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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 733 of 918

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Page 733

प्र० १५०-१५२ : अ० ३ ] कूटयुद्ध और सेना-प्रयोग [ ६४९

(१) चिकित्सकाः शस्त्रयन्त्रागदस्नेहवस्त्रहस्ताः, स्त्रियश्चान्नपानरक्षिण्यः पुरुषाणामुद्धर्षणीयाः पृष्ठतस्तिष्ठेयुः ।
(२) अदक्षिणामुखं पृष्ठतः सूर्यमनुलोमवातमनीकं स्वभूमौ व्यूहेत । परभूमिव्यूहे चाश्वांश्चारयेयुः ।
(३) यत्र स्थानं प्रजवश्चाभूमि व्यूहस्य, तत्र स्थितः प्रजवितश्चोभयथा जीयेत । विपर्यये जयति । उभयथा स्थाने प्रजवे च ।
(४) समा विषमा व्यामिश्रा वा भूमिरिति । पुरस्तात्पार्श्वाभ्यां पश्चाच्च ज्ञेया । समायां दण्डमण्डलव्यूहाः, विषमायां भोगसंहतव्यूहाः । व्यामिश्रायां विषमव्यूहाः ।
(५) विशिष्टबलं भङ्क्त्वा सन्धि याचेत । समबलेन याचितः सन्दधीत । हीनमनुहन्यात् । न त्वेव स्वभूमिप्राप्तं त्यक्तात्मानं वा ।


( १ ) सैनिकों के स्वास्थ्य-संरक्षण और मनोविनोद के लिए चिकित्सक, काटने के औजार, चिमटी, दवाई, घी, तेल, मरहम-पट्टी, सहचिकित्सक, खाने-पीने की सामग्री और सैनिकों को प्रसन्न करने वाली स्त्रियाँ, इन सबको युद्धभूमि के लिये प्रस्थान करते समय सेना के पिछले हिस्से में रखा जाय ।

( २ ) विजिगीषु को चाहिए कि युद्धकाल में अमंगल-सूचक दक्षिण दिशा की ओर सैनिकों का मुँह करके खड़ा न करे । इस बात पर पूरा ध्यान दिया जाय कि सूर्य की किरणें सेना के पीठ पीछे और वायु का रुख अनुकूल हो, इस प्रकार व्यूह-रचना करके सैनिकों को खड़ा किया जाय । यदि युद्ध भूमि शत्रु के अनुकूल हो और वहीं पर विजिगीषु को भी व्यूह-रचना करनी पड़े, तो विजिगीषु को चाहिए कि वह घोड़े दौड़ा कर शत्रु के मोर्चे को विघटित कर दे ।

( ३ ) जिस स्थान पर ठहर कर विजिगीषु बहुत दिनों तक कार्य करता ही रह जाय या समयाभाव में जल्दी ही कार्य को करता हुआ, दोनों ही परिस्थितियों में, वहाँ पर अवश्य ही वह शत्रु द्वारा मारा जाता है ।

( ४ ) व्यूहभूमि तीन प्रकार की होती है, १. सम २. विषम और ३. व्यामिश्र । व्यूह-रचना के आगे, पीछे या बगल में, कहीं भी सम भूमि का होना आवश्यक है । इसी प्रकार विषम भूमि के संबंध में भी समझना चाहिए । तीनों प्रकार की उक्त समभूमि में दण्डाकार सेना की स्थापना ( दण्ड व्यूह ) और गोलाकार सेना की स्थापना ( मंडल व्यूह ) की जाय । इसी प्रकार तीनों तरह की विषम भूमि में भोग-व्यूह और संहत व्यूह की रचना की जाय । तीनों प्रकार की व्यामिश्र भूमि में विषमव्यूहों की रचना की जाय ।

( ५ ) विजिगीषु को चाहिए कि पहले वह अधिक शक्तिशाली शत्रु की सेना को