बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
by महर्षि बौधायन
Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)
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Read in contextपञ्चमः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ३२५
अनु०—बारह रात्रियों में विद्वान् ब्राह्मण की हत्या, गुरुपत्नीगमन, सुवर्ण की चोरी और सुरापान के पापों को छोड़कर शेष सभी दुष्कर्मों के पाप से मुक्ति मिल-जाती है ॥ ६ ॥
ब्रह्महत्यादीनि महापातकानि वर्जयित्वा अन्येभ्यः पापेभ्यः प्रमुच्यत इति शेषः ॥ ६ ॥
एकविंशतिरात्रात्तान्यपि तरति तान्यपि जयति ॥ ७ ॥
अनु०—इक्कीस रात्रियों में उन महापातकों को भी पार कर लेता है और उन्हें भी जीत लेता है ॥ ७ ॥
तानि पूर्ववर्जितानि महापातकानि । तरणं क्षपणम् । जयः पुण्यफल-योग्यता ॥ ७ ॥
अथ फलार्थवादप्रपञ्चः—
सर्वं तरति सर्वं जयति सर्वक्रतुफलमवाप्नोति सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति सर्वेषु वेदेषु चीर्णव्रतो भवति सर्वैर्देवैर्ज्ञातो भवत्याचक्षुषः पङ्क्तिं पुनाति कर्माणि चाऽस्य सिध्यन्तीति बौधायनः ॥ ८ ॥
अनु०—अघमर्षण सूक्त का इस प्रकार जप करने वाला सबको पार कर जाता है, सबको जीत लेता है, यज्ञ के सभी फलों को प्राप्त कर लेता है। सभी पवित्र तीर्थों में स्नान कर लेता है। सभी वेदों के अध्ययन के लिए विहित व्रत का आचरण कर लेता है। सभी देवता उसे जानने लगते हैं। वह देखने मात्र से ही ब्राह्मणों की पंक्ति को पवित्र कर देता है और उसके सभी कर्म सफल होते हैं। ऐसा बौधायन का उपदेश है ॥ ८ ॥
आचक्षुषः आदृशः पश्यः। बौधायनसंशब्दनादन्यस्तच्छिष्योऽस्य ग्रन्थस्य कर्तेति गम्यते । मनुरब्रवीदितिवत् ॥ ८ ॥
इति तृतीये प्रश्ने पञ्चमः खण्डोऽध्यायश्च ।