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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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Page 144
१३४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

करके श्राद्ध-क्रिया सम्पन्न करनेसे श्राद्धकर्ता एक सौ एक पुरुषपर्यन्त पितरोंकी पीढ़ीको ब्रह्मलोक ले जाते हैं।

संयतमनसे पितरोंके प्रति ध्यान लगाकर मनुष्यको ब्रह्मयोनि नामक तीर्थको विधिवत् पार करना चाहिये। वहाँपर पितृगणों एवं देवोंका तर्पण करके मनुष्य पुनः गर्भ-यन्त्रणाके संकटमें नहीं पड़ता है।

काकजङ्घातीर्थमें तर्पण करनेसे पितरोंको अक्षयतृप्ति होती है। धर्मारण्य तथा मातङ्गवापीतीर्थमें श्राद्ध करनेसे मनुष्य स्वर्गलोक प्राप्त करता है। धर्मकूप तथा कूपतीर्थमें श्राद्ध करनेपर प्राणी पितृऋणसे मुक्त हो जाता है। यहाँ श्राद्धादि कृत्य करके इस मन्त्रका पाठ करना चाहिये—

प्रमाणं देवताः सन्तु लोकपालाश्च साक्षिणः।
मयागत्य मतङ्गेऽस्मिन्पितॄणां निष्कृतिः कृता॥

<div style="text-align: right;">(८३।३६)</div>

अर्थात् मेरे द्वारा किये जा रहे श्राद्धादि कृत्योंके साक्षी यहाँके देवता प्रमाण हों और लोकपाल साक्षी हों। इस मतङ्गतीर्थमें आ करके मैंने पितरोंसे ऋण-मुक्तिका कार्य किया है।

रामतीर्थमें स्नान करके प्रभासतीर्थ और प्रेतशिलातीर्थमें श्राद्ध करनेसे पितृगण निश्चित ही प्रेतभावसे मुक्त हो जाते हैं। (ऐसा करके) वह श्राद्धकर्ता अपने इक्कीस कुलोंका उद्धार करता है। मुण्डपृष्ठादि तीर्थोंमें भी श्राद्ध-क्रिया सम्पन्न करके अपने पितरोंको ब्रह्मलोक ले जाता है।

गयाक्षेत्रमें ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहाँपर तीर्थ नहीं है। पाँच कोशके क्षेत्रफलमें स्थित गयाक्षेत्रमें जहाँ-तहाँ भी पिण्डदान करनेवाला मनुष्य अक्षय फलको प्राप्तकर अपने पितृगणोंको ब्रह्मलोक प्रदान करता है—

गयायां न हि तत्स्थानं यत्र तीर्थं न विद्यते।
पञ्चक्रोशे गयाक्षेत्रे यत्र तत्र तु पिण्डदः॥
अक्षयं फलमाप्नोति ब्रह्मलोकं नयेत् पितॄन्।

<div style="text-align: right;">(८३।३९-४०)</div>

भगवान् जनार्दनके हाथमें अपने लिये पिण्डदान समर्पित करके यह मन्त्र पढ़ना चाहिये—

एष पिण्डो मया दत्तस्तव हस्ते जनार्दन।
परलोकं गते मोक्षमक्षय्यमुपतिष्ठताम्॥

<div style="text-align: right;">(८३।४१)</div>

हे जनार्दन! भगवान् विष्णु! मैंने आपके हाथमें यह पिण्ड प्रदान किया है। अतः परलोकमें पहुँचनेपर मुझे मोक्ष प्राप्त हो। ऐसा करनेसे मनुष्य पितृगणोंके साथ स्वयं भी ब्रह्मलोक प्राप्त करता है।

गयाक्षेत्रमें स्थित धर्मपृष्ठ, ब्रह्मसर, गयाशीर्ष तथा अक्षयवटतीर्थमें पितरोंके लिये जो कुछ किया जाता है, वह अक्षय हो जाता है। धर्मारण्य, धर्मपृष्ठ, धेनुकारण्य नामक तीर्थोंका दर्शन करनेसे व्यक्ति अपनी बीस पीढ़ियोंका उद्धार करता है।

महानदीके पश्चिमी भागको ब्रह्मारण्य कहा जाता है। उसके पूर्वभागमें ब्रह्मसद, नागाद्रि पर्वत तथा भरताश्रम है। भरताश्रम एवं मतङ्गपर्वतपर मनुष्यको पितरोंके लिये श्राद्ध करना चाहिये।

गयाशीर्षतीर्थसे दक्षिण तथा महानदीतीर्थके पश्चिम चम्पक वन स्थित है, जहाँपर पाण्डुशिला नामक तीर्थ है। श्रद्धावान् व्यक्तिको उस तीर्थमें तृतीया तिथिको श्राद्ध करना चाहिये। उसी तीर्थके सन्निकट निश्चिरामण्डल, महाह्रद और कौशिकी आश्रम है। इन पवित्र तीर्थोंमें भी श्राद्ध करनेसे प्राणीको अक्षय फलकी प्राप्ति होती है।

वैतरणी नदीके उत्तरमें तृतीया नामक एक जलाशय है, वहींपर क्रौञ्च पक्षियोंका निवास है। इस तीर्थमें श्राद्ध करनेवाला पितृगणोंको स्वर्ग ले जाता है।

क्रौञ्चपदतीर्थसे उत्तर निश्चिरा नामसे प्रसिद्ध एक जलाशय है, वहाँपर एक बार जाने और एक बार