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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 744 of 918

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Page 744

६६० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

ङ्गल्पसारमात्मनस्तद्बहुनोपचिनुयात् । यतः परस्यापचयस्ततोऽभ्याशे व्यूहेत, यतो वा भयं स्यात् ।
(१) अभिसृतं परिसृतमतिसृतमपसृतमुन्मथ्यावधानं वलयो गोमूत्रिका मण्डलं प्रकीर्णिका व्यावृतपृष्ठमनुवंशमग्रतः पाश्र्वाभ्यां पृष्ठतो भग्नरक्षा भग्नानुपातः इत्यश्वयुद्धानि ।
(२) प्रकीर्णिकावर्जान्येतान्येव, चतुर्णामङ्गानां व्यस्तसमस्तानां वा घातः । पक्षकक्षोरस्यानां च प्रभञ्जनमवस्कन्दः सौप्तिकं चेति हस्तियुद्धानि ।
(३) उन्मथ्यावधानवर्जान्येतान्येव स्वभूमावभियानापयानस्थितयुद्धानीति रथयुद्धानि ।
(४) सर्वदेशकालप्रहरणमुपांशुदण्डश्चेति पत्तियुद्धानि ।

सेना के निर्बल अंग की सहायता के लिए अधिक सेना की नियुक्ति की जानी चाहिए । शत्रु सेना का जो निर्बल छोर हो उसी ओर से आक्रमण करना चाहिए; या जिस ओर से अपने ऊपर आक्रमण का भय हो उधर से ही व्यूह-रचना करनी चाहिए ।

(१) अभिसृत (अपनी सेना से शत्रु की सेना की ओर जाना), परिसृत (शत्रु की सेना के चारों ओर घूम कर प्रहार करना), अतिसृत (शत्रु की सेना के बीच से सुई की तरह वेध कर निकल जाना), अपसृत (उसी मार्ग से दुवारा निकलना), बहुत से घोड़ों के द्वारा शत्रु सेना का मंथन करके फिर एकत्र हो जाना, दो तरफ से सूई के समान मार्ग बनाकर जाना, गोमूत्र के समान टेढ़ी गति से जाना (गोमूत्रिका), मंडल (शत्रु सेना के बीच से निकल कर उसे घेर लेना), प्रकीर्णिका (सभी तरह की चालों का प्रयोग करना), अनुवंश (शत्रुसेना के सामने गयी हुई अपनी सेना का अनुगमन करना) और भग्नानुपात (छिन्न-भिन्न हुई शत्रुसेना का पीछा करना), ये तेरह प्रकार के अश्वयुद्ध होते हैं ।

(२) घोड़ों की प्रकीर्णिका गति को छोड़ कर शेष सभी युद्ध, बिखरे हुए या इकट्ठा हुए सेना के चारों अंगों का हनन करना, आगे, पीछे तथा मध्य में खड़ी हुई सेना को नष्ट करना, शत्रुसेना की निर्बलता पर प्रहार करना और सोती हुई शत्रुसेना को मार डालना, ये सब हस्तियुद्ध हैं ।

(३) उन्मथ्यावधान (अनेक हाथियों के द्वारा शत्रुसेना को उन्मथित करके फिर उनका एकत्र हो जाना) को छोड़ कर बाकी सभी तरह के हस्तियुद्ध, अनुकूल भूमि में रह कर शत्रु पर आक्रमण करना, शत्रु सेना को पराजित कर भाग जाना, सुरक्षित शत्रुसेना के चारों ओर घेरा डाल कर उससे युद्ध करना, ये सब रथ-युद्ध हैं ।

(४) हर समय तथा हर स्थान में हथियारों को धारण करना और चुपचाप शत्रु सेना को नष्ट करना, ये सब पदाति (पैदल) युद्ध हैं ।