कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context| प्रकरण १५३-१५४ | युद्धभूमयः, पत्त्यश्वरथहस्तिकर्माणि च |
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| अध्याय ४ |
(१) स्वभूमिः पत्त्यश्वरथद्विपानामिष्टा युद्धे निवेशे च ।
(२) धान्वनवननिम्नस्थलयोधिनां खनकाकाशदिवारात्रियोधिनां च पुरुषाणां नादेयपार्वतानूपसारसानां च हस्तिनामश्वानां च यथास्वमिष्टा युद्धभूमयः कालश्च ।
(३) समा स्थिराभिकाशा निरुत्खातिन्यचक्रखुरोऽनक्षग्राहिणी अवृक्षगुल्मप्रततिस्तम्भकेदारश्वभ्रवल्मीकसिकतापङ्कभङ्गुरा दरणहीना च रथभूमिः ।
(४) हस्त्यश्वयोर्मनुष्याणां च समे विषमे हिता युद्धे निवेशे च ।
(५) अण्वश्मवृक्षा ह्रस्वलङ्घनीयश्वभ्रा मन्ददरणदोषाचाश्वभूमिः । स्थूलस्थाण्वश्मवृक्षप्रततिवल्मीकगुल्मा पदातिभूमिः । गम्यशैलनिम्नविषमा मर्दनीयवृक्षा छेदनीयप्रततिः पङ्कभङ्गुरदरणहीना च हस्तिभूमिः ।
युद्धयोग्य भूमि और पदाति, अश्व, रथ तथा हाथी आदि सेनाओं के कार्य
(१) पैदल, घुड़सवार, रथारोही तथा हस्त्यारोही सैनिकों को युद्ध के लिए और ठहरने के लिए उपयुक्त भूमि का होना अत्यंत आवश्यक है ।
(२) धान्वनदुर्ग, वनदुर्ग, जल, स्थल, खाई, आकाश, दिन-रात, नदी, पहाड़, जलमय प्रदेश तथा तालाब आदि में युद्ध करने वाले हस्त्यारोही और अश्वारोही सैनिकों के लिए अनुकूल युद्धयोग्य भूमि तथा उपयुक्त ऋतु आदि का होना अत्यन्त आवश्यक है ।
(३) समतल, दलदल रहित एकदम ठोस, साफ-सुथरी, चिकनी, घनी बेलों से अच्छादित, खाई-खंधक से रहित, झुरमुट, ठूंठ, क्यारियाँ, बाँबी, गढ़े, रेत, कीचड़ और टेढ़ेपन आदि से रहित जमीन एवं दर्रों से रहित ( दरणहीना ) भूमि रथसेना के युद्धार्थ उपयुक्त समझनी चाहिए ।
(४) उपर्युक्त रथयोग्य भूमि ही अश्वारोही, हस्त्यारोही और पदाति सेनाओं के लिए भी सम, विषम देश में युद्ध के लिए उपयुक्त समझनी चाहिए ।
(५) छोटे-छोटे कंकड़ तथा वृक्षों से युक्त, छोटे-छोटे लांघने योग्य गढों से युक्त और इधर-उधर छोटे-छोटे दर्रों से युक्त भूमि अश्वारोही सेना के ठहरने—युद्ध के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है । मोटे-मोटे पेड़ों के ठूंठ, मोटे-मोटे पत्थर वा कंकड़,