जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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उन्होंने प्रसन्नता पूर्वक कहा—पूछें, उत्तर देंगे। प्राचार्य ने प्रश्न पूछते हुए
पहली गाथा कही—
कालो घसति भूतानि सब्बानेव सहत्तना,
यो च कालघसो भूतो स भूत पचनिं पचि ॥
[ काल सभी प्राणियो को खाता है, अपने को भी (खाता है) । जो काल
को खाने वाला प्राणी है वह सब प्राणियो को जलाने वाली को जलाता हैं।]
कालो पूर्वाह्ण समय तथा अपराह्ण समय आदि । भूतानि प्राणी । काल
प्राणियो का चर्म मास आदि नोच नोच कर उन्हे नही खाता किन्तु उनकी
आयु, वर्ण बल को नष्ट कर यौवन को मर्दन कर आरोग्य का विनाश करता
हुआ खाता है। इस प्रकार खाता हुआ किसी को नही छोड़ता। सब्बानेव
खाता है। केवल प्राणियो को ही नही किन्तु सहत्तना अपने को भी खाता
है। पूर्वाह्ण अपराह्ण तक नही रहता, इसी प्रकार अपराह्ण आदि भी ।
यो च कालघसो भूतो यह क्षीणास्रव के लिए कहा गया है। वह आर्य्यमार्ग
से भविष्य के प्रतिसन्धि-ग्रहण करने के समय को नष्ट करने वाला होने से
कालघसो भूतो कहलाता है। स भूत पचनिं पचि उसने इस तृष्णा को, जो
प्राणियो को अपाय मे जलाती है, ज्ञानाग्नि से जला दिया, भस्म कर दिया ।
इसीसे भूतपचनिं पचि कहा जाता है। पजनिं भी पाठ है। जननि पैदा करने
वाली अर्थ है।
इस प्रश्न को सुनकर माणवको मे एक भी न जान सका । तब बोधिसत्त्व
ने कहा—तुम यह मत समझो कि यह प्रश्न तीनो वेदो मे हैं। तुम यह समझ
कर कि जो मैं जानता हूँ वह सब तुम जानते हो मुझे बेर का वृक्ष बनाते हो।
तुम यह नही जानते कि ऐसा बहुत है जिसे तुम नही जानते और मैं जानता
हूँ। जाओ, सात दिन का समय देता हूँ। इतने समय मे इस प्रश्न पर
विचार करो ।
'वे बोधिसत्त्व को प्रणाम कर अपने अपने निवासस्थान पर गए। वहाँ
सप्ताह भर सोचने पर भी न उन्हे प्रश्न का आरम्भ मिला न अन्त। वे सातव
दिन प्राचार्य के पास गए। प्रणाम करके बैठे। प्राचार्य ने पूछा—भद्रमुखो !