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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

DevanagariHindipublished486 pages

Page 375 of 486

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Page 375

पञ्चमः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ३२३

अथ व्युष्टायां जघनार्धादात्मानमपकृष्य तीर्थं गत्वा प्रसिद्धं स्नात्वाऽन्तर्जलगतोऽघमर्षणेन षोडश प्राणायामान् धारयित्वा प्रसिद्धमादित्योपस्थानात् कृत्वाऽऽचार्यस्य गृहानेति ॥ ७ ॥

अनु०— दिन के उगने पर नाभि से नीचे तकके शरीर के भाग को निकाल कर किसी जलाशय पर जाकर वहाँ ज्ञात विधि से स्नान करे और जल के भीतर स्थित होते हुए ही अघमर्षण मन्त्र से सोलह प्राणायाम करे और सूर्य की पूजा तक की प्रसिद्ध क्रियाएं करे और तब अपने आचार्य के घर जाय ॥ ७ ॥

टि०— गोविन्द स्वामी के अनुसार उपयुक्त कर्म एक नये जन्म का प्रतीक होता है । ब्रह्मचारी ही अन्त में आचार्य के घर जाय, गृहस्थ अपने घर ही रहे ।

व्युष्टायां उषस्समये जघनार्धात् आत्मसम्बन्धिनो नाभेरधोभागात् पुनर्ज-ननमिति निर्वृत्य (?) तीर्थं नदीदेवखातादिपुण्यजलाशयः । प्रसिद्धमिति पूर्वोक्तस्नानविधिनाऽऽदित्योपस्थानपर्यन्तं करोति । अयं विशेषः—अघमर्षणमन्त्रेण षोडश प्राणायामाः । ब्रह्मचारी चेदाचार्यस्य गृहानेति । गृहस्थस्तु गृहान् ॥ ७ ॥

अथाऽस्य प्रशंसा—

यथाऽश्वमेधावभृथमेवैतद्विजानीयादिति ॥ ८ ॥

अनु०— यह क्रिया उसी प्रकार की होती है जिस प्रकार अश्वमेध यज्ञ के अन्त में अवभृथ स्नान की क्रिया होती है ॥ ८ ॥

इति तृतीयप्रश्ने चतुर्थः खण्डोऽध्यायश्च ।


तृतीयप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः

पञ्चमः खण्डः

पापनिर्हरणप्रसङ्गादघमर्षणप्रसङ्गाद्वेदमन्यदारभते—

अथाऽतः पवित्रातिपवित्रस्याऽघमर्षणस्य कल्पं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

अनु०— अब हम यहाँ से पवित्र से भी पवित्रतम अघमर्षण सूक्त के प्रयोग की व्याख्या करेंगे ॥ १ ॥

पवित्रं पुरुषसूक्तादि । तेषां मध्ये अतिपवित्रमघमर्षणं सूक्तं तस्य कल्पः प्रयोगः ॥ १ ॥