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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 738 of 918

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Page 738

६५४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) स्वबलरक्षा चतुरङ्गबलप्रतिषेधः संग्रामे ग्रहणं मोक्षणं भिन्नसन्धानमभिन्नभेदनं त्रासनमौदार्यं भीमघोषश्चेति रथकर्माणि ।
(२) सर्वदेशकालशस्त्रवहनं व्यायामश्चेति पदातिकर्माणि ।
(३) शिबिरमार्गसेतुकूपतीर्थशोधनकर्म यन्त्रायुधावरणोपकरणग्रासवहनमायोधनाच्च प्रहरणावरणाप्रतिविद्धापनयनमिति विष्टिकर्माणि ।

(४) कुर्याद्गवाश्वव्यायोगं रथेष्वल्पहयो नृपः ।
खरोष्ट्रशकटानां वा गर्भमल्पगजस्तथा ॥

इति सांग्रामिके दशमेऽधिकरणे युद्धभूमयः पत्त्यश्वरथहस्तिकर्माणि नाम चतुर्थोऽध्यायः; आदित एकत्रिंशदुत्तरशततमः ।

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(१) अपनी सेना की रक्षा करना, आक्रमण के समय शत्रु सेना को रोकना, शत्रु के बलवान् सैनिकों को पकड़ना, अपने गिरफ्तार सैनिकों को छुड़ाना, अपनी सेना को संगठित करना तथा शत्रु सेना को तितर-बितर करना, भयभीत करके शत्रु की सेना को घबड़ाना, अपनी सेना का महत्त्व प्रकट करना और भयंकर आवाज करना; ये सभी कार्य रथकर्म अर्थात् रथसेना के द्वारा संपादित होते हैं ।

(२) सम-विषम आदि सभी स्थानों और वर्षा-शरद् आदि सभी ऋतुओं में युद्ध के लिए तैयार हो जाना, नियम पूर्वक कवायद करना और अवसर आने पर युद्ध करना; ये सब कार्य पदाति सेना के हैं ।

(३) अस्त्र-शस्त्र न रखकर फौज में कार्य करने वाले कर्मचारियों को विष्टि कहा जाता है । सैनिक शिविर बनाना, सैनिक मार्ग, नदी के पुल, बाँध, कुएँ, घाट आदि तैयार करना, घास आदि उखाड़ कर मैदान साफ करना, युद्ध की मशीनें, अस्त्र-शस्त्र, कवच आदि युद्धोपयोगी सामान तथा हाथी, घोड़ों के लिए घास ढोना, उनकी रक्षा का प्रबन्ध करना, युद्धभूमि में कवच, हथियार तथा घायल आदि सैनिकों को दूसरी जगह ले जाना, ये सभी कार्य विष्टि नामक कर्मचारियों के हैं ।

(४) जिस राजा के पास घोड़ों की तादाद कम हो उसको चाहिए कि वह घोड़ों के साथ रथों में बैलों को भी जोड़ कर काम ले । इसी प्रकार जिस राजा के पास हाथियों का अभाव हो वह अपनी सेना को गधों या ऊँटों द्वारा चलाई जाने वाली गाड़ियों के बीच में सुरक्षित रखे ।

सांग्रामिक नामक दसवें अधिकरण में युद्धभूमि-पत्त्यश्वरथहस्तिकर्म नामक चौथा अध्याय समाप्त ।

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