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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

DevanagariHindipublished486 pages

Page 364 of 486

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Page 364

३१२ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ वृत्त्युपायाः

यित्वा (?) तूष्णीमेव गोदोहनकालमात्र तिष्ठेत् । एतस्मादेव लिङ्गादेतस्या वृत्तेरसन्दर्शनोति संज्ञान्तरमाचक्षते ॥ ६ ॥

वृत्तेर्वृत्तरवार्तायां तयव तस्य ध्रुवं वर्तनाद् ध्रुवेति परिकीर्तिता ॥ ७ ॥

**अनु०—**भिन्न-भिन्न दूसरी वृत्तियों से यदि जीविका निर्वाह न हो तो उसी एक (भिक्षा) वृत्ति से निरन्तर जीवन निर्वाह करने के कारण उसे ध्रुवा वृत्ति कहते हैं ॥ ७ ॥

वृत्तेर्वृत्तेरिति वीप्सादर्शनात् अवार्त्तायामित्यध्याहार्यम् । वृत्त्यवार्ताशब्दौ द्रव्यलाभालाभबवचनौ । प्रथमो वृत्तिशब्दः प्राणयात्रामात्रप्रसिद्ध्यर्थद्रव्यार्जन-वचनः । तयैव भिक्षया वर्तेत । ध्रुवमित्याद्युपसंहारः । ध्रुवं निश्चयेन ॥ ७ ॥

किंलक्षणा सम्प्रक्षालनोत्यत आह—

सम्प्रक्षालनीति । उत्पन्नानामोषधीनां प्रक्षेपणं निक्षेपणं नास्ति निचयो वा भाजनानि सम्प्रक्षालय न्युब्जतीति सम्प्रक्षालनी ॥ ८ ॥

**अनु०—**संप्रक्षालनी नाम की वृत्ति इस प्रकार होती है। उत्पन्न होने योग्य व्रीहि इत्यादि बीजों के बोने का कार्य, या प्राप्त ओषधियों अन्नादि के नष्ट करने के प्रयोजन से फेंकने अथवा संचय करने का कार्य जिस वृत्ति में नहीं होता और जिस वृत्ति में बरतनों को धोकर उलटा रख दिया जाता है उसे सम्प्रक्षालनी वृत्ति कहते हैं ॥ ८ ॥

उपपन्नानामुत्पादयितुमङ्कुरीकर्तुं योग्यानां बीजानामित्यर्थः । ओषधीनां व्रीह्यादिबीजानां प्रक्षेपणं बीजावापनम् । यद्वा पूर्वमेवोत्पन्नानां यात्रामात्रप्र-सिद्ध्यर्थमर्जितानामित्यर्थः । नास्तीत्येतत्काकाक्षिवत् प्रक्षेपणनिक्षेपणनिचयेषु सम्बध्यते । निक्षेपणं निक्षेपः । पात्र्यां भोजनवेलायाम् , निचयस्सञ्चयः; आमे पक्वे च सञ्चयो न कर्तव्य इत्यर्थः । किं तर्हि कुर्यात् ? अहरेव भाज-नानि सम्प्रक्षाल्य न्युब्जति न्यञ्चं करोति सैषा सम्प्रक्षालनी वृत्तिः ॥ ८ ॥

समूहा नाम पञ्चमी । सा कीदृशोत्याह—

समूहेति । अवारितस्थानेषु पथिषु वा क्षेत्रेषु वाऽप्रहितावकाशेषु वा यत्र यत्रौषधयो विद्यन्ते तत्र तत्र समूहन्या समूह्य ताभिर्वर्तयतीति समूहा ॥ ९ ॥

**अनु०—**समूहा नाम की वृत्ति इस प्रकार होती है । जिन स्थानों पर जाना निषिद्ध नहीं है, मार्ग में या खेत में जहां प्रवेश का मार्ग घिरा न हो जहां ओषधियां वृक्षादि हों उन स्थानों पर झाडू से बुहार कर जो अन्नादि उपलब्ध हों उन्हीं से जीविका निर्वाह करना समूहा वृत्ति है ॥ ९ ॥