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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages
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काण्ड ] गङ्गा आदि विविध तीर्थोंकी महिमा १२९


स्फटिक-परीक्षा

सूतजीने कहा—हलधारी बलरामने उस दैत्यराजके मेदाभागको लेकर कावेरी, विन्ध्य, यवन, चीन तथा नेपाल देशके भूभागोंमें प्रयत्नपूर्वक बिखेरा था। अतः उन स्थानोंपर आकाशके समान निर्मल तैल-स्फटिक नामक मणि उत्पन्न हुई। यह मणि मृणाल एवं शंखके सदृश धवल होती है, किंतु कुछ मणियाँ उक्त वर्णके अतिरिक्त अन्य वर्णोंको भी धारण करती हैं।

रत्नोंमें उस मणिके समान अन्य कोई नहीं है, जो पाप-विनाश करनेमें उसके बराबर क्षमता रखती हो। शिल्पकारके द्वारा संस्कारित होनेपर ही स्फटिकके मूल्यका कुछ आकलन किया जा सकता है।

(अध्याय ७९)


विद्रुममणिकी परीक्षा

सूतजीने पुनः कहा—हे शौनक! शेषनागने उस बलासुरके अन्त्रभागको ग्रहणकर केरल आदि देशोंमें छोड़ा था, अतएव उन स्थानोंपर महागुणसम्पन्न विद्रुममणियोंका जन्म हुआ। उन विद्रुममणियोंमें जो खरगोशके रक्तके समान लोहित होती हैं अथवा गुञ्जाफल या जपापुष्पकी आभाको धारण करती हैं, उन्हें श्रेष्ठ माना गया है। नील देश, देवक तथा रोमक नामक स्थान इन मणियोंकी जन्मभूमि है। उनमें उत्पन्न हुई विद्रुममणि अत्यन्त लाल वर्णकी होती है। अन्य स्थानोंसे प्राप्त होनेवाली मणियाँ प्रशस्त नहीं मानी गयी हैं। शिल्पकलाके विशेष योग-कौशलपर ही इनके मूल्यका निर्धारण होता है।

जो विद्रुममणि सुन्दर, कोमल, स्निग्ध तथा लाल-लाल वर्णकी होती है, वह निश्चित ही इस संसारमें मनुष्यको धन-धान्यसम्पन्न बनानेवाली तथा उसके विषादिक दुःखोंको दूर करनेवाली होती है।

(अध्याय ८०)


गङ्गा आदि विविध तीर्थोंकी महिमा

सूतजीने कहा—हे शौनक! अब मैं समस्त तीर्थोंका वर्णन करूँगा। जितने भी तीर्थ हैं, उनमें गङ्गा उत्तमोत्तम तीर्थ है। यद्यपि गङ्गा सर्वत्र सुलभ है, किंतु हरिद्वार, प्रयाग एवं गङ्गासागरके संगम—इन तीन स्थानोंमें वह दुर्लभ है*।

प्रयाग परम श्रेष्ठ तीर्थ है, जो मरनेवालेको मुक्ति और भुक्ति दोनों प्रदान करता है। इस महातीर्थमें स्नान करके जो अपने पितरोंके लिये पिण्डदान करते हैं, वे अपने समस्त पापोंका विनाशकर सभी अभीष्टोंकी सिद्धि प्राप्त करते हैं।

वाराणसी परम तीर्थ है। इस तीर्थमें भगवान् विश्वनाथ और केशव सदैव निवास करते हैं। कुरुक्षेत्र भी बहुत बड़ा तीर्थ है। इस तीर्थमें दानादि करनेसे यह भोग और मोक्ष दोनोंकी प्राप्ति करानेवाला है। प्रभास श्रेष्ठतम तीर्थ है, जहाँपर भगवान् सोमनाथ विराजमान रहते हैं। द्वारका अत्यन्त सुन्दर नगरी है। यह मुक्ति-भुक्ति दोनोंको प्रदान करनेवाली है। पूर्व दिशामें अवस्थित सरस्वती पुण्यदायिनी तीर्थ है। इसी प्रकार सप्तसारस्वत परमतीर्थ है।

केदारतीर्थ समस्त पापोंका विनाशक है। सम्भलग्राम उत्तम तीर्थ है। बदरिकाश्रम भगवान्


* सर्वत्र सुलभा गङ्गा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा॥ गङ्गाद्वारे प्रयागे च गङ्गासागरसङ्गमे। (८१।१-२)

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१३०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

नर-नारायणका महातीर्थ है, जो मुक्तिप्रदायक है।

श्वेतद्वीप, मायापुरी (हरिद्वार), नैमिषारण्य, पुष्कर, अयोध्या, चित्रकूट, गोमती, वैनायक, रामगिर्याश्रम, काञ्चीपुरी, तुंगभद्रा, श्रीशैल, सेतुबन्ध-रामेश्वर, कार्तिकेय, भृगुतुंग, कामतीर्थ, अमरकण्टक, महाकालेश्वरकी निवासभूमि उज्जयिनी, श्रीधर हरिका निवासस्थल कुब्जक, कुब्जाम्रक, कालसर्पि, कामद, महाकेशी, कावेरी, चन्द्रभागा, विपाशा, एकाग्र, ब्रह्मेश, देवकोटक, रम्य मथुरापुरी, महानद शोण तथा जम्बूसर नामक स्थानोंको महातीर्थ कहा गया है।

इन तीर्थोंमें सदा सूर्य, शिव, गणपति, महालक्ष्मी एवं भगवान् हरि निवास करते हैं। यहाँ और अन्यान्य पवित्र स्थानोंमें किया गया स्नान, दान, जप, तप, पूजा, श्राद्ध तथा पिण्डदानादि अक्षय होता है। इसी प्रकार शालग्राम तथा पाशुपततीर्थ भी परम पवित्र तीर्थ हैं, जो भक्तोंको सब कुछ प्रदान करते हैं।

कोकामुख, वाराह, भाण्डीर और स्वामि नामक तीर्थ महातीर्थके रूपमें विख्यात हैं। लोहदण्ड नामक तीर्थमें महाविष्णु तथा मन्दारतीर्थमें मधुसूदन निवास करते हैं।

कामरूप महान् तीर्थ है। इस स्थानमें कामाख्यादेवी सदा विराजमान रहती हैं। पुण्ड्रवर्धनतीर्थमें भगवान् कार्तिकेय प्रतिष्ठित रहते हैं। विरज, श्रीपुरुषोत्तम, महेन्द्रपर्वत, कावेरी, गोदावरी, पयोष्णी, वरदा, विन्ध्य और नर्मदाभेद नामक महातीर्थ समस्त पापोंके विनाशक हैं। गोकर्ण, माहिष्मती, कलिंजर एवं श्रेष्ठ शुक्लतीर्थको महातीर्थ माना गया है। यहाँपर स्नान करनेसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। इस तीर्थमें भगवान् शार्ङ्गधारी हरि निवास करते हैं। भक्तोंको सब कुछ देनेवाले विरज तथा स्वर्णाक्षतीर्थ भी उत्तम तीर्थ हैं।

नन्दितीर्थ मुक्तिदायक और कोटितीर्थोंका फल प्रदान करनेवाला है। नासिक, गोवर्धन, कृष्णा, वेणी, भीमरथी, गण्डकी, इरावती, विंदुसर एवं विष्णुपादोदक महापुण्यप्रदायक परम तीर्थ हैं।

ब्रह्मध्यान और इन्द्रियनिग्रह महान् तीर्थ हैं, दम तथा भावशुद्धि श्रेष्ठ तीर्थ है। ज्ञानरूपी सरोवर और ध्यानरूपी जलमें, राग-द्वेषादि रूप मलका नाश करनेके लिये ऐसे मानस तीर्थमें जो मनुष्य स्नान करता है, वह परमगतिको प्राप्त करता है।

यह तीर्थ है, यह तीर्थ नहीं है—जो लोग इस प्रकारके भेद-ज्ञानको रखते हैं, उन्हीं लोगोंके लिये तीर्थगमन और उसके उत्तम फलका विधान किया गया है, किंतु जो 'सर्वत्र ब्रह्ममय है' ऐसा स्वीकार करते हैं, उनके लिये कोई भी स्थान अतीर्थ नहीं है। इन सभीमें स्नान, दान, श्राद्ध, पिण्डदान आदि कर्म करनेसे अक्षय फल प्राप्त होता है। समस्त पर्वत, समस्त नदियाँ एवं देवता, ऋषि-मुनि तथा संतों आदिसे सेवित स्थान तीर्थ ही हैं—

इदं तीर्थमिदं नेति ये नरा भेददर्शिनः।
तेषां विधीयते तीर्थगमनं तत्फलं च यत्॥
सर्वं ब्रह्मेति यो वेत्ति नातीर्थं तस्य किञ्चन।
एतेषु स्नानदानानि श्राद्धं पिण्डमथाक्षयम्॥
सर्वा नद्यः सर्वशैलाः तीर्थं देवादिसेवितम्।
(८१।२५-२७)

श्रीरंगपत्तनम् भगवान् हरिका महान् तीर्थ है। ताप्ती एक श्रेष्ठ महानदी है। सप्तगोदावरी एवं कोणगिरि भी महातीर्थ हैं। कोणगिरितीर्थमें महालक्ष्मी नदीके रूपमें स्वयं विराजमान रहती हैं। सह्यपर्वतपर भगवान् देवदेवेश्वर एकवीर तथा महादेवी सुरेश्वरी निवास करती हैं।

गङ्गाद्वार, कुशावर्त, विन्ध्यपर्वत, नीलगिरि और कनखल—इन महातीर्थोंमें जो व्यक्ति स्नान करता है, वह पुनः संसारमें जन्म नहीं लेता—

गङ्गाद्वारे कुशावर्ते विन्ध्यके नीलपर्वते॥
स्नात्वा कनखले तीर्थे स भवेन्न पुनर्भवे।
(८१।२९-३०)

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काण्ड ] गया-माहात्म्य तथा गयाक्षेत्रके तीर्थोंमें श्राद्धादि करनेका फल १३१


सूतजीने (आगे) कहा कि उपर्युक्त वर्णित और अन्य जो अवर्णित तीर्थ हैं, सभी स्नानादिक क्रियाओंको सम्पन्न करनेपर सदैव सब कुछ प्रदान करनेवाले हैं।
इस प्रकार भगवान् श्रीहरिसे तीर्थोंका माहात्म्य सुनकर ब्रह्माने दक्षप्रजापति आदिके साथ महामुनि व्यासको उनका श्रवण कराया और पुनः तीर्थोत्तम एवं अक्षय फल देनेवाले तथा ब्रह्मलोक प्रदान करनेवाले 'गया' नामक तीर्थका वर्णन किया।
(अध्याय ८१)


गया-माहात्म्य तथा गयाक्षेत्रके तीर्थोंमें श्राद्धादि करनेका फल

ब्रह्माजीने कहा—हे व्यासजी! मैं भुक्ति और मुक्ति प्राप्त करानेवाले परम सार-स्वरूप उत्तम गया-माहात्म्यको संक्षेपमें कहूँगा, आप सुनें।

पूर्वकालमें गय नामक परम वीर्यवान् एक असुर हुआ। उसने सभी प्राणियोंको संतप्त करनेवाली महान् दारुण तपस्या की। उसकी तपस्यासे संतप्त देवगण उसके वधकी इच्छासे भगवान् श्रीहरिकी शरणमें गये। श्रीहरिने उनसे कहा—आप लोगोंका कल्याण होगा, इसका महादेह गिराया जायगा। देवताओंने 'बहुत अच्छा' इस प्रकार कहा। एक समय शिवजीकी पूजाके लिये क्षीरसमुद्रसे कमल लाकर गय नामका वह बलवान् असुर विष्णुमायासे विमोहित होकर कीकटदेशमें शयन करने लगा और उसी स्थितिमें वह विष्णुकी गदाके द्वारा मारा गया।

भगवान् विष्णु मुक्ति देनेके लिये 'गदाधर'के रूपमें गयामें स्थित हैं। गयासुरके विशुद्ध देहमें ब्रह्मा, जनार्दन, शिव तथा प्रपितामह स्थित हैं, विष्णुने वहाँकी मर्यादा स्थापित करते हुए कहा कि इसका देह पुण्यक्षेत्रके रूपमें होगा। यहाँ जो भक्ति, यज्ञ, श्राद्ध, पिण्डदान अथवा स्नानादि करेगा, वह स्वर्ग तथा ब्रह्मलोकमें जायगा, नरकगामी नहीं होगा। पितामह ब्रह्माने गयातीर्थको श्रेष्ठ जानकर वहाँ यज्ञ किया और ऋत्विक्-रूपमें आये हुए ब्राह्मणोंकी पूजा की।

ब्रह्माने वहाँ रसवती अर्थात् जलसे परिपूर्ण एक विशाल नदी, वापी, जलाशय आदि तथा विविध भक्ष्य, भोज्य, फल आदि और कामधेनुकी सृष्टि की। तदनन्तर ब्रह्माने इन सब साधनोंसे सम्पन्न पाँच कोशके परिक्षेत्रमें फैले हुए उस गया तीर्थका दान उन ब्राह्मणोंको कर दिया।

ब्राह्मणोंने उस धर्मयज्ञमें दिये गये धनादिक दानको लोभवश ही स्वीकार किया था। अतः उसी कालसे वहाँके ब्राह्मणोंके लिये यह शाप हो गया कि 'तुम्हारे द्वारा अर्जित विद्या और धन तीन पुरुषपर्यन्त अर्थात् तीन पीढ़ियोंतक स्थायी नहीं रहेगा। तुम्हारे इस गया परिक्षेत्रमें प्रवाहित होनेवाली रसवती नदी जल एवं पत्थरोंके पर्वतमात्रके रूपमें ही अवस्थित रहेगी।

संतप्त ब्राह्मणोंके द्वारा प्रार्थना करनेपर प्रभु ब्रह्माने अनुग्रह किया और कहा—गयामें जिन पुण्यशाली लोगोंका श्राद्ध होगा, वे ब्रह्मलोकको प्राप्त करेंगे। जो मनुष्य यहाँ आकर आप सभीका पूजन करेंगे, उनके द्वारा मैं भी अपनेको पूजित स्वीकार करूँगा।

'ब्रह्मज्ञान, गयाश्राद्ध, गोशालामें मृत्यु तथा कुरुक्षेत्रमें निवास—ये चारों मुक्तिके साधन हैं'—

ब्रह्मज्ञानं गयाश्राद्धं गोगृहे मरणं तथा।
वासः पुंसां कुरुक्षेत्रे मुक्तिरेषा चतुर्विधा॥
(८२।१५)

६६- गयातीर्थमें पिण्डदानकी महिमा

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१३२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-


हे व्यासजी! सभी समुद्र, नदी, वापी, कूप, तडागादि जितने भी तीर्थ हैं; वे सब इस गयातीर्थमें स्वयमेव स्नान करनेके लिये आते हैं, इसमें संदेह नहीं है।

'गयामें श्राद्ध करनेसे ब्रह्महत्या, सुरापान, स्वर्णकी चोरी, गुरुपत्नीगमन और उक्त संसर्ग-जनित सभी महापातक नष्ट हो जाते हैं'—
ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वंगनागमः।
पापं तत्संगजं सर्वं गयाश्राद्धाद् विनश्यति॥
(८२।१७)

जिनकी संस्काररहित दशामें मृत्यु हो जाती है अथवा जो मनुष्य पशु तथा चोरद्वारा मारे जाते हैं या जिनकी मृत्यु सर्पके काटनेसे होती है, वे सभी गया-श्राद्धकर्मके पुण्यसे बन्धनमुक्त होकर स्वर्ग चले जाते हैं।

'गयातीर्थमें पितरोंके लिये पिण्डदान करनेसे मनुष्यको जो फल प्राप्त होता है, सौ करोड़ वर्षोंमें भी उसका वर्णन मेरे द्वारा नहीं किया जा सकता।'

ब्रह्माजीने पुनः व्यासजीसे कहा—कीकट-देशमें गया पुण्यशाली है। राजगृह, वन तथा विषयचारण परम पवित्र है एवं नदियोंमें पुनःपुना नामक नदी श्रेष्ठ है।

गयातीर्थमें पूर्व, पश्चिम, दक्षिण तथा उत्तरमें 'मुण्डपृष्ठ' नामक तीर्थ है, जिसका मान ढाई कोश विस्तृत कहा गया है। 'गयाक्षेत्रका परिमाण पाँच कोश और गयाशिरका परिमाण एक कोश है। वहाँपर पिण्डदान करनेसे पितरोंको शाश्वत तृप्ति हो जाती है'—
पञ्चक्रोशं गयाक्षेत्रं क्रोशमेकं गयाशिरः।
तत्र पिण्डप्रदानेन तृप्तिर्भवति शाश्वती॥
(८३।३)

विष्णुपर्वतसे लेकर उत्तरमानसतकका भाग गयाका सिर माना गया है। उसीको फल्गुतीर्थ भी कहा जाता है। यहाँपर पिण्डदान करनेसे पितरोंको परमगति प्राप्त होती है। गयागमनमात्रसे ही व्यक्ति पितृऋणसे मुक्त हो जाता है—
गयागमनमात्रेण पितॄणामनृणो भवेत्॥
(८३।५)

गयाक्षेत्रमें भगवान् विष्णु पितृदेवताके रूपमें विराजमान रहते हैं। पुण्डरीकाक्ष उन भगवान् जनार्दनका दर्शन करनेपर मनुष्य अपने तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाता है। गयातीर्थमें रथमार्ग तथा रुद्रपद आदिमें कालेश्वर भगवान् केदारनाथका दर्शन करनेसे मनुष्य पितृऋणसे विमुक्त हो जाता है।

वहाँ पितामह ब्रह्माका दर्शन करके वह पापमुक्त और प्रपितामहका दर्शनकर अनामयलोककी प्राप्ति करता है। उसी प्रकार गदाधर पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुको प्रयत्नपूर्वक प्रणाम करनेसे उसका पुनर्जन्म नहीं होता।

हे ब्रह्मर्षि! गयातीर्थमें (मौन धारण करके जो) मौनादित्य और महात्मा कनकार्कका दर्शन करता है, वह पितृऋणसे विमुक्त हो जाता है और ब्रह्माकी पूजा करके ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है।

जो मनुष्य प्रातःकाल उठ करके गायत्रीदेवीका दर्शनकर विधि-विधानसे प्रातःकालीन संध्या सम्पन्न करता है, उसे सभी वेदोंका फल प्राप्त हो जाता है। जो व्यक्ति मध्याह्नकालमें सावित्रीदेवीका दर्शन करता है, वह यज्ञ करनेका फल प्राप्त करता है। इसी प्रकार जो सायंकालमें सरस्वतीदेवीका दर्शन करता है, उसे दानका फल प्राप्त होता है।

यहाँ पर्वतपर विराजमान भगवान् शिवका दर्शन करके मनुष्य अपने पितृऋणसे विमुक्त हो जाता है। धर्मारण्य और उस पवित्र वनके स्वामी धर्मस्वरूप देवका दर्शन करनेसे समस्त ऋण नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार गृध्रेश्वर महादेवका दर्शन

६७- गयाके तीर्थोंकी महिमा तथा आदिगदाधरका माहात्म्य

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काण्ड ] \hfill गया-माहात्म्य तथा गयाक्षेत्रके तीर्थोंमें श्राद्धादि करनेका फल \hfill १३३


करके कौन ऐसा व्यक्ति है, जो भवबन्धनसे विमुक्त नहीं हो सकता।

प्राणी धेनुवन (गो-प्रचारतीर्थ) नामक महातीर्थमें धेनुका दर्शन करके अपने पितरोंको ब्रह्मलोक ले जाता है। प्रभासतीर्थमें प्रभासेश्वर शिवका दर्शन-लाभ करके मनुष्य परमगतिको प्राप्त होता है। कोटीश्वर और अश्वमेधका दर्शन करनेपर ऋणका विनाश हो जाता है। स्वर्गद्वारेश्वरका दर्शन करके मनुष्य भवबन्धनसे विमुक्त हो जाता है।

उसी धर्मारण्यमें अवस्थित गदालोलतीर्थ तथा भगवान् रामेश्वरका दर्शन करके मनुष्य स्वर्गको प्राप्त होता है। भगवान् ब्रह्मेश्वरके दर्शनसे ब्रह्महत्याके पापसे विमुक्ति हो जाती है।

मुण्डपृष्ठतीर्थमें महाचण्डीका दर्शन करके प्राणी अपनी समस्त इच्छाओंको पूर्ण कर लेता है। फल्गुतीर्थके स्वामी फल्गु, चण्डीदेवी, गौरी, मङ्गला, गोमक, गोपति, अङ्गारेश्वर, सिद्धेश्वर, गयादित्य, गज तथा मार्कण्डेयेश्वर भगवान्‌के दर्शनसे व्यक्ति पितृऋणसे मुक्त हो जाता है। फल्गुतीर्थमें स्नान करके जो मनुष्य भगवान् गदाधरका दर्शन करता है, वह पितरोंके ऋणसे विमुक्त हो जाता है।

पुण्यकर्म करनेवाले जनोंके लिये क्या इतने कर्मसे पर्याप्त संतोष नहीं होता ? (अरे इन तीर्थोंमें अवस्थित देवदर्शन तथा स्नान करनेसे मनुष्यके कुलकी) इक्कीस पुरुषपर्यन्त पीढ़ियाँ ब्रह्मलोकको प्राप्त हो जाती हैं।

पृथिवीपर जितने भी तीर्थ, समुद्र और सरोवर हैं, वे सभी प्रतिदिन एक बार फल्गुतीर्थ जाते हैं। पृथिवीमें गया पुण्यशाली तीर्थ है। गयामें गयाशिर श्रेष्ठ है और उसमें भी फल्गुतीर्थ उसका मुखभाग है—

पृथिव्यां यानि तीर्थानि ये समुद्राः सरांसि च।
फल्गुतीर्थं गमिष्यन्ति वारमेकं दिने दिने॥
पृथिव्यां च गया पुण्या गयायां च गयाशिरः।
श्रेष्ठं तथा फल्गुतीर्थं तन्मुखं च सुरस्य हि॥
(८३। २२-२३)

उदीची, कनका नदी और नाभितीर्थ उसका मध्यभाग है। उसी तीर्थके सन्निकट ब्रह्मसदस्तीर्थ है, जो स्नान करनेसे मनुष्यको ब्रह्मलोक प्रदान करता है। वहाँपर स्थित कूपमें पिण्डदानादि कृत्य करके मनुष्य अपने पितरोंके ऋणसे विमुक्त हो जाता है। अक्षयवटमें श्राद्धकर्म सम्पन्न करके मनुष्य अपने पितृगणोंको ब्रह्मलोक प्राप्त कराता है।

हंसतीर्थमें स्नान करके मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। कोटितीर्थ, गयालोल, वैतरणी तथा गोमकतीर्थमें पितरोंके लिये श्राद्ध करनेपर मनुष्य अपने इक्कीस पुरुषपर्यन्त (इक्कीस पीढ़ी)-को ब्रह्मलोक ले जाता है। ब्रह्मतीर्थ, रामतीर्थ, अग्नितीर्थ, सोमतीर्थ और रामह्रदतीर्थमें श्राद्ध करनेवाला अपने पितरोंको ब्रह्मलोक प्राप्त कराता है। उत्तरमानसतीर्थमें श्राद्ध करनेपर पुनर्जन्म नहीं होता। दक्षिणमानसतीर्थमें श्राद्ध करनेसे श्राद्ध करनेवाले अपने पितरोंको ब्रह्मलोक पहुँचाते हैं। स्वर्गद्वारतीर्थमें श्राद्ध करनेसे भी श्राद्धकर्ताओंके पितृजन ब्रह्मलोकको जाते हैं। भीष्मतर्पणका कृत्य जिस स्थानपर हुआ था, उस कूट स्थानपर श्राद्ध करनेसे भी मनुष्य पितृगणोंको भवसागरसे पार उतार देता है। गृध्रेश्वरतीर्थमें श्राद्ध करनेसे श्राद्धकर्ता अपने पितृऋणसे विमुक्त हो जाते हैं।

धेनुकारण्यमें श्राद्धकर तिलसे बनी हुई गौका दान करनेवाला व्यक्ति यदि स्नान करके वहाँपर अवस्थित धेनुमूर्तिका दर्शन करता है तो निश्चित ही वह अपने पितृजनोंको ब्रह्मलोक पहुँचाता है।

ऐन्द्रतीर्थ, वासवतीर्थ, रामतीर्थ, वैष्णवतीर्थ तथा महानदीके पवित्र तीर्थपर श्राद्ध करनेवाला मनुष्य पितरोंको ब्रह्मलोक ले जाता है। गायत्रीतीर्थ, सावित्रीतीर्थ, सारस्वततीर्थमें स्नान-संध्या तथा तर्पण

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१३४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

करके श्राद्ध-क्रिया सम्पन्न करनेसे श्राद्धकर्ता एक सौ एक पुरुषपर्यन्त पितरोंकी पीढ़ीको ब्रह्मलोक ले जाते हैं।

संयतमनसे पितरोंके प्रति ध्यान लगाकर मनुष्यको ब्रह्मयोनि नामक तीर्थको विधिवत् पार करना चाहिये। वहाँपर पितृगणों एवं देवोंका तर्पण करके मनुष्य पुनः गर्भ-यन्त्रणाके संकटमें नहीं पड़ता है।

काकजङ्घातीर्थमें तर्पण करनेसे पितरोंको अक्षयतृप्ति होती है। धर्मारण्य तथा मातङ्गवापीतीर्थमें श्राद्ध करनेसे मनुष्य स्वर्गलोक प्राप्त करता है। धर्मकूप तथा कूपतीर्थमें श्राद्ध करनेपर प्राणी पितृऋणसे मुक्त हो जाता है। यहाँ श्राद्धादि कृत्य करके इस मन्त्रका पाठ करना चाहिये—

प्रमाणं देवताः सन्तु लोकपालाश्च साक्षिणः।
मयागत्य मतङ्गेऽस्मिन्पितॄणां निष्कृतिः कृता॥

<div style="text-align: right;">(८३।३६)</div>

अर्थात् मेरे द्वारा किये जा रहे श्राद्धादि कृत्योंके साक्षी यहाँके देवता प्रमाण हों और लोकपाल साक्षी हों। इस मतङ्गतीर्थमें आ करके मैंने पितरोंसे ऋण-मुक्तिका कार्य किया है।

रामतीर्थमें स्नान करके प्रभासतीर्थ और प्रेतशिलातीर्थमें श्राद्ध करनेसे पितृगण निश्चित ही प्रेतभावसे मुक्त हो जाते हैं। (ऐसा करके) वह श्राद्धकर्ता अपने इक्कीस कुलोंका उद्धार करता है। मुण्डपृष्ठादि तीर्थोंमें भी श्राद्ध-क्रिया सम्पन्न करके अपने पितरोंको ब्रह्मलोक ले जाता है।

गयाक्षेत्रमें ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहाँपर तीर्थ नहीं है। पाँच कोशके क्षेत्रफलमें स्थित गयाक्षेत्रमें जहाँ-तहाँ भी पिण्डदान करनेवाला मनुष्य अक्षय फलको प्राप्तकर अपने पितृगणोंको ब्रह्मलोक प्रदान करता है—

गयायां न हि तत्स्थानं यत्र तीर्थं न विद्यते।
पञ्चक्रोशे गयाक्षेत्रे यत्र तत्र तु पिण्डदः॥
अक्षयं फलमाप्नोति ब्रह्मलोकं नयेत् पितॄन्।

<div style="text-align: right;">(८३।३९-४०)</div>

भगवान् जनार्दनके हाथमें अपने लिये पिण्डदान समर्पित करके यह मन्त्र पढ़ना चाहिये—

एष पिण्डो मया दत्तस्तव हस्ते जनार्दन।
परलोकं गते मोक्षमक्षय्यमुपतिष्ठताम्॥

<div style="text-align: right;">(८३।४१)</div>

हे जनार्दन! भगवान् विष्णु! मैंने आपके हाथमें यह पिण्ड प्रदान किया है। अतः परलोकमें पहुँचनेपर मुझे मोक्ष प्राप्त हो। ऐसा करनेसे मनुष्य पितृगणोंके साथ स्वयं भी ब्रह्मलोक प्राप्त करता है।

गयाक्षेत्रमें स्थित धर्मपृष्ठ, ब्रह्मसर, गयाशीर्ष तथा अक्षयवटतीर्थमें पितरोंके लिये जो कुछ किया जाता है, वह अक्षय हो जाता है। धर्मारण्य, धर्मपृष्ठ, धेनुकारण्य नामक तीर्थोंका दर्शन करनेसे व्यक्ति अपनी बीस पीढ़ियोंका उद्धार करता है।

महानदीके पश्चिमी भागको ब्रह्मारण्य कहा जाता है। उसके पूर्वभागमें ब्रह्मसद, नागाद्रि पर्वत तथा भरताश्रम है। भरताश्रम एवं मतङ्गपर्वतपर मनुष्यको पितरोंके लिये श्राद्ध करना चाहिये।

गयाशीर्षतीर्थसे दक्षिण तथा महानदीतीर्थके पश्चिम चम्पक वन स्थित है, जहाँपर पाण्डुशिला नामक तीर्थ है। श्रद्धावान् व्यक्तिको उस तीर्थमें तृतीया तिथिको श्राद्ध करना चाहिये। उसी तीर्थके सन्निकट निश्चिरामण्डल, महाह्रद और कौशिकी आश्रम है। इन पवित्र तीर्थोंमें भी श्राद्ध करनेसे प्राणीको अक्षय फलकी प्राप्ति होती है।

वैतरणी नदीके उत्तरमें तृतीया नामक एक जलाशय है, वहींपर क्रौञ्च पक्षियोंका निवास है। इस तीर्थमें श्राद्ध करनेवाला पितृगणोंको स्वर्ग ले जाता है।

क्रौञ्चपदतीर्थसे उत्तर निश्चिरा नामसे प्रसिद्ध एक जलाशय है, वहाँपर एक बार जाने और एक बार

६८- चौदह मन्वन्तरोंका वर्णन तथा अठारह विद्याओंके नाम

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काण्ड ]गया-माहात्म्य तथा गयाक्षेत्रके तीर्थोंमें श्राद्धादि करनेका फल१३५

पिण्डदान करनेसे मनुष्यको कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता है, किंतु जो इस तीर्थमें नित्य निवास करते हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है ?

महानदीके जलका स्पर्श करके मनुष्यको पितृदेवोंका तर्पण करना चाहिये। ऐसा करनेसे उसे अक्षय लोकोंकी प्राप्ति होती है और उसके कुलका उद्धार हो जाता है।

सावित्रीतीर्थमें (एक बार) संध्या करनेसे मनुष्यको द्वादशवर्षीय संध्याका फल प्राप्त हो जाता है।

शुक्लपक्ष तथा कृष्णपक्षमें जो मनुष्य गयातीर्थ जाकर वहाँपर रात्रिवास करते हैं, निश्चित ही उनके सात कुलोंका उद्धार हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है। इस गयातीर्थमें मुण्डपृष्ठ, अरविन्दपर्वत तथा क्रौञ्चपाद नामक तीर्थोंका दर्शन करके प्राणी समस्त पापोंसे विमुक्त हो जाता है। मकर-संक्रान्ति, चन्द्रग्रहण एवं सूर्यग्रहणके अवसरपर गयातीर्थमें जाकर पिण्डदान करना तीनों लोकोंमें दुर्लभ है।

महाह्रद, कौशिकी, मूल-क्षेत्र तथा गृध्रकूट-पर्वतकी गुफामें श्राद्ध करनेपर महाफलकी प्राप्ति होती है। जहाँ भगवान् महेश्वर शिवकी जटाओंसे निकली हुई गङ्गाकी माहेश्वरी धारा प्रवाहित है, वहाँ श्राद्ध करके मनुष्यको ऋणमुक्त होना चाहिये। उसी क्षेत्रमें तीनों लोकोंमें विश्रुत पुण्यतमा विशाला नामक नदीतीर्थ है। वहाँ श्राद्ध करनेसे व्यक्ति अग्निष्टोम नामक यज्ञका फल प्राप्त करता है एवं मृत्युके पश्चात् उसको स्वर्गलोक प्राप्त होता है। श्राद्धकर्ताको उस क्षेत्रमें स्थित मासपद नामसे विख्यात तीर्थके जलमें स्नान करके वाजपेय-यज्ञका फल प्राप्त करना चाहिये।

रविपाद नामक तीर्थमें पिण्डदान करके पतितजनोंको अपना उद्धार करना चाहिये। गयातीर्थमें जाकर जो मनुष्य अन्नदान करते हैं, उन्हींसे पितृगण अपनेको पुत्रवान् मानते हैं। नरकके भयसे डरे हुए पितृजन इसीलिये पुत्रप्राप्तिकी अभिलाषा करते हैं कि गयातीर्थमें जो कोई भी मेरा पुत्र जायगा, वह हमारा उद्धार करेगा। इस तीर्थमें पहुँचे हुए अपने पुत्रको देखकर पितृजनोंमें यह उत्सव होता है कि यहाँपर आया हुआ यह मेरा पुत्र अपने पैरोंसे भी इस तीर्थके जलका स्पर्श करके हम सबको निश्चित ही कुछ-न-कुछ प्रदान करेगा—

गयाप्राप्तं सुतं दृष्ट्वा पितॄणामुत्सवो भवेत्।
पद्भ्यामपि जलं स्पृष्ट्वा अस्मभ्यं किल दास्यति॥ (८३।६०)

अपने पुत्र अथवा पिण्डदान देनेके अधिकारी अन्य किसी वंशजके द्वारा जब कभी इस गयाक्षेत्रमें स्थित गयाकूप नामक पवित्र तीर्थमें जिसके भी नामसे पिण्डदान दिया जाता है, उसे शाश्वत ब्रह्मगति प्राप्त करा देता है—

आत्मजो वा तथान्यो वा गयाकूपे यदा तदा।
यन्नाम्ना पातयेत् पिण्डं तं नयेद् ब्रह्म शाश्वतम्॥ (८३।६१)

वहाँपर स्थित कोटितीर्थमें जानेसे मनुष्यको पुण्डरीक विष्णुलोक प्राप्त होता है। उस क्षेत्रमें त्रिलोकविश्रुत वैतरणी नामक नदी है। वह उस गयाक्षेत्रमें पितरोंका उद्धार करनेके लिये अवतरित हुई है।

जो श्रद्धालु व्यक्ति वहाँपर पिण्डदान एवं गोदान करता है, निश्चित ही उसके द्वारा अपने कुलकी इक्कीस पुरुषपर्यन्त पीढ़ियोंका उद्धार होता है, इसमें संदेह नहीं है।

या सा वैतरणी नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुता॥
सावतीर्णा गयाक्षेत्रे पितॄणां तारणाय हि। (८३।६२-६३)

यदि मनुष्य किसी समय गयातीर्थकी यात्रा करता है तो वहाँपर उसके द्वारा उन्हीं कुलके ब्राह्मणोंको भोजन करवाना चाहिये, जिनका ब्रह्माने

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१३६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

अपने यज्ञमें वरण किया था। उस गयातीर्थमें ब्रह्मपद तथा सोमपान नामक तीर्थ उन्हीं ब्राह्मणोंके स्थान हैं, जिनका निर्माण ब्रह्माजीने किया था। इन ब्रह्माके द्वारा प्रकल्पित तीर्थपुरोहितोंकी पूजा करनेपर पितृगणोंके देवता भी पूजित हो जाते हैं।

उस गयातीर्थमें हव्य-कव्यादि पक्वान्नके द्वारा वहाँके ब्राह्मणोंको विधिवत् संतुष्ट करना चाहिये। गयामें निवास तथा देह-परित्यागकी भी विधि है। उत्तमोत्तम गयाक्षेत्रमें जो वृषोत्सर्ग करता है, उसे एक सौ अग्निष्टोम-यज्ञोंका पुण्य-लाभ होता है, इसमें संदेह नहीं है।

बुद्धिमान् मनुष्यको इस गयाक्षेत्रमें अपने लिये भी तिलरहित पिण्डदान करना चाहिये और अन्य व्यक्तियोंके लिये भी पिण्डदान करना चाहिये*।

हे व्यासजी! जातिके जितने भी पितृ, बन्धु-बान्धव एवं सुहृद् जन हों, उन सभीके लिये गया-भूमिमें विधिपूर्वक पिण्डदान किया जा सकता है।

रामतीर्थमें स्नान करके मनुष्य एक सौ गोदानका फल प्राप्त करता है। मातङ्गवापीमें स्नान करके एक सहस्र गायोंके दानका फल प्राप्त होता है। निश्चिरा-संगममें स्नान करके मनुष्य अपने पितृजनोंको ब्रह्मलोक ले जाता है। वसिष्ठाश्रममें स्नान करनेसे वाजपेय-यज्ञका फल प्राप्त होता है। महाकौशिकी-तीर्थमें निवास करनेसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है।

ब्रह्मसरोवरके निकट संसारको पवित्र करनेवाली प्रसिद्ध अग्निधारा नामक नदी प्रवाहित होती है। उसीको कपिला कहते हैं। इस नदीमें स्नान करके कृतकृत्य हुआ श्रद्धालु व्यक्ति पितरोंके लिये श्राद्ध करके अग्निष्टोम-यज्ञका फल प्राप्त करता है।

कुमारधारामें श्राद्ध करके मनुष्यको अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करना चाहिये और वहाँपर स्थित कुमारदेवको प्रणाम-निवेदन करके उसे मोक्ष प्राप्त कर लेना चाहिये।

सोमकुण्डतीर्थमें स्नान करके मनुष्य सोमलोकको जाता है। संवर्तवापी नामक तीर्थमें स्नान करके पिण्डदान करनेवाला प्राणी महासौभाग्यशाली बन जाता है।

प्रेतकुण्डतीर्थमें पिण्डदान करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे विमुक्त हो जाता है। देवनदी, लेलिहान, मथन, जानुगर्तक तथा इसी प्रकारके अन्य पवित्र तीर्थोंमें पिण्डदान करनेवाला मनुष्य अपने पितृजनोंको तार देता है। गयाक्षेत्रमें वसिष्ठेश्वर आदि देवताओंको प्रणाम करके प्राणी सभी ऋणोंसे विमुक्त हो जाता है।
(अध्याय ८२-८३)


गयाके तीर्थोंका माहात्म्य तथा गयाशीर्षमें पिण्डदानकी महिमामें विशालकी कथा

ब्रह्माजीने कहा—व्यासजी! गयातीर्थकी यात्राके लिये उद्यत मनुष्यको विधिपूर्वक श्राद्ध करके संन्यासीके वेषमें अपने गाँवकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये। तदनन्तर दूसरे गाँवमें वह जाकर श्राद्धसे अवशिष्ट अन्नका भोजन ग्रहण करके प्रतिग्रहसे विवर्जित होकर यात्रा करे। गयायात्राके लिये मात्र घरसे चलनेवालेके एक-एक कदम पितरोंके स्वर्गारोहणके लिये एक-एक सीढ़ी बनते जाते हैं—

गृहाच्चलितमात्रस्य गयायां गमनं प्रति।
स्वर्गारोहणसोपानं पितॄणां तु पदे पदे॥
(८४।३)


* आत्मनोऽपि महाबुद्धिर्गयायां तु तिलैर्विना। पिण्डनिर्वपणं कुर्यादन्येषामपि मानवः॥ (८३।६९)

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काण्ड ] गयाके तीर्थोंका माहात्म्य १३७

कुरुक्षेत्र, विशाला (बदरीक्षेत्र), विरजा (जगन्नाथक्षेत्र) तथा गयातीर्थको छोड़कर शेष सभी तीर्थोंमें मुण्डन एवं उपवासका विधान है।

गयातीर्थमें दिन तथा रात (प्रत्येक समय)-में कभी भी श्राद्ध किया जा सकता है। वाराणसी, शोणनद और महानदी पुनःपुनाके तटपर श्राद्ध करके अपने पितृजनोंको स्वर्गलोकमें ले जाय। मनुष्य उत्तर मानसतीर्थमें जाकर श्रेष्ठ सिद्धि प्राप्त करता है। उस तीर्थमें उसे स्नान तथा श्राद्धादि क्रियाओंको सम्पन्न करना चाहिये। ऐसा करनेसे वह दिव्य कामनाओंको तथा मोक्षको प्राप्त करता है।

दक्षिण मानसतीर्थमें जाकर श्रद्धावान् पुरुषको मौन धारण करके पिण्डदानादि करना चाहिये, उस तीर्थमें श्राद्धादि करनेसे मनुष्य देव, ऋषि एवं पितृ—इन तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाता है।

उस गयाक्षेत्रमें सिद्धजनोंके लिये प्रीतिकारक, पापियोंके लिये भयोत्पादक, अपनी जिह्वाको लपलपाते हुए महाभयंकर, नष्ट न होनेवाले महासर्पोंसे परिव्याप्त कनखल नामक त्रिलोकविश्रुत महातीर्थ है। उदीचितीर्थमें देवर्षियोंसे सेवित मुण्डपृष्ठ नामसे एक प्रसिद्ध तीर्थ है। उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य स्वर्गलोकको जाता है एवं श्राद्ध करनेपर उसे अक्षय फलकी प्राप्ति होती है। उस तीर्थमें सूर्यदेवको नमस्कार करके पिण्डदानादि सत्क्रियाओंको अवश्य ही सम्पन्न करना चाहिये।

[कव्यवाह, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्त, बर्हिषद् और सोमपा नामक पितृदेवता हैं। गयाके तीर्थमें श्राद्ध करते समय इन सभी पितृदेवोंकी इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—]

कव्यवाहस्तथा सोमो यमश्चैवार्यमा तथा।
अग्निष्वात्ता बर्हिषदः सोमपाः पितृदेवताः ॥
आगच्छन्तु महाभागा युष्माभी रक्षितास्त्विह।
मदीयाः पितरो ये च कुले जाताः सनाभयः ॥
तेषां पिण्डप्रदानार्थमागतोऽस्मि गयामिमाम्।
(८४।१२–१४)

हे कव्यवाह ! सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्त, बर्हिषद्, सोमप (दिव्य) पितृदेवता ! आप महाभाग ! यहाँ पधारें! आप लोगोंद्वारा रक्षित हमारे कुलमें उत्पन्न जो सपिण्ड पितर पितृलोकमें चले गये हैं, उन सभी पितृजनोंके लिये पिण्डदान करनेके निमित्त मैं इस गयातीर्थमें आया हूँ।

—ऐसी प्रार्थना करके फल्गुतीर्थमें पिण्डदान करके मनुष्यको पितामहका दर्शन करना चाहिये। उसके बाद भगवान् गदाधर विष्णुका दर्शन करे। ऐसा करनेसे वह पितृऋणसे मुक्त हो जाता है। फल्गुतीर्थमें स्नान करके जो मनुष्य भगवान् गदाधरका दर्शन करता है, वह सद्यः अपना तो उद्धार करता ही है, साथ ही वह अपने कुलके दस पूर्व पुरुष एवं दस पश्चाद्वर्ती पुरुषपर्यन्त इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करता है।

गयातीर्थमें पहुँचे हुए श्रद्धालु व्यक्तिके लिये यह प्रथम दिनकी विधिका वर्णन किया गया है। दूसरे दिन धर्मारण्य एवं मातङ्गवापीमें जाकर श्राद्ध करनेवाला मनुष्य पिण्डदान आदि करे, धर्मारण्यमें जानेसे मनुष्यको वाजपेय-यज्ञका फल प्राप्त होता है। तत्पश्चात् ब्रह्मतीर्थमें राजसूय-यज्ञ एवं अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। तदनन्तर कूप और यूप नामके तीर्थोंके मध्य श्राद्ध एवं पिण्डोदक कृत्य सम्पन्न करना चाहिये। कूपोदकके द्वारा किया गया वह श्राद्धादि कार्य अक्षय होता है। तीसरे दिन ब्रह्मसदतीर्थमें जाकर स्नानकर तर्पण करना चाहिये, तदनन्तर यूप एवं कूपतीर्थके मध्यमें श्राद्ध तथा पिण्डदान करनेका नियम है।

तदनन्तर गोप्रचारतीर्थके समीपमें ब्रह्माके द्वारा कल्पित ब्राह्मणोंके सेवनमात्रसे पितृजन मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। यूपतीर्थकी प्रदक्षिणा करके

६९- प्रजापति रुचि और उनके पितरोंका संवाद

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१३८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

वाजपेय-यज्ञका फल प्राप्त कर लेना चाहिये।

चौथे दिन फल्गुतीर्थमें स्नान करके देवादिकोंका तर्पण करे और उसके बाद गयाशीर्षमें रुद्रपदादि तीर्थोंमें जाकर वह पितरोंके लिये श्राद्ध करे।

तदनन्तर व्यास, देहिमुख, पञ्चाग्नि तथा पदत्रय नामक तीर्थमें पिण्डदान करके सूर्यतीर्थ, सोमतीर्थ एवं कार्तिकेय-तीर्थमें जाकर किये गये श्राद्धका फल अक्षय होता है।

गयातीर्थमें नवदैवत्य और द्वादशदैवत्य नामक श्राद्ध करना चाहिये। अन्वष्टका तिथियोंमें, वृद्धिश्राद्धमें, गयामें और मृत्युतिथिमें माताके लिये पृथक् रूपसे श्राद्ध करनेका विधान है। अन्यत्र तीर्थोंमें पिताके साथ ही माताका श्राद्ध करना चाहिये<sup>१</sup>। दशाश्वमेधतीर्थमें स्नान करके पितामहका दर्शनकर यदि मनुष्य रुद्रपादका स्पर्श करता है तो वह पुनः इस लोकमें नहीं आता है।

वित्तपरिपूर्ण समग्र पृथिवीका तीन बार दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह फल गयाशिरतीर्थमें श्राद्ध करनेपर प्राप्त हो जाता है। इस गयाशिरतीर्थमें शमीपत्र प्रमाणके बराबर पिण्डदान करना चाहिये। इससे पितृगण देवत्वको प्राप्त करते हैं। इस कार्यमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है<sup>२</sup>।

भगवान् शिवने मुण्डपृष्ठतीर्थपर अपना चरण रखा था। अतः उस तीर्थमें अल्पमात्र तपस्यासे ही मनुष्य महान् पुण्य प्राप्त कर लेता है। जो व्यक्ति गयाशीर्षतीर्थमें नामोच्चारके साथ जिन पितरोंको पिण्डदान करता है उससे नरकलोकमें निवास करनेवाले पितृजन स्वर्गलोक एवं स्वर्गमें रहनेवाले पितरोंको मोक्ष प्राप्त हो जाता है—

मुण्डपृष्ठे पदं न्यस्तं महादेवेन धीमता॥
अल्पेन तपसा तत्र महापुण्यमवाप्नुयात्।
गयाशीर्षे तु यः पिण्डान्नाम्ना येषां तु निर्वपेत्॥
नरकस्था दिवं यान्ति स्वर्गस्था मोक्षमाप्नुयुः।

<div style="text-align: right;">(८४।२८-३०)</div>

पाँचवें दिन गदालोलतीर्थमें स्नान करके अक्षयवटके नीचे पिण्डदान करनेवाला अपने समस्त कुलका उद्धार कर देता है। अक्षयवटके मूलमें शाक अथवा उष्णोदकसे एक ब्राह्मणको भोजन करानेपर करोड़ ब्राह्मणोंको भोजन करानेका फल प्राप्त हो जाता है<sup>३</sup>। अक्षयवटमें श्राद्ध करनेके पश्चात् प्रपितामहका दर्शन करके मनुष्य अक्षय लोकोंको प्राप्त करता है एवं अपने सौ कुलोंका उद्धार कर देता है।

मनुष्यको बहुत-से पुत्रोंकी कामना करनी चाहिये, क्योंकि उनमेंसे एक भी पुत्र गयातीर्थमें जाय अथवा अश्वमेध-यज्ञ करे या नीलवृषोत्सर्ग करे<sup>४</sup>।

एक प्रेतने किसी वणिक्से कहा—हे वणिक्! गयाशीर्षतीर्थमें तुम मेरे नामसे पिण्डदान करो, जिससे मैं इस प्रेतयोनिसे मुक्त हो जाऊँगा। यह पिण्डदान दाताके लिये भी स्वर्गप्रदान करनेवाला होगा। ऐसा सुनकर उस वणिकने गयाशीर्षतीर्थमें उस प्रेतराजके लिये पिण्डदान किया। तदनन्तर अपने छोटे भाइयोंके साथ उसने अपने पितृजनोंको भी पिण्डदान प्रदान किया। वणिक्के द्वारा


१-श्राद्धं तु नवदैवत्यं कुर्याद्द्वादशदैवतम्। अन्वष्टकासु वृद्धौ च गयायां मृतवासरे॥
अत्र मातुः पृथक् श्राद्धमन्यत्र पतिना सह। ............................................॥ (८४।२४-२५)
२-त्रिवित्तपूर्णां पृथिवीं दत्त्वा यत्फलमाप्नुयात्॥ ............................................॥
स तत्फलमवाप्नोति कृत्वा श्राद्धं गयाशिरे। शमीपत्रप्रमाणेन पिण्डं दद्याद् गयाशिरे॥
पितरो यान्ति देवत्वं नात्र कार्या विचारणा। ............................................॥ (८४।२६-२८)
३-वटमूलं समासाद्य शाकेनोष्णोदकेन वा॥ एकस्मिन् भोजिते विप्रे कोटिर्भवति भोजिताः। (८४।३१-३२)
४-एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत्॥ यजेत वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत्। (८४।३३-३४)

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काण्ड ] गयाके तीर्थोंका माहात्म्य १३९


वहाँ पिण्डदान करनेसे उस प्रेतराजके साथ उसके सभी पितर मुक्त हो गये और पिण्डदान करनेवाला वह विशाल वणिक् पुत्रवान् हो गया। मृत्युके पश्चात् उसने विशालामें राजपुत्रके रूपमें जन्म लिया। उसने ब्राह्मणोंसे कहा कि मुझे किस प्रकारके सत्कार्योंको करनेसे पुत्र-प्राप्ति हो सकती है। ब्राह्मणोंने विशाल नामक राजपुत्रसे कहा कि गयातीर्थमें पिण्डदान करनेसे आपकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो सकती हैं।

तदनन्तर विशालने गयाशीर्षतीर्थमें जाकर पिण्डदान किया, जिसके पुण्यसे वह पुत्रवान् हो गया। एक दिन उसने आकाशमें श्वेत, रक्त एवं कृष्णवर्णवाले पुरुषोंको देखा। उन लोगोंको देखकर उसने पूछा कि तुम सब कौन हो? उनमेंसे श्वेतवर्णवाले पुरुषने उस विशालसे कहा कि श्वेतवर्णवाला मैं तुम्हारा पिता हूँ। तुम्हारे द्वारा दिये गये पिण्डदानके पुण्यलाभसे मैंने शुभ इन्द्रलोकको प्राप्त किया है। हे पुत्र! ये जो रक्तवर्णवाले पुरुष दिखायी दे रहे हैं, मेरे पिता हैं। ये ब्रह्महत्या करनेवाले तथा अन्यान्य महापापोंसे युक्त थे। ये कृष्णवर्णवाले तेरे पितामह हैं। इन्होंने अपने जीवनकालमें अनेक ऋषियोंका वध किया। अतः इन लोगोंको अवीचि नामक नरक प्राप्त हुआ था, किंतु तुम्हारे द्वारा प्रदत्त पिण्डदानसे हम सभी पापविमुक्त हो गये हैं। अब हम लोग उत्तम स्वर्गलोकमें जा रहे हैं।

यह सुनकर कृतकृत्य होकर विशाला नगरीमें राज्य करके वह विशाल स्वर्गलोकमें चला गया।


[गयातीर्थमें पिण्डदान करते हुए निम्न मन्त्रोंका पाठ करना चाहिये—]

येऽस्मत्कुले तु पितरो लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥
ये चाप्यकृतचूडास्तु ये च गर्भाद्विनिःसृताः।
येषां दाहो न क्रिया च येऽग्निदग्धास्तथापरे ॥
भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु तृप्ता यान्तु परां गतिम्।
पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः ॥
माता पितामही चैव तथैव प्रपितामही।
तथा मातामहश्चैव प्रमातामह एव च॥
वृद्धप्रमातामहश्च तथा मातामही परम्।
प्रमातामही तथा वृद्धप्रमातामहीति वै ॥
अन्येषां चैव पिण्डोऽयमक्षय्यमुपतिष्ठताम् ॥
(८४।४३–४८)

इसका भाव यह है कि हमारे कुलमें जो पितर पिण्डदान एवं जल-तर्पण क्रियासे वञ्चित रहे हैं, जो चूडाकर्म-संस्कारविहीन हैं, जो गर्भसे निकले हुए हैं (गर्भपातके कारण मृत्युको प्राप्त हुए हैं), जिनका अग्निदाह अथवा अन्य अन्तिम क्रिया-संस्कार नहीं हुआ है, अग्निमें जलकर जिनकी मृत्यु हुई है और जो दूसरे पितृगण हैं, वे भूमिमें मेरे द्वारा किये गये इस पिण्डदानसे तृप्त हों और तृप्त होकर परमगतिको प्राप्त करें। पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह, मातामही, प्रमातामही, वृद्धप्रमातामही और अन्य पितृजनोंको मेरे द्वारा दिया गया यह पिण्ड अक्षय होकर उन्हें प्राप्त हो। (अध्याय ८४)

७०- रुचिद्वारा की गयी पितृस्तुति तथा श्राद्धमें इस पितृस्तुतिके पाठका माहात्म्य

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१४० संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

गयातीर्थमें पिण्डदानकी महिमा

ब्रह्माजीने कहा—पिण्डदान करनेवालेको चाहिये कि वह प्रेतशिलादि तीर्थोंमें स्नान करके 'अस्मत्कुले मृता ये च०' आदि मन्त्रोंसे अपने श्रेष्ठ पितरोंका आवाहनकर वरुणनदीके अमृतमय जलसे पिण्डदान प्रदान करे*।

हमारे कुलमें जो मरे हैं, जिनकी सद्गति नहीं हुई है। इस दर्भपृष्ठपर तिलोदकके द्वारा उन सभी पितरोंका आवाहन करता हूँ। पितृवंश एवं मातृवंशमें जिन लोगोंकी मृत्यु हुई है, उन लोगोंके उद्धारके लिये मैं यह पिण्डदान दे रहा हूँ। मातामह अर्थात् नानाके कुलमें जो लोग मर गये हैं, जिनको कोई सद्गति प्राप्त नहीं हुई है, उनके उद्धारके लिये मैं यह पिण्ड दे रहा हूँ। हमारे कुलमें जो दाँत निकलनेके पूर्व ही मृत्युको प्राप्त हो गये और जो कोई गर्भकालमें विनष्ट हो गये हैं, उन लोगोंके उद्धारके लिये मैं यह पिण्डदान दे रहा हूँ। बन्धुकुलमें उत्पन्न जो कोई नाम-गोत्रसे रहित हैं, स्वगोत्र एवं परगोत्रमें जिनकी कोई गति नहीं रही है, उनके उद्धारके लिये मैं यह पिण्ड दे रहा हूँ। उद्धन्धन (फाँसीद्वारा) अथवा विषसे या शस्त्राघातसे जिनकी मृत्यु हुई है, जिन्होंने आत्महत्या की है, उन लोगोंके लिये यह पिण्ड दे रहा हूँ।

जो लोग अग्निमें जलकर मर गये हैं, जिनकी मृत्यु सिंह और व्याघ्रादि हिंसक प्राणियोंके द्वारा हुई है अथवा विशाल दाँतोंवाले हाथियों या सींगधारी पशुओंके आघातसे जो मरे हैं, उन सभीके उद्धारके लिये मैं पिण्ड दे रहा हूँ। जिनकी मृत्यु अग्निमें जलकर अथवा बिना अग्निमें जले

१-अस्मत्कुले मृता ये च गतिर्येषां न विद्यते। आवाहयिष्ये तान् सर्वान् दर्भपृष्ठे तिलोदकैः॥
पितृवंशे मृता ये च मातृवंशे च ये मृताः। तेषामुद्धरणार्थाय इमं पिण्डं ददाम्यहम्॥
मातामहकुले ये च गतिर्येषां न विद्यते। तेषामुद्धरणार्थाय इमं पिण्डं ददाम्यहम्॥
अजातदन्ता ये केचिद्दे च गर्भे प्रपीडिताः। तेषामुद्धरणार्थाय इमं पिण्डं ददाम्यहम्॥
बन्धुवर्गाश्च ये केचिन्नामगोत्रविवर्जिताः। स्वगोत्रे परगोत्रे वा गतिर्येषां न विद्यते।
तेषामुद्धरणार्थाय इमं पिण्डं ददाम्यहम्॥
उद्धन्धनमृता ये च विषशस्त्रहताश्च ये। आत्मोपघातिनो ये च तेभ्यः पिण्डं ददाम्यहम्॥
अग्निदाहे मृता ये च सिंहव्याघ्रहताश्च ये। दंष्ट्रिभिः शृङ्गिभिर्वापि तेषां पिण्डं ददाम्यहम्॥
अग्निदग्धाश्च ये केचिन्नाग्निदग्धास्तथापरे। विद्युच्चौरहता ये च तेभ्यः पिण्डं ददाम्यहम्॥
रौरवे चान्धतामिस्रे कालसूत्रे च ये गताः। तेषामुद्धरणार्थाय इमं पिण्डं ददाम्यहम्॥
असिपत्रवने घोरे कुम्भीपाके च ये गताः। तेषामुद्धरणार्थाय इमं पिण्डं ददाम्यहम्॥
अन्येषां यातनास्थानां प्रेतलोकनिवासिनाम्। तेषामुद्धरणार्थाय इमं पिण्डं ददाम्यहम्॥
पशुयोनिं गता ये च पक्षिकीटसरीसृपाः। अथवा वृक्षयोनिस्यास्तेभ्यः पिण्डं ददाम्यहम्॥
असंख्ययातनासंस्था ये नीता यमशासनैः। तेषामुद्धरणार्थाय इमं पिण्डं ददाम्यहम्॥
जात्यन्तरसहस्रेषु भ्रमन्ति स्वेन कर्मणा। मानुष्यं दुर्लभं येषां तेभ्यः पिण्डं ददाम्यहम्॥
ये बान्धवाऽबान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः। ते सर्वे तृप्तिमायान्तु पिण्डदानेन सर्वदा॥
ये केचित् प्रेतरूपेण वर्तन्ते पितरो मम। ते सर्वे तृप्तिमायान्तु पिण्डदानेन सर्वदा॥
ये मे पितृकुले जाताः कुले मातुस्तथैव च। गुरुश्वशुरबन्धूनां ये चान्ये बान्धवा मृताः॥
ये मे कुले लुप्तपिण्डाः पुत्रदारविवर्जिताः। क्रियालोपहता ये च जात्यन्धाः पङ्गवस्तथा॥
विरूपा आमगर्भाश्च ज्ञाताज्ञाताः कुले मम। तेषां पिण्डं मया दत्तमक्षय्यमुपतिष्ठताम्॥
साक्षिणः सन्तु मे देवा ब्रह्मेशानादयस्तथा। मया गयां समासाद्य पितॄणां निष्कृतिः कृता॥
आगतोऽहं गयां देव पितृकार्ये गदाधर। तन्मे साक्षी भवत्वद्य अनुणोऽहम्ऋणत्रयात्॥ (८५।२—२२)

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काण्ड ] गयाके तीर्थोंकी महिमा तथा आदिगदाधरका माहात्म्य १४१


हो गयी है, जो विद्युत्से या चोरोंके द्वारा मारे गये हैं, उनके लिये मैं पिण्ड दे रहा हूँ। जो रौरव, अन्धतामिस्र तथा कालसूत्र नामक नरकोंमें गये हैं, उन सबके उद्धारके लिये यह पिण्ड दे रहा हूँ। जो असिपत्रवन और घोरकुम्भीपाक नामक नरकोंमें पड़े हुए हैं, उनके उद्धारके लिये यह पिण्ड दे रहा हूँ। अन्य जो यातना भोग रहे हैं और प्रेतलोकमें निवास कर रहे हैं, उनके उद्धारके लिये यह पिण्ड दे रहा हूँ।

जो पितृगण पशुयोनिमें चले गये हैं अथवा जो पक्षी, कीट-पतंग, सर्प, सरीसृप (छिपकली, गिरगिट, सर्पादि) हो गये हैं या जो वृक्षयोनिमें अवस्थित हैं, उनके लिये मैं यह पिण्ड दे रहा हूँ। जो यमराजके शासनादेशसे यमगणोंके द्वारा असंख्य यातनाओंके बीच पहुँचाये गये हैं, उन सभीके उद्धारके लिये यह पिण्ड दे रहा हूँ। जो अपने कर्मानुसार हजारों योनियोंमें घूमते हुए कष्ट भोग रहे हैं, जिनको मानुषयोनि दुर्लभ है, उन सभीके लिये यह पिण्ड दे रहा हूँ।

जो हमारे बान्धव हैं या बान्धव नहीं हैं अथवा जो अन्य जन्मोंमें मेरे बन्धु-बान्धव रहे हैं, वे मेरे द्वारा दिये गये इस पिण्डदानसे सदैव तृप्तिको प्राप्त करें। जो कोई भी पितृजन प्रेतरूपमें अवस्थित हैं, वे सभी इस पिण्डदानसे तृप्ति प्राप्त करें।

जो हमारे पितृकुल, मातृकुल, गुरु, श्वशुर, बान्धव अथवा अन्य सम्बन्धियोंके कुलमें उत्पन्न होकर मृत्युको प्राप्त हुए हैं और जो अन्य बान्धव हैं, जो मेरे कुलमें पुत्र-पत्नीसे रहित होनेके कारण लुप्तपिण्ड हैं, क्रियालोपसे जिनकी दुर्गति हुई है, जो जन्मान्ध या पंगु हैं, जो विरूप हैं अथवा अल्पगर्भमें ही मृत्युको प्राप्त हुए हैं, जो ज्ञात अथवा अज्ञात हैं, उनके निमित्त मेरे द्वारा दिया गया यह पिण्डदान अक्षय होकर उन्हें प्राप्त हो।

ब्रह्मा और ईशान आदि देव ! आप सब मेरे इस कार्यमें साक्षी हों। मैंने गयातीर्थमें आ करके पितरोंके उद्धारके लिये यह पिण्डदानादिक कार्य सम्पन्न किया है।

हे देव ! भगवान् गदाधर विष्णु ! मैं पितृकार्यके लिये इस गयातीर्थमें उपस्थित हुआ हूँ। मेरे द्वारा सम्पन्न किये गये आजके इस पितृकार्यमें आप साक्षी हों। आज मैं (देव-गुरु एवं पितृ) तीनों ऋणोंसे विमुक्त हो गया हूँ। (अध्याय ८५)


गयाके तीर्थोंकी महिमा तथा आदिगदाधरका माहात्म्य

ब्रह्माजीने कहा— इस गयाक्षेत्रमें जो विख्यात प्रेतशिला है, वह प्रभास, प्रेतकुण्ड एवं गयासुरशीर्ष नामक तीर्थोंमें तीन प्रकारसे अवस्थित है। सर्वदेवमयी इस शिलाको धर्मदेवताके द्वारा ऐश्वर्यके लिये धारण किया गया है। अपने मित्रादिक बन्धु-बान्धवोंमें जिन लोगोंको प्रेतयोनि प्राप्त हो गयी है, उनका उद्धार करनेके लिये यह प्रेतशिला शुभ है। अतएव मुनिजन, नृपगण तथा राजपत्नयादि इस प्रेतशिलापर आ करके अपने पितृजनोंके लिये श्राद्धादिकर ब्रह्मलोक प्राप्त करते हैं।

गयासुरके मुण्डके पृष्ठभागमें जो शिला स्थित है, उसका नाम 'मुण्डपृष्ठगिरि' है, इसी कारण यह पर्वत सर्वदेवमय है। इसके पाददेशमें ब्रह्मसरोवरादि अनेक तीर्थ हैं। उन तीर्थोंमें एक अरविन्दवन नामक तीर्थ है। उस वनसे सुशोभित होनेके कारण उसके पर्वतीय प्रान्त-भागको 'अरविन्दगिरि' कहते हैं। वहाँपर क्रौञ्च पक्षियोंके चरण-चिह्न विद्यमान रहते हैं। इसलिये वह पर्वतीय भाग 'क्रौञ्चपाद' के

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१४२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

नामसे प्रसिद्ध है। श्राद्धादि करनेसे वह तीर्थ पितरोंको ब्रह्मलोक प्रदान करता है।

आदिकालसे ही यहाँपर आदिदेव भगवान् गदाधर विष्णु अव्यक्तरूपमें शिलारूपसे स्थित हैं। इसलिये यह शिला देवमयी कही गयी है। यह शिला गयासुरके सिरको आच्छादित करके वर्तमान समयमें भी अपने गुरुत्व भावके कारण चारों ओरसे अवस्थित है। कालान्तरमें महारुद्रादि देवोंके साथ आदि-अन्तसे रहित हरि आदि गदाधरके रूपमें व्यक्त होकर यहाँ स्थित हो गये हैं।

जिस प्रकार पूर्वकालमें धर्म-संरक्षण एवं अधर्म-विनाशके निमित्त दैत्यों और राक्षसोंका संहार करनेके लिये मत्स्यावतार हुआ। जैसे कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, दाशरथी राम, कृष्ण और बुद्ध हुए। तदनन्तर कल्कि अवतार भी हुआ। उसी प्रकार यहाँपर व्यक्ताव्यक्त भगवान् आदि गदाधर प्रकट हुए।

आदिकालमें इसी पवित्र तीर्थपर ब्रह्मादि देवोंने आदिदेव भगवान् गदाधर विष्णुकी पूजा की थी। इसलिये यहाँपर अर्घ्य, पाद्य, पुष्पादिक उपहारोंसे उन भगवान् गदाधरकी पूजा करनी चाहिये। जो मनुष्य इस तीर्थमें जाकर अन्य देवताओंके साथ इन आदिदेव भगवान् गदाधरको अर्घ्य-पात्र, पाद्य, गन्ध, पुष्प, धूप, सुन्दर नैवेद्य, विविध प्रकारके पुष्पोंसे बनी हुई मालाएँ, वस्त्र, मुकुट, घण्टा, चामर, दर्पण, अलंकार, पिण्ड, अन्न तथा अन्यान्य वस्तुओंको प्रदान करता है, वह जबतक इस पृथिवीपर जीवित रहता है, तबतक धन, धान्य, आयु, आरोग्य, सम्पदाओं, पुत्र-पौत्रादिक संतति, श्रेय, विद्या, अर्थ एवं अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त करता है। भार्याको प्राप्तकर (अन्तमें) स्वर्गका निवासी बन जाता है। तदनन्तर वह पुनः पृथिवीपर जन्म लेकर राज्यसुख प्राप्त करता है। वह श्रेष्ठ कुलीन मनुष्य सत्त्वसम्पन्न होकर युद्धभूमिमें शत्रुओंको पराजित करनेमें समर्थ रहते हुए वध और बन्धनसे विमुक्त होकर मृत्युके पश्चात् मोक्ष प्राप्त करता है।

जो इस गयातीर्थमें अपने पितृजनोंके लिये श्राद्ध तथा पिण्डदानादिक क्रियाओंको सम्पन्न करनेवाले हैं, वे उन पितृगणोंके साथ स्वयं भी ब्रह्मलोकगामी होते हैं*।

जो व्यक्ति पुरुषोत्तमक्षेत्रमें जाकर भगवान् जगन्नाथ, सुभद्रा एवं बलभद्रकी पूजा करते हैं, वे लोग ज्ञान, लक्ष्मी तथा पुत्रादिकोंको प्राप्तकर अन्त समयमें भगवान् पुरुषोत्तम विष्णुके सांनिध्यमें चले जाते हैं। जो मनुष्य वहाँ स्थित भगवान् पुरुषोत्तम जगन्नाथ, सूर्यदेव और गणनायक विघ्नेश्वरके समक्ष पितरोंके लिये पिण्डदानादिक कार्य करते हैं, उन लोगोंको वह सम्पूर्ण कृत्य ब्रह्मलोक प्रदान करता है।

इस क्षेत्रमें विद्यमान कपर्दी भगवान् शिव और गणेशको नमस्कार करके मनुष्य समस्त विघ्नोंसे मुक्त हो जाता है। यहाँपर विराजमान भगवान् कार्तिकेयका पूजनकर ब्रह्मलोक प्राप्त करता है। द्वादशादित्य सूर्यदेवकी सम्यक् अर्चनासे पुरुष सर्वरोग-विमुक्त हो जाता है। भगवान् वैश्वानर अग्निदेवकी विधिवत् पूजा करके पुरुष उत्तम कान्ति प्राप्त करता है। रेवन्त देवकी पूजा करके मनुष्य उत्तम जातिके अश्वोंको प्राप्त करता है। देवराज इन्द्रकी भलीभाँति पूजा करके महान् ऐश्वर्य एवं गौरीदेवीकी पूजा करके सौभाग्यकी प्राप्ति करनी चाहिये। मनुष्य सरस्वतीदेवीकी पूजा करके विद्या, लक्ष्मीकी पूजा करके सम्पत्ति तथा गरुड़की पूजा करके विघ्नोंके समूहोंसे विमुक्त हो जाता है।

क्षेत्रपालदेवकी पूजा करके व्यक्ति ग्रहोंके समूहसे निर्मुक्त हो जाता है। मुण्डपृष्ठकी पूजा करके अपनी सम्पूर्ण अभिलाषाओंकी पूर्ति करनी चाहिये।


* वधबन्धविनिर्मुक्तश्चान्ते मोक्षमवाप्नुयात्। श्राद्धपिण्डादिकर्तारः पितृभिर्ब्रह्मलोकगाः॥ (८६।१८)

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काण्ड ] चौदह मन्वन्तरोंका वर्णन तथा अठारह विद्याओंके नाम १४३


अष्टनागदेवकी पूजा करके प्राणी सर्पदंशसे मुक्त हो जाता है। ब्रह्माकी पूजा करके ब्रह्मलोकका पुण्य अर्जित करना चाहिये।

भगवान् बलभद्रकी सम्यक् पूजा करके शक्ति और आरोग्य तथा सुभद्रादेवीकी विधिवत् पूजा करके परम सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। भगवान् पुरुषोत्तम जगन्नाथकी पूजा करनेसे सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति होती है। भगवान् नारायणकी पूजा करके वह मनुष्योंका अधिपति होता है।

नृसिंहदेवके चरणोंका स्पर्श एवं नमन करके मनुष्य संग्राममें विजयी होता है। वराहदेवकी पूजा करके वह पृथिवीका राज्य प्राप्त करता है तथा मालाधर एवं विद्याधरका स्पर्श करके विद्याधरोंके पदको प्राप्त कर लेता है।

भगवान् आदिगदाधरकी सम्यक् पूजा करके प्राणी समस्त अभिलाषाओंको पूर्ण कर लेता है। भगवान् सोमनाथकी पूजासे शिवलोकको प्राप्त करता है। रुद्रदेवको नमस्कार करके रुद्रलोकमें प्रतिष्ठापित होता है।

रामेश्वर-शिवको प्रणाम करके मनुष्यको रामके समान अतिशय प्रिय बनना चाहिये। भगवान् ब्रह्मोश्वरकी पूजा करके ब्रह्मलोक-प्राप्तिकी योग्यता प्राप्त करनी चाहिये। कालेश्वरकी भलीभाँति पूजा करके कालजयी बनना चाहिये। केदारनाथकी पूजा करके शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करनी चाहिये और भगवान् सिद्धेश्वरकी पूजा करके मनुष्यको ब्रह्मलोक प्राप्त करना चाहिये।

आद्यदेव रुद्र आदिके साथ भगवान् आदिगदाधर विष्णुका दर्शन करके अपने सौ कुलोंका उद्धार कर उन्हें ब्रह्मलोक प्राप्त कराये। आदिगदाधरकी पूजासे धर्मार्थी धर्मको, धनार्थी धनको, कामार्थी कामको तथा मोक्षार्थी मोक्षको प्राप्त करता है। इनकी पूजासे राज्य चाहनेवाला पुरुष राज्य और शान्तिका इच्छुक शान्ति प्राप्त कर लेता है। सब प्रकारकी कामना करनेवाला सब कुछ प्राप्त कर लेता है। इन भगवान् आदिगदाधरकी अर्चनासे पुत्रकी कामना करनेवाली स्त्रीको पुत्र, सौभाग्य चाहनेवालीको सौभाग्य तथा वंशाभिवृद्धिकी इच्छुक स्त्रीको वंशाभिवृद्धिका पुण्य प्राप्त करना चाहिये। मनुष्य श्राद्ध, पिण्डदान, अन्नदान और जलदानके द्वारा भगवान् गदाधरदेवकी विधिवत् पूजा करके ब्रह्मलोक प्राप्त करता है। पृथिवीपर अवस्थित सभी तीर्थोंकी अपेक्षा जिस प्रकार गयापुरी श्रेष्ठ है, उसी प्रकार शिलाके रूपमें विराजमान गदाधर श्रेष्ठ हैं। उनकी मूर्तिका दर्शन करनेसे सम्पूर्ण शिलाका दर्शन हो जाता है; क्योंकि सब कुछ तो भगवान् गदाधर विष्णु ही हैं—

श्राद्धेन पिण्डदानेन अन्नदानेन वारिदः॥
ब्रह्मलोकमवाप्नोति सम्पूज्यादिगदाधरम्।
पृथिव्यां सर्वतीर्थेभ्यो यथा श्रेष्ठा गयापुरी॥
तथा शिलारूपश्च श्रेष्ठश्चैव गदाधरः।
तस्मिन् दृष्टे शिला दृष्टा यतः सर्वं गदाधरः॥
(८६। ३८-४०)
(अध्याय ८६)


चौदह मन्वन्तरोंका वर्णन तथा अठारह विद्याओंके नाम

श्रीहरिने कहा— हे रुद्र! अब मैं चौदह मनु और उनके पुत्रोंका वर्णन करूँगा। पूर्वकालमें सर्वप्रथम स्वायम्भुव मनु हुए। उनके अग्नीध्र आदि अनेक पुत्र थे। मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु तथा वसिष्ठ—ये इस मन्वन्तरके सात ऋषि (सप्तर्षि) कहे गये हैं। इस मन्वन्तरमें जय, अमित, शुक्र एवं याम नामक (देवताओंके) बारह गण थे, जिनमें चार सोमपायी थे। इसीमें

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१४४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

विश्वभुक् और वामदेव इन्द्रपदसे प्रसिद्ध हुए। वाष्कलि नामक दैत्य उनका शत्रु था, वह भगवान् विष्णुके द्वारा चक्रसे मारा गया।

तदनन्तर स्वारोचिष मनुका प्रादुर्भाव हुआ। उनके चैत्रक, विनत, कर्णान्त, विद्युत्, रवि, बृहद्गुण और नभ नामसे विख्यात महाबली मण्डलेश्वर एवं पराक्रमशाली पुत्र हुए थे। ऊर्ज, स्तम्ब, प्राण, ऋषभ, निश्चल, दत्तोति और अर्वरीवान्—ये सात ऋषि सप्तर्षिरूपमें प्रसिद्ध हुए। इस मन्वन्तरमें द्वादश तुषित और पारावतदेवगण हुए। विपश्चित् नामक इन्द्र थे। उनका शत्रु पुरुकुत्सर नामक दैत्य था। मधुसूदन भगवान् विष्णुने हाथीका रूप धारण करके उसे मारा था।

हे रुद्र! स्वारोचिष मनुके पश्चात् औत्तम मनु हुए। इस मनुके अज, परशु, विनीत, सुकेतु, सुमित्र, सुबल, शुचि, देव, देवावृध, महोत्साह और अजित नामक पुत्र थे। इस मन्वन्तरमें रथौजा, ऊर्ध्वबाहु, शरण, अनघ, मुनि, सुतप और शंकु—ये सप्तर्षि हुए। वशवर्ति, स्वधाम, शिव, सत्य तथा प्रतर्दन नामके पाँच देवगण हुए। इन सभी देवगणोंके प्रत्येक गणमें बारह देवता थे। स्वशान्ति नामक इन्द्र हुए, जिनका शत्रु प्रलम्बासुर दैत्य था। भगवान् विष्णुने मत्स्यावतार धारण करके उस दैत्यका वध किया।

उस मनुके बाद तामस मनु हुए। उनके जानुजङ्घ, निर्भय, नवख्याति, नय, विप्रभृत्य, विविक्षिप, दृढेषुधि, प्रस्तलाक्ष, कृतबन्धु, कृत, ज्योतिर्धाम, पृथु, काव्य, चैत्र, चेताग्नि और हेमक नामक पुत्र थे। इस मन्वन्तरमें सुरागा तथा सुधी आदि सात ऋषि कहे गये हैं। इसमें हरि आदि देवताओंके चार गण थे, प्रत्येकमें पचीस देवता हुए। उसी गणमें शिवि इन्द्र हुए। उनका शत्रु भीमरथ नामक असुर हुआ। भगवान् विष्णुने कूर्मावतार लेकर उसका वध किया।

तदनन्तर रैवत मनुका आविर्भाव हुआ। उनके महाप्राण, साधक, वनबन्धु (वलबन्धु), निरमित्र, प्रत्यङ्ग, परहा, शुचि, दृढ़व्रत और केतुशृंग नामक ऋषि कहे गये हैं। इस मन्वन्तरमें वेदश्री, वेदबाहु, ऊर्ध्वबाहु, हिरण्यरोम, पर्जन्य, सत्यनेत्र और स्वधाम—ये सात ऋषि हुए। इस मन्वन्तरमें अभूतरजस्, अश्वमेधस्, वैकुण्ठ तथा अमृत नामक चार देवगण हुए, जिनमें चौदह देव हुए। विभु नामक इन्द्र हुए। उनका शत्रु शान्त नामक दैत्य था। भगवान् विष्णुने हंसरूप धारण करके उसका विनाश किया।

इसके बाद चाक्षुष मनुका प्रादुर्भाव हुआ। इनके ऊरु, पूरु, महाबल, शतद्युम्न, तपस्वी, सत्यबाहु, कृति, अग्निष्णु, अतिरात्र, सुद्युम्न तथा नर नामक पुत्र हुए। हविष्मान्, उत्तम, स्वधामा, विरज, अभिमान, सहिष्णु तथा मधुश्री नामक—ये सात ऋषि हुए। आर्य, प्रभूत, भव्य, लेख और पृथुक नामवाले पाँच गणोंमें आठ-आठ देवता कहे गये हैं। इस मन्वन्तरके इन्द्र मनोजव थे, उनका शत्रु महान् भुजाओंवाला महाबली महाकाल कहा गया है। जगदाधार भगवान् विष्णुने अश्वरूप धारण करके उसका वध किया था।

तत्पश्चात् वैवस्वत मनु हुए। उनके इक्ष्वाकु, नाभाग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, पांसु, नभ, नेदिष्ठ, करूष, पृषध्र और सुद्युम्न नामक विष्णुपरायण पुत्र हुए। इस मन्वन्तरमें अत्रि, वसिष्ठ, जमदग्नि, कश्यप, गौतम, भरद्वाज तथा विश्वामित्र नामक सात ऋषि (सप्तर्षि) कहे गये हैं। इसमें उनचास मरुद्गण, द्वादश आदित्य, एकादश रुद्र, साध्यगण आठ वसु, अश्विनीकुमारद्वय, दस विश्वेदेव, दस आंगिरसदेव तथा नौ देवगण कहे गये हैं। इस मनुके समयमें तेजस्वी नामक इन्द्र हैं। उनका शत्रु हिरण्याक्ष माना गया है। भगवान् विष्णुने वराह

७१- प्रम्लोचा नामक अप्सराकी दिव्य कन्या मानिनीसे प्रजापति रुचिका विवाह

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काण्ड ] चौदह मन्वन्तरोंका वर्णन तथा अठारह विद्याओंके नाम १४५

अवतार धारण करके उस दैत्यका विनाश किया था।

अब मैं भविष्यमें होनेवाले सावणि मनुके पुत्रोंका वर्णन कर रहा हूँ। उन मनुके विजय, आर्ववीर, निर्मोह, सत्यवाक्, कृति, वरिष्ठ, गरिष्ठ, वाच, संगति नामक पुत्र होंगे। इस मन्वन्तरमें अश्वत्थामा, कृपाचार्य, व्यास, गालव, दीप्तिमान्, ऋष्यशृंग और परशुराम—ये सात ऋषि कहे गये हैं। सुतपा, अमिताभ तथा मुख्य नामक तीन देवगण हैं, जिनके प्रत्येक गणमें बीस-बीस देव माने गये हैं। विरोचन-पुत्र बलि इन्द्र होंगे, जो वामनरूपधारी भगवान् विष्णुके द्वारा याचित तीन पग भूमिदान देनेसे ऐश्वर्यसम्पन्न इन्द्रपदको छोड़कर सिद्धि प्राप्त करेंगे।

हे ब्रह्मा ! नवें वरुणपुत्र दक्षसावर्णि मनुके पुत्रोंको सुनें। धृतिकेतु, दीप्तिकेतु, पञ्चहस्त, निरामय, पृथुश्रवा, बृहद्द्युम्न, ऋचीक तथा बृहद्गुण नामके पुत्र हुए। इस मन्वन्तरमें मेधातिथि, द्युति, सवस, वसु, ज्योतिष्मान् हव्य और कव्य तथा विभु—ये सप्तर्षि हुए। पर, मरीचिगर्भ तथा सुधर्मा—ये तीन देवता हुए। इस मन्वन्तरमें कालकाक्ष नामक देवशत्रु हुआ, जिसका वध पद्मनाभ विष्णुने किया था।

दसवें मनु (धर्म)-के पुत्र धर्मसावर्णिके पुत्रोंको सुनो—सुक्षेत्र, उत्तमौजा, भूरिश्रेण्य, शतानीक, निरमित्र, वृषसेन, जयद्रथ, भूरिद्युम्न, सुवर्चा, शान्ति एवं इन्द्र नामक महाप्रतापी पुत्र थे। इस मन्वन्तरमें अयोमूर्ति, हविष्मान्, सुकृति, अव्यय, नाभाग, अप्रतिमौजा और सौरभ नामक सप्तर्षि हुए। इसमें देवताओंके प्राण नामके एक सौ गण विद्यमान थे। उन गणोंके इन्द्र महाबलशाली शान्त नामक देवपुरुष थे। उनका शत्रु बलि नामक असुर होगा। भगवान् विष्णु अपनी गदासे उसका वध करेंगे।

हे रुद्र ! अब मैं आपके पुत्र एकादश मनु (रुद्रसावर्णि)-की संतानोंका वर्णन करता हूँ। इनके सर्वत्रग, सुशर्मा, देवानीक, पुरु, गुरु, क्षेत्रवर्ण, दृढेषु, आर्द्रक तथा पुत्र नामक पुत्र होंगे। इस मन्वन्तरमें हविष्मान्, हविष्य, वरुण, विश्व, विस्तर, विष्णु और अग्नितेज नामक सप्तर्षि कहे गये हैं और इसमें विहङ्गम, कामगम, निर्माण तथा रुचि नामक चार देवगण हुए। एक-एक गणमें तीस-तीस देवता कहे गये हैं। उन समस्त देवगणोंके इन्द्र वृषभ हुए; जिनका शत्रु दशग्रीव नामक राक्षस होगा। लक्ष्मीका रूप धारण करके विष्णु उसका विनाश करेंगे।

इसके पश्चात् दक्षके पुत्र दक्षसावर्णि बारहवें मनु हुए। उनके पुत्रोंका वर्णन सुनें—इन मनुके देववान्, उपदेव, देवश्रेष्ठ, विदूरथ, मित्रवान्, मित्रदेव, मित्रबिन्दु, वीर्यवान्, मित्रवाह, प्रवाह नामक पुत्र हैं। इस मन्वन्तरमें तपस्वी, सुतपा, तपोमूर्ति, तपोरति, तपोघृति, द्युति तथा तपोधन नामसे विख्यात सप्तर्षि हुए। स्वधर्मा, सुतपस, हरित और रोहित नामक देव सुरगण हैं। उनके प्रत्येक गणोंमें दस-दस देव हुए। हे शिव ! इस मन्वन्तरमें ऋतधामा नामके इन्द्र होंगे। उनका शत्रु तारकासुर होगा। विष्णु नपुंसकस्वरूप धारण करके उसका वध करेंगे।

तदनन्तर रौच्य नामक त्रयोदश मनुके पुत्रोंको मुझसे सुनें। इन मनुके चित्रसेन, विचित्र, तप, धर्मरत, धृति, सुनेत्र, क्षेत्रवृत्ति तथा सुनय नामक पुत्र कहे गये हैं। इस मन्वन्तरमें धर्म, धृतिमान्, अव्यय, निशारूप, निरुत्सक, निर्मोह और तत्त्वदर्शी नामक सप्तर्षि कहे गये हैं। इस मन्वन्तरमें सुरोम, सुधर्म तथा सुकर्म—तीन देवगणोंका उद्भव हुआ। इन सभी गणोंमें तैंतीस-तैंतीस देवगण कहे गये हैं। इन देवगणोंका इन्द्र दिवस्पति और शत्रु त्वष्टिभ नामक दानव था। भगवान् विष्णु मयूरका स्वरूप

७२- भगवान् विष्णुका अमूर्त ध्यानस्वरूप

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१४६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

धारण करके उस दैत्यका वध करेंगे।

हे शिव! अब मेरे पुत्र चौदहवें मनु भौत्यके पुत्रोंका श्रवण करें—इन मनुके ऊरु, गभीर, धृष्ट, तरस्वी, ग्राह, अभिमानी, प्रवीर, जिष्णु, संक्रन्दन, तेजस्वी तथा दुर्लभ नामक पुत्र होंगे। इस मन्वन्तरमें अग्नीध्र, अग्निबाहु, मागध, शुचि, अजित, मुक्त और शुक्र—ये सप्तर्षि होंगे। इस मन्वन्तरमें चाक्षुष, कर्मनिष्ठ, पवित्र, भ्राजिन तथा वचोवृद्ध नामक पाँच देवगणोंके प्रत्येक गणको सात-सात देवगणोंसे समन्वित कहा गया है। इस मन्वन्तरमें शुचि नामसे प्रसिद्ध इन्द्र होंगे तथा महादैत्य उनका शत्रु होगा। स्वयं भगवान् विष्णु ही उस महादानवका वध करेंगे।

उन्हीं भगवान् विष्णुने व्यासरूपमें अवतरित होकर एक ही वेदसंहिताको चतुर्धा विभाजित किया। तदनन्तर अठारह पुराणोंका प्रणयन किया। उन्होंने ही चारों वेद, छः वेदाङ्ग और मीमांसा, न्याय, पुराण, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, अर्थवेद, धनुर्वेद और गन्धर्ववेद—इन अष्टादश विद्याओंका विस्तार किया।
(अध्याय ८७)

प्रजापति रुचि और उनके पितरोंका संवाद

**सूतजीने कहा—**भगवान् हरिने ब्रह्मा और भगवान् शिवको चौदह मन्वन्तरोंका जो वर्णन सुनाया था, मैंने आपको वह सुना दिया। अब मार्कण्डेयजीने क्रौष्टुकि मुनिको जो पितृस्तोत्र सुनाया था, वह आप सभीको सुना रहा हूँ। आप सब उसे श्रवण करें।

**मार्कण्डेयजीने कहा—**प्राचीनकालमें रुचि नामक प्रजापति मायामोहको छोड़कर, निर्भय होकर, स्वल्प शयन करते हुए निरहंकारभावसे इस पृथिवीपर विचरण करने लगे। उन्होंने अग्निहोत्रका परित्याग कर दिया। घरमें रहना छोड़ दिया। वे एक बार भोजन करते और गृहस्थादिक आश्रमके नियमोंसे रहित हो संगरहित होकर इधर-उधर अकेले ही विचरण करते थे। उन्हें देखकर उनके पितृजनोंने उनसे कहा—

हे वत्स! तुमने किस कारण दार-परिग्रह (विवाह) नहीं किया। यह दार-परिग्रह स्वर्ग एवं मोक्ष-प्राप्तिका हेतु है। गृहस्थाश्रमके बिना प्राणीको शाश्वत बन्धन होता है; क्योंकि गृहस्थ समस्त देवताओं, पितरों, ऋषियों और याचकोंकी पूजा करके उत्तम लोकोंको प्राप्त करता है। वह देवताओंको स्वाहा एवं पितरोंको स्वधा शब्दके उच्चारणसे तथा अतिथि एवं भृत्यादि जनोंको अन्न-दानसे संतुष्ट करता है। ऐसा न करके तुम देवऋण और हम सभी पितृजनोंके ऋणसे आबद्ध हो। मनुष्य, ऋषि एवं अन्य प्राणिजनोंके लिये भी तुम प्रतिदिन ऋणी ही हो रहे हो। पुत्रोत्पत्ति, देव-पूजा तथा पितृतर्पण तथा संन्यासग्रहण किये बिना ही तुम कैसे उस स्वर्ग-प्राप्तिकी इच्छा कर रहे हो।

हे पुत्र! इस अन्यायसे तुमको मात्र कष्ट ही प्राप्त होगा। इससे तो मरनेके बाद तुम्हें नरककी प्राप्ति होगी और दूसरे जन्ममें भी क्लेश ही होगा।

**रुचिने पितृजनोंसे कहा—**जीवनमें परिग्रह (ग्रहण करना) अत्यन्त दुःख-भोग, पाप-संग्रह एवं अन्तकालमें अधोगति प्रदान करनेके लिये होता है। ऐसा विचार करके ही मैंने स्त्रीपरिग्रह (विवाह) नहीं किया है। क्षणमात्र विचार करनेसे ही अपने अन्तःकरणमें विद्यमान संशय—संदेहको दूर करनेका उपाय किया जा सकता है। परिग्रह उस मुक्तिका कारण नहीं हो सकता है। जो

७३- भगवान् विष्णुका मूर्त ध्यानस्वरूप

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काण्ड ] प्रजापति रुचि और उनके पितरोंका संवाद १४७

निष्परिग्रह-व्यक्ति प्रतिदिन विद्याके सद्-ज्ञानोपार्जनरूपी जलद्वारा अपने आत्माको निर्मल करता है, मेरे लिये तो वही श्रेष्ठ है। विद्वानोंने अनेक प्रकारके सांसारिक कर्मरूपी पंकिलचिह्नोंका वर्णन किया है। अतएव जितेन्द्रिय पुरुषोंको तत्त्वज्ञानरूपी जलसे आत्माका प्रक्षालन करना चाहिये।

पितरोंने कहा—‘हे वत्स! जितेन्द्रियजनोंके द्वारा आत्माका प्रक्षालन करना चाहिये’—ऐसा तुम्हारा कहना उचित ही है, किंतु यह कल्याणका मार्ग नहीं है, जिसके ऊपर तुम चल रहे हो।

पञ्चयज्ञ, तप तथा दानके द्वारा अपने अमङ्गलको दूर करते हुए फलप्राप्तिकी कामनासे रहित किये हुए जो शुभ और अशुभ कर्म हैं, वे बन्धनके हेतु नहीं होते और जो पूर्वका कर्म है, वह भोगसे नष्ट होता है।

प्रारब्धका जो पुण्यापुण्य कर्म है, वह सुख-दुःखात्मक भोग भोगनेसे निरन्तर नष्ट होता रहता है। इस प्रकार विद्वज्जनोंके द्वारा अपनी आत्माका प्रक्षालन होता रहता है और कर्मबन्धनसे उसकी रक्षा की जाती है। अपने विवेकसे रक्षित आत्मा पापरूपी पंकसे लिप्त नहीं होता।

रुचिने कहा—हे पितामह आदि पितृगण! वेदमें कर्म-मार्गके प्रतिपादनके द्वारा अविद्या-मायाकी परिपुष्टि की गयी है। इसलिये आप सब कैसे मुझे उसी मार्गमें चलनेके लिये प्रवृत्त कर रहे हैं।

पितरोंने कहा—‘कर्मके द्वारा जो कुछ किया जाता है, वह सब अविद्या है’—ऐसा जो तुम्हारा कहना है, वह असत्य वचन नहीं है; किंतु विद्याकी सम्यक्-प्राप्तिमें भी तो कर्म ही हेतु है। शास्त्र-प्रतिपादित जो विहित कर्म हैं, सज्जन पुरुष उनका उल्लंघन नहीं करते। उन्हें उसीसे मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है। विहित कर्मका अनुष्ठान न करना अधोगति-प्रदायक है। हे वत्स! ‘मैं अपरिग्रहादिके द्वारा आत्मप्रक्षालन कर रहा हूँ!’, ऐसा तुम उचित मानते हो, किंतु शास्त्रविहित कर्मोंका अनुष्ठान न करनेसे उत्पन्न पापोंके द्वारा भी तुम स्वयं अपनेको जला रहे हो।

अविद्या भी विषके समान मनुष्योंका उपकार करनेके लिये ही होती है। जिस प्रकार विषका यथोचित उपयोग करनेसे प्राणीका कल्याण होता है, उसी प्रकार समुचित रूपसे अविद्यारूप विहित कर्मका अनुष्ठान करनेसे कर्ताका हित ही होगा! वह भवबन्धनके लिये नहीं, अपितु मोक्षके लिये है।

हे पुत्र! इस कारण तुम विधिपूर्वक दार-परिग्रह अर्थात् अपना विवाह करो। लौकिक कर्मोंका सम्यक् रीतिसे अनुष्ठान न करनेसे तुम आजन्म विफलताको ही प्राप्त करोगे।

रुचिने कहा—हे पितृगण! अब तो मैं वृद्ध हो गया हूँ। कौन मुझे अपनी कन्या प्रदान करेगा? वैसे भी मुझ-जैसे अकिञ्चन व्यक्तिके लिये दार-परिग्रह अर्थात् विवाह करना अत्यन्त कष्टसाध्य है।

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१४८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-
पितरोंने कहा—हे वत्स! यदि तुम हमारे वचनका अनुपालन नहीं करते हो तो निश्चित ही हम सभी पितरोंका पतन होगा और तुम्हारी अधोगति होगी।हे मुनिश्रेष्ठ! ऐसा कहकर उस प्रजापति रुचिके सभी पितृगण देखते-ही-देखते वायुवेगके झोंकोंसे बुझे हुए दीपकोंके समान सहसा अदृश्य हो गये।<br>(अध्याय ८८)

रुचिद्वारा की गयी पितृस्तुति तथा श्राद्धमें इस पितृस्तुतिके पाठका माहात्म्य

पितृजनोंके द्वारा उस प्रकारके वाक्यको सुनकर वे ब्रह्मर्षि रुचि मन-ही-मन अत्यधिक व्याकुल हो उठे और कन्या प्राप्त करनेकी इच्छासे पृथिवीलोकमें विचरने लगे, किंतु उन्हें कोई कन्या प्राप्त न हो सकी। अतएव पितरोंके उक्त वचनरूपी अग्निसे संतप्त हुए वे अतिशय चिन्ताग्रस्त होकर व्यग्र-मनसे इस प्रकार सोचने लगे—

‘मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरे पितृगणोंका और मेरा अभ्युदय करनेवाला वह स्त्री-परिग्रह (विवाह-संस्कार) किस प्रकार हो सकेगा?’

इस प्रकार चिन्तन करते हुए उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं कमलयोनि उन ब्रह्माको ही तपस्याके द्वारा प्रसन्न करता हूँ। तदनन्तर महात्मा रुचिने सौ दिव्य वर्षोंतक कठिन तप किया। वे तपस्याके लिये वनमें एक ही स्थानपर चिरकालतक अवस्थित रहे।

तत्पश्चात् जगत्पितामह ब्रह्माने दर्शन दिया और कहा कि मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, तुम अपनी अभिलाषा प्रकट करो। तदनन्तर सम्पूर्ण संसारको गति प्रदान करनेवाले उन आराध्य-देव ब्रह्माको प्रणाम करके रुचिने पितृजनोंके कथनानुसार जो-जो उनकी अभिलाषा थी। उनसे निवेदन किया।

इसपर ब्रह्माजीने कहा—हे विप्र! तुम प्रजापति होओगे। तुम्हारे द्वारा प्रजाओंकी सृष्टि होगी। प्रजारूपी पुत्रोंकी उत्पत्ति करके ही तुम पितृजनोंके लिये श्राद्ध एवं पिण्डदानादिको सम्पन्न करनेके पश्चात् साधिकार उक्त कामनाकी सिद्धि प्राप्त कर सकोगे। अतः तुम्हारे पितरोंके द्वारा उचित ही कहा गया है कि ‘तुम स्त्री-परिग्रह करो।’ इस अभिलाषाको भलीभाँति ध्यानमें रखते हुए तुम्हें पितरोंकी ही पूजा करनी चाहिये। प्रसन्न होकर वे ही पितृगण तुम्हारी इस कामनाको पूर्ण करेंगे। सम्यक् पूजासे संतुष्ट हुए पितामहादि पितृगण स्त्री-पुत्र आदि क्या नहीं दे सकते।

ब्रह्माजीका इस प्रकारका वचन सुनकर ऋषि रुचिने नदीके एकान्त तटपर पहुँच करके अपने