कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context| प्रकरण १५८-१५९ <br> अध्याय ६ | ## दण्डभोगमण्डलासंहतव्यूहव्यूहनं तस्य प्रतिव्यूहस्थापनं च |
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(१) पक्षावुरस्यं प्रतिग्रह इत्यौशनसो व्यूहविभागः । पक्षौ कक्षावुरस्यं प्रतिग्रहः इति बार्हस्पत्यः ।
(२) प्रपक्षकक्षोरस्या उभयोर्दण्डभोगमण्डलासंहताः प्रकृतिव्यूहाः । तत्र तिर्यग्वृत्तिर्दण्डः । समस्तानामान्वावृत्तिर्भोगः । सरतां सर्वतोवृत्तिर्मण्डलः । स्थितानां पृथगनीकवृत्तिरसंहतः ।
(३) पक्षकक्षोरस्यैः समं वर्तमानो दण्डः । स कक्षाभिक्रान्तः प्रदरः; स एव पक्षाभ्यां प्रतिक्रान्तो दृढकः; स एवातिक्रान्तः पक्षाभ्यामसहाः; पक्षाव-
प्रकृतिव्यूह; विकृतिव्यूह और प्रतिव्यूह की स्थापना
(१) आगे के दो हिस्से, बीच का एक हिस्सा और पीछे का एक हिस्सा—व्यूह के चार विभाग शुक्राचार्य (उशना) ने किये हैं। आगे का एक हिस्सा, पीछे दोनों ओर के दो-दो हिस्से, बीच का एक हिस्सा और पीछे का एक हिस्सा—व्यूह के ये छः विभाग आचार्य वृहस्पति ने किये हैं।
(२) शुक्राचार्य और वृहस्पति दोनों आचार्यों के मत से आगे, पीछे तथा बीच में अलग-अलग खड़ी होने वाली सेनाओं के दण्ड, भोग, मण्डल और असंहत नामों से चार प्रकार के व्यूह हुआ करते हैं। ये व्यूह प्रकृतिव्यूह के नाम से कहे जाते हैं। उनमें से सेना को तिरछे में खड़ा करके जो व्यूह बनाया जाता है उसे दण्डव्यूह कहते हैं। दोनों आचार्यों के उक्त चार और छः विभागों द्वारा लगातार कई बार घुमाव डाल कर जो व्यूह बनाया जाता है उसे भोगव्यूह कहते हैं। शत्रु की ओर जाती हुई सेनाओं का चारों ओर से घिर कर आक्रमण करना मण्डलव्यूह कहलाता है। आक्रमण के लिए छोटी-छोटी सेनाओं को अलग-अलग टुकड़ियों में खड़ा करना असंहतव्यूह कहलाता है।
(३) आगे, पीछे तथा बीच में समानरूप से नियुक्त सेनाओं के व्यूह को दण्डव्यूह कहते हैं। जब आगे के दोनों भागों से शत्रु पर आक्रमण किया जाता है तो उस दण्डव्यूह को प्रदरव्यूह कहते हैं। जब पीछे की सेना मुड़ कर शत्रु पर वार करे तो दण्डव्यूह की वह स्थिति दृढकव्यूह के नाम से कही जाती है। पीछे की सेना जब बड़े वेग से शत्रु-सेना के बीच में घुस जाय तब उस दृढकव्यूह को असह्यव्यूह