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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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Page 472

[किंसुकोपम ] ४५७
ख. अतीत कथा
पूर्वं समय मे बाराणसी मे ब्रह्मदत्त राज्य करता था। उसके चार पुत्र
थे। उन्होने सारथी को बुलाकर कहा—सौम्य ! हम किंसुक देखना चाहते
हैं। हमे किंसुक वृक्ष दिखाएँ। सारथी बोला—अच्छा दिखाऊँगा। उसने
चारो को एक साथ न दिखा ज्येष्ठ पुत्र को रथ मे बिठा जगल मे ले जा ठूंठ
की अवस्था मे किंसुक दिखाकर कहा कि यह किंसुक है। दूसरे को छोटे छोटे
पत्ते निकलने के समय। तीसरे को फूल निकलने के समय। चौथे को फल
निकलने पर।
आगे चलकर एक बार जब चारो भाई एक साथ बैठे थे उन्होने बातचीत
चलाई कि किंसुक कैसा होता है ? एक बोला—जैसे जला हुआ ठूंठ। दूसरा—
जैसे न्यग्रोध वृक्ष। तीसरा—जैसे मांसपेशी। चौथा—जैसे सिरीष। वे
परस्पर एक दूसरे के कथन से असन्तुष्ट हो पिता के पास गए और पूछा—
देव ! किंसुक कैसा होता है ? राजा ने पूछा—तुमने कैसे कैसे बताया ? सबने
अपना अपना कहने का ढग राजा से कहा। राजा बोला—तुम चारो ने किंसुक
देखा है। हाँ, केवल किंसुक दिखाने वाले सारथी से इस समय में किंसुक कैसा
होता है, इस समय में कैसा होता है यह बाँट कर नही पूछा। उसीसे शक
पैदा हुआ है। यह कह पहली गाथा कही—
सब्बेहि किंसुको दिट्ठो किन्थेत्थ विचिकिच्छथ,
नहि सब्बेसु ठानेसु सारथी परिपुच्छितो ॥
[ सभी ने किंसुक देखा है, किन्तु उसमें शङ्का करते हो। सभी अवस्थाओ
मे सारथी से नही पूछा।]

नहि सब्बेसु ठानेसु सारथी परिपुच्छितो सभी ने किंसुक देखा है। तुम
यहाँ क्या शङ्का करते हो ? सब जगह यह किंसुक ही था, किन्तु तुमने सभी
अवस्थाओ में सारथी को नही पूछा। उसीसे शङ्का उत्पन्न हुई है।

शास्ता ने यह बात कह कर समझाया कि भिक्षु जैसे वे चार भाई विभाग
करके न पूछने के कारण किंसुक के बारे में सन्देहशील हुए, उसी तरह तू भी