जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
About this granth
The Jatakas belong to the Khuddaka Nikaya of the Pali Sutta Pitaka and tell some five hundred and fifty stories of the Buddha's former lives. Each opens with a present-day incident that prompts the Teacher to speak, then gives the 'story of the past' about the Bodhisattva, and ends by identifying who in the story is who now. Together they are a great storehouse of Indian folk tale, art and moral teaching.
The complete Jataka was translated from Pali into Hindi by Bhadant Anand Kausalyayan and published in several volumes by the Hindi Sahitya Sammelan, Prayag. This is the second volume of that translation, beginning with Jataka no. 101, the Parosata Jataka, and arranged in vaggas.
The contents give a one-line summary of each story: a father testing his daughter's loyalty in the Pannika Jataka, an elephant frightened by brittle wood falling in the wind, a hunchback who cures a talkative priest by flicking goat droppings into his mouth, and a castor-tree spirit who accepts a devotee's humble cake of bran. The Kutavanija and Sunakha Jatakas are also here. The 479 pages suit readers of Buddhist literature and of India's story traditions.
'२४३. गुत्तिल जातक
४३८ [ २.१०.२४३ ]
'२४३. गुत्तिल जातक
"सत्ततन्ति सुमधुरं..." यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय
देवदत्त के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उस समय भिक्षुओं ने देवदत्त से पूछा—आयुष्मान् देवदत्त ! सम्यक्
सम्बुद्ध तेरे आचार्य हैं। तूने सम्यक् सम्बुद्ध के कारण तीनो पिटक सीखे,
चारो ध्यान प्राप्त किए, अब आचार्य का विरोधी बनना उचित नहीं। देवदत्त
ने आचार्य का प्रत्याख्यान करते हुए कहा—आयुष्मान श्रमण गौतम मेरे कैसे
आचार्य हैं ? क्या मैंने अपनी सामर्थ्य से ही तीनो पिटक नहीं सीखे हैं तथा
चारो ध्यान नहीं प्राप्त किए हैं ?
भिक्षुओं ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! देवदत्त अपने
आचार्य का प्रत्याख्यान कर सम्यक् सम्बुद्ध का विरोधी बन महाविनाश
को प्राप्त हुआ। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर
रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—"भिक्षुओ, न केवल
अभी देवदत्त आचार्य का प्रत्याख्यान कर मेरा शत्रु बन नष्ट होता है, पहले भी
विनष्ट हुआ ही है।" इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य-करने के समय बोधिसत्त्व
गन्धर्व कुल में पैदा हुआ। उसका नाम हुआ गुत्तिल कुमार। यह बड़े होने पर
गन्धर्व-शिल्प में ऐसा पारङ्गत हुआ कि सारे जम्बूद्वीप में गुत्तिल गन्धर्व ही
सब गन्धर्वों से बढ़ गया। वह स्त्री का पालन न कर अपने अन्धे मातापिता
का पालन करता था।
गुत्तिल ] ४३६
उस समय वाराणसी निवासी बनियो ने व्यापार के लिए उज्जैनि जाकर
उत्सव घोषित होने पर चन्दा करके बहुत सा माला गन्ध विलेपन आदि तथा
खाद्य भोज्य ले क्रीडा-स्थान पर इकट्ठे हो कहा—कि वेतन देकर एक गन्धर्व
को लाओ । उस समय उज्जैनि मे मूसिल नामक ज्येष्ठ गन्धर्व था । उन्होने
उसे बुलवाकर अपना गन्धर्व बनाया ।
मूसिल वीणा भी बजाता था । उसने वीणा को स्वर चढ़ा कर बजाया ।
गुत्तिल गन्धर्व के गन्धर्व से परिचित उन लोगो को मूसिल का बजाना चटाई
खुजलाने जैसा प्रतीत हुआ । कोई भी कुछ न बोला । उन्होने अपनी प्रसन्नता
न प्रकट की । मूसिल ने उनकी प्रसन्नता न देखी तो सोचा—मालूम होता है
मै बहुत तीखा बजाता हूँ । उसने मध्यम स्वर चढा मध्यम स्वर से बजाया ।
वे तब भी उपेक्षावान् ही रहे । उसने सोचा—मालूम होता है यह कुछ नही
जानते । स्वय भी कुछ न जानने वाला बन उसने वीणा के तारों को ढीला
र बजाया । उन्होने तब भी कुछ न कहा ।
मूसिल बोला—भो व्यापारियो ! क्या आप लोग मेरे वीणा-वादन से
सन्न नही होते ?
"क्या तू वीणा बजाता था ? हम तो समझते रहे कि तू वीणा को कस
रहा है ।"
"क्या तुम मुझसे बढ़कर आचार्य को जानते हो ? अथवा अपने अज्ञान
के कारण प्रसन्न नही होते हो ?"
“वाराणसी मे जिन्होने गुत्तिल गन्धर्व का वीणा-वादन सुना है उन्हें
तुम्हारा वीणा बजाना ऐसा ही लगता है जैस स्त्रियाँ बच्चो को सन्तुष्ट कर
रही हों।"
"अच्छा, तो आपने जो खर्चा दिया है उसे वापिस ले । मुझे यह नही
चाहिए । लेकिन हाँ, वाराणसी जाते समय मुझे साथ लेकर जाएँ ।"
उन्होने 'अच्छा' कह स्वीकार किया । जाते समय उसे साथ वाराणसी
ले गए । वहीं 'यह गुत्तिल का निवासस्थान है' बताकर अपने अपने घर
चले गए ।
मूसिल ने बोधिसत्व के घर में प्रवेश कर वहाँ टँगी हुई बोधिसत्व की
बहुत ही अच्छी वीणा देख उतारकर बजाई । बोधिसत्व के माता पिता
४४० [ २४३
अन्धे होने के कारण उसे न देख सके। वे समझे चूहे वीणा खा रहे हैं।
इसलिए उन्होंने कहा—सू सू चूहे वीणा खा रहे हैं।
उस समय मूसिल ने वीणा रखकर बोधिसत्त्व के माता पिता को प्रणाम
किया। उन्होंने पूछा—कहाँ से आया ?
“उज्जेनी से आचार्य के पास शिल्प सीखने आया हूँ।”
“अच्छा।”
“आचार्य कहाँ हैं ?”
“तात ! बाहर गया है। आज आ जाएगा।”
यह सुन मूसिल वहीं बैठ गया। बोधिसत्त्व के आने पर, उसके द्वारा
कुशल समाचार पूछे जा चुकने पर उसने अपने आने का कारण कहा। बोधि-
सत्त्व अङ्गविद्या के जानकार थे। वे जान गए कि यह सत्पुरुष नहीं है।
उन्होंने अस्वीकार किया—तात ! जा तेरे लिए शिल्प नहीं है।
मूसिल ने बोधिसत्त्व के माता पिता के चरण पकड़े। उन्हें अपनी सेवा
से सन्तुष्ट कर उसने उनसे याचना की कि मुझे शिल्प सिखलवा दें। बोधिसत्त्व
ने माता पिता के बारबार कहने पर उनकी आज्ञा का उल्लङ्घन न कर सकने
के कारण उसे शिल्प सिखा दिया।
वह बोधिसत्त्व के साथ राजदरबार जाता। राजा ने उसे देखकर पूछा—
आचार्य ! यह कौन है ?
“महाराज !• मेरा शिष्य है।”
वह शनै शनै राजा का विश्वासी हो गया। बोधिसत्त्व ने बिना कुछ
छिपाए अपना जाना सारा शिल्प सिखाकर कहा—तात ! शिल्प समाप्त
हो गया। उसने सोचा—मैंने शिल्प सीख लिया। यह वाराणसी नगर सारे
जम्बूद्वीप में श्रेष्ठ नगर है। और आचार्य भी बूढ़े हो गए हैं। मुझे यहीं
रहना चाहिए। उसने आचार्य से कहा—आचार्य ! मैं राजा की सेवा
करूँगा। आचार्य बोला—अच्छा तात ! मैं राजा से कहूँगा। उसने राजा
से जाकर कहा—“महाराज ! हमारा शिष्य देव की सेवा में रहना चाहता है।
उसको जो देना हो, जान।”
राजा बोला—‘आपको जितना मिलता है, आपके शिष्य को उसका
आधा मिलेगा।’ उसने मूसिल को वह बात कही। मूसिल बोला—“मुझे
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"आचार्य्य ! जगल में क्यो दाखिल हुए हो ?"
"तू कौन है ?"
"मै शक्र हूँ।"
बोधिसत्त्व ने उसे 'देवराज ! मैं शिष्य के भय से जगल में दाखिल हुआ
हूँ' यह पहली गाथा कही—
सत्ततन्ति सुमधुर रामणेय्य अवाचायि,
सो म रङ्गमन्हि अव्हेति सरणम्मे होहि कोसिय ॥
अर्थ—हे देवराज ! मैने मूसिल नाम के शिष्य को सात तारो वाली सुमधुर
रमणीक वीणा जितनी मै जानता था उतनी सिखाई । अब वह मुझे रङ्गमंच
पर ललवारता है। हे कोसिय गोत्र (इन्द्र) ! तू मुझे शरण में ले।
शक्र उसकी बात सुन बोला—डरे मत । मै तुम्हारा त्राण करूँगा । मैं तुम्हें
शरण दूंगा। यह कह उसने दूसरी गाथा कही—
अह त सरण सम्म अहमाचरियपूजको,
न त जयिस्सति सिस्सो सिस्समाचरिय जेस्सति ॥
[ सौम्य ! मै तेरा शरणदाता हूँ। मै आचार्य्य की पूजा करने वाला हूँ।
शिष्य तुझे नही जीतेगा। आचार्य्य ही शिष्य को जीतेगा।]
अह त सरण मै शरण (-दाता हूँ), सहायक होकर, प्रतिष्ठा देकर त्राण
करूंगा। सम्म प्रिय वचन है। सिस्समाचरिय जेस्सति आचार्य्य ! तू वीणा
बजाता हुआ शिष्य को जीतेगा।
शक्र ने और भी कहा—"तुम वीणा बजाते हुए एक तार तोडकर छ ,
बजाना। वीणा से स्वाभाविक स्वर निकलेगा। मूसिल भी तार तोड देगा।
उसकी वीणा से स्वर न निकलेगा। उसी क्षण पराजित हो जाएगा। उसका
पराजित होना जान दूसरी, तीसरी, चौथी, पांचवी, छटी और सातवी तार
भी तोड कर केवल वीणा-दण्ड ही बजाना। तार रहित खूंटियो से स्वर निकल
कर सारी बारह योजन की वाराणसी नगरी को ढक लेगा।" इतना कहकर
गुत्तिल ] ४४३
शक्र ने बोधिसत्त्व को तीन गोटियाँ दी और कहा—"सारे नगर पर वीणा
शब्द के छा जाने पर इनमें से एक गोटी आकाश में फेंकना। तुम्हारे सामने
तीनसौ अप्सराएं उतर कर नाचने लगेगी। उनके नाचने के समय दूसरी
फेंकना। दूसरी तीन सौ उतर कर वीणा के सिरे पर नाचने लगेगी। तब
तीसरी भी फेंकना। और तीन सौ उतर कर रङ्गमण्डप में नाचेंगी। मैं भी
तुम्हारे पास आऊँगा। जाएँ। डरे मत।"
बोधिसत्त्व पूर्वाह्ण समय घर गए। राजदरबार में भी मण्डप बनाकर
राजासन तैयार कर दिया गया। राजा प्रासाद से उतर सजे मण्डप में आसन
के बीच में बैठा। दस हजार अलङ्कृत स्त्रियो तथा अमात्य ब्राह्मण राष्ट्रिक
आदि ने राजा को घेर लिया। सभी नगरवासी इकट्ठे हो गए। राजाङ्गण
में चवको के साथ चक्के तथा मञ्चो के साथ मञ्च बँध गए। बोधिसत्त्व भी
स्नान करके, लेप कर, नाना प्रकार के श्रेष्ठ भोजन खा वीणा ले, अपने लिए
बिछे आसन पर बैठे। शक्र गुप्त रूप से आकाश में आकर ठहरा। केवल
बोधिसत्त्व ही उसे देख सकते थे। मूसिल भी आकर अपने आसन पर बैठा।
जनता घेर कर खडी हुई। आरम्भ में दोनो ने बराबर बराबर बजाया।
जनता ने दोनो के बजाने से सन्तुष्ट हो हजारो हर्ष-नाद किए।
शक्र ने आकाश में ठहर कर बोधिसत्त्व को ही सुनाते हुए कहा—एक
तार तोड दें। बोधिसत्त्व ने भ्रमर-तार तोड दी। वह टूटने पर भी टूटे हुए
सिरे से स्वर देती थी। देवगन्धर्व का सा स्वर निकलता था। मूसिल ने भी
तार तोड दी। उसमे से स्वर न निकला। आचार्य ने दूसरी—तीसरी करके
सातो तारे तोड दी। केवल दण्डे को बजाने से जो स्वर निकला उसने सारे
नगर को छा लिया। हजारो वस्त्र फेंके गए तथा हजारो हर्षनाद हुए। बोधि-
सत्त्व ने एक गोटी आकाश में फेंकी। तीन सौ अप्सराएँ उतर कर नाचने
लगी। इस प्रकार दूसरी और तीसरी गोटी के फेंकने पर जैसे कहा गया उसी
तरह नौ सौ अप्सराएँ उतर कर नाचने लगीं।
उस समय राजा ने जनता को इशारा किया। जनता ने उठकर 'तू
आचार्य से विरोध कर उसकी बराबरी का प्रयत्न करता है। अपनी सामर्थ्य
नही देखता' कहते हुए मूसिल को डरा, जो जो हाथ में आया पत्थर डण्डे आदि
से चूर चूर कर, जान मार पैरो से पकड कूडे के ढेर पर फेक दिया। राजा
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ने सन्तुष्ट हो घनी वर्षा बरसाते हुए की तरह बोधिसत्त्व को बहुत धन दिया।
नगरवासियो ने भी वैसे ही किया।
शक्र ने भी उससे विदा लेते हुए कहा—"पण्डित ! मैं सहस्र घोड़ो वाले
आजानीय रथ के साथ मातली को भेजूंगा। तू सहस्र घोड़ो वाले श्रेष्ठ वैजयन्त
रथ पर चढ़कर देवलोक आना।" उसके वहाँ जाकर पाण्डुकम्बलशिलातल
पर बैठने पर देवकन्याओ ने पूछा—महाराज ! वहाँ गए थे ? शक्र ने उनको
यह बात विस्तार से बनाई और बोधिसत्त्व के सदाचार तथा प्रज्ञा की प्रशंसा
की। देवकन्याएँ बोली—महाराज ! हम आचार्य्य को देखना चाहती हैं।
उसे यहाँ लाएं।
शक्र ने मातली को बुला कर कहा—तात ! देवप्सराएँ गुत्तिल गन्धर्व
को देखना चाहती हैं। जा उसे वैजयन्त रथ में बिठाकर ला। उसने 'अच्छा'
कहा और जाकर बोधिसत्त्व को ले आया। शक्र ने बोधिसत्त्व का कुशल क्षेम
पूछ कहा—आचार्य्य ! देवकन्याएँ तुम्हारा गन्धर्व सुनना चाहती है।
"महाराज ! हम गन्धर्व लोग शिल्प से ही जीविका चलाते हैं। मूल्य
मिले तो गाऊँगा।"
"बजाएँ। मै तुम्हे मूल्य दूंगा।"
"मुझे और मूल्य की जरूरत नहीं। यह देवकन्याएँ अपना अपना सुकृत
कहें। ऐसा होने से मैं बजाऊँगा।"
देवकन्याएँ बोली—"आचार्य्य ! हम अपने किए सुकृत पीछे सन्तुष्ट
होकर कहेंगी। गन्धर्व करे।"
बोधिसत्व ने सप्ताह पर्य्यन्त देवताओ को गन्धर्व सुनाया। वह दिव्य-
वाद्य से भी बढ़ गया। सातवे दिन आरम्भ से देवकन्याओ का सुकृत पूछा।
काश्यप बुद्ध के समय एक भिक्षु को उत्तम वस्त्र देकर शक्र की परिचारिका
होकर उत्पन्न हुई, हजारो अप्सराओ से घिरी एक उत्तम देवकन्या से पूछा—
तू पूर्व जन्म में क्या कर्म करके (यहाँ) उत्पन्न हुई ?
उससे पूछा गया प्रश्न तथा उसका उत्तर विमानवत्थु¹ में आया है।
वहाँ कहा है—
¹खुद्दक निकाय का एक ग्रन्थ।
गुत्तित ] ४४५
"अभिक्कन्तेन वण्णेन या त्वं तिट्ठसि देवते,
ओभासेन्ती दिसा सब्बा ओसधी विय तारका ॥
केन ते तादिसो वण्णो केन ते इध मिज्झति,
उप्पज्जन्ति च ते भोगा ये केचि मनसो पिया ॥
पुच्छामि तं देवि महानुभावे
मनुस्सभूता किमकासि पुञ्ञं,
येनासि एवं जलितानुभावा
वण्णो च ते सब्बदिसा पभासति ॥"
[ हे देवते ! यह जो तेरा कान्तिपूर्ण वर्ण है, यह जो सारी दिशाएँ इस
प्रकार प्रकाशित है जैसे ओषधी तारा हो, सो यह तेरा ऐसा वर्ण किस कारण से
है ? तू किस कारण से यहाँ ऋद्धिमान् है ? जो भोग तुझे प्यारे लगते हों, वह
किस कारण से प्राप्त होते हैं ? हे महानुभाव देवि ! मैं तुझसे पूछता हूँ कि
मनुष्य योनि में तूने क्या पुण्य कर्म किया ? जिस कर्म के प्रभाव से तू प्रज्वलित
अनुभाव की है ? और तेरा वर्ण सब दिशाओं को प्रकाशित करता है । ]
"वत्थुत्तमदायिका नारी पवरा होति नरेसु नारिसु,
एवं पियरूपदायिका मनापं दिब्बं सा लभते उपेच्च ठानं ॥
पस्स मे पस्स विमानं अच्छरा कामवण्णिनीहमस्मि,
अच्छरासहस्सानं पवरा पस्स पुञ्ञानं विपाकं ॥
तेन मेतादिसो वण्णो तेन मे इध मिज्झति,
उप्पज्जन्ति च मे भोगा ये केचि मनसो पिया,
तेनम्हि एवं जलितानुभावा
वण्णो च मे सब्बदिसा पभासति ॥
[ उत्तम वस्त्र देने वाली नारी नरों में और नारियों में श्रेष्ठ होती है।
इस प्रकार प्रिय रूप देने वाली वह (नारी) मरकर सुन्दर दिव्य स्थान को
प्राप्त करती है। मेरे विमान को देखो। मैं इच्छित रूप धारण करने वाली
अप्सरा हूँ। मैं हजार अप्सराओं में श्रेष्ठ हूँ। यह पुण्य का फल है, देखो।
इसीसे मेरा ऐसा वर्ण है। इसीसे मैं ऋद्धिमान् हूँ। इसीसे मन को जो प्यारे
लगते हैं ऐसे भोग मुझे प्राप्त होते हैं। उसीसे मैं प्रज्वलित अनुभाव वाली हूँ।
उसीसे मेरा वर्ण सब दिशाओं को प्रकाशित करता है।]
४४६ [ २.१०.२४३
दूसरी ने भिक्षा मांगते हुए भिक्षु को पूजने के लिए पुष्प दिए। दूसरी
ने चैत्य में पञ्चाङ्गुलि चिह्न लगाने के लिए सुगन्धि दी। दूसरी ने मधुर
फलमूल दिए। दूसरी ने उत्तम रस दिया। दूसरी ने काश्यप बुद्ध के चैत्य पर
सुगन्धित पञ्चाङ्गुलि-चिन्ह लगाया। दूसरी ने रास्ते चलते भिक्षुओं तथा
भिक्षुणियों के घर में वास ग्रहण करने पर धर्म सुना। दूसरी ने नौका में बैठ
भोजन किए भिक्षु को पानी में खड़े हो पानी दिया। दूसरी ने गृहस्थ में रह
क्रोधरहित चित्त से सास ससुर की सेवा की। दूसरी ने अपने को मिले हिस्से
में से भी बाँट कर ही खाया और शीलवान् रही। दूसरी ने पराए घर में दासी
होकर क्रोध रहित मान रहित रह अपने हिस्से को बाँट कर खाया। इसीसे
वह देवराज की परिचारिका होकर पैदा हुई।
इस प्रकार गुत्तिलविमानवत्थु में आई सैंतीस देवकन्याओं ने जो जो कर्म
करके वहाँ जन्म ग्रहण किया वह सब बोधिसत्त्व ने पूछा। उन सब ने भी अपना
कर्म गाथाओं में ही कहा। यह सुन बोधिसत्त्व ने कहा—"मुझे बड़ा लाभ
हुआ। मुझे बड़ी प्राप्ति हुई। मैंने यह जो यहाँ आकर अल्पमात्र कर्म से भी
प्राप्त सम्पत्तियों की बात सुनी। अब यहाँ से मैं मनुष्यलोक जाकर दानादि
कुशल कर्म ही करूँगा।" यह कह उसने यह हर्ष वाक्य कहा—
स्वागतं वत मे अज्ज सुप्पभात सुवुद्वितं,
य अद्दसासि देवतार्यो अच्छरा कामवण्णियो ॥
इमासाह धम्म सुत्वान काहामि कुसलं बहुं,
दानेन समचरियाय सञ्जमेन दमेन च;
सोहं तत्थ गमिस्सामि यत्थ गन्त्वा न सोचरे ॥
[आज मेरा आना शुभ है। आज का प्रभात शुभ है। आज का उठना
शुभ है। आज मैंने इच्छित रूप धारण कर सकने वाली अप्सरा देवियों को देख
लिया। इनसे धर्म सुनकर मैं बहुत कुशल कर्म करूँगा। दान से, समचर्या
से तथा संयम के प्रताप से मैं वहाँ जाऊँगा जहाँ जाकर आदमी सोचता नहीं है।]
सप्ताह के बाद देवराज ने मातली सारथी को आज्ञा दे बोधिसत्त्व को
रथ पर बिठा बाराणसी ही भेज दिया। उसने बाराणसी पहुँच देवलोक में
जो देखा था वह मनुष्यों को बताया। उस समय से मनुष्यों ने उत्साहपूर्वक
पुण्य-कर्म करना स्वीकार किया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मूसिल
वोतिच्छ ] ४४७
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मूसिल
देवदत्त था। शक्र अनुरूद्ध था। राजा आनन्द था। गुत्तिल गन्धवं तो मैं ही था।
२४४. वीतिच्छ जातक
“यं पस्सति न तं इच्छति...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय एक प्लासिक परिव्राजक के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उसे सारे जम्बूद्वीप मे कोई शास्त्रार्थ करने वाला न मिला। उसने
श्रावस्ती पहुँचकर पूछा—मेरे साथ कौन शास्त्रार्थ कर सकता है ? उत्तर
मिला—सम्यक् सम्बुद्ध। उसने बहुत से आदमियो के साथ जेतवन पहुँच
कर चारो प्रकार की परिषद को धर्मोपदेश देते हुए तथागत से प्रश्न पूछा।
शास्ता ने उसके प्रश्न का उत्तर दे उससे प्रश्न पूछा—एक (चीज) क्या है ?
वह उत्तर न दे सकने के कारण उठकर भाग गया। बैठी हुई परिषद बोली—
भन्ते ! एक ही शब्द से परिव्राजक को हरा दिया। शास्ता ने कहा—“उपा-
सको ! न केवल अभी मैने उसको एक ही पद से हराया है, पहले भी हराया है।”
यह कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
काशी राष्ट्र मे ब्राह्मण कुल मे पैदा हुआ। बड़े होने पर कामभोगो को छोड़
ऋषियो के प्रब्रज्या क्रम से प्रब्रजित हो दीर्घकाल तक हिमालय मे रहा। वह पर्वत
से उतर एक निगम-ग्राम के पास गङ्गा के मोड पर पर्णशाला में रहने लगा।
४४८ [ २१० २४४
एक परिव्राजक को सारे जम्बूद्वीप मे शास्त्रार्थ करने वाला न मिला।
उसने उस निगम में पहुँच पूछा—मेरे साथ शास्त्रार्थ कर सकने वाला कोई है ?
पता लगा—है। वह बोधिसत्व की प्रशसा सुन अनेक आदमियो के साथ
उसके निवासस्थान पर पहुँच, कुशल क्षेम पूछ कर बैठा। बोधिसत्व ने
पूछा—वनगन्ध से सुगन्धित गङ्गाजल पीएगा ? परिव्राजक ने शास्त्रार्थ
आरम्भ करते हुए कहा—कौनसी गङ्गा ? बालू गङ्गा है ? जल गङ्गा है ?
इधर का किनारा गङ्गा है ? अथवा उधर का किनारा गङ्गा है ? बोधिसत्व
ने उसे उत्तर दिया—परिव्राजक ! उदक, बालू, इधर के किनारे और उधर
के किनारे के अतिरिक्त और गङ्गा कहाँ है ? परिव्राजक को कुछ उत्तर न
सूझा। वह उठकर भाग गया। उसके भाग जाने पर बोधिसत्व ने बैठे हुए
लोगो को उपदेश देते हुए यह गाथाएँ कही—
यं पस्सति न त इच्छति
यञ्च न पस्सति तं किर इच्छति,
मञ्ञामि चिरं चरिस्सति
न हि तं लच्छति यं सो इच्छति ॥१॥
यं लभति न तेन तुस्सति
यं पत्थेति लद्धं हीळेति,
इच्छा हि अनन्तगोचरा
वीतिच्छानं नमो करोमसे ॥२॥
[ जिसे देखता है उसको इच्छा नही करता, जिसे नही देखता है उसकी
इच्छा करता है। मै समझता हूँ कि यह चिरकाल तक भटकेगा। जिसकी इच्छा
करता है वह इसे नही मिलेगा ॥१॥ जो मिलता है उससे सन्तुष्ट नही होता।
जिसकी इच्छा करता है वह मिलने पर उसका अनादर करता है। इच्छा की
गति अनन्त है। जो वीतिच्छा हैं, उन्हे हम नमस्कार करते हैं ॥२॥ ]
यं पस्सति जिस उदक आदि को देखता है, उसे गङ्गा नही मानता है।
यञ्च न पस्सति जिस उदक आदि से रहित गङ्गा को नही देखता उसकी
इच्छा करता है। मञ्ञामि चिरं चरिस्सति मै ऐसा मानता हूँ कि यह परि-
व्राजक इस प्रकार की गङ्गा को खोजत हुए चिरकाल तक भटकेगा, अथवा
मूलपरियाय ] ४४६
जैसे उदक आदि से रहित गङ्गा को उसी तरह रूप आदि से रहित आत्मा को भी
खोजते हुए ससार मे चिरकाल तक भटकेगा । न हि तं लच्छति चिरकाल तक
विचरते हुए भी वह जो इस प्रकार की गङ्गा या आत्मा की इच्छा करता है
उसे न प्राप्त कर सकेगा।
यं सम्भति जो उदक वा रूप आदि मिलता है उससे सन्तुष्ट नही होता ।
यं पत्येति लद्धं हीळेति इस प्रकार प्राप्त से असन्तुष्ट हो जिस जिस सम्पत्ति
को प्राप्त करता है, उस उस को प्राप्त करके 'इससे क्या' कहकर उसका अनादर
करता है, उसकी अवमानना करता है। इच्छा हि अनन्तगोचरा जो जो
प्राप्त हो उसका अनादर कर दूसरी दूसरी चीज की इच्छा करने के कारण
यह इच्छा, यह तृष्णा अनन्त गति वाली है। वीतिच्छान नमो करोमसे इसलिए
जो इच्छा रहित बुद्ध आदि हैं उनको हम नमस्कार करते हैं ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय का
परिव्राजक ही इस समय का परिव्राजक है। तपस्वी तो मैं ही था।
२४५. मूलपरियाय जातक
"कालो घसति भूतानि .." यह शास्ता ने उक्कठ्ठा के पास सुभगवन में
विहार करते हुए मूलपरियाय सुत्त¹ के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उस समय तीन वेदों में पारङ्गत पाँच सौ ब्राह्मणों ने (बुद्ध-) शासन में
प्रव्रजित हो तीनो पिटक सीख कर अभिमान में चूर हो सोचा-सम्यक् सम्बुद्ध
¹मज्झिम निकाय का प्रथम सुत्त।
२६ ०
४५० [ २.१०.२४५
भी तीन पिटक ही जानते हैं। हम भी जानते हैं। तब हमारा उनका क्या
अन्तर है? उन्होने बुद्ध की सेवा मे जाना छोड़ दिया। शास्ता की बराबरी
के होकर घूमने लगे।
एक दिन शास्ता ने उनके आकर पास बैठे रहने के समय आठ भूमियों
से सजाकर मूलपरियाय सुत्त का उपदेश दिया। उनकी कुछ समझ में नहीं
आया। तब उनको विचार हुआ—हम अभिमान करते हैं कि हमारे समान
पण्डित नही। लेकिन अब कुछ नही समझे। बुद्ध के सदृश पण्डित नही हैं।
अहो बुद्ध गुण ! उस समय से वह नम्र बन गए, जैसे जैसे सर्प के दांत उखाड
दिए गए हो, विष जाता रहा हो। शास्ता ने उक्कठ्ठा मे यथामिरुचि रहकर
वैशाली जा वहाँ गोतमक चेतिय मे गोतमकसुत्त का उपदेश दिया। हजार
लोकधातु कांप गई। उसे सुनकर वह भिक्षु अर्हत्व को प्राप्त हुए। मूल
परियाय सुत्त के उपदेश के अन्त म, जिस समय शास्ता उक्कठ्ठा में ही बिहार
करते थे, भिक्षुओ ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! अहो बुद्धो
की शक्ति ! वे ब्राह्मण प्रव्रजित वैसे अभिमानी थे। उन्हे भगवान् ने मूल
परियाय सुत्त से मान-रहित कर दिया। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ,
बैठे क्या बातचीत कर रहे हो? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—
भिक्षुओ, न केवल अभी इन अभिमानी सिर वालो को मान रहित किया है,
पहले भी किया है। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत, कथा
पूर्व समय म वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
ब्राह्मण कुल मे पैदा हुआ। बडे होने पर तीनो वेदो में पारङ्गत हो प्रसिद्ध आचार्य्य
बन पाँच सौ माणवको को मन्त्र बँचवाता था। वे पाँच सौ (माणवक) शिल्प
सीखकर, उसका अभ्यास कर सोचने लगे—'जितना हम जानते है, आचार्य्य
भी उतना ही। उसमे कुछ विशेष नही।' यह सोच वह अभिमान से चूर
हो आचार्य्य के पास न जाते, उसकी सेवा शुश्रूषा न करते। एक दिन जब
आचार्य्य बेर के वृक्ष के नीचे बैठा था, उन्होने उसे ठगने की इच्छा से बेर
के वृक्ष को नाखून से खुरच कर कहा—यह वृक्ष निस्सार है। बोधिसत्त्व ने
यह जान कि यह मुझे ठग रहे हैं कहा—शिष्यो ! एक प्रश्न पूछता हूँ।
मूलपरियाय ] ४५१
उन्होंने प्रसन्नता पूर्वक कहा—पूछें, उत्तर देंगे। प्राचार्य ने प्रश्न पूछते हुए
पहली गाथा कही—
कालो घसति भूतानि सब्बानेव सहत्तना,
यो च कालघसो भूतो स भूत पचनिं पचि ॥
[ काल सभी प्राणियो को खाता है, अपने को भी (खाता है) । जो काल
को खाने वाला प्राणी है वह सब प्राणियो को जलाने वाली को जलाता हैं।]
कालो पूर्वाह्ण समय तथा अपराह्ण समय आदि । भूतानि प्राणी । काल
प्राणियो का चर्म मास आदि नोच नोच कर उन्हे नही खाता किन्तु उनकी
आयु, वर्ण बल को नष्ट कर यौवन को मर्दन कर आरोग्य का विनाश करता
हुआ खाता है। इस प्रकार खाता हुआ किसी को नही छोड़ता। सब्बानेव
खाता है। केवल प्राणियो को ही नही किन्तु सहत्तना अपने को भी खाता
है। पूर्वाह्ण अपराह्ण तक नही रहता, इसी प्रकार अपराह्ण आदि भी ।
यो च कालघसो भूतो यह क्षीणास्रव के लिए कहा गया है। वह आर्य्यमार्ग
से भविष्य के प्रतिसन्धि-ग्रहण करने के समय को नष्ट करने वाला होने से
कालघसो भूतो कहलाता है। स भूत पचनिं पचि उसने इस तृष्णा को, जो
प्राणियो को अपाय मे जलाती है, ज्ञानाग्नि से जला दिया, भस्म कर दिया ।
इसीसे भूतपचनिं पचि कहा जाता है। पजनिं भी पाठ है। जननि पैदा करने
वाली अर्थ है।
इस प्रश्न को सुनकर माणवको मे एक भी न जान सका । तब बोधिसत्त्व
ने कहा—तुम यह मत समझो कि यह प्रश्न तीनो वेदो मे हैं। तुम यह समझ
कर कि जो मैं जानता हूँ वह सब तुम जानते हो मुझे बेर का वृक्ष बनाते हो।
तुम यह नही जानते कि ऐसा बहुत है जिसे तुम नही जानते और मैं जानता
हूँ। जाओ, सात दिन का समय देता हूँ। इतने समय मे इस प्रश्न पर
विचार करो ।
'वे बोधिसत्त्व को प्रणाम कर अपने अपने निवासस्थान पर गए। वहाँ
सप्ताह भर सोचने पर भी न उन्हे प्रश्न का आरम्भ मिला न अन्त। वे सातव
दिन प्राचार्य के पास गए। प्रणाम करके बैठे। प्राचार्य ने पूछा—भद्रमुखो !
८ ४५२ [ २.१० २४६
प्रश्न समझ में आया ? वे बोले—नही जानते । बोधिसत्त्व ने फिर उनकी
निन्दा करते हुए दूसरी गाथा कही—
बहूनि नरसीसानि लोमसानि बृहन्ति च,
गीवासु पटिमुक्कानि कोचिदेवेत्थ कण्णवा ॥
अर्थ—बहुत आदमियों के सिर दिखाई देते हैं। वे बालो वाले हैं। सभी
बड़े बड़े हैं। गर्दनों पर रखे हैं। ताड के फल की तरह हाथ में पकड़े हुए
नहीं हैं। इन बातो में किन्ही में आपस में भेद नहीं है। लेकिन यहाँ कोई ही
कानवाला है। (यह अपने बारे में कहा) कण्णवा प्रज्ञावान् । कान का छेद
तो किसको नहीं है ?
इस प्रकार उन माणवकों की निन्दा कर कि तुम लोगो को कानो का
छेद मात्र ही हैं, प्रज्ञा नहीं है प्रश्न समझाया। उन्होने सुनकर 'ओह ! आचार्य्य
महान् होते हैं' क्षमा मांग नम्र हो बोधिसत्त्व की सेवा की।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय पांच
सौ माणवक यह भिक्षु थे। आचार्य्य मैं ही था ।
२४६. तेलोवाद जातक
“हन्त्वा भत्वा वधित्वा च ” यह शास्ता ने वैशाली के आश्रय कूटा-
गार शाला में विहार करते समय सिंह सेनापति के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उसने भगवान् (बुद्ध) की शरण जा, निमन्त्रण दे, अगले दिन मास सहित
भोजन कराया। निगण्ठों ने उसे सुन कुपित हो असन्तुष्ट हो तथागत को
१ निगण्ठ=निर्ग्रन्थ=जैन सम्प्रदाय वाले साधु ।
कथा कही—
तेलोवाद ] ४५३
पीडा पहुँचाने की इच्छा से गाली दी—श्रमण गौतम जान बूझ कर अपने लिए
बनाए मास को खाता है। भिक्षुओ ने धर्मसभा मे बातचीत चलाई—आयु-
ष्मन्तो ! परिषद सहित निगण्ठनाथपुत्र 'श्रमण गौतम जान बूझ कर अपने लिए
बना मास खाता है' कह गाली देता हुआ घूमता है। इसे सुन शास्ता ने कहा—
भिक्षुओ, न केवल अभी निगण्ठनाथपुत्र 'अपने लिए बना मास खाने वाला'
कह मेरी निन्दा करता है, उसने पहले भी की है। इतना कह पूर्व-जन्म की
कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय मे बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
ब्राह्मण कुल मे उत्पन्न हुए। बडे होने पर ऋषि प्रव्रज्या के अनुसार प्रव्रजित
हो नमक-खटाई खाने के लिए हिमालय से बाराणसी आ अगले दिन नगर में
भिक्षा के लिए प्रवेश किया। एक गृहस्थ ने तपस्वी को तग करने के उद्देश्य से
उसे घर में बुला, बिछे आसन पर बिठा मत्स्य मास परोसा। भोजन कर चुकने
पर एक ओर बैठ कर कहा—यह मास तुम्हारे ही लिए प्राणियो को मार
कर तैयार किया गया है। यह पाप केवल हम न लगे, तुम्हें भी लगे।
इतना कह पहली गाथा कही—
हन्त्वा भत्वा वधित्वा च देति दान असञ्ञतो,
एदिस भत्त भुञ्जमानो स पापेन उपलिप्पति ॥
[ मारकर, कष्ट देकर तथा वध करके असयमी दान देता है। इस प्रकार
के भोजन को खाने वाला पाप का भागी होता है।]
हन्त्वा प्रहार देकर। भत्वा क्लेश देकर। वधित्वा मारकर। देति
दान असञ्ञतो असयमी दुदशील ऐसा करके इस प्रकार दान देता है। एदिस
भत्त भुञ्जमानो स पापेन उपलिप्पति इस प्रकार उद्देश्य करके बनाए हुए
भोजन को खाने वाला श्रमण भी पाप से युक्त होता है।
उसे सुन बोधिसत्त्व ने दूसरी गाथा कही—
४५४ [ २.१०.२४७
पुत्तदारम्पि चे हन्त्वा देति दानं असञ्जतो,
भुञ्जमानो पि सप्पञ्ञो न पापेन उपलिप्पति ॥
[ यदि असंयमी (आदमी) पुत्र तथा स्त्री को मारकर भी दान देता है,
तो भी बुद्धिमान् खाने वाले को पाप नहीं लगेगा । ]
२४७. पादञ्जली जातक
“अद्धा पादञ्जली सब्वे...” यह शास्ता ने जेतवन में विहरते समय
लालुदायी स्थविर के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
एक दिन दोनो प्रधान शिष्य प्रश्नो पर विचार करते थे। भिक्षु धर्मसभा
में सुन स्थविरों की प्रशंसा करते थे। परिषद में बैठे हुए लाल उदायी स्थविर
ने होठ चबाए—यह हमारे बराबर क्या जानते हैं ? धर्मसभा में भिक्षुओं ने
बातचीत चलाई—आयुष्मानो, लालुदायी ने दोनो श्रावको की निन्दा कर
होठ चबाए। शास्ता ने यह सुन कर कहा—भिक्षुओ, न केवल अभी, पहले भी
पूर्व-जन्म की कथा कही—
पादञ्जली ] ४५५
लालुदायी होठ चबाना छोड और अधिक कुछ नही जानता था। इतना कह
पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी म ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
उसके अर्थधर्मानुशासक आमात्य हुए। राजा का पादञ्जली नाम का पुत्र मूर्ख
था, आलसी था। आगे चलकर राजा मर गया। आमात्यो ने राजा का क्रिया
कर्म करके, किसे राज्याभिषिक्त करे सलाह करते हुए कहा कि राजपुत्र
पादञ्जली को। बोधिसत्त्व ने कहा—यह कुमार मूर्ख है, आलसी है।
परीक्षा करके इसे राज्याभिषिक्त करें। आमात्यो ने मुकद्दमा बना कुमार को
पास बैठा मुकद्दमे का फैसला करते हुए ठीक फैसला नही किया। उन्होने
अस्वामी को स्वामी बना कुमार से पूछा—कुमार ! क्या हम लोगो ने ठीक
फैसला किया ? उसने होठ चबाए। बोधिसत्त्व ने समझा मालूम होता है कुमार
पण्डित है। वह समझ गया होगा कि मुकद्दमे का ठीक फैसला नही हुआ।
ऐसा मानकर पहली गाथा कही—
अद्धा पादञ्जली सम्बे पञ्जाय अतिरोचति,
तथाहि ओट्ठं भञ्जति उत्तरिं नून पस्सति ॥
[ पादञ्जली निश्चय से प्रज्ञा म सबसे बढकर है। इसीसे होठ चबाता
है। निश्चय से इसे दूसरी बात दिखाई देती है ।]
निश्चय से पादञ्जली कुमार सम्बे हम पञ्जाय अतिरोचति तथाहि
ओट्ठ भञ्जति नून उत्तरिं दूसरे कारण को पस्सति ।
उन्होने दूसरे दिन भी एक मुकद्दमा तैयार कर उस मुकद्दमे का ठीक
से फैसला कर पूछा—देव ! कैसे क्या यह ठीक से फैसला हुआ है ? उसने
फिर भी होठ चबाए। उसकी मूर्खता की बात जान बोधिसत्त्व ने दूसरी
गाथा कही—
नाय धम्म अधम्म वा अत्यानत्थं च बुज्झति,
अञ्ञत्र ओट्ठनिब्भोगा नाय जानाति किञ्चन ॥
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय पादञ्जली
४५६ . [ २.१०.२४८
[ यह धर्म अधर्म वा अर्थ अनर्थ कुछ नहीं बूझता है। यह होठ चबाने
के अतिरिक्त और कुछ नहीं जानता है।]
आमात्यो ने पादञ्जली कुमार की मूर्खता पहचान बोधिसत्त्व को राज्या-
भिषिक्त किया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय पादञ्जली
लालुदायी था। पण्डित आमात्य तो मै ही था।
२४८. किंसुकोपम जातक
“सब्बेहि किंसुको दिट्ठो...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय किंसुकोपमसुत्त के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
चार भिक्षुओ ने तथागत के पास आ कर्मस्थान मांगा। शास्ता ने उनको
कर्मस्थान कहा। वे कर्मस्थान ले अपने अपने रात्रि के निवासस्थान तथा दिन
के निवासस्थानो को गए। उनमें से एक ने छ स्पर्श आयतनो का परिग्रहण कर
अर्हत्व प्राप्त किया। एक ने पञ्चस्कन्धो को। एक ने चारो महाभूतो को।
एक ने अठारह धातुओ को। उन सबने अपनी अपनी अर्हत्व-प्राप्ति तथागत
से निवेदन की। उन भिक्षुओ म से एक को शङ्का हुई—यह कर्मस्थान तो
भिन्न भिन्न हैं। निर्वाण एक है। सभी को अर्हत्व की प्राप्ति कैसे हुई ?
उसने शास्ता से पूछा। शास्ता बोले—भिक्षु, क्या तुम्हे किंसुक देखने वाले
भाइयो जैसा भेद (पैदा हुआ है) ? भिक्षुओ ने प्रार्थना की भन्ते ! यह
बात हमे कहे। शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
[किंसुकोपम ] ४५७
ख. अतीत कथा
पूर्वं समय मे बाराणसी मे ब्रह्मदत्त राज्य करता था। उसके चार पुत्र
थे। उन्होने सारथी को बुलाकर कहा—सौम्य ! हम किंसुक देखना चाहते
हैं। हमे किंसुक वृक्ष दिखाएँ। सारथी बोला—अच्छा दिखाऊँगा। उसने
चारो को एक साथ न दिखा ज्येष्ठ पुत्र को रथ मे बिठा जगल मे ले जा ठूंठ
की अवस्था मे किंसुक दिखाकर कहा कि यह किंसुक है। दूसरे को छोटे छोटे
पत्ते निकलने के समय। तीसरे को फूल निकलने के समय। चौथे को फल
निकलने पर।
आगे चलकर एक बार जब चारो भाई एक साथ बैठे थे उन्होने बातचीत
चलाई कि किंसुक कैसा होता है ? एक बोला—जैसे जला हुआ ठूंठ। दूसरा—
जैसे न्यग्रोध वृक्ष। तीसरा—जैसे मांसपेशी। चौथा—जैसे सिरीष। वे
परस्पर एक दूसरे के कथन से असन्तुष्ट हो पिता के पास गए और पूछा—
देव ! किंसुक कैसा होता है ? राजा ने पूछा—तुमने कैसे कैसे बताया ? सबने
अपना अपना कहने का ढग राजा से कहा। राजा बोला—तुम चारो ने किंसुक
देखा है। हाँ, केवल किंसुक दिखाने वाले सारथी से इस समय में किंसुक कैसा
होता है, इस समय में कैसा होता है यह बाँट कर नही पूछा। उसीसे शक
पैदा हुआ है। यह कह पहली गाथा कही—
सब्बेहि किंसुको दिट्ठो किन्थेत्थ विचिकिच्छथ,
नहि सब्बेसु ठानेसु सारथी परिपुच्छितो ॥
[ सभी ने किंसुक देखा है, किन्तु उसमें शङ्का करते हो। सभी अवस्थाओ
मे सारथी से नही पूछा।]
नहि सब्बेसु ठानेसु सारथी परिपुच्छितो सभी ने किंसुक देखा है। तुम
यहाँ क्या शङ्का करते हो ? सब जगह यह किंसुक ही था, किन्तु तुमने सभी
अवस्थाओ में सारथी को नही पूछा। उसीसे शङ्का उत्पन्न हुई है।
शास्ता ने यह बात कह कर समझाया कि भिक्षु जैसे वे चार भाई विभाग
करके न पूछने के कारण किंसुक के बारे में सन्देहशील हुए, उसी तरह तू भी
इस धर्म में शङ्का करता है। यह कह अभिसम्बुद्ध होने पर दूसरी कथा कही—
[Header] ४५८ [ २.१०.२४६
इस धर्म में शङ्का करता है। यह कह अभिसम्बुद्ध होने पर दूसरी कथा कही—
एवं सब्वेहि जाणेहि येसं धम्मा अजानिता,
ते वे धम्मेसु कङ्खन्ति किसुकस्मिंव भातरो ॥
[ सभी विषयो में, जो धर्म के जानकार नही हैं वह धर्मों के वारे में वैसे
ही शङ्का करते हैं जैसे किसुक के वारे में (चारो) भाई । ]
जैसे वे भाई सभी अवस्थाओ में किसुक को न देखने के कारण सन्देहशील
हुए। उसी प्रकार विपश्यना ज्ञान से जिनको सच छ स्पर्धायतन स्कन्ध
महाभूत धातु आदि धर्म अज्ञात है, स्रोतापत्ति मार्ग को प्राप्त न किए रहने के
कारण, ज्ञानी न हुए रहने के कारण ही (वे) उन स्पर्श आयतन आदि धर्मों मे
शका पैदा करते हैं। जैसे एक ही किसुक में चारो भाई ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय वाराणसी
राजा में ही था।
२४६. सालक जातक
"एकपुत्तको भविस्ससि..." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय एक महास्थविर के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
वह एक कुमार को प्रव्रजित कर उसे कष्ट पहुँचाता रहता था। श्रामणेर
ने पीड़ान सह सकने के कारण चीवर त्याग दिया। स्थविर जाकर उसे फुसलाता
—कुमारक ! तेरा चीवर तेरा ही रहेगा। पात्र भी। मेरे पास जो पात्र
चीवर है वह भी तेरा ही रहेगा। आ प्रव्रजित हो। 'मैं प्रव्रजित नहीं होऊँगा'