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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 754 of 918

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Page 754

६७० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ ग्यारहवां अधिकरण

(१) कुमारकान् विशिष्टच्छन्दिकया हीनच्छन्दिकानुत्साहयेयुः ।
(२) विशिष्टानां चैकपात्रं विवाहं हीनेभ्यो वारयेयुः । हीनान् वा विशिष्टैरेकपात्रे विवाहे वा योजयेयुः । अवहीनान् वा तुल्यभावोपगमने कुलतः पौरुषतः स्थानविपर्यास्तो वा । व्यवहारमवस्थितं वा प्रतिलोम-स्थापनेन निशामयेयुः । विवादपदेषु वा द्रव्यपशुमनुष्याभिघातेन रात्रौ तीक्ष्णाः कलहानुत्पादयेयुः । सर्वेषु च कलहस्थानेषु हीनपक्षं राजा कोश-दण्डाभ्यामुपगृह्य प्रतिपक्षवधे योजयेत्, भिन्नानपवाहयेद्वा । एकदेशे सम-स्तान् वा निवेश्य भूमौ चेषां पञ्चकुलीं दशकुलीं वा कृष्यां निवेशयेत् । एकस्था हि शस्त्रग्रहणसमर्थाः स्युः । समवाये चैषामत्ययं स्थापयेत् ।
(३) राजशब्दिभिरवरुद्धमवक्षिप्तं वा कुल्यमभिजातं राजपुत्रत्वे स्था-


( १ ) संघ के राजकुमारों में जो अधिक साधनसंपन्न होकर सुखपूर्वक रहते हों उनके मुकाबले में असंपन्न राजकुमारों को भड़का दे ।

( २ ) गुप्तचरों को चाहिए कि वे संघ के विशिष्ट व्यक्तियों को उनकी अपेक्षा हीन व्यक्तियों के साथ एक पंक्ति में बैठ कर भोजन करने तथा विवाहादि संबंध करने, से वर्जित करें । अथवा हीन व्यक्तियों को विशिष्ट व्यक्तियों के साथ एक पंक्ति में भोजन करने तथा विवाहादि संबंध के लिए प्रेरित करें । अथवा छोटी हैसियत के व्यक्तियों को बड़ी हैसियत के व्यक्तियों के बराबर खानदानी या बहादुरी या स्थानां-तर के लिए उत्साहित करें । अथवा संघ द्वारा किसी विवादास्पद विषय का निर्णय किये जाने पर जो निर्णय हुआ हो उसके विपरीत ही वादी को जाकर सुनायें । अथवा रात में तीक्ष्ण गुप्तचर स्वयं ही किसी संघ के द्रव्य, पशु तथा मनुष्यों को नष्ट कर उसको दूसरे संघ वालों का कार्य बताकर प्रचार करे और इस प्रकार के विवादास्पद विषयों को उठाकर उनको आपस में लड़ा दे । जब इस प्रकार के कलह संघों में उत्पन्न हों, तो विजिगीषु को चाहिए कि वह किसी पक्षपात रहित संघ के व्यक्ति को कोष तथा दण्ड के द्वारा अपने वश में कर उससे अपने शत्रु का वध करा डाले । अथवा संघ के विरुद्ध हुए उन व्यक्तियों को संघ से अलग करा दे । अथवा उनको किसी एक प्रदेश में इकट्ठा कर पाँच-पाँच, दस-दस समूहों के छोटे-छोटे गाँवों में बसा दे । क्योंकि यदि उन्हें एक साथ ही बसा दिया जायगा तो संभव है वे लोग फिर कभी अवसर आने पर विजिगीषु के विरुद्ध हथियार उठाने में समर्थ हो सकें, इसलिए उनकी आबादी के बीच में थोड़ी-थोड़ी सेना नियुक्त कर दे ।

( ३ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह नाममात्र को राजा कहलाने वाले लिच्छिवी आदि क्षत्रिय-संघों से अवरुद्ध या तिरस्कृत, उच्चकुलोत्पन्न गुणी व्यक्ति को राजपुत्र