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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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४५६ . [ २.१०.२४८
[ यह धर्म अधर्म वा अर्थ अनर्थ कुछ नहीं बूझता है। यह होठ चबाने
के अतिरिक्त और कुछ नहीं जानता है।]
आमात्यो ने पादञ्जली कुमार की मूर्खता पहचान बोधिसत्त्व को राज्या-
भिषिक्त किया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय पादञ्जली
लालुदायी था। पण्डित आमात्य तो मै ही था।
२४८. किंसुकोपम जातक
“सब्बेहि किंसुको दिट्ठो...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय किंसुकोपमसुत्त के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
चार भिक्षुओ ने तथागत के पास आ कर्मस्थान मांगा। शास्ता ने उनको
कर्मस्थान कहा। वे कर्मस्थान ले अपने अपने रात्रि के निवासस्थान तथा दिन
के निवासस्थानो को गए। उनमें से एक ने छ स्पर्श आयतनो का परिग्रहण कर
अर्हत्व प्राप्त किया। एक ने पञ्चस्कन्धो को। एक ने चारो महाभूतो को।
एक ने अठारह धातुओ को। उन सबने अपनी अपनी अर्हत्व-प्राप्ति तथागत
से निवेदन की। उन भिक्षुओ म से एक को शङ्का हुई—यह कर्मस्थान तो
भिन्न भिन्न हैं। निर्वाण एक है। सभी को अर्हत्व की प्राप्ति कैसे हुई ?
उसने शास्ता से पूछा। शास्ता बोले—भिक्षु, क्या तुम्हे किंसुक देखने वाले
भाइयो जैसा भेद (पैदा हुआ है) ? भिक्षुओ ने प्रार्थना की भन्ते ! यह
बात हमे कहे। शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही—