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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 743 of 918

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Page 743

प्र० १५५-१५७ : अ० ५ ] व्यूह-बल-विभाग एवं युद्ध ६५९

(१) पत्त्यश्वरथद्विपानां सारत्रिभागमुरस्यं स्थापयेद्, द्वौ त्रिभागौ कक्षं पक्षं चोभयतः । अनुलोममनुसारम् । प्रतिलोमं तृतीयसारम् । फल्गु प्रतिलोमम् । एवं सर्वमुपयोगं गमयेत् ।
(२) फल्गुबलमन्तेष्ववधाय वेगोऽभिहुतो भवति । सारबलमग्रतः कृत्वा कोटीष्वनुसारं कुर्यात् । जघने तृतीयसारं, मध्ये फल्गुबलमेतत् सहिष्णु भवति ।
(३) व्यूहं तु स्थापयित्वा पक्षकक्षोरस्यानामेकेन द्वाभ्यां वा प्रहरेत् । शेषैः प्रतिगृह्णीयात् ।
(४) यत्परस्य दुर्बलं वीतहस्त्यश्वं दूष्यामात्यकं कृतोपजापं वा, तत्प्रभूतसारेणाभिहन्यात् । यद्वा परस्य सारिष्ठं तद्द्विगुणसारेणाभिहन्यात् । यद्-


वेग, पराक्रम, युद्धनैपुण्य, स्थिरता, उन्नतशिर ( उदग्रता ), आज्ञाकारी, अनेक शुभ लक्षणों और शुभ चेष्टाओं आदि विशेष गुणों से युक्त हाथी और घोड़ों की सेना को सारबल कहते हैं ।

( १ ) पैदल, घोड़े, रथ, हाथी के सारभूत बल के एक-तिहाई भाग को बीच में और बाकी दो तिहाई भाग को आगे-पीछे स्थापित किया जाय । यह सर्वोत्तम सेना के खड़े होने का प्रकार है । उत्तम सेना की अपेक्षा जो सेना न्यूनशक्ति हो, उसे अनुसार कहा जाता है, ऐसी सेना के सारबल को पीछे की ओर खड़ा करना चाहिए । इससे भी कुछ न्यूनशक्ति वाली तृतीयसार नामक सेना के सारबल को आगे की ओर खड़ा करना चाहिए । उससे भी निर्बल या वंश-परम्परा से चले आते फल्गुबल को तृतीयसार सेना के आगे खड़ा करना चाहिए । इस प्रकार सभी तरह की सेनाओं को उपयोग में लाना चाहिए ।

( २ ) फल्गुबल को आगे की ओर खड़ा करने से शत्रु के आक्रमण का सारा वेग उसी के ऊपर शान्त हो जाता है । सारबल को आगे, अनुसारबल को बगल ( कोटि ), तृतीयसार को पीछे और फल्गुबल को बीच में करके भी व्यूह की रचना की जा सकती है; यह व्यूह भी शत्रु के आक्रमण को सहन करने वाला होता है ।

( ३ ) आगे, पीछे तथा बीच में व्यूह की यथोचित रचना करके तदनंतर सेना के एक अंग द्वारा या दो अंगों के द्वारा शत्रु पर आक्रमण करना चाहिए और सेना के बाकी अंगों से शत्रु के आक्रमण को रोकना चाहिए ।

( ४ ) शत्रु की दुर्बल, हाथी-घोड़ों से रहित, राजद्रोही अमात्यों से युक्त भेद डाली हुई सेना को सारभूत सेना के द्वारा नष्ट कर डालना चाहिए, और शत्रु की सारभूत सेना को अपनी दुगुनी सारभूत सेना के द्वारा नष्ट कर देना चाहिए । अपनी