कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context६५२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण
(१) अकण्टकिन्यबहुविषमा प्रत्यासारवतीति पदातीनामतिशयः ।
(२) द्विगुणप्रत्यासारा कर्दमौदकखञ्जनहीना निःशर्करेति वाजिनामतिशयः ।
(३) पांसुकर्दमौदकनलशराधानवती श्वदंष्ट्राहीना महावृक्षशाखाघातवियुक्तेति हस्तिनामतिशयः ।
(४) तोयाशयाश्रयवती निरुत्खातिनी केदारहीना व्यावर्तनसमर्थेति रथानामतिशयः । उक्ता सर्वेषां भूमिः ।
(५) एतया सर्वबलनिवेशा युद्धानि च व्याख्यातानि भवन्ति ।
(६) भूमिवासनवनिचयो विषमतोयतीर्थवातरश्मिग्रहणं वीवधासारयोर्घातो रक्षा वा, विशुद्धिः स्थापना च बलस्य, प्रसारवृद्धिर्बाहूत्सारः,
वृक्ष, लता, बांबी तथा झुरमुट आदि से युक्त भूमि पैदल सैनिकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है । हाथियों के चढ़ सकने योग्य पहाड़, ऊँची-नीची जमीन, हाथियों के खुजलाने योग्य वृक्षों से युक्त, काटने योग्य लताओं से पूर्ण और गढों एवं दरारों से रहित भूमि हाथियों के लिए अधिक उपयुक्त है ।
( १ ) कंटकरहित, न अधिक ऊँची न अधिक नीची और अवसर आने पर लौट आने की सुविधा वाली भूमि पैदल सेना के पड़ाव-युद्ध के लिए अत्यन्त उत्तम है ।
( २ ) जिस भूमि में आगे बढ़ने की अपेक्षा पीछे लौटने में अधिक सुविधा रहती है और जिसमें कीचड़, जल, दलदल तथा कंकरीली मिट्टी का सर्वथा अभाव हो वह भूमि अश्वारोही सेना के लिए अतीव उत्तम है ।
( ३ ) धूल, कीचड़, जल, नरसल, मूंज और नरसल-मूंज की जड़ से युक्त तथा गोखुरुओं से रहित एवं बड़े-बड़े घने वृक्षों से रहित भूमि हस्त्यारोही सेना के लिए अति उत्तम है ।
( ४ ) स्नान योग्य जलाशयों, विश्राम करने योग्य स्थानों से युक्त, ऊबड़-खाबड़ रहित, क्यारियों से रहित, अवसर के समय में लौटने की सुविधाओं वाली भूमि रथ-सेना के लिए अधिक उपयोगी है । यहाँ तक उपयुक्त युद्धभूमि के सम्बन्ध में निरूपण किया गया ।
( ५ ) इसी प्रकार सेनाओं के ठहरने और युद्धादि कार्यों के सम्बन्ध में भी विचार कर लेना चाहिए ।
( ६ ) भूमि, निवास तथा वन की सफाई घोड़ों के द्वारा की जानी चाहिए । ( छिपे हुए शत्रु को हटाना भूमिनिश्चय; सेना के पड़ाव में उपद्रव को दूर करना वासनिश्चय; और जंगली मार्गों में चोरों को साफ करना वननिश्चय कहलाता है ) । विषम ( जहाँ पर शत्रु आक्रमण न कर सके ), तोय ( जहाँ पर जल से भरे तालाब हों ), तीर्थ ( नदी के घाट ), वात ( जहाँ पर शुद्ध वायु आ-जा सके ) और रश्मि