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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

DevanagariHindipublished486 pages

द्वितीयः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ३०९

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द्वितीयः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ३०९

शिष्टों ने जिसका आचरण किया है वह शौच दो प्रकार का बताया गया है। दुर्गन्ध तथा अपवित्र वस्तुओं के लेप को दूर करना बाह्य शौच है तथा किसी प्राणी को कष्ट न पहुँचाना अन्तः शौच है ॥ २३ ॥

द्विविधस्याऽप्युदाहरणमाह—
'अद्भिश्शुद्ध्यन्ति गात्राणि बुद्धिर्ज्ञानेन शुद्ध्यतीति ।
अहिंसया च भूतात्मा मनस्सत्येन शुद्ध्यतीति ॥ २४ ॥

इति तृतीयप्रश्ने प्रथमः खण्डः॥

**अनु०—**शरीर के अंगों की शुद्धि जल से होती है और बुद्धि की शुद्धि ज्ञान से होती है। अहिंसा से आत्मा की शुद्धि होती है और सत्य से मन शुद्ध होता है ॥२४॥
व्याख्यातश्लोकः । अन्तश्शौचमहिंसनमित्येतद्विधानपरोऽयं प्रपञ्चः ॥ २४ ॥

इति श्रीगोविन्दस्वामिकृते बौधायनधर्मविवरणे
तृतीयप्रश्नेऽप्रथमोऽध्यायः ।


तृतीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः

द्वितीयः खण्डः

अथोक्ता वृत्तीरानुपूर्व्येणाऽनुक्रमं विवृणोति—
यथो एतत् षण्णिवर्तनीति ॥ १ ॥

**अनु०—**षण्णिवर्तनी वृत्ति के नियम इस प्रकार होते हैं ॥ १ ॥

यथो एतदिति निपातः उक्तानुभाषणार्थः 'यथा एतद्हुतः प्रहुत आहुतः' इति । यथा वा 'यथो एतदेकस्य सतः' इति । नवानां वृत्तीनां षण्णिवर्तनेति या प्रथमं पठिता तां विवरिष्यामीत्यर्थः ॥ १ ॥

षडेव निवर्तनानि निरुपहतानि करोति स्वामिने भागमुत्सृजत्य-
नुज्ञातं वा गृह्णाति । प्राक्प्रातराशात्कर्षी स्यादास्यूतनासिकाभ्यां समु-
ष्काभ्यामतुदन्नारया मुहुर्मुहुरभ्युच्छन्दयन् । एतेन विधिना षण्णिवर्त-
नानि करोतीति षण्णिवर्तनी ॥ २ ॥


१. See मनु ५. १०९.

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३१०बौधायन-धर्मसूत्रम्[ वृत्त्युपायाः

**अनु०—**बिना जोती हुई छः निवर्तनं भूमि में खेती करे। भूमि के स्वामी को भाग देकर अपना अंश ग्रहण करे अथवा खेत के स्वामी की आज्ञा होने पर सम्पूर्ण अंश स्वयं ग्रहण करे। प्रातःकालीन भोजन की वेला से पहले ही ऐसे बैलों से जिनकी नाक में छेदकर रस्सी न पिन्हाई गयी हो और जिन्हें बधिया न किया गया हो, कोड़े या डण्डे का प्रयोग किये बिना, बार-बार पुचकारते-दुलारते हुए जुताई करे। इस विधि से छः निवर्तनं भूमि में कृषि कर्म करने वाला षण्णिवर्तनी कहलाता है॥ २॥

निवर्तनं नाम भूम्याः कर्षणं कृषीबलानां प्रसिद्धम्-इयदेकं निवर्तनमिति। निरुपहतं अकृष्टक्षेत्रं षट्संख्याविशिष्टानि निवर्तनान्यकृष्टक्षेत्राणि समापाद-यन्तीत्यर्थः। तत्र निष्पन्नौषधेरयं विशेषः—स्वामिने भागमित्यादि। भूस्वा-मिने भागोंऽशः परक्षेत्रविषयमेतत्। सामर्थ्यात् स चेदनुजानीयात्सर्वं स्वयमेव गृह्णीयात्। स्वक्षेत्रेषु नाऽयं विधिः स्वक्षेत्रत्वात्। आपदुपायोऽयम्। प्राक्प्रातरित्यादि व्याख्यातम्। एतेन विधानेन षण्णिवर्तनीशब्दं व्युत्पाद-यन्नुपसंहरति॥ २॥

कथं कौद्दालीत्याह—

कौद्दालीति जलाभ्याशे कुद्दालेन वा फालेन वा तीक्ष्णकाष्ठेन वा खनति बीजान्यावपति कन्दमूलफलशाकौषधीर्निष्पादयति। कुद्दा-लेन करोतीति कौद्दाली ॥ ३ ॥

**अनु०—**कौद्दाली वृत्ति का अनुसरण करने वाला किसी जलाशय के समीप कुदाल से, फाल से या नुकीले लकड़ी के टुकड़े से भूमि को खोदे और उसमें बीज बोकर कन्द, मूल, फल, शाक, ओषधि उत्पन्न करे। इस प्रकार कुद्दाल से भूमि खोद कर उससे उत्पन्न वस्तुओं से जीविका-निर्वाह करने वाला कौद्दाली होता है॥ ३॥

अभ्याशे समीपे अपरिग्रहे। कुद्दालमयौमुखं काष्ठम्। फालमायस्यं खनित्र-मिति यावत्। तीक्ष्णाग्रं काष्ठं प्रसिद्धम्। एतेषां सम्भवापेक्षो विकल्पः खनति विखनति। ततो बीजान्यावपति कन्दादीनाम्। कन्दमामोपयोग्यम्। मूलं पक्कोपयोग्यम्। अन्यत्प्रसिद्धम्॥ ३॥

तृतीया वृत्तिः ध्रुवा। तामाह—

ध्रुवायां वर्तमानश्शुकलेन वाससा शिरो वेष्टयति—"भूत्यै त्वा शिरो वेष्टयामी" ति ॥ ४ ॥

**अनु०—**ध्रुवा वृत्ति से जीविका निर्वाह करने वाला श्वेत वस्त्र से शिर को

द्वितीयः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ३११

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द्वितीयः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ३११

“भूत्यै त्वा शिरो वेष्टामि” । ( समृद्धि के लिए मैं तुम्हें अपने सिर पर बाँधता हूँ ) कहकर आच्छादित करे ॥ ४ ॥

प्रत्यारम्भं इति केचित् । अहरहरित्यन्ये । एवं कृष्णाजिनादानेष्वपि द्रष्टव्यम् ॥ ४ ॥

“ब्रह्मवर्चसमसि ब्रह्मवर्चसाय त्वे”ति कृष्णाजिनमादत्ते । अब्ब्लिङ्गाभिः पवित्रम् । “बलमसि बलाय त्वे”ति कमण्डलुम् ॥ ५ ॥

अनु०—"ब्रह्मवर्चसमसि ब्रह्मवर्चसाय त्वा” ( तुम ब्रह्म के तेज हो, ब्रह्म के तेज के लिए मैं तुम्हें धारण करता हूँ ) कहकर कृष्ण मृगचर्म ग्रहण करे । जल देवता के मन्त्रों से पवित्र को ग्रहण करे । 'बलमसि बलाय त्वा' ( तुम बल हो, तुम्हें बल के लिए ग्रहण करता हूँ ) कहकर कमण्डलु ग्रहण कर ॥ ५ ॥

आदत्त इत्यनुवर्तते ॥ ५ ॥

“धान्यमसि पुष्ट्यै त्वे”ति वीवधम् ॥ “सखा मा गोपाये”ति दण्डम् । अथोपनिष्क्रम्य व्याहृतीर्जपित्वा दिशामनुमन्त्रणं जपति—“पृथिवी चान्तरिक्षं च द्यौश्च नक्षत्राणि च या दिशः । अग्निवायुश्च सूर्यश्च पान्तु मां पथि देवता” इति । १मानस्तोकीयं जपित्वा ग्रामं प्रविश्य गृहद्वारे गृहद्वार आत्मानं वीवधेन सह दर्शनात् संदर्शनीत्याचक्षते ॥६॥

“धान्यमसि पुष्ट्यै त्वा” ( तुम अन्न हो, मैं तुम्हें पुष्टि के लिए ग्रहण करता हूँ ) कहकर वीवध को ग्रहण करे । "सखा मा गोपाय” ( तुम मित्र हो, मेरी रक्षा करो ) कहकर दण्ड ग्रहण करे । अपनी कुटी से निकलकर व्याहृतियों का जप करें और दिशामों के अनुमन्त्रण के लिए यह मन्त्र जपे—"पृथिवी चान्तरिक्षं च द्यौश्च नक्षत्राणि च या दिशः । अग्निवायुश्च सूर्यश्च पान्तु मां पथि देवता । ( पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, नक्षत्र और दिशाएं, अग्नि, वायु और सूर्य देवता मार्ग में मेरी रक्षा करें ) । मानस्तोकीय ( तैत्तिरीय संहिता ३. ४. ११.२ के 'मा नस्तोके' आदि से आरम्भ होने वाला अंश ) का पाठ करते हुए गाँव में प्रवेश करे और प्रत्येक घर के द्वार पर वीवध के साथ उपस्थित होकर अपने को दिखाए, इसे ही संदर्शनी कहते हैं ॥ ६ ॥

ध्रुवा हि वृत्तिर्भिक्षाटनप्राधान्यात् । भैक्षभाजनं च वीवधः । तन्न तत्र प्रतिगृह्योपनिष्क्रम्य व्याहृतीर्जपति । दिशामनुमन्त्रणम्—'पृथिवी च' इति मन्त्रः । 'मा नस्तोके' इति गृहद्वारे । आत्मानं वीवधेन गृहद्वारिभ्यस्संदर्श-


१. मानस्तोकीयो व्याख्यास्यते ।

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३१२ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ वृत्त्युपायाः

यित्वा (?) तूष्णीमेव गोदोहनकालमात्र तिष्ठेत् । एतस्मादेव लिङ्गादेतस्या वृत्तेरसन्दर्शनोति संज्ञान्तरमाचक्षते ॥ ६ ॥

वृत्तेर्वृत्तरवार्तायां तयव तस्य ध्रुवं वर्तनाद् ध्रुवेति परिकीर्तिता ॥ ७ ॥

**अनु०—**भिन्न-भिन्न दूसरी वृत्तियों से यदि जीविका निर्वाह न हो तो उसी एक (भिक्षा) वृत्ति से निरन्तर जीवन निर्वाह करने के कारण उसे ध्रुवा वृत्ति कहते हैं ॥ ७ ॥

वृत्तेर्वृत्तेरिति वीप्सादर्शनात् अवार्त्तायामित्यध्याहार्यम् । वृत्त्यवार्ताशब्दौ द्रव्यलाभालाभबवचनौ । प्रथमो वृत्तिशब्दः प्राणयात्रामात्रप्रसिद्ध्यर्थद्रव्यार्जन-वचनः । तयैव भिक्षया वर्तेत । ध्रुवमित्याद्युपसंहारः । ध्रुवं निश्चयेन ॥ ७ ॥

किंलक्षणा सम्प्रक्षालनोत्यत आह—

सम्प्रक्षालनीति । उत्पन्नानामोषधीनां प्रक्षेपणं निक्षेपणं नास्ति निचयो वा भाजनानि सम्प्रक्षालय न्युब्जतीति सम्प्रक्षालनी ॥ ८ ॥

**अनु०—**संप्रक्षालनी नाम की वृत्ति इस प्रकार होती है। उत्पन्न होने योग्य व्रीहि इत्यादि बीजों के बोने का कार्य, या प्राप्त ओषधियों अन्नादि के नष्ट करने के प्रयोजन से फेंकने अथवा संचय करने का कार्य जिस वृत्ति में नहीं होता और जिस वृत्ति में बरतनों को धोकर उलटा रख दिया जाता है उसे सम्प्रक्षालनी वृत्ति कहते हैं ॥ ८ ॥

उपपन्नानामुत्पादयितुमङ्कुरीकर्तुं योग्यानां बीजानामित्यर्थः । ओषधीनां व्रीह्यादिबीजानां प्रक्षेपणं बीजावापनम् । यद्वा पूर्वमेवोत्पन्नानां यात्रामात्रप्र-सिद्ध्यर्थमर्जितानामित्यर्थः । नास्तीत्येतत्काकाक्षिवत् प्रक्षेपणनिक्षेपणनिचयेषु सम्बध्यते । निक्षेपणं निक्षेपः । पात्र्यां भोजनवेलायाम् , निचयस्सञ्चयः; आमे पक्वे च सञ्चयो न कर्तव्य इत्यर्थः । किं तर्हि कुर्यात् ? अहरेव भाज-नानि सम्प्रक्षाल्य न्युब्जति न्यञ्चं करोति सैषा सम्प्रक्षालनी वृत्तिः ॥ ८ ॥

समूहा नाम पञ्चमी । सा कीदृशोत्याह—

समूहेति । अवारितस्थानेषु पथिषु वा क्षेत्रेषु वाऽप्रहितावकाशेषु वा यत्र यत्रौषधयो विद्यन्ते तत्र तत्र समूहन्या समूह्य ताभिर्वर्तयतीति समूहा ॥ ९ ॥

**अनु०—**समूहा नाम की वृत्ति इस प्रकार होती है । जिन स्थानों पर जाना निषिद्ध नहीं है, मार्ग में या खेत में जहां प्रवेश का मार्ग घिरा न हो जहां ओषधियां वृक्षादि हों उन स्थानों पर झाडू से बुहार कर जो अन्नादि उपलब्ध हों उन्हीं से जीविका निर्वाह करना समूहा वृत्ति है ॥ ९ ॥

द्वितीयः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ३१३

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द्वितीयः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ३१३

अवारितस्थानान्यनिषिद्धानि। अप्रतिहतावकाशाः वृत्तिशून्या देशाः। समूहनी सम्मार्जनी ॥ ९॥

पालनीत्यहिंसिकेत्येवेदमुक्तं भवति। तुषविहीनांस्तण्डुलानिच्छति सज्जनेभ्यो बीजानि वा पालयतीति पालनी ॥ १० ॥

अनु०—पालनी नाम की वृत्ति, जिसे अहिंसिका वृत्ति भी कहते हैं इस प्रकार की होती है। सज्जनों से बिना छिलके के चावलों को या बीजों को प्राप्त करने की इच्छा करे और उन्हीं से अपना पालन करे तो पालनी वृत्ति कहलाती है ॥ १० ॥

सज्जनेभ्यो विद्वद्भ्यः। पालयति प्रयच्छति तस्मात्तंडुलानेव स्वयं गृह्णीयात्। तुषविहीनग्रहणं तुषाणामप्यसंग्रहणार्थम्। तेषु मिश्रणसम्भावना यतः ॥ ० ॥

सिलोञ्छा पुनः—

सिलोञ्छेति। अवारितस्थानेषु पथिषु वा क्षेत्रेषु वाऽप्रतिहतावकाशेषु वा यत्रयत्रौषधयो विद्यन्ते तत्रतत्रैकैकं कणिशमुञ्छयित्वा काले-काले सिलैर्वर्तयतीति सिलोञ्छा ॥ ११ ॥

अनु०—सिलोञ्छा वृत्ति इस प्रकार है। जिन स्थानों पर जाना निषिद्ध नहीं है, ऐसे मार्ग में या खेतों में या जहाँ प्रवेश का मार्ग अवरुद्ध नहीं है ऐसे स्थानों पर, जहाँ ओषधियाँ ( अन्न, वृक्षादि ) हों वहाँ एक-एक कण समय-समय पर एकत्र कर उसी के भक्षण से जीवन निर्वाह करना सिलोञ्छा वृत्ति है ॥ ११ ॥

कणिशो धान्यस्तम्बः। उञ्छनं उत्पाटनम्। उञ्छनकालः वीप्सया सम्बध्यते। 'सर्वावश्यककालः उञ्छनकालः। सिलाः ग्रासविशेषाः। यावद्भिरात्मयात्रा भवतीति। शेषं पूर्ववत् ॥ ११ ॥

कापोताऽष्टमी, सेदानीमुच्यते—

कापोतेति। अवारितस्थानेषु पथिषु क्षेत्रेषु वाऽप्रतिहतावकाशेषु वा यत्र यत्रौषधयो विद्यन्ते तत्र तत्राऽङ्गुलिभ्यामेकैकामोषधिमुञ्छयित्वा सन्दर्शनात् कपोतवदिति कापोता ॥ १२ ॥

अनु०—कापोता वृत्ति इस प्रकार होती है। उन स्थानों में जहाँ जाना निषिद्ध नहीं है, मार्गों में या खेतों में या जिन स्थानों पर प्रवेश का मार्ग अवरुद्ध नहीं है, उन स्थानों पर जो ओषधियाँ विद्यमान हों, उनमें दो अंगुलियों से केवल एक-एक ओषधि

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३१४ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ वृत्त्युपायाः

( अन्न या फल ) ग्रहण कर कपोत के समान जीविका निर्वाह के कारण कापोता-वृत्ति होती है ॥ १२ ॥

संदर्शनादात्मनः प्रकटीकरणात् । संदंशनादिति पाठे खादनादित्यर्थः । तद्यथा कपोतो द्वाभ्यां चञ्चुभ्यां एकस्थान्यव्यक्तं गृहीत्वा पतति एवं कापोतामास्थाय वर्तते ॥ १२ ॥

सिद्धेच्छेच्छा तर्हि वक्तव्या—

सिद्धेच्छेति । वृत्तिभिश्चान्तो वृद्धत्वाद्धातुक्षयाद्वा सज्जनेभ्यः सिद्धमन्नमिच्छतीति सिद्धेच्छा ॥ १३ ॥

**अनु०—**सिद्धेच्छा वृत्ति इस प्रकार है । यदि अन्य वृत्तियों से थक कर वृद्ध होने के कारण या दुर्बल होने के कारण सज्जनों के घर से पके-पकाये अन्न को प्राप्त कर जीवन निर्वाह करता है तो वह सिद्धेच्छा वृत्ति है ॥ १३ ॥

पूर्वोक्ताभिर्वृत्तिभिः । श्रान्तः परिक्षीणः । वृद्धता वयसा, धातुक्षयेण रोगेण । सिद्धं पक्वान्नम् ॥ १३ ॥

तस्याऽऽत्मसमारोपणं विद्यते संन्यासिवदुपचारः पवित्रकाषायवासोवर्जम् ॥ १४ ॥

**अनु०—**यदि सिद्धेच्छा वृत्ति ग्रहण करता है तो सभी यज्ञाग्नियों को अपने में समारोपित करे और संन्यासी के समान आचरण करे, किन्तु पवित्र का प्रयोग न करे तथा गेरुआ वस्त्र भी न धारण करे ॥ १४ ॥

तस्य सिद्धेच्छावृत्तेरपरो नियमः—अग्नीनामात्मनि समारोपणं परिव्राजकधर्माणामनुष्ठानं च । किं सर्वेषाम् । नेत्याह--जलपवित्रं पक्षपवित्रं काषायवासश्च वर्ज्यम् ॥ १४ ॥

अथ वान्या वृत्तिः—

वान्याऽपि वृक्षलतावल्ल्योषधीनां च तृणौषधीनां च श्यामाकजर्तिलादीनां वान्याभिर्वर्तयतीति वान्या ॥ १५ ॥

**अनु०—**यदि वृक्षों और लताओं से उत्पन्न फलों को, तृणों से उत्पन्न वस्तुओं को, श्यामाक, तिल आदि जंगली अन्न को खाकर जीविका निर्वाह करे तो वह वान्या वृत्ति कहलाती है ॥ १५ ॥

वृक्षलतासूत्पादिता वल्लीगुल्मलतासु च । ओषध्यः फलपाकान्ताः यद्वा--द्विविधा ओषध्यः वल्ल्योषध्यः तृणौषध्यश्च । यासां वल्लीभ्य एव धान्यं गृह्यते

तृतीयः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने तृतीयोऽध्यायः ३१५

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तृतीयः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने तृतीयोऽध्यायः ३१५

ता वल्ल्योषध्यः। ताश्च कुलुत्थाद्याः। तृणौषध्यस्तु—‘तस्मादुपरिष्टादोषधयः फलं गृह्णन्ति’ इत्यत्र या उक्ताः, ताश्च व्रीह्याद्याः। अत्र पुनरेवंलक्षणा एवाऽऽरण्या गृह्यन्ते। अत एव श्यामाकजर्तिलादीनामित्युदाहृतम्। आदिग्रहणं सप्तानामपि सङ्ग्रहार्थम्। एवं चोपसंहारोऽप्युपपन्नो भवति—‘‘वन्याभिर्वर्तयेतेति वान्ये’’ति। षष्ठी सम्बन्धमात्रलक्षणा। वृक्षादीनां फलैरिति शेषः ॥ १५ ॥

अथाऽप्युदाहरन्ति —
मृगैस्सह परिस्पन्दः संवासस्तैभिरेव च। तैरेव सदृशी वृत्तिः प्रत्यक्षं स्वर्गलक्षणं प्रत्यक्षं स्वर्गलक्षणमिति ॥ १६ ॥

इति तृतीयप्रश्ने द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥

अनु०— इस सम्बन्ध में निम्नलिखित भी उद्धृत करते हैं—
पशुओं के साथ विचरण करना और उन्हीं के साथ निवास करना, और पशुओं के समान ही जीविका निर्वाह करना स्वर्ग प्राप्ति का प्रत्यक्ष लक्षण है ॥ १६ ॥

उत्क्षेपणावक्षेपणाकुञ्चनप्रसारणानीति परिस्पन्दः। चलनात्मिका क्रियेति यावत्। तैभिरिति ऐसो ^१लोपश्छान्दसः। मृगसदृशवृत्तित्वमस्य स्वयंविशीर्णफलादिभक्षणाद्भवत्यामद्रव्यभक्षणाच्च ॥ १६ ॥

इति श्रीगोविन्दस्वामिकृते बौधायनधर्मविवरणे तृतीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः।


तृतीयप्रश्ने तृतीयोऽध्यायः

तृतीयः खण्डः

उक्ता नव वृत्तयो गृहस्थस्य;
अथ वानप्रस्थस्य द्वैविध्यम् ॥ १ ॥

अनु०— वानप्रस्थों के दो वर्ग होते हैं (जिनका विवेचन यहाँ किया जायगा) ॥ १ ॥

वक्ष्यत इति शेषः। तच्च वृत्तिविशेषकृतम् ॥ १ ॥

तदाह—
पचमानका अपचमानकाश्चेति ॥ २ ॥


^१. ऐसोऽप्रवृत्तिश्छान्दसीति सुवचम्।

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३१६ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ वानप्रस्थभेदाः

**अनु०—**अग्नि पर भोजन पकाने वाले पचमानक, तथा भोजन न पकानेवाले अपचमानक ॥ २ ॥

अग्निपक्वाशिनः अनग्निपक्वाशिनश्चेति सूत्रार्थः ॥ २ ॥

अत्राऽप्याह—

तत्र पचमानकाः पञ्चविधाः—सर्वारण्यका वैतुषिकाः कन्दमूलभक्षाः फलभक्षाश्शाकभक्षाश्चेति ॥ ३ ॥

**अनु०—**इनमें भी पचमानक अर्थात् अग्नि पर अपना भोजन पकाने वाले वानप्रस्थ पाँच प्रकार के होते हैं (१) सर्वारण्यक अर्थात् वन की सभी प्रकार की खाद्य वस्तुओं का भक्षण करने वाले, (२) वैतुषिक जो बिना कूटे गये जंगली अन्न को खाकर जीवन निर्वाह करते हैं, (३) कन्द-मूल का भक्षण करने वाले (४) फलाहारी तथा (५) वन के शाक मात्र का भक्षण कर जीवन निर्वाह करने वाले ॥३॥

एते पचमानकप्रभेदाः ॥ ३ ॥

तत्र सर्वारण्यका नाम द्विविधाः द्विविधमारण्यमाश्रयन्तः—इन्द्रावसिक्ता रेतोवसिक्ताश्चेति ॥ ४ ॥

**अनु०—**इनमें भी वन'की सभी खाद्य वस्तुओं का आहार करने वाले सर्वारण्यक भी दो प्रकार के होते हैं और ये वन की दो प्रकार की वस्तुओं के भक्षण से वृत्ति चलाते हैं—इन्द्र द्वारा उत्पन्न वस्तुओं के भक्षण से (अर्थात् वर्षा से उत्पन्न वस्तुओं के भक्षण से) तथा वीर्य से उत्पन्न जीवों के भक्षण से (अर्थात् मृगादि पशुओं का मांस भक्षण कर) ॥ ४ ॥

अरण्ये भवमारण्यं तच्च द्विविधं—वल्ल्यादयो मृगादयश्च । तत्र वल्ल्यादिभक्षा इन्द्रावसिक्ताः , इन्द्रेण देवेन पर्जन्यरूपिणा वृष्ट्या सिक्ताः वर्धिताः वल्ल्यादयः । तद्भक्षणादिन्द्रावसिक्ताः । उक्तं चाऽऽचार्येण—'अथाऽस्य कर्मणस्सानुप्रदानं पितृवधो या च का च वलिप्रकृतिरिन्द्रकर्मैव तत्' इति । तथा रेतोऽवसिक्ताः मृगमांसाशिनः रेतसा हि हेतुभूतेनाऽवसिक्तानि मांसानि, तदाश्रयात् । सर्वारण्यकानां च द्वैविध्यम् ॥ ४ ॥

तदिदानीं प्रपञ्चयति--

तत्रेन्द्रावसिक्ता नाम वल्लीगुल्मलतावृक्षाणामानयित्वा श्रपयित्वा सायं प्रातरग्निहोत्रं हुत्वा यत्यतिथिव्रतिभ्यश्च दत्त्वाऽथेतरच्छेषभक्षाः ॥ ५ ॥

तृतीयः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने तृतीयोऽध्यायः ३१७

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तृतीयः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने तृतीयोऽध्यायः ३१७

अनु०—इन दो प्रकार की वस्तुओं में भी जो पदार्थ इन्द्र अर्थात् वृष्टि द्वारा उत्पन्न की गयी हैं वे हैं वृक्षों, लताओं, झाड़ियों के फल । इन फलों को लाकर पकावे, सायंकाल तथा प्रातः काल अग्निहोत्र हवन करें, भिक्षुकों, अतिथियों और ब्रह्मचारियों को देकर शेष अंश का भक्षण करे ॥ ५ ॥

भवेयुरित्यध्याहार्यम् । वल्लद्यादीनां फलानि आनयित्वा आनीय । यतयो भिक्षुकाः । अतिथयः प्रसिद्धाः । व्रतिनो ब्रह्मचारिणः । वल्लयादिफलानामग्निहोत्रद्रव्यत्वेन विधानात् नित्यानां पयआदिद्रव्याणां निवृत्तिः । इतरद्भक्षाः शेषभक्षाश्चेति विग्रहः । इतरद्भक्षा इति सिद्धे शेषभक्षा इति वचनं अग्निहोत्रशेषे यात्रानिर्यार्तितशेषे च वैश्वदेवप्राप्त्यर्थम् । इतरदपि शेषं कृत्वा भक्षयेदित्यर्थः ॥ ५ ॥

अथेतरानाह—

रेतोवसिक्ता नाम मांस ¹व्याघ्रवृकश्येनादिभिरन्यतमेन वा हतमानयित्वा श्रपयित्वा सायं प्रातरग्निहोत्रं हुत्वा यत्यतिथिभ्यश्च दत्त्वाऽथेतरच्छेषभक्षाः ॥ ६ ॥

अनु०—वीर्य से उत्पन्न हुआ (पशुओं का ) मांस होता है । बाघ, भेड़िया, बाज आदि शिकार करने वाले जानवरों या पक्षियों द्वारा मारे गये पशु-पक्षी को लाकर उसका मांस पकावे, सायं तथा प्रातः काल अग्निहोत्र हवन करने, भिक्षुकों, अतिथियों तथा ब्रह्मचारियों को देने के बाद शेष मांस का भक्षण करे ॥ ६ ॥

अस्याऽपि पूर्वैव व्याख्या ॥ ६ ॥

अथ पचमानकानां द्वितीयानाह—

वैतुषिकास्तुषधान्यवर्जं तण्डुलान्रानयित्वा श्रपयित्वा सायं प्रातरग्निहोत्रं हुत्वा यत्यतिथिव्रतिभ्यश्च दत्त्वाऽथेतरच्छेषभक्षाः ॥ ७ ॥

अनु०—जो छिलका निकाले बिना ही जंगली अन्न का भक्षण करते हैं वे तुषधान्य को छोड़कर चावल मंगाकर उसे पकावें, सायंकाल तथा प्रातःकाल अग्निहोत्र होम कर, भिक्षुओं, अतिथियों और ब्रह्मचारियों को अंश देकर बचे हुए अन्न का भक्षण करें ॥ ७ ॥

तुषधान्यवर्जद्रव्याहरणस्य प्रयोजनं तत्स्वीकारोऽपि कथं नु नाम स्यादिति ॥ ७ ॥


१. मृगव्याघ्रेति क्वचित् पाठः ।

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३१८बौधायन-धर्मसूत्रम्[ वानप्रस्थभेदाः

अथेतरान् त्रीन् समुच्चित्यऽऽह—
कन्दमूलफलशाकभक्षाणामप्येवमेव ॥ ८ ॥
अनु०— जो कन्द, मूल या शाक का भक्षण करते हैं वे भी इसी प्रकार करें॥८॥
एवमिति आनयित्वेत्यादीति शेषः॥ ८ ॥

इदानीमपचमानप्रकारभेदविधित्सयाऽऽह—
पञ्चैवाऽपचमानकाः—उन्मज्जकाः प्रवृत्ताशिनो मुखेनादायिनस्तोयाहारा वायुभक्षाश्चेति ॥ ९ ॥
अनु०— अपचमानक अर्थात् पकाकर न खाने वालों के भी पांच ही वर्ग हैं— उन्मज्जक, प्रवृत्ताशिन्, मुखेनादायिन्, तोयाहार और वायुभक्ष ॥ ९ ॥
एते भेदाः ॥ १ ॥

तेषां परस्परवैलक्षण्यं प्रतिपादयन्नाह—
तत्रोन्मज्जका नाम लोहाश्मकरणवर्जम् ॥
अनु०— इनमें उन्मज्जक वे हैं जो लोहे और पत्थर के उपकरणों का प्रयोग न करते हुए अपना भोजन तैयार करते हैं ॥ १० ॥
लोहकरणं दर्व्यादि। अश्मकरणमप्येवमाकृतिकमेव किञ्चित् । काष्ठान्येव करणमादाय इत्यर्थः ॥ १० ॥

हस्तेनाऽऽदाय प्रवृत्ताशिनः ॥ ११ ॥
अनु०— प्रवृत्ताशिन् हाथ में ही लेकर भक्षण करते हैं ॥ ११ ॥
भक्षयन्तीति वाक्यसमाप्तिः ॥ ११ ॥

मुखेनाऽऽदायिनो मुखेनाऽऽददते ॥ १२ ॥
अनु०— मुखेनादायिन् (पशुओं की तरह) मुख से ही लेकर भक्षण करते हैं ॥ १२ ॥
पशुवदित्यभिप्रायः ॥ १२ ॥

तोयाहाराः केवलं तोयाहाराः ॥ १३ ॥
अनु०— तोयाहार केवल जल पीकर ही रहते हैं ॥ १३ ॥
केवलशब्दादुपदंशादिस्थानेऽपि तोयस्यैव प्रवेशः कर्त्तव्यः ॥ १३ ॥

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[ तृतीयः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने तृतीयोऽध्यायः ३१९

वायुभक्षा निराहाराश्च ॥ १४ ॥ वैखानसानां विहिता दश दीक्षाः ॥ १५ ॥ यथाशास्त्रमभ्युपेत्यं दण्डं च मौनं चाऽप्रमादं च ॥ १६ ॥ वैखानसाश्शुद्ध्यन्ति निराहाराश्चेति ॥ १७ ॥

अनु०—वायुभक्ष किसी प्रकार का भोजन नहीं करते ॥ १४ ॥
अनु०—इस प्रकार वैखानसों के लिए दस प्रकार की दीक्षा होती है ॥ १५ ॥
अनु०—जो संन्यासी शास्त्रों के अनुसार नियमों का पालन कर रहा है वह दण्ड धारण करे, मौन रहे और प्रमाद (बिना सोचे-विचारे कोई कार्य) न करे ॥१६॥
अनु०--विखनस् के अनुसार नियमों का पालन करने वाले संन्यासी तथा आहार न करने वाले शुद्ध होते हैं अर्थात् उनके पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ १७ ॥

वायुभक्षा इत्येतावदेवोच्यमाने वाङमुखादायिवत् द्वयोः कारणताशङ्काऽपि स्यादिति मत्वा निराहाराश्चेत्युक्तम् । मुखेनादायिप्रभृतीनां त्रयाणां संज्ञासिद्धिमपि सन्देहनिवृत्त्यर्थं वृत्तिविवरणमाचार्येण कृतम् । वानप्रस्थसंन्यासभेदः किमर्थमाचार्यकृत इति । असावेव द्रष्टव्यः । यद्वा—उक्तव्यतिरिक्तवृत्तिनिषेधार्थम् ॥ १४-१७ ॥

एवं भेदेषूक्तेष्विदानी सर्वेषां संहत्याऽऽह—

शास्त्रपरिग्रहस्सर्वेषां ब्रह्मवैखानसानाम् ॥ १८ ॥

अनु०—सभी ब्राह्मण वैखानसों के लिए (या ब्रह्मवैखानसों के लिए) शास्त्र के अनुसार निम्नलिखित नियम होते हैं ॥ १८ ॥

वक्ष्यत इति शेषः । ब्रह्मणा दृष्टाः वैखानसाः ब्रह्मवैखानसाः । यद्वा—ब्राह्मणास्सन्त इति ॥ १८ ॥

तत्र प्रथमं तावत्—

न द्रुह्येद् दंशमशकान् हिमवान् तापसो भवेत् ।
वनप्रतिष्ठस्सन्तुष्टश्चीरचर्मजलप्रियः ॥ १९ ॥

अनु०—दंश और मच्छर जैसे क्षुद्र प्राणियों को भी हानि न पहुँचाये शीत सहन करने की क्षमता रखे । तपस्या में लगा रहे । वन में निवास करे । सन्तुष्ट रहे । वृक्षों की छाल तथा चर्म को ही वस्त्र के रूप में धारण करने में रुचि रखे॥१९॥

दंशादिकानामपि हिंसां नाऽऽचरेत् । द्रुहः जिघांसायां वर्तते । हिमवान् शीतसहिष्णुः । तद्ग्रहणं घर्मस्याऽप्युपलक्षणार्थम् । आह च—

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३२०बौधायन-धर्मसूत्रम्[ वानप्रस्थधर्माः

ग्रीष्मे पञ्चतपाश्च स्याद्वर्षास्वभ्रावकाशकः ।
आर्द्रवासास्तु हेमन्ते क्रमशो वर्धयंस्तपः ॥ इति ॥
वनप्रतिष्ठः ग्रामप्रवेशवर्जः । सन्तुष्टो वितृष्णः । चीरचर्मप्रियः तद्वसनः ।
जलप्रियः कमण्डलुधारी । ऋज्वन्वयद् ॥ १९ ॥

अतिथीन् पूजयेत्पूर्वं काले त्वाश्रममागतान् ।
देवविप्राग्निहोत्रे च युक्तस्तपसि तापसः ॥ २० ॥

**अनु०—**तपस्वी पहले भोजन काल में आश्रम में आये हुए अतिथियों का सत्कार करे। देव, विप्र की पूजा में तथा अग्निहोत्र कर्म एवं तपस्या में लगा रहे ॥ २० ॥

युक्तशब्दः काकाक्षिनिरीक्षणवत् उभयत्र सम्बध्यते देवविप्रपूजायामग्निहोत्रे तपसि च युक्तः स्यादित्यर्थः ॥ २० ॥

कृच्छ्रां वृत्तिमसंहार्थां सामान्यां मृगपक्षिभिः ।
तदहर्जनसम्भारं कषायकटुकाश्रयाम् ॥ २१ । ।
परिगृह्य शुभां वृत्तिमेतां दुर्जनवर्जिताम् ।
वनवासमुपाश्रित्य ब्राह्मणो नाऽऽवसीदति ॥ २२ ॥

**अनु०—**जो कठिन और दुर्भर है तथा पशु-पक्षियों की ऐसी जीवनवृत्ति के समान है, जिस वृत्ति में केवल एक दिन के लिए वस्तुओं का संचय किया जाता है, और कषाय तथा कटु रस वाली वस्तुओं का ही भक्षण किया जाता है, जो दुर्जनों के संग से दूर रखने वाली कल्याण देने वाली उत्तम वृत्ति है उसे स्वीकार कर वनवास करने वाला ब्राह्मण कभी दुःख नहीं पाता है ॥ २१–२२ ॥

कृच्छ्रां दुःखाम् । असंहार्थां दुर्भराम् । मृगपक्षिसाहश्यान्मव्यापदम् तदहर्जीविका जना वैखानसाः । तत्सम्भारास्सम्भार्था आर्जनीयाः वैखानससकाशादेवाऽश्वस्तनिकधनमार्जयेदित्यर्थः । तदहर्जनसम्भारेति 'सुपां सुपा' इति समासः । कषायं चित्तमलम् । कटुकं वाचिकं मलं अप्रियभाषणम् ; न तदाश्रयः विपरीतलक्षणेपा । एषैव शुभा दुर्जनवर्जिता च वृत्तिः । दुर्जनाः नास्तिकाः ॥ २१, २२ ॥

मृगैस्सह परिस्पन्दः संवासस्तेभिरेव च ।
तैरेव सदृशी वृत्तिः प्रत्यक्षं स्वर्गलक्षणम् ॥
प्रत्यक्षं स्वर्गलक्षणमिति ॥ २३ ॥
इति तृतीयप्रश्ने तृतीयः खण्डः ॥

चतुर्थः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने चतुर्थोऽध्यायः ३२१

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चतुर्थः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने चतुर्थोऽध्यायः ३२१

अनु०—पशुओं के साथ विचरण करना, उन्हीं के साथ निवास करना, उन्हीं के समान जीवन वृत्ति का आश्रय लेना स्वर्ग का प्रत्यक्ष लक्षण होता है ॥ २३ ॥

फलार्थवादोऽयम् ॥

इति तृतीयप्रश्ने तृतीयः खण्डः तृतीयोऽध्यायश्च ।


तृतीयप्रश्ने चतुर्थोऽध्यायः

चतुर्थः खण्डः

उक्तं च ब्रह्मचर्यम् —

अथ यदि ब्रह्मचार्यव्रत्यमिव चरेत् ॥ १ ॥

अनु०—यदि ब्रह्मचारी अपने व्रत के विरुद्ध कोई कार्य करता है तो उसके संबन्ध में नियम यहाँ बताया जायगा ॥ १ ॥

व्रतं नियमस्तस्मै हितं व्रत्यं तदभावोऽव्रत्यम् । ब्रह्मचारिग्रहणं प्रदर्शनार्थम् । यस्य यस्मिन् काले ब्रह्मचर्यं चोदितमपि गृहस्थस्य भिक्षावर्जमस्याऽऽश्रमिणो वक्ष्यमाणे कर्मण्यधिकारः ॥ १ ॥

किं किं पुनरव्रत्यमित्याह—

मांसमश्नीयात् स्त्रियं वोपेयात् सर्वास्वेवाऽऽर्त्तिषु ॥ २ ॥

अनु०—यदि ब्रह्मचारी मांस भक्षण कर लेता है, स्त्री से संभोग कर लेता है, अथवा सभी प्रकार के व्रत भंग के समय निम्नलिखित कर्म करे ॥ २ ॥

अव्रत्यानि परिभाषायां प्रपञ्चितानि—'अथोपनीतस्याऽव्रत्यानि भवन्ति नाऽन्यस्योच्छिष्टं भुञ्जीत' इत्यादि । अत्र तेषां दिङ्मात्रं प्रदर्शितम् । तत्र हि पुनरुपनयनं नैमित्तिकत्वेन विहितम् । इह तु होमः । अनयोश्शक्तिबुद्धिपूर्वव्यपेक्षया विकल्पसमुच्चयौ द्रष्टव्यौ । सर्वास्वेवार्तिषु प्रदेशेषु ॥ २ ॥

अन्तराजगारेऽग्निमुपसमाधाय सम्परिस्तीर्याऽऽग्निमुखात् कृत्वाऽथाज्याहुतीरुपजुहोति ॥ ३ ॥

अनु०—घर के भीतर अग्नि के ऊपर समिध् रखकर उसका उपसमाधान करे; उसके चारो ओर कुश घास फैलावे, अग्निमुख तक की (दर्विहोमिक) क्रियाओं को कर घृत की आहुतियां इन मन्त्रों के साथ करे ॥ ३ ॥

२४ बौ० ध०

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३२२ बौधायन-धर्मसूत्रम् [कृच्छ्रत्रयप्रायश्चित्तम्]

आऽग्निमुखात्कृत्वेति दार्विहोमिकतन्त्रप्राप्त्यर्थम्, उपजुहोतीति श्रवणात्। पक्वहोमानन्तरं वक्ष्यमाणहोमादिः। पक्वहोमाश्च व्याहृतीभिस्सावित्र्या च ॥ ३ ॥

त एते मन्त्राः—

"कामेन कृतं कामः करोति कामायैवेदं सर्वं यो मा कारयति तस्मै स्वाहा। मनसा कृतं मनः करोति मनस एवेदं सर्वं यो मा कारयति तस्मै स्वाहा। रजसा कृतं रजः करोति रजस एवेदं सर्वं यो मा कारयति तस्मै स्वाहा। तमसा कृतं तमः करोति तमस एवेदं सर्वं यो मा कारयति तस्मै स्वाहा। पाप्मना कृतं पाप्मा करोति पाप्मन एवेदं सर्वं यो मा कारयति तस्मै स्वाहा। मन्युना कृतं मन्युः करोति मन्यव एवेदं सर्वं यो मा कारयति तस्मै स्वाहेति" ॥ ४ ॥

अनु०—यह काम ने किया, काम ही यह पाप करता है, यह सभी काम का है जो मुझसे कराता है।···मन ने किया-। राग ने किया···तमस् ने किया-। पापी ने किया···। क्रोध ने किया···॥ ४ ॥

कामेन कृतं न मया। यद्यप्यात्मा कर्मकर्त्ता तथाऽपि कामाधीनमेतद्व्रत्य-चरणमनुष्ठ्यातव्यमित्यभिप्रायः। एवं मनःप्रभृतिष्वपि यथासम्भवं तस्य हेतु-भावो द्रष्टव्यः। कामः रागोऽर्थव्यतिकर।व्यतिकराभिलाषः। मन्युः क्रोधः तद्धि-घातकृत्सु। तावेवाऽविहिताकरणप्रतिषिद्धसेवनयोर्निदानम्। तत्सहकारिणि मनोरजस्तमांसि। पाप्मा कर्तुः पापम्। तदप्यनेकजन्मोपार्जितं कारणमेव॥४॥

जयप्रभृति सिद्धमा धेनुवरप्रदानात् ॥ ५ ॥

अनु०—जय से लेकर अन्त में दक्षिणार्थ गौ के दान तक की क्रियाएं ज्ञात ही हैं॥ ५ ॥

इदमपि तन्त्रप्राप्तिद्योतकमेव ॥ ५ ॥

अपरेणाऽग्निं कृष्णाजिनेन प्राचीनग्रीवेणोत्तरलोम्ना प्रावृत्य वसति ॥ ६ ॥

अनु०—इसके अनन्तर अग्नि के पश्चिम की ओर काले मृग के चर्म से शरीर को इस प्रकार ढक कर बैठा रहे कि मृगचर्म की ग्रीवा पूर्व की ओर हो और उसके रोएं ऊपर की ओर हों॥ ६ ॥

अपरेणाऽग्निमग्नेः पश्चिमदेशे ऋज्वन्वयत्, रात्राविति शेषः॥ ६ ॥

पञ्चमः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ३२३

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पञ्चमः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ३२३

अथ व्युष्टायां जघनार्धादात्मानमपकृष्य तीर्थं गत्वा प्रसिद्धं स्नात्वाऽन्तर्जलगतोऽघमर्षणेन षोडश प्राणायामान् धारयित्वा प्रसिद्धमादित्योपस्थानात् कृत्वाऽऽचार्यस्य गृहानेति ॥ ७ ॥

अनु०— दिन के उगने पर नाभि से नीचे तकके शरीर के भाग को निकाल कर किसी जलाशय पर जाकर वहाँ ज्ञात विधि से स्नान करे और जल के भीतर स्थित होते हुए ही अघमर्षण मन्त्र से सोलह प्राणायाम करे और सूर्य की पूजा तक की प्रसिद्ध क्रियाएं करे और तब अपने आचार्य के घर जाय ॥ ७ ॥

टि०— गोविन्द स्वामी के अनुसार उपयुक्त कर्म एक नये जन्म का प्रतीक होता है । ब्रह्मचारी ही अन्त में आचार्य के घर जाय, गृहस्थ अपने घर ही रहे ।

व्युष्टायां उषस्समये जघनार्धात् आत्मसम्बन्धिनो नाभेरधोभागात् पुनर्ज-ननमिति निर्वृत्य (?) तीर्थं नदीदेवखातादिपुण्यजलाशयः । प्रसिद्धमिति पूर्वोक्तस्नानविधिनाऽऽदित्योपस्थानपर्यन्तं करोति । अयं विशेषः—अघमर्षणमन्त्रेण षोडश प्राणायामाः । ब्रह्मचारी चेदाचार्यस्य गृहानेति । गृहस्थस्तु गृहान् ॥ ७ ॥

अथाऽस्य प्रशंसा—

यथाऽश्वमेधावभृथमेवैतद्विजानीयादिति ॥ ८ ॥

अनु०— यह क्रिया उसी प्रकार की होती है जिस प्रकार अश्वमेध यज्ञ के अन्त में अवभृथ स्नान की क्रिया होती है ॥ ८ ॥

इति तृतीयप्रश्ने चतुर्थः खण्डोऽध्यायश्च ।


तृतीयप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः

पञ्चमः खण्डः

पापनिर्हरणप्रसङ्गादघमर्षणप्रसङ्गाद्वेदमन्यदारभते—

अथाऽतः पवित्रातिपवित्रस्याऽघमर्षणस्य कल्पं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

अनु०— अब हम यहाँ से पवित्र से भी पवित्रतम अघमर्षण सूक्त के प्रयोग की व्याख्या करेंगे ॥ १ ॥

पवित्रं पुरुषसूक्तादि । तेषां मध्ये अतिपवित्रमघमर्षणं सूक्तं तस्य कल्पः प्रयोगः ॥ १ ॥

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३२४ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ अघमर्षणकल्पः

तीर्थं गत्वा स्नातः शुचिवासा उदकान्ते स्थण्डिलमुद्धृत्य सकृ-
त्क्लिन्नेन वाससा सकृत्पूर्णेन पाणिनाऽऽदित्याभिमुखोऽघमर्षणं स्वा-
ध्यायमध्येयीत ॥ २ ॥

**अनु०—**स्नान करने योग्य जलाशय में जाकर स्नान करे और शुद्ध वस्त्र पहन कर जल के किनारे मिट्टी निकालकर (सूर्य के आकार में मिट्टी का बनाकर) एक बार भिगोये गये वस्त्र से और एक बार जल से हाथ को भरकर स्वाध्याय के ढंग से सूर्य की ओर मुख कर अघमर्षण सूक्त का पाठ करे ॥ २ ॥

शुचिवासा इत्यस्योपसंहारः—सकृत्क्लिन्नेति । सकृत्प्रक्षालितमिति यावत् । इत्थम्भूतलक्षणे तृतीया । स्थण्डिलमादित्यमण्डलाकारम् । पूर्णेनेति इयमपोत्थम्भूतलक्षणे तृतीया । सकृदेव पाणिपूरणं न पुनरादानम् । एवमन्यत्राऽपि जपेष्व्वापरिसमाप्तेः सोदकेन पाणिना भवितव्यम् । आदित्याभिमुखवचनात् स्थण्डिलस्य पश्चात्प्राङ्मुखस्तिष्ठन् ॥ २ ॥

प्रातश्शतं मध्याह्ने शतमपराह्णे शतमपरिमितं वा ॥ ३ ॥

**अनु०—**प्रातःकाल सौ बार, मध्याह्न में सौ बार और अपराह्न में अपरिमित संख्या में अघमर्षण सूक्त का पाठ करे ॥ ३ ॥

प्रातश्शतमधीयीत । मध्यन्दिने दक्षिणाभिमुख उदङ्मुखो वा । अपराह्णे प्रत्यङ्मुखः । अपरिमितमपराह्नेनैव सम्बध्यते ॥ ३ ॥

उदितेषु नक्षत्रेषु प्रसृतयावकं प्राश्नीयात् ॥ ४ ॥

**अनु०—**नक्षत्रों के उग जाने पर एक मुट्ठी जौ से बने अन्न में से (वैश्वदेव बलि आदि करके) भक्षण करे ॥ ४ ॥

प्रसृतयावकस्वरूपमुपरितनेऽध्याये वक्ष्यति । तत्राऽस्यैव वैश्वदेवबलिहरणादि कर्तव्यम् । 'यदशनीयस्य' इति प्राप्तेऽपि उत्तरत्र निषेधात् ॥ ४ ॥

ज्ञानकृतेभ्योऽज्ञानकृतेभ्यश्चोपपातकेभ्यः सप्तरात्रात् प्रमुच्यते ॥ ५ ॥

**अनु०—**इस प्रकार सात रात्रियों में जान बूझकर किये गये और अनजान में किये गये उपपातकों से मुक्त हो जाता है ॥ ५ ॥

एवमेव सप्तरात्रे कृते गोवधादिभ्यो विमुच्यत इत्यर्थः ॥ ५ ॥

द्वादशरात्राद् भ्रूणहननं गुरुतल्पगमनं सुवर्णस्तैन्यं सुरापानमिति च वर्जयित्वा ॥ ६ ॥

पञ्चमः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ३२५

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पञ्चमः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ३२५

अनु०—बारह रात्रियों में विद्वान् ब्राह्मण की हत्या, गुरुपत्नीगमन, सुवर्ण की चोरी और सुरापान के पापों को छोड़कर शेष सभी दुष्कर्मों के पाप से मुक्ति मिल-जाती है ॥ ६ ॥

ब्रह्महत्यादीनि महापातकानि वर्जयित्वा अन्येभ्यः पापेभ्यः प्रमुच्यत इति शेषः ॥ ६ ॥

एकविंशतिरात्रात्तान्यपि तरति तान्यपि जयति ॥ ७ ॥

अनु०—इक्कीस रात्रियों में उन महापातकों को भी पार कर लेता है और उन्हें भी जीत लेता है ॥ ७ ॥

तानि पूर्ववर्जितानि महापातकानि । तरणं क्षपणम् । जयः पुण्यफल-योग्यता ॥ ७ ॥

अथ फलार्थवादप्रपञ्चः—
सर्वं तरति सर्वं जयति सर्वक्रतुफलमवाप्नोति सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति सर्वेषु वेदेषु चीर्णव्रतो भवति सर्वैर्देवैर्ज्ञातो भवत्याचक्षुषः पङ्क्तिं पुनाति कर्माणि चाऽस्य सिध्यन्तीति बौधायनः ॥ ८ ॥

अनु०—अघमर्षण सूक्त का इस प्रकार जप करने वाला सबको पार कर जाता है, सबको जीत लेता है, यज्ञ के सभी फलों को प्राप्त कर लेता है। सभी पवित्र तीर्थों में स्नान कर लेता है। सभी वेदों के अध्ययन के लिए विहित व्रत का आचरण कर लेता है। सभी देवता उसे जानने लगते हैं। वह देखने मात्र से ही ब्राह्मणों की पंक्ति को पवित्र कर देता है और उसके सभी कर्म सफल होते हैं। ऐसा बौधायन का उपदेश है ॥ ८ ॥

आचक्षुषः आदृशः पश्यः। बौधायनसंशब्दनादन्यस्तच्छिष्योऽस्य ग्रन्थस्य कर्तेति गम्यते । मनुरब्रवीदितिवत् ॥ ८ ॥

इति तृतीये प्रश्ने पञ्चमः खण्डोऽध्यायश्च ।

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३१६बौधायन-धर्मसूत्रम्[ यावकव्रतम्

तृतीयप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः

षष्ठः खण्डः

प्रसृतयावकप्रसङ्गादिदमाह—

अथ कर्मभिरात्मकृतैर्गुरुमिवाऽऽत्मानं मन्येताऽऽत्मार्थे प्रसृतयावकं श्रपयेदुदितेषु नक्षत्रेषु ॥ १ ॥

**अनु०—**यदि कोई व्यक्ति अपने ही किए हुए कर्मों से (अनुताप के कारण) बोझ जैसा अनुभव करे तो नक्षत्रों के उगने पर अपने लिए एक मुट्ठी जौ का यवागू पकाए ॥ १ ॥

**टि०—**प्रसृतयावक की व्याख्या गोविन्द स्वामी ने 'गोकर्णपरिमितं यावकः यवविकारो यवागूर्वा' किया है ।

कर्मभिर्गर्हितैः गुरुमिव ।ऽजगरगीर्णमिवाऽऽत्मानं मन्यते । पुत्रदारादिकृतैनोन्निवृत्त्यर्थमात्मग्रहणम् । अत एवाऽऽत्मार्थमित्युक्तम् । आत्मार्थे न परार्थे एतस्मादेव लिङ्गादतोऽन्यत्र पापक्षपणे आत्विज्यमस्तीति गम्यते ॥ यद्वा—'नाऽऽत्मार्थं पाचयेत्' इत्यस्य प्रतिप्रसवोऽयम्—प्रसृतयावकमात्मार्थमेव श्रपयेदिति । ततश्च वैश्वदेवातिथिभृत्यादीनां द्रव्यान्तरमन्वेष्टव्यं भवति । सति चैवमुत्तरसूत्रेण प्राप्तस्याऽयमनुवादः 'न ततोऽग्नौ जुहुयात्' इति । प्रसृतं गोकर्णकरपरिमितं यावको यवविकारो यवागूर्वा उदितेषु नक्षत्रेष्विति श्रपणकालः॥१॥

न ततोऽग्नौ जुहुयान्न चाऽत्र बलिकर्म ॥ २ ॥

**अनु०—**उस यावक में से निकालकर अग्नि में हवन न करे और न उससे वैश्वदेव बलि का कर्म करे ॥ २ ॥

'यदंशनीयस्य' इति प्राप्तस्याऽयं प्रतिषेधः पर्युदासो वा ॥ २ ॥

अभृतं श्रप्यमाणं शृतं चाऽभिमन्त्रयेत् ॥ ३ ॥

**अनु०—**जौ पकाने के पहले तथा पकाये जाते समय निम्नलिखित मन्त्र से अभिमन्त्रण करे ॥ ३ ॥

यवानामवघातावस्थायां पाकावस्थायां पक्वावस्थायां चाऽन्वीक्ष्य मन्त्रं ब्रूयादित्यर्थः ॥ ३ ॥

तदाह—

यवोऽसि धान्यराजोऽसि वारुणो मधुसंयुतः ।
निर्णोदस्सर्वपापानां पवित्रमृषिभिस्स्मृतम् ॥ ४ ॥

षष्ठः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः ३२७

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षष्ठः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः ३२७

अनु०—तुम जो हो, तुम सभी अन्नों के राजा हो, तुम वरुण के लिए पवित्र हो और मधु से मिश्रित हो। ऋषियों ने तुम्हें सभी पापों को दूर करने वाला, तथा पवित्रता का कारण बताया है ॥ ४ ॥

धान्यराजत्वं ^१मन्येषु धान्येषु म्लायत्सु मोदमानतयोत्थानात् । वारुणत्वं पुनरेतेषां 'वारुणं यवमयं चरुमश्वो दक्षिणा' 'वरुणाय घर्मपतये यवमयं चरुम्' इत्येवमादिषु प्राचुर्येण वरुणसम्बन्धात् । मधुसंयुतत्वं तेनाऽभिघारितत्वात् । ऋज्वन्यत् ॥ ४ ॥

घृतं यवा मधु यवा आपो यवा अमृतं यवाः ।
सर्वं पुनथ मे पापं यन्मया दुष्कृतं कृतम् ॥ ५ ॥

अनु०—यव घृत है, यव मधु है, यव जल है, यव अमृत है। तुम मेरे सभी पापों को पवित्र कर, मेरे सभी दुष्कर्मों को दूर करो ॥ ५ ॥

घृतादिग्रहणं प्रदर्शनार्थम्। यवा एव सर्वपवित्रत्वेन ध्यातव्या इति तेषां प्रशंसा ॥ ५ ॥

वाचा कृतं कर्म कृतं मनसा दुर्विचिन्तितम् ।
अलक्ष्मीं ^२कालरात्रीं च सर्वं पुनथ मे यवाः ॥ ६ ॥

अनु०—वाणी द्वारा किए गए, कर्म द्वारा किए गए तथा मन से सोचे गये सभी पाप कर्मों को, अभाग्य को तथा सबका विनाश करने वाली कालरात्रि को—इन सबको, हे यवों, तुम पवित्र करो ॥ ६ ॥

कालरात्रो कृत्या ॥ ६ ॥

श्वसूकरावधूतं यत्काकोच्छिष्टोपहतं च यत् ।
मातापित्रोरशुश्रूषां सर्वं पुनथ मे यवाः ॥ ७ ॥

अनु०—कुत्ते तथा सूअर द्वारा छुए गये, कौए या उच्छिष्ट से दूषित किये गये अन्न को खाने से हुए पाप से, माता और पिता की आज्ञा के उल्लंघन के पाप से—इन सभी पापों से, हे यवों, तुम मुझे पवित्र करो ॥ ७ ॥

श्वादिग्रहणमाहारदोषकृतपापोपलक्षणार्थम् ॥ ७ ॥


१. "यत्राऽन्या ओषधयो म्लायन्ते अथैते मोदमाना इवोत्तिष्ठन्ति" "वसन्ते सर्वसस्यानां जायते पत्रशातनम् । मोदमानाश्च तिष्ठन्ति यवाः कणिशशालिनः" ॥ इत्यादिश्रुतिस्मृत्याद्यत्राऽनुसन्धातव्यम् ।
२. 'कालकर्णीम्' इति सर्वेषु मूलपुस्तकेषु पाठः ॥

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३२८ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ यावकव्रतम्

महापातकसंयुक्तं दारुणं राजकिल्विषम् ।
बालवृत्तमधर्मं च सर्वं पुनथ मे यवाः ॥ ८ ॥

**अनु०—**महापातक के घोर पाप को, राजा की सेवा में किए गए पाप को, बालकों या वृद्धों के प्रति किए गए अन्याय या अधर्म को—इन मेरे सभी पापों को, हे यवो, तुम पवित्र करो ॥ ८ ॥

दारुणं क्रूरं तत्पूर्वोत्तराभ्यां सम्बध्यते । राजकिल्विषं राजसेवानिमित्तम् । बालवृत्तं बालैःकृतं अज्ञानकृतं वा । अधर्मः पापम् । स एव सर्वत्र विशेष्य-भूतः ॥ ८ ॥

सुवर्णस्तैन्यमव्रत्यमयाज्यस्य च याजनम् ।
ब्राह्मणानां परीवादं सर्वं पुनथ मे यवाः ॥ ९ ॥

**अनु०—**सुवर्ण की चोरी का पाप, व्रत के भङ्ग का पाप, जिसका यज्ञ नहीं कराना चाहिए उसका यज्ञ कराने का पाप, ब्राह्मण की निन्दा करने का पाप—मेरे इन सभी पापों को, हे यवों, तुम पवित्र करो ॥ ९ ॥

अव्रत्यं नियमलोपकृतम् । ऋज्वन्वयत् ॥ ९ ॥

गणान्नं गणिकान्नं च शूद्रान्नं श्राद्धसूतकम् ।
चोरस्यान्नं नवश्राद्धं सर्वं पुनथ मे यवा इति ॥ १० ॥

**अनु०—**अनेक व्यक्तियों के समूह द्वारा दिए गए अन्न को, वेश्या और शूद्र के अन्न को या श्राद्ध और जन्म संबन्धी सूतक के समय दिये गए अन्न के भक्षण के पाप को चोर के अन्न का तथा नवश्राद्ध के अन्न के भक्षण का पाप, मेरे इन सभी पापों को, हे यवों, पवित्र करो ॥ १० ॥

गणान्नं गणाय गणेन वा सङ्कल्पितम् । श्राद्धं पितृभ्यः सङ्कल्पितम् । सूतकं तत्सम्बन्ध्यन्नम् । नवश्राद्धमेकोद्दिष्टान्नम् । परगृहविषयं सङ्कल्पाविषयम-भोज्यमेतत् । एते मन्त्रा वामदेवऋर्षा अनुष्टुप्छन्दसः यवदेवत्याश्च द्रष्टव्याः॥१०॥

अप्यमाणे त्वयं विशेषः—

अप्यमाणे रक्षां कुर्यात् ॥ ११ ॥

**अनु०—**जिस समय जो पकाये जा रहे हों उस समय उसकी रक्षा करे ॥११॥

स्थाल्यां कृष्णायसादि प्रतिमुञ्चेदित्यर्थः ॥ ११ ॥

तत्रैते मन्त्राः—

नमो रुद्राय भूताधिपतये द्यौश्शान्ता ॥ १२ ॥