जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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ने सन्तुष्ट हो घनी वर्षा बरसाते हुए की तरह बोधिसत्त्व को बहुत धन दिया।
नगरवासियो ने भी वैसे ही किया।
शक्र ने भी उससे विदा लेते हुए कहा—"पण्डित ! मैं सहस्र घोड़ो वाले
आजानीय रथ के साथ मातली को भेजूंगा। तू सहस्र घोड़ो वाले श्रेष्ठ वैजयन्त
रथ पर चढ़कर देवलोक आना।" उसके वहाँ जाकर पाण्डुकम्बलशिलातल
पर बैठने पर देवकन्याओ ने पूछा—महाराज ! वहाँ गए थे ? शक्र ने उनको
यह बात विस्तार से बनाई और बोधिसत्त्व के सदाचार तथा प्रज्ञा की प्रशंसा
की। देवकन्याएँ बोली—महाराज ! हम आचार्य्य को देखना चाहती हैं।
उसे यहाँ लाएं।
शक्र ने मातली को बुला कर कहा—तात ! देवप्सराएँ गुत्तिल गन्धर्व
को देखना चाहती हैं। जा उसे वैजयन्त रथ में बिठाकर ला। उसने 'अच्छा'
कहा और जाकर बोधिसत्त्व को ले आया। शक्र ने बोधिसत्त्व का कुशल क्षेम
पूछ कहा—आचार्य्य ! देवकन्याएँ तुम्हारा गन्धर्व सुनना चाहती है।
"महाराज ! हम गन्धर्व लोग शिल्प से ही जीविका चलाते हैं। मूल्य
मिले तो गाऊँगा।"
"बजाएँ। मै तुम्हे मूल्य दूंगा।"
"मुझे और मूल्य की जरूरत नहीं। यह देवकन्याएँ अपना अपना सुकृत
कहें। ऐसा होने से मैं बजाऊँगा।"
देवकन्याएँ बोली—"आचार्य्य ! हम अपने किए सुकृत पीछे सन्तुष्ट
होकर कहेंगी। गन्धर्व करे।"
बोधिसत्व ने सप्ताह पर्य्यन्त देवताओ को गन्धर्व सुनाया। वह दिव्य-
वाद्य से भी बढ़ गया। सातवे दिन आरम्भ से देवकन्याओ का सुकृत पूछा।
काश्यप बुद्ध के समय एक भिक्षु को उत्तम वस्त्र देकर शक्र की परिचारिका
होकर उत्पन्न हुई, हजारो अप्सराओ से घिरी एक उत्तम देवकन्या से पूछा—
तू पूर्व जन्म में क्या कर्म करके (यहाँ) उत्पन्न हुई ?
उससे पूछा गया प्रश्न तथा उसका उत्तर विमानवत्थु¹ में आया है।
वहाँ कहा है—
¹खुद्दक निकाय का एक ग्रन्थ।