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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

DevanagariHindipublished486 pages

Page 365 of 486

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Page 365

द्वितीयः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ३१३

अवारितस्थानान्यनिषिद्धानि। अप्रतिहतावकाशाः वृत्तिशून्या देशाः। समूहनी सम्मार्जनी ॥ ९॥

पालनीत्यहिंसिकेत्येवेदमुक्तं भवति। तुषविहीनांस्तण्डुलानिच्छति सज्जनेभ्यो बीजानि वा पालयतीति पालनी ॥ १० ॥

अनु०—पालनी नाम की वृत्ति, जिसे अहिंसिका वृत्ति भी कहते हैं इस प्रकार की होती है। सज्जनों से बिना छिलके के चावलों को या बीजों को प्राप्त करने की इच्छा करे और उन्हीं से अपना पालन करे तो पालनी वृत्ति कहलाती है ॥ १० ॥

सज्जनेभ्यो विद्वद्भ्यः। पालयति प्रयच्छति तस्मात्तंडुलानेव स्वयं गृह्णीयात्। तुषविहीनग्रहणं तुषाणामप्यसंग्रहणार्थम्। तेषु मिश्रणसम्भावना यतः ॥ ० ॥

सिलोञ्छा पुनः—

सिलोञ्छेति। अवारितस्थानेषु पथिषु वा क्षेत्रेषु वाऽप्रतिहतावकाशेषु वा यत्रयत्रौषधयो विद्यन्ते तत्रतत्रैकैकं कणिशमुञ्छयित्वा काले-काले सिलैर्वर्तयतीति सिलोञ्छा ॥ ११ ॥

अनु०—सिलोञ्छा वृत्ति इस प्रकार है। जिन स्थानों पर जाना निषिद्ध नहीं है, ऐसे मार्ग में या खेतों में या जहाँ प्रवेश का मार्ग अवरुद्ध नहीं है ऐसे स्थानों पर, जहाँ ओषधियाँ ( अन्न, वृक्षादि ) हों वहाँ एक-एक कण समय-समय पर एकत्र कर उसी के भक्षण से जीवन निर्वाह करना सिलोञ्छा वृत्ति है ॥ ११ ॥

कणिशो धान्यस्तम्बः। उञ्छनं उत्पाटनम्। उञ्छनकालः वीप्सया सम्बध्यते। 'सर्वावश्यककालः उञ्छनकालः। सिलाः ग्रासविशेषाः। यावद्भिरात्मयात्रा भवतीति। शेषं पूर्ववत् ॥ ११ ॥

कापोताऽष्टमी, सेदानीमुच्यते—

कापोतेति। अवारितस्थानेषु पथिषु क्षेत्रेषु वाऽप्रतिहतावकाशेषु वा यत्र यत्रौषधयो विद्यन्ते तत्र तत्राऽङ्गुलिभ्यामेकैकामोषधिमुञ्छयित्वा सन्दर्शनात् कपोतवदिति कापोता ॥ १२ ॥

अनु०—कापोता वृत्ति इस प्रकार होती है। उन स्थानों में जहाँ जाना निषिद्ध नहीं है, मार्गों में या खेतों में या जिन स्थानों पर प्रवेश का मार्ग अवरुद्ध नहीं है, उन स्थानों पर जो ओषधियाँ विद्यमान हों, उनमें दो अंगुलियों से केवल एक-एक ओषधि