अधीनस्थ कर्मचारियों के निकट, सभी स्थानों पर, अपने गुप्तचरों को नियुक्त करे ।

( ३ ) इसके अतिरिक्त उन शत्रु, मित्र, मध्यम आदि राजाओं के घरों तथा उनके मन्त्री, पुरोहित आदि के घरों में भी काम करने वाले कुबड़े, बौने, नपुंसक, कारीगर स्त्रियाँ, गूँगे तथा दूसरे-दूसरे प्रकार के बहानों को लेकर म्लेच्छ जाति के पुरुषों को नियुक्त करना चाहिए ।

( ४ ) किलों में व्यापार करने वाले लोगों को, किले की सीमा पर सिद्ध तपस्वियों को, राज्य के अन्तर्गत अन्य स्थानों पर कृषक तथा उदास्थित पुरुषों को और राज्य की सीमा पर चरवाहों को, गुप्तचर वेष में नियुक्त करना चाहिये ।

( ५ ) जंगल में शत्रु की प्रत्येक गति-विधि का पता लगाने के लिए चतुर, वानप्रस्थी और जंगली लोगों को गुप्तचर नियुक्त करना चाहिए ।

( ६ ) इस प्रकार, प्रकट रूप से सामान्य स्थिति में रहते हुए ये गुप्तचर, शत्रु की ओर से नियुक्त सभी, तीक्ष्ण, कापटिक, उदास्थित आदि गुप्तचरों को अपने वर्ग के अनुसार ही चीन्हैं ।