गरुड़ पुराण
Garuda Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in contextकाण्ड ] गयाके तीर्थोंका माहात्म्य १३७
कुरुक्षेत्र, विशाला (बदरीक्षेत्र), विरजा (जगन्नाथक्षेत्र) तथा गयातीर्थको छोड़कर शेष सभी तीर्थोंमें मुण्डन एवं उपवासका विधान है।
गयातीर्थमें दिन तथा रात (प्रत्येक समय)-में कभी भी श्राद्ध किया जा सकता है। वाराणसी, शोणनद और महानदी पुनःपुनाके तटपर श्राद्ध करके अपने पितृजनोंको स्वर्गलोकमें ले जाय। मनुष्य उत्तर मानसतीर्थमें जाकर श्रेष्ठ सिद्धि प्राप्त करता है। उस तीर्थमें उसे स्नान तथा श्राद्धादि क्रियाओंको सम्पन्न करना चाहिये। ऐसा करनेसे वह दिव्य कामनाओंको तथा मोक्षको प्राप्त करता है।
दक्षिण मानसतीर्थमें जाकर श्रद्धावान् पुरुषको मौन धारण करके पिण्डदानादि करना चाहिये, उस तीर्थमें श्राद्धादि करनेसे मनुष्य देव, ऋषि एवं पितृ—इन तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाता है।
उस गयाक्षेत्रमें सिद्धजनोंके लिये प्रीतिकारक, पापियोंके लिये भयोत्पादक, अपनी जिह्वाको लपलपाते हुए महाभयंकर, नष्ट न होनेवाले महासर्पोंसे परिव्याप्त कनखल नामक त्रिलोकविश्रुत महातीर्थ है। उदीचितीर्थमें देवर्षियोंसे सेवित मुण्डपृष्ठ नामसे एक प्रसिद्ध तीर्थ है। उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य स्वर्गलोकको जाता है एवं श्राद्ध करनेपर उसे अक्षय फलकी प्राप्ति होती है। उस तीर्थमें सूर्यदेवको नमस्कार करके पिण्डदानादि सत्क्रियाओंको अवश्य ही सम्पन्न करना चाहिये।
[कव्यवाह, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्त, बर्हिषद् और सोमपा नामक पितृदेवता हैं। गयाके तीर्थमें श्राद्ध करते समय इन सभी पितृदेवोंकी इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—]
कव्यवाहस्तथा सोमो यमश्चैवार्यमा तथा।
अग्निष्वात्ता बर्हिषदः सोमपाः पितृदेवताः ॥
आगच्छन्तु महाभागा युष्माभी रक्षितास्त्विह।
मदीयाः पितरो ये च कुले जाताः सनाभयः ॥
तेषां पिण्डप्रदानार्थमागतोऽस्मि गयामिमाम्।
(८४।१२–१४)
हे कव्यवाह ! सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्त, बर्हिषद्, सोमप (दिव्य) पितृदेवता ! आप महाभाग ! यहाँ पधारें! आप लोगोंद्वारा रक्षित हमारे कुलमें उत्पन्न जो सपिण्ड पितर पितृलोकमें चले गये हैं, उन सभी पितृजनोंके लिये पिण्डदान करनेके निमित्त मैं इस गयातीर्थमें आया हूँ।
—ऐसी प्रार्थना करके फल्गुतीर्थमें पिण्डदान करके मनुष्यको पितामहका दर्शन करना चाहिये। उसके बाद भगवान् गदाधर विष्णुका दर्शन करे। ऐसा करनेसे वह पितृऋणसे मुक्त हो जाता है। फल्गुतीर्थमें स्नान करके जो मनुष्य भगवान् गदाधरका दर्शन करता है, वह सद्यः अपना तो उद्धार करता ही है, साथ ही वह अपने कुलके दस पूर्व पुरुष एवं दस पश्चाद्वर्ती पुरुषपर्यन्त इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करता है।
गयातीर्थमें पहुँचे हुए श्रद्धालु व्यक्तिके लिये यह प्रथम दिनकी विधिका वर्णन किया गया है। दूसरे दिन धर्मारण्य एवं मातङ्गवापीमें जाकर श्राद्ध करनेवाला मनुष्य पिण्डदान आदि करे, धर्मारण्यमें जानेसे मनुष्यको वाजपेय-यज्ञका फल प्राप्त होता है। तत्पश्चात् ब्रह्मतीर्थमें राजसूय-यज्ञ एवं अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। तदनन्तर कूप और यूप नामके तीर्थोंके मध्य श्राद्ध एवं पिण्डोदक कृत्य सम्पन्न करना चाहिये। कूपोदकके द्वारा किया गया वह श्राद्धादि कार्य अक्षय होता है। तीसरे दिन ब्रह्मसदतीर्थमें जाकर स्नानकर तर्पण करना चाहिये, तदनन्तर यूप एवं कूपतीर्थके मध्यमें श्राद्ध तथा पिण्डदान करनेका नियम है।
तदनन्तर गोप्रचारतीर्थके समीपमें ब्रह्माके द्वारा कल्पित ब्राह्मणोंके सेवनमात्रसे पितृजन मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। यूपतीर्थकी प्रदक्षिणा करके