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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 748 of 918

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Page 748

६६४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) पक्षकक्षोरस्यानाम् असंहतादसंहतः । स पञ्चानीकानामाकृति-स्थापनाद्वज्रो गोधा वा । चतुर्णामुद्यानकः काकपदी वा । त्रयाणामर्धचन्द्रिकः कर्कटकशृङ्गी वा । इत्यसंहतव्यूहाः ।
(२) रथोरस्यो हस्तिकक्षोऽश्वपृष्ठोऽरिष्टः ।
(३) पत्तयोऽश्वा रथा हस्तिनश्चानुपृष्ठमचलः ।
(४) हस्तिनोऽश्वा रथाः पत्तयश्चानुपृष्ठमप्रतिहतः ।
(५) तेषां प्रदरं दृढकेन घातयेत्; दृढकमसह्येन, श्येनं चापेन, प्रतिष्ठं सुप्रतिष्ठेन, सञ्जयं विजयेन, स्थूलकर्णं विशालविजयेन, पारिपतन्तकं सर्वतोभद्रेण । दुर्जयेन सर्वान् प्रतिव्यूहेत ।

मण्डलब्यूह की स्थिति सर्वतोभद्रव्यूह कहलाती है और जब उस व्यूह में आठ सेनायें मिलकर शत्रु पर आक्रमण करें तो वही व्यूह दुर्जयव्यूह कहलाता है । यहाँ तक मण्डलब्यूहों का निरूपण हुआ ।

( १ ) आगे-पीछे आदि की सेनाओं को तितर-बितर कर जो युद्ध किया जाता है उसे असंहतव्यूह कहते हैं । उसके दो प्रकार हैं : एक वज्र और दूसरा गोधा । जब आगे-पीछे की सभी सेनाओं को वज्र के आकार में खड़ा कर दिया जाता है तब उसे वज्रव्यूह और जब उन्हें गोह के आकार में खड़ा कर दिया जाता है तब उसे गोधाव्यूह कहते हैं । जब कि आगे के दोनों हिस्से, बीच का एक हिस्सा और अंत का एक हिस्सा इन चार स्थानों में उक्त प्रकार से सेना को खड़ा कर दिया जाता है तब उस असंहत व्यूह को उद्यानकव्यूह या काकपक्षीव्यूह कहते हैं । जब आगे के दोनों हिस्सों और बीच के एक हिस्से में सेना को खड़ा कर दिया जाता है तब उस व्यूह को अर्धचन्द्रिक या कर्कटकशृङ्गीव्यूह कहते हैं । असंहत व्यूह के यही प्रमुख भेद हैं ।

( २ ) व्यूहों के तीन भेद और हैं : अरिष्ट, अचल और अप्रतिहत । जिस व्यूह के मध्य में रथ, अंत में घोड़े और आदि में हाथी हों उसको अरिष्टव्यूह कहते हैं ।

( ३ ) जिस व्यूह में पैदल, हाथी, घोड़े और रथ एक-दूसरे के पीछे हों, उसे अचलव्यूह कहते हैं ।

( ४ ) जिस व्यूह में हाथी, घोड़ा, रथ और पैदल एक-दूसरे के पीछे हों, उसे अप्रतिहतव्यूह कहते हैं ।

( ५ ) उक्त व्यूहों में से प्रदर को दृढक से, दृढक को असह्य से, श्येन को चाप से, प्रतिष्ठ को सुप्रतिष्ठ से, संजय को विजय से, स्थूलकर्ण को विशालविजय से और पारिपतंतक को सर्वतोभद्र से तोड़ा जाना चाहिए । दुर्जयव्यूह के द्वारा सभी व्यूहों को तोड़ा जाना चाहिए ।