कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्र० १५५-१५७ : अ० ५ ] व्यूह-बल-विभाग एवं युद्ध ६५७
(१) अतः सैन्यानां व्यूहशेषमावापः कार्यः । रथानां द्वौ त्रिभागावङ्गे-
ष्वावापयेत् । शेषमुरस्यं स्थापयेत् । एवं त्रिभागोना रथानामावापः कार्यः ।
तेन हस्तिनामश्वानामावापो व्याख्यातः ।
(२) यावदश्वरथद्विपानां युद्धसम्बाधं न कुर्यात्, तावदावापः कार्यः ।
(३) दण्डबाहुल्यमावापः । पत्तिबाहुल्यं प्रत्यावापः । एकाङ्गबाहुल्य-
मन्वावापः । दूष्यबाहुल्यमत्यावापः ।
(४) परावापात् प्रत्यावापादाचतुर्गुणादाष्टगुणादिति वा विभवतः
सैन्यानामावापः कार्यः ।
(५) रथव्यूहेन हस्तिव्यूहो व्याख्यातः । व्यामिश्रो वा हस्तिरथाश्वा-
नाम् । चक्रान्तयोर्हस्तिनः, पार्श्वयोरश्वमुख्याः, रथा उरस्ये । हस्तिनामुरस्यं
रथानां कक्षावश्वानां पक्षाविति मध्यभेदी । विपरीतोऽन्तर्भेदी ।
इक्कीस रथों तक की वृद्धि कर अयुग्म रूप से दस विषमव्यूहों की रचना की जा सकती है ।
( १ ) इस प्रकार की व्यूह-रचना करने के बाद जो सेना बची रह जाय उसको भी व्यूह के भीतर इधर-उधर नियुक्त कर देना चाहिए । उस बची हुई सेना का दो-तिहाई भाग तो आगे-पीछे और बाकी एक हिस्सा बीच में रख देना चाहिए । रथसैन्य में यदि कुछ बचे हुए रथ बाद में मिलाने पड़ जायें तो उनकी संख्या, व्यूह की सेना से एक-तिहाई कम होनी चाहिए । इसी तरह बचे हुए हाथी और घोड़ों को मिलाने के सम्बन्ध में भी समझ लेना चाहिए ।
( २ ) जब तक युद्धकाल में घोड़े, रथ और हाथियों की पर्याप्त भीड़ न हो जाय तब तक उनमें बची हुई सेना को मिलाते रहना चाहिए ।
( ३ ) व्यूह-रचना के बाद बची हुई सेना को फिर से व्यूह में मिला लेने को अवाप कहते हैं । इस प्रकार केवल पैदल सेना ही मिलाई जाय तो उसे प्रत्यावाप कहते हैं । घोड़े, रथ या हाथी, इन तीनों में से किसी एक बचे हुए अंग को व्यूह-रचना के बाद उसमें मिला देने को अन्वावाप कहते है । इसी प्रकार राजद्रोही सैनिकों के द्वारा व्यूहसेना बढ़ाये जाने का नाम अत्यावाप है ।
( ४ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह शत्रुसेना की अपेक्षा चौगुने से लेकर अठगुने तक अपनी सेना में सैनिकों का अवाप करे, अथवा अपनी शक्ति के अनुसार अवाप द्वारा ही सेना को बढ़ाये ।
( ५ ) रथों की उक्त व्यूह-रचना के अनुसार ही हाथियों की व्यूह-रचना भी समझ लेनी चाहिए । अथवा हाथी, रथ और घोड़ों को मिलाकर इस प्रकार की व्यूह-रचना की जानी चाहिए : सेना के सामने दोनों ओर हाथियों को खड़ा कर दिया जाय, पीछे के दोनों हिस्सों में बढ़िया घोड़ों को खड़ा किया जाय, और बीच में
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