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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 143 of 634

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Page 143

काण्ड ] \hfill गया-माहात्म्य तथा गयाक्षेत्रके तीर्थोंमें श्राद्धादि करनेका फल \hfill १३३


करके कौन ऐसा व्यक्ति है, जो भवबन्धनसे विमुक्त नहीं हो सकता।

प्राणी धेनुवन (गो-प्रचारतीर्थ) नामक महातीर्थमें धेनुका दर्शन करके अपने पितरोंको ब्रह्मलोक ले जाता है। प्रभासतीर्थमें प्रभासेश्वर शिवका दर्शन-लाभ करके मनुष्य परमगतिको प्राप्त होता है। कोटीश्वर और अश्वमेधका दर्शन करनेपर ऋणका विनाश हो जाता है। स्वर्गद्वारेश्वरका दर्शन करके मनुष्य भवबन्धनसे विमुक्त हो जाता है।

उसी धर्मारण्यमें अवस्थित गदालोलतीर्थ तथा भगवान् रामेश्वरका दर्शन करके मनुष्य स्वर्गको प्राप्त होता है। भगवान् ब्रह्मेश्वरके दर्शनसे ब्रह्महत्याके पापसे विमुक्ति हो जाती है।

मुण्डपृष्ठतीर्थमें महाचण्डीका दर्शन करके प्राणी अपनी समस्त इच्छाओंको पूर्ण कर लेता है। फल्गुतीर्थके स्वामी फल्गु, चण्डीदेवी, गौरी, मङ्गला, गोमक, गोपति, अङ्गारेश्वर, सिद्धेश्वर, गयादित्य, गज तथा मार्कण्डेयेश्वर भगवान्‌के दर्शनसे व्यक्ति पितृऋणसे मुक्त हो जाता है। फल्गुतीर्थमें स्नान करके जो मनुष्य भगवान् गदाधरका दर्शन करता है, वह पितरोंके ऋणसे विमुक्त हो जाता है।

पुण्यकर्म करनेवाले जनोंके लिये क्या इतने कर्मसे पर्याप्त संतोष नहीं होता ? (अरे इन तीर्थोंमें अवस्थित देवदर्शन तथा स्नान करनेसे मनुष्यके कुलकी) इक्कीस पुरुषपर्यन्त पीढ़ियाँ ब्रह्मलोकको प्राप्त हो जाती हैं।

पृथिवीपर जितने भी तीर्थ, समुद्र और सरोवर हैं, वे सभी प्रतिदिन एक बार फल्गुतीर्थ जाते हैं। पृथिवीमें गया पुण्यशाली तीर्थ है। गयामें गयाशिर श्रेष्ठ है और उसमें भी फल्गुतीर्थ उसका मुखभाग है—

पृथिव्यां यानि तीर्थानि ये समुद्राः सरांसि च।
फल्गुतीर्थं गमिष्यन्ति वारमेकं दिने दिने॥
पृथिव्यां च गया पुण्या गयायां च गयाशिरः।
श्रेष्ठं तथा फल्गुतीर्थं तन्मुखं च सुरस्य हि॥
(८३। २२-२३)

उदीची, कनका नदी और नाभितीर्थ उसका मध्यभाग है। उसी तीर्थके सन्निकट ब्रह्मसदस्तीर्थ है, जो स्नान करनेसे मनुष्यको ब्रह्मलोक प्रदान करता है। वहाँपर स्थित कूपमें पिण्डदानादि कृत्य करके मनुष्य अपने पितरोंके ऋणसे विमुक्त हो जाता है। अक्षयवटमें श्राद्धकर्म सम्पन्न करके मनुष्य अपने पितृगणोंको ब्रह्मलोक प्राप्त कराता है।

हंसतीर्थमें स्नान करके मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। कोटितीर्थ, गयालोल, वैतरणी तथा गोमकतीर्थमें पितरोंके लिये श्राद्ध करनेपर मनुष्य अपने इक्कीस पुरुषपर्यन्त (इक्कीस पीढ़ी)-को ब्रह्मलोक ले जाता है। ब्रह्मतीर्थ, रामतीर्थ, अग्नितीर्थ, सोमतीर्थ और रामह्रदतीर्थमें श्राद्ध करनेवाला अपने पितरोंको ब्रह्मलोक प्राप्त कराता है। उत्तरमानसतीर्थमें श्राद्ध करनेपर पुनर्जन्म नहीं होता। दक्षिणमानसतीर्थमें श्राद्ध करनेसे श्राद्ध करनेवाले अपने पितरोंको ब्रह्मलोक पहुँचाते हैं। स्वर्गद्वारतीर्थमें श्राद्ध करनेसे भी श्राद्धकर्ताओंके पितृजन ब्रह्मलोकको जाते हैं। भीष्मतर्पणका कृत्य जिस स्थानपर हुआ था, उस कूट स्थानपर श्राद्ध करनेसे भी मनुष्य पितृगणोंको भवसागरसे पार उतार देता है। गृध्रेश्वरतीर्थमें श्राद्ध करनेसे श्राद्धकर्ता अपने पितृऋणसे विमुक्त हो जाते हैं।

धेनुकारण्यमें श्राद्धकर तिलसे बनी हुई गौका दान करनेवाला व्यक्ति यदि स्नान करके वहाँपर अवस्थित धेनुमूर्तिका दर्शन करता है तो निश्चित ही वह अपने पितृजनोंको ब्रह्मलोक पहुँचाता है।

ऐन्द्रतीर्थ, वासवतीर्थ, रामतीर्थ, वैष्णवतीर्थ तथा महानदीके पवित्र तीर्थपर श्राद्ध करनेवाला मनुष्य पितरोंको ब्रह्मलोक ले जाता है। गायत्रीतीर्थ, सावित्रीतीर्थ, सारस्वततीर्थमें स्नान-संध्या तथा तर्पण