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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

DevanagariHindipublished486 pages

Page 369 of 486

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Page 369

तृतीयः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने तृतीयोऽध्यायः ३१७

अनु०—इन दो प्रकार की वस्तुओं में भी जो पदार्थ इन्द्र अर्थात् वृष्टि द्वारा उत्पन्न की गयी हैं वे हैं वृक्षों, लताओं, झाड़ियों के फल । इन फलों को लाकर पकावे, सायंकाल तथा प्रातः काल अग्निहोत्र हवन करें, भिक्षुकों, अतिथियों और ब्रह्मचारियों को देकर शेष अंश का भक्षण करे ॥ ५ ॥

भवेयुरित्यध्याहार्यम् । वल्लद्यादीनां फलानि आनयित्वा आनीय । यतयो भिक्षुकाः । अतिथयः प्रसिद्धाः । व्रतिनो ब्रह्मचारिणः । वल्लयादिफलानामग्निहोत्रद्रव्यत्वेन विधानात् नित्यानां पयआदिद्रव्याणां निवृत्तिः । इतरद्भक्षाः शेषभक्षाश्चेति विग्रहः । इतरद्भक्षा इति सिद्धे शेषभक्षा इति वचनं अग्निहोत्रशेषे यात्रानिर्यार्तितशेषे च वैश्वदेवप्राप्त्यर्थम् । इतरदपि शेषं कृत्वा भक्षयेदित्यर्थः ॥ ५ ॥

अथेतरानाह—

रेतोवसिक्ता नाम मांस ¹व्याघ्रवृकश्येनादिभिरन्यतमेन वा हतमानयित्वा श्रपयित्वा सायं प्रातरग्निहोत्रं हुत्वा यत्यतिथिभ्यश्च दत्त्वाऽथेतरच्छेषभक्षाः ॥ ६ ॥

अनु०—वीर्य से उत्पन्न हुआ (पशुओं का ) मांस होता है । बाघ, भेड़िया, बाज आदि शिकार करने वाले जानवरों या पक्षियों द्वारा मारे गये पशु-पक्षी को लाकर उसका मांस पकावे, सायं तथा प्रातः काल अग्निहोत्र हवन करने, भिक्षुकों, अतिथियों तथा ब्रह्मचारियों को देने के बाद शेष मांस का भक्षण करे ॥ ६ ॥

अस्याऽपि पूर्वैव व्याख्या ॥ ६ ॥

अथ पचमानकानां द्वितीयानाह—

वैतुषिकास्तुषधान्यवर्जं तण्डुलान्रानयित्वा श्रपयित्वा सायं प्रातरग्निहोत्रं हुत्वा यत्यतिथिव्रतिभ्यश्च दत्त्वाऽथेतरच्छेषभक्षाः ॥ ७ ॥

अनु०—जो छिलका निकाले बिना ही जंगली अन्न का भक्षण करते हैं वे तुषधान्य को छोड़कर चावल मंगाकर उसे पकावें, सायंकाल तथा प्रातःकाल अग्निहोत्र होम कर, भिक्षुओं, अतिथियों और ब्रह्मचारियों को अंश देकर बचे हुए अन्न का भक्षण करें ॥ ७ ॥

तुषधान्यवर्जद्रव्याहरणस्य प्रयोजनं तत्स्वीकारोऽपि कथं नु नाम स्यादिति ॥ ७ ॥


१. मृगव्याघ्रेति क्वचित् पाठः ।