गरुड़ पुराण
Garuda Purana
by महर्षि वेदव्यास
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अपने यज्ञमें वरण किया था। उस गयातीर्थमें ब्रह्मपद तथा सोमपान नामक तीर्थ उन्हीं ब्राह्मणोंके स्थान हैं, जिनका निर्माण ब्रह्माजीने किया था। इन ब्रह्माके द्वारा प्रकल्पित तीर्थपुरोहितोंकी पूजा करनेपर पितृगणोंके देवता भी पूजित हो जाते हैं।
उस गयातीर्थमें हव्य-कव्यादि पक्वान्नके द्वारा वहाँके ब्राह्मणोंको विधिवत् संतुष्ट करना चाहिये। गयामें निवास तथा देह-परित्यागकी भी विधि है। उत्तमोत्तम गयाक्षेत्रमें जो वृषोत्सर्ग करता है, उसे एक सौ अग्निष्टोम-यज्ञोंका पुण्य-लाभ होता है, इसमें संदेह नहीं है।
बुद्धिमान् मनुष्यको इस गयाक्षेत्रमें अपने लिये भी तिलरहित पिण्डदान करना चाहिये और अन्य व्यक्तियोंके लिये भी पिण्डदान करना चाहिये*।
हे व्यासजी! जातिके जितने भी पितृ, बन्धु-बान्धव एवं सुहृद् जन हों, उन सभीके लिये गया-भूमिमें विधिपूर्वक पिण्डदान किया जा सकता है।
रामतीर्थमें स्नान करके मनुष्य एक सौ गोदानका फल प्राप्त करता है। मातङ्गवापीमें स्नान करके एक सहस्र गायोंके दानका फल प्राप्त होता है। निश्चिरा-संगममें स्नान करके मनुष्य अपने पितृजनोंको ब्रह्मलोक ले जाता है। वसिष्ठाश्रममें स्नान करनेसे वाजपेय-यज्ञका फल प्राप्त होता है। महाकौशिकी-तीर्थमें निवास करनेसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है।
ब्रह्मसरोवरके निकट संसारको पवित्र करनेवाली प्रसिद्ध अग्निधारा नामक नदी प्रवाहित होती है। उसीको कपिला कहते हैं। इस नदीमें स्नान करके कृतकृत्य हुआ श्रद्धालु व्यक्ति पितरोंके लिये श्राद्ध करके अग्निष्टोम-यज्ञका फल प्राप्त करता है।
कुमारधारामें श्राद्ध करके मनुष्यको अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करना चाहिये और वहाँपर स्थित कुमारदेवको प्रणाम-निवेदन करके उसे मोक्ष प्राप्त कर लेना चाहिये।
सोमकुण्डतीर्थमें स्नान करके मनुष्य सोमलोकको जाता है। संवर्तवापी नामक तीर्थमें स्नान करके पिण्डदान करनेवाला प्राणी महासौभाग्यशाली बन जाता है।
प्रेतकुण्डतीर्थमें पिण्डदान करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे विमुक्त हो जाता है। देवनदी, लेलिहान, मथन, जानुगर्तक तथा इसी प्रकारके अन्य पवित्र तीर्थोंमें पिण्डदान करनेवाला मनुष्य अपने पितृजनोंको तार देता है। गयाक्षेत्रमें वसिष्ठेश्वर आदि देवताओंको प्रणाम करके प्राणी सभी ऋणोंसे विमुक्त हो जाता है।
(अध्याय ८२-८३)
गयाके तीर्थोंका माहात्म्य तथा गयाशीर्षमें पिण्डदानकी महिमामें विशालकी कथा
ब्रह्माजीने कहा—व्यासजी! गयातीर्थकी यात्राके लिये उद्यत मनुष्यको विधिपूर्वक श्राद्ध करके संन्यासीके वेषमें अपने गाँवकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये। तदनन्तर दूसरे गाँवमें वह जाकर श्राद्धसे अवशिष्ट अन्नका भोजन ग्रहण करके प्रतिग्रहसे विवर्जित होकर यात्रा करे। गयायात्राके लिये मात्र घरसे चलनेवालेके एक-एक कदम पितरोंके स्वर्गारोहणके लिये एक-एक सीढ़ी बनते जाते हैं—
गृहाच्चलितमात्रस्य गयायां गमनं प्रति।
स्वर्गारोहणसोपानं पितॄणां तु पदे पदे॥
(८४।३)
* आत्मनोऽपि महाबुद्धिर्गयायां तु तिलैर्विना। पिण्डनिर्वपणं कुर्यादन्येषामपि मानवः॥ (८३।६९)