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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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४५४ [ २.१०.२४७

पुत्तदारम्पि चे हन्त्वा देति दानं असञ्जतो,
भुञ्जमानो पि सप्पञ्ञो न पापेन उपलिप्पति ॥
[ यदि असंयमी (आदमी) पुत्र तथा स्त्री को मारकर भी दान देता है,
तो भी बुद्धिमान् खाने वाले को पाप नहीं लगेगा । ]

<center>---</center> भुञ्जमानो पि सप्पञ्ञो दूसरे गाथ की बात रहे। पुत्र स्त्री को भी मार कर दुश्शील द्वारा दिए गए दान को प्रज्ञावान् क्षमामंत्री आदि गुणों से युक्त खाने वाला पाप से लिप्त नहीं होगा। <center>---</center> इस प्रकार बोधिसत्त्व धर्मोपदेश कर आसन से उठकर चले गए। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय गृहस्थ निगण्ठनाथपुत्र था। तपस्वी तो मैं ही था।

२४७. पादञ्जली जातक

“अद्धा पादञ्जली सब्वे...” यह शास्ता ने जेतवन में विहरते समय
लालुदायी स्थविर के बारे में कही।

क. वर्तमान कथा

एक दिन दोनो प्रधान शिष्य प्रश्नो पर विचार करते थे। भिक्षु धर्मसभा
में सुन स्थविरों की प्रशंसा करते थे। परिषद में बैठे हुए लाल उदायी स्थविर
ने होठ चबाए—यह हमारे बराबर क्या जानते हैं ? धर्मसभा में भिक्षुओं ने
बातचीत चलाई—आयुष्मानो, लालुदायी ने दोनो श्रावको की निन्दा कर
होठ चबाए। शास्ता ने यह सुन कर कहा—भिक्षुओ, न केवल अभी, पहले भी