अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-२ देवता—यम तथा मंत्र में कहे
इत एत उदारुहन् दिवस्पृष्ठान्यारुहन्.
प्र भूर्जयो यथा पथा द्यामाङ्गिरसो ययुः (६१)
दाह संस्कार करने वाले पुरुषों ने मृतक को पृथ्वी से उठा कर अरथी पर रखा और
आकाश के उपभोग योग्य स्थानों पर चढ़ा दिया. पृथ्वी को जीतने वाले आंगिरस जिस मार्ग
से गए हैं, उसी मार्ग से इसे भी आकाश में पहुंचा दिया. (६१)
सूक्त-२ देवता—यम तथा मंत्र में कहे
गए
यमाय सोमः पवते यमाय क्रियते हविः.
यमं ह यज्ञो गच्छत्यग्निदूतो अरंकृतः.. (१)
यज्ञ में यम के लिए सोम को पवित्र किया जाता है. यम के लिए हवि दी जाती है. नाना
प्रकार के द्रव्यों से सुशोभित किया गया यज्ञ अग्नि को दूत बना कर यम के पास जाता है. ये
ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ यम को प्राप्त होते हैं. (१)
यमाय मधुमत्तमं जुहोता प्र च तिष्ठत.
इदं नम ऋषिभ्यः पूर्वजेभ्यः पूर्वेभ्यः पथिकृद्भ्यः.. (२)
हे यजमानो! यम के लिए सोम, घृत आदि की आहुति दो. पूर्व पुरुषों तथा मंत्र द्रष्टा
अंगिरा आदि ऋषियों के लिए नमस्कार हैं. (२)
यमाय घृतवत् पयो राज्ञे हविर्जुहोतन.
स नो जीवेष्वा यमेद् दीर्घमायुः प्र जीवसे.. (३)
हे यजमानो! घृत से युक्त क्षीर रूप हवि यम के लिए अर्पण करो. वे हवि पा कर हमें
जीवित मनुष्यों में रखेंगे और सौ वर्ष की आयु प्रदान करेंगे. (३)
मैनमग्ने वि दहो माभि शूशुचो मास्य त्वचं चिक्षिपो मा शरीरम्.
शृतं यदा करसि जातवेदो ऽ थेमेनं प्र हिणुतात् पितृंरुप.. (४)
हे अग्नि! इस प्रेत को भस्म मत करो; इस की त्वचा को अन्यत्र मत फेंको. इस के लिए
शोक भी मत करो. जब तुम इस हवि रूप शरीर को पका लो, तब इसे रक्षा के लिए पितरों
को दो. इस प्रेत की आत्मा पितृलोक में चली जाए. (४)
यदा शृतं कृणवो जातवेदो ऽ थेममेनं परि दत्तात् पितृभ्यः.
यदो गच्छात्यसुनीतिमेतामथ देवानां वशनीर्भवाति.. (५)
हे जातवेद अग्नि! जब तू इस प्रेत को पूरी तरह भस्म कर दे, तब इसे पितरों के लिए
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सौंप दे. जब इस के प्राण निकल जाते हैं, तब यह प्रेत देवों के वश में हो जाता है. (५)
त्रिकद्रुकेभिः पवते षडुर्वीरिकमिद् बृहत्.
त्रिष्टुब् गायत्री छन्दांसि सर्वा ता यम आर्पिता.. (६)
यह सब का नियंत्रण करने वाला तथा महान यम कद्रुक नाम के तीन यंत्रों से छह
उर्वियों को प्राप्त होता है. त्रिष्टुप, गायत्री आदि छंद सब का नियंत्रण करने वाले परमात्मा में
स्थित हैं. (६)
सूर्य चक्षुषा गच्छ वातमात्मना दिवं च गच्छ पृथिवीं च धर्मभिः.
अपो वा गच्छ यदि तत्र ते हितमोषधीषु प्रति तिष्ठा शरीरैः.. (७)
हे प्रेत! तू नेत्र द्वार से सूर्य को प्राप्त हो. तू आत्मा के द्वारा वायु को प्राप्त हो तथा वन्य
इंद्रियों से आकाश और पृथ्वी को प्राप्त हो तथा अंतरिक्ष और जल को प्राप्त हो. यदि इन
स्थानों में जाने की तेरी इच्छा हो तो जा अथवा ओषधि आदि में प्रविष्ट हो जा. (७)
अजो भागस्तपसस्तं तपस्व तं ते शाचिस्तपतु तं ते अर्चिः.
यास्ते शिवास्तन्वो जातवेदस्ताभिर्वहैनं सुकृतामु लोकम्.. (८)
हे अग्नि! इस प्रेत का जो जन्म न लेने वाला भाग अर्थात् आत्मा है, उसे तुम अपने तप
से संतप्त करो. तेरी दीप्त होती हुई ज्वाला इस प्रेत की आत्मा को तपाए. हे जातवेद अग्नि!
तेरा जो ज्वलारूपी कल्याणकारी शरीर है, उस के द्वारा इस प्रेत की आत्मा को उत्तम कर्म
करने वालों के लोक में ले जा. (८)
यास्ते शोचयो रंहयो जातवेदो याभिरापृणासि दिवमन्तरिक्षम्.
अजं यन्तमनु ताः समृण्वतामथेतराभिः शिवतमाभिः शृतं कृधि.. (९)
हे जातवेद अग्नि! तेरा जो ज्वलारूपी शरीर है, उस से तू द्युलोक तथा अंतरिक्ष लोक
व्याप्त करता है. तेरा ज्वलारूपी शरीर द्युलोक को जाती हुई इस प्रेत की आत्मा के पीछे
जाए तथा दूसरे कल्याणकारी शरीरों के पीछे रह गई इस प्रेत की मृत देह को पूरी तरह जला
दे. (९)
अव सृज पुनरग्ने पितृभ्यो यस्त आहुतश्चरति स्वधावान्.
आयुर्वसान उप यातु शेषः सं गच्छतां तन्वा सुवर्चाः.. (१०)
हे अग्नि! हवि के रूप में जो प्रेत तुम्हें दिया गया है तथा हमारे प्रति स्वधा से संपन्न हो
कर तुम्हारे द्वारा जलाया जा रहा है, उसे तुम पितृलोक के लिए छोड़ दो. उस का पुत्र आयु से
संपन्न होता हुआ अपने घर को लौटे. यह प्रेत सुंदर शक्ति वाला तथा पितृलोक में निवास
करने वाला हो. (१०)
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अति द्रव श्वानौ सारमेयौ चतुरक्षौ शबलौ साधुना पथा.
अधा पितृन्त्सुविदत्राँ अपीहि यमेन ये सधमादं मदन्ति.. (११)
हे प्रेत! तू पितृलोक को जाने वाला है. तू सरमा नाम की देवों की कुतिया के श्याम और
शबल नाम वाले दोनों पुत्रों के साथ प्रसन्न रहने वाले एवं हव्य संपन्न पितरों के पास पहुंचे.
(११)
यौ ते श्वानौ यम रक्षितारौ चतुरक्षौ पथिषदी नृचक्षसा.
ताभ्यां राजन् परि धेह्येनं स्वस्त्यस्मा अनमीवं च धेहि.. (१२)
हे पितरों के प्रभु! पितर मार्ग में स्थित चार नेत्रों वाले जो कुत्ते यमपुर की रक्षा करने के
हेतु तुम्हारे द्वारा नियुक्त किए गए हैं, इस प्रेत की रक्षा के लिए उन्हें सौंप दो. यह तुम्हारे लोक
में रहने को आया है. इसे बाधा रहित स्थान दो. (१२)
उरूणसावसुतृपावुदुम्बलौ यमस्य दूतौ चरतो जनाँ अनु.
तावस्मभ्यं दृशये सूर्याय पुनर्दातामसुमद्येह भद्रम्.. (१३)
बड़ीबड़ी नाक वाले प्राणियों के प्राणों से तृप्ति को प्राप्त हुए तथा प्राणों का अपहरण
करने वाले महाबली यमदूत सभी जगह घूमते हैं. ये दोनों दूत सूर्य दर्शन के निमित्त पांच
इंद्रियों वाले प्राण को हमारे शरीर में पुनः स्थापित करें. (१३)
सोम एकेभ्यः पवते घृतमेक उपासते.
येभ्यो मधु प्रधावति तांश्चिदेवापि गच्छतात्.. (१४)
कुछ पितरों के लिए नदी के रूप में सोमरस बहता है. अन्य पितर घृत का उपभोग
करते हैं. ब्रह्म याग में अथर्ववेद के मंत्रों का पाठ करने वालों के लिए मधु अर्थात् शहद की
नदी है. हे मृतात्मा को प्राप्त प्रेत! तू उन सब को प्राप्त हो. (१४)
ये चित् पूर्व ऋतसाता ऋतजाता ऋतावृधः.
ऋषीन् तपस्वतो यम तपोज़ाँ अपि गच्छतात्.. (१५)
जो पूर्व पुरुष सत्य से युक्त थे, जो साम से उत्पन्न हो कर सत्य की वृद्धि करते थे, हे यम
के निमित्त पुरुष! उन तपोबल वाले ऋषियों को तू प्राप्त हो. (१५)
तपसा ये अनाधृष्यास्तपसा ये स्वर्ययुः.
तपो ये चक्रिरे महस्तांश्चिदेवापि गच्छतात्.. (१६)
तप के द्वारा, यज्ञ आदि साधनों के द्वारा, दुष्कर कर्म और उपासना के द्वारा महान तप
करते हुए जो पुरुष पुण्य लोकों को जाते हैं, हे पुरुष! तू उन तपस्वियों के लोकों को जा.
(१६)
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ये युध्यन्ते प्रधनेषु शूरासो ये तनूत्यजः.
ये वा सहस्रदक्षिणास्तांश्चिदेवापि गच्छतात्.. (१७)
जो वीर पुरुष युद्धों में शत्रुओं पर प्रहार करते हैं, जो रणक्षेत्र में शरीर का त्याग करते हैं
तथा जो अन्न, दक्षिणा आदि वाले यज्ञों को पूर्ण करते हैं, उन्हें जो फल प्राप्त है, तू उन सभी
फलों को प्राप्त कर. (१७)
सहस्रणीथाः कवयो ये गोपायन्ति सूर्यम्.
ऋषीन् तपस्वतो यम तपोजाँ अपि गच्छतात्.. (१८)
जो अनंत द्रष्टा ऋषि सूर्य की रक्षा करते हैं, हे पुरुष! तू यम के पास ले जाने वाला हो
कर उन तपस्वी ऋषियों के कर्म फल को प्राप्त कर. (१८)
स्योनास्मै भव पृथिव्यनृक्षरा निवेशनी.
यच्छास्मै शर्म सप्रथाः.. (१९)
हे वेदी रूपिणी पृथ्वी! तू मरने वाले पुरुष के लिए कंटकहीन बन जा तथा इसे सभी
प्रकार का सुख प्रदान कर. (१९)
असंबाधे पृथिव्या उरौ लोके नि धीयस्व.
स्वधा याश्चकृषे जीवन् तास्ते सन्तु मधुश्चतः.. (२०)
हे मरने वाले पुरुष! तू यज्ञ आदि की वेदी के विस्तृत स्थान में प्रतिष्ठित हो. पहले तू ने
जिन उत्तम हवियों को दिया है, वे तुझे मधु आदि रसों के रूप में प्राप्त हों. (२०)
ह्वयामि ते मनसा मन इहेमान् गृहाँ उप जुजुषाण एहि.
सं गच्छस्व पितृभिः सं यमेन स्योनास्त्वा वाता उप वान्तु शग्माः.. (२१)
हे प्रेत पुरुष! मैं अपने मन के द्वारा तेरे मन को इस लोक में बुलाता हूं. जिन घरों में तेरे
लिए और्ध्वदैहिक अर्थात् देह त्याग के बाद का कर्म किया जाता है, तू हमारे उन घरों में जा
तथा संस्कार के बाद पिता, पितामह, प्रपितामह आदि के साथ सपिण्डीकरण की विधि के
अनुसार मिल. यम के पास पहुंचा हुआ तू पितृलोक में जा कर श्रम को दूर करने वाली वायु
को प्राप्त कर. (२१)
उत् त्वा वहन्तु मरुत उदवाहा उदप्रुतः.
अजेन कृण्वन्तः शीतं वर्षेणोक्षन्तु बालिति.. (२२)
हे प्रेत! मरुद्गण तुझे व्योम में धारण करें. वायु तुझे ऊर्ध्वलोक में पहुंचाए. जल को
धारण करने वाले तथा वर्षा करने वाले मेघ समीप में भी अज अर्थात् अजन्मा आत्मा सहित
तुझे वर्षा के जल से सींचें. (२२)
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उदह्रमायुरायुषे क्रत्वे दक्षाय जीवसे.
स्वान् गच्छतु ते मनो अधा पितँरुप द्रव.. (२३)
हे प्रेत! प्राणन अर्थात् सांस लेने और अपानन अर्थात् अपान वायु छोड़ने के व्यापार
अर्थात् कार्य के लिए मैं तेरी आयु का आह्वान करता हूं. तेरा मन संस्कार से उत्पन्न नवीन
शरीर को प्राप्त हो. इस के बाद तू पितरों के समीप पहुंच. (२३)
मा ते मनो मासोर्माङ्गानां मा रसस्य ते.
मा ते हास्त तन्व १: किं चनेह.. (२४)
हे प्रेत! तेरा मन और तेरी इंद्रियां तेरा त्याग न करें. तेरे प्राण के किसी अंश का क्षय न
हो. तेरे शरीर के अंगों में किसी प्रकार का विकार न हो. तेरे शरीर में रुधिर रस आदि भी पूरी
मात्रा में रहें. तेरा कोई भी भाग तुझ से अलग न हो. (२४)
मा त्वा वृक्षः सं बाधिष्ट मा देवी पृथिवी मही.
लोकं पितृषु वित्त्वैधव्व यमराजसु.. (२५)
हे प्रेत! तू जिस वृक्ष के नीचे बैठे, वह तुझे व्यथित न करे. तू जिस धरती का आश्रय ले,
वह भी तुझे पीड़ा न पहुंचाए. तू यम की प्रजा रूप पितरों के स्थान पर जा कर वृद्धि प्राप्त
कर. (२५)
यत् ते अङ्गमतिहासितं पराचैरपानः प्राणो य उ वा ते परेतः.
तत् ते संगत्यू पितरः सनीडा घासाद् घासं पुनरा वेशयन्तु.. (२६)
हे प्रेत! तेरा जो अंग तेरे शरीर से अलग हो गया था, जो प्राण वापस न होने के लिए तेरे
शरीर से निकल गए थे, उन सब को एक स्थान पर स्थित पितर तुझे एक शरीर से दूसरे शरीर
में प्रविष्ट करें. (२६)
अपेमं जीवा अरुधन् गृहेभ्यस्तं निर्वहत परि ग्रामादितः.
मृत्युर्यमस्यासीद् दूतः प्रचेता असून् पितृभ्यो गमयां चकार.. (२७)
हे जीवित बंधुओ! इस प्रेत को घर से ले जाओ. उसे उठा कर ग्राम से बाहर ले जाओ.
यम के दूत रूप मृत्यु ने इस के प्राणों को पितर के रूप में करने के लिए ले लिया है. (२७)
ये दस्यवः पितृषु प्रविष्टा ज्ञातिमुखा अहुतादश्चरन्ति.
परापुरो निपुरो ये भरन्त्यग्निष्टानस्मात् प्र धमाति यज्ञात्.. (२८)
जो राक्षसों के समान पिता, पितामह आदि पितरों में मिल कर बैठ जाते हैं, माया कर
के हवि का भक्षण करते हैं तथा पिंडदान करने वाले पुत्रों और पौत्रों की हिंसा करते हैं, उन
मायावी राक्षसों को पितृयाग से अग्नि देव बाहर निकालें. (२८)
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सं विशन्त्विह पितरः स्वा नः स्योनं कृण्वन्तः प्रतिरन्त आयुः.
तेभ्यः शकेम हविषा नक्षमाणा ज्योग् जीवन्तः शरदः पुरूचीः. (२९)
हमारे गोत्र में उत्पन्न पिता, पितामह आदि सभी पितर भलीभांति यज्ञ में आ कर बैठें
तथा हमें सुखी बनाएं. वे हमारी आयु की वृद्धि करें. हम भी आयु प्राप्त कर के हवियों द्वारा
पितरों को पूजते हुए चिरकाल तक जीवित रहें. (२९)
यां ते धेनुं निपृणामि यमु ते क्षीर ओदनम्.
तेना जनस्यासो भर्ता यो ऽ त्रासदजीवनः. (३०)
हे प्रेत! मैं तेरे निमित्त गोदान करता हूं. मैं तेरे लिए दूध से बना जो भात देता हूं, उस के
द्वारा तू यमलोक में अपने जीवन को पुष्ट करने वाला हो. (३०)
अश्वावतीं प्र तर या सशेवार्क्षाकं वा प्रतरं नवीयः.
यस्त्वा जघान वध्यः सो अस्तु मा सो अन्यद् विदत् भागधेयम्.. (३१)
हे प्रेत! मैं नए वन मार्ग में रीछ आदि दुष्ट पशुओं से बचता हुआ पार हो जाऊं. तू हमें
अश्वावती नदी के उस पार उतार दे. यह नदी हमें सुख देने वाली हो. जिस ने तेरा वध किया
है, वह वध के योग्य होता हुआ उपभोग के योग्य पदार्थ न पा सके. (३१)
यमः परो ऽ वरो विवस्वान् ततः परं नाति पश्यामि किं चन.
यमे अध्वरो अधि मे निविष्टो भुवो विवस्वानन्वाततान.. (३२)
सूर्य के पुत्र यम अपने पिता से भी अधिक तेजस्वी हैं. मैं किसी भी प्राणी को यम से
श्रेष्ठ नहीं पाता हूं. तेरा यज्ञ उन श्रेष्ठ यम में व्याप्त हो रहा है. यज्ञ की सिद्धि के लिए ही सूर्य ने
भूखंडों को विस्तृत किया है. (३२)
अपागूहन्नमृतां मर्त्येभ्यः कृत्वा सवर्णांमदधुर्विवस्वते.
उताश्विनावभरद् यत् तदासीदजहादु द्वा मिथुना सरण्यूः. (३३)
मरणधर्मा मनुष्यों से देवताओं ने अपनेअपने अविनाशी रूप अदृश्य कर लिए. उन्होंने
सूर्य को अन्य वर्ण वाली स्त्री बना कर दी. सरण्यु ने घोड़ी का रूप धारण कर के
अश्विनीकुमारों का पालन किया. त्वष्टा की पुत्री सरण्यु ने सूर्य का घर छोड़ते समय यमयमी
के जोड़े को घर पर ही छोड़ा था. (३३)
ये निखाता ये परोप्ता ये दग्धा ये चोद्धिताः.
सर्वांस्तानग्न आ वह पितॄन् हविषे अत्तवे.. (३४)
जो पिता भूमि में गाड़े जा कर, जो काठ के समान त्यागे जा कर तथा जो अग्नि दाह के
संस्कार के द्वारा ऊपर स्थित पितृलोक को प्राप्त हुए हैं, इस प्रकार के पितरो! हवि भक्षण के
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लिए यहां आओ. (३४)
ये अग्निदग्धा ये अनग्निदग्धा मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते.
त्वं तान् वेत्थ यदि ते जातवेदः स्वधया यज्ञं स्वधितिं जुषन्ताम्.. (३५)
जो पितर अग्नि के द्वारा संस्कृत हुए, जो गाड़ने आदि के द्वारा संस्कृत हुए और जो
पिंड, पितृयाग आदि से तृप्त हुए आकाश में निवास करते हैं, हे अग्नि! तुम उन्हें भलीभांति
जानते हो. वे अपनी संतानों के द्वारा किए जाने वाले पितृयाग आदि का सेवन करें. (३५)
शं तप माति तपो अग्ने मा तन्वं १ तपः.
वनेषु शुष्मो अस्तु ते पृथिव्यामस्तु यद्धरः.. (३६)
हे अग्नि! इस प्रेत के शरीर को अधिक मत जलाओ. जिस प्रकार इसे सुख मिले, वैसा
करो. शोषण करने वाली तुम्हारी ज्वालाएं जंगल में जाएं तथा रस का हरण करने वाला तेज
पृथ्वी में रहे. तुम हमारे शरीरों को भस्म मत करो. (३६)
ददाम्यस्मा अवसानमेतद् य एष आगन् मम चेहभूदिह.
यमश्चिकित्वान् प्रत्येतदाह ममैष राय उप तिष्ठतामिह.. (३७)
यम का वचन—यह आया हुआ पुरुष मेरा हो तो मैं उसे स्थान दूं. अब यह मेरे पास
आया है. यदि यह मेरा स्तवन करता रहे तो यहां रह सकता है. (३७)
इमां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै. शते शरत्सु नो पुरा.. (३८)
हम इस श्मशान को नापते हैं, क्योंकि ब्रह्मा ने हमें सौ वर्ष की आयु प्रदान की है.
इसलिए बीच में ही श्मशान हमें अपने कर्म के द्वारा प्राप्त न हो. (३८)
प्रेमां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै.
शते शरत्सु नो पुरा.. (३९)
हम इस श्मशान को अच्छी प्रकार नापते हैं, जिस से हमें सौ वर्ष से पहले बीच में ही
श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (३९)
अपेमां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै.
शते शरत्सु नो पुरा.. (४०)
हम इस श्मशान के नाप संबंधी दोषों को हटाते हुए नापते हैं, जिस से हमें सौ से पहले
बीच में ही दूसरा मृतक कर्म प्राप्त न हो. (४०)
वी ३ मां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै. शते शरत्सु नो पुरा.. (४१)
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हम इस श्मशान भूमि को विशेष प्रकार से नापते हैं, जिस से हमें सौ वर्ष से पहले बीच
में ही दूसरा श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (४१)
निरिमां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै. शते शरत्सु नो पुरा.. (४२)
हम दोष रहित करते हुए इस श्मशान को नापते हैं, जिस से हमें सौ वर्ष से पहले बीच में
ही दूसरा श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (४२)
उदिमां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै. शते शरत्सु नो पुरा.. (४३)
उत्कृष्ट साधन वाली नाप से हम इस श्मशान को नापते हैं, जिस से हमें सौ वर्ष से पहले
बीच में ही दूसरा श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (४३)
समिमां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै. शते शरत्सु नो पुरा.. (४४)
इस श्मशान भूमि को हम भलीभांति नापते हैं, जिस से हमें सौ वर्ष से पहले बीच में ही
दूसरा श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (४४)
अमासि मात्रां स्व रगामायुष्मान् भूयासम्.
यथापरं न मासातै शते शरत्सु नो पुरा.. (४५)
मैं ने श्मशान की भूमि को नाप लिया है, उसी नाप के द्वारा मैं इस प्रेत को स्वर्ग भेज
चुका हूं. उस कर्म से ही मैं सौ वर्ष की आयु प्राप्त करूं तथा सौ वर्ष से पहले बीच में ही मुझे
अन्य श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (४५)
प्राणो अपानो व्यान आयुश्चक्षुर्द्दशये सूर्याय.
अपरिपेरेण पथा यमराज्ञः पितॄन् गच्छ.. (४६)
प्राण, अपान, व्यान, आयु तथा चक्षु—सब आदित्य के दर्शन करने वाले हों. हे पुरुष! तू
भी यमराज के प्रत्यक्ष मार्ग के द्वारा पितरों को प्राप्त हो. (४६)
ये अग्रवः शशमानाः परेयुर्हित्वा द्वेषांस्यनपत्यवन्तः.
ते द्यामुरुदित्याविदन्त लोकं नाकस्य पृष्ठे अधि दीध्यानाः.. (४७)
जो पितर संतान रहित होने पर भी पापों का त्याग करते हुए परलोक में गए, वे अंतरिक्ष
को लांघ कर स्वर्ग के ऊपरी भाग में निवास करते हैं तथा पुण्य का फल प्राप्त करते हैं. (४७)
उदन्वती द्यौरवमा पीलुमतीति मध्यमा.
तृतीया ह प्रद्यौरिति यस्यां पितर आस्ते.. (४८)
सब से नीचे उदंचती नाम का द्युलोक है, जिस में जल रहता है. उस के ऊपर अर्थात्
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बीच में पीलुमती नाम का द्युलोक है, जिस में नक्षत्र आदि रहते हैं. सब से ऊपर तीसरा प्रद्यौ
नाम का द्युलोक है, जिस के इसी तीसरे भाग में पितर निवास करते हैं. (४८)
ये नः पितुः पितरो ये पितामहा य आविविशुरुर्व १ न्तरिक्षम्.
य आक्षियन्ति पृथिवीमुत द्यां तेभ्यः पितृभ्यो नमसा विधेम.. (४९)
हमारे पिता के जन्मदाता पितर, पितामह के जन्मदाता पितर, वे पितर जो विशाल
अंतरिक्ष में प्रविष्ट हुए हैं तथा जो पितर स्वर्ग अथवा पृथ्वी पर निवास करते हैं, हम इन सभी
लोकों में निवास करने वाले पितरों का नमस्कारों के द्वारा पूजन करते हैं. (४९)
इदमद् वा उ नापरं दिवि पश्यसि सूर्यम्.
माता पुत्रं यथा सिचाभ्ये नं भूम ऊर्णुहि.. (५०)
हे मृतक! हम श्राद्ध आदि में जो कुछ देते हैं, वही तेरा जीवन है. तेरे जीवन का अन्य
कोई साधन नहीं है. इस श्मशान को प्राप्त हुआ तू सूर्य के दर्शन करता है. हे पृथ्वी! जिस
प्रकार माता अपने पुत्र को आंचल से ढकती है. उसी प्रकार तुम इस मृतक को अपने तेज से
ढक लो. (५०)
इदमद् वा उ नापरं जरस्यन्यदितो ऽ परम्.
जाया पतिमिव वाससाभ्ये नं भूम ऊर्णुहि.. (५१)
जीर्ण होते हुए इस शरीर ने जो भोजन किया था, उस के अतिरिक्त इस के लिए कुछ भी
अनुकूल नहीं है. इस के लिए इस श्मशान के अतिरिक्त कोई अन्य स्थान भी नहीं है. हे भूमि!
श्मशान को प्राप्त हुए पितर को तुम उसी प्रकार ढक लो, जिस प्रकार पत्नी वस्त्र से अपने
पति को ढकती है. (५१)
अभि त्वोर्णोमि पृथिव्या मातुरुस्त्रेण भद्रया.
जीवेषु भद्रं तन्मयि स्वधा पितृषु सा त्वयि. (५२)
हे मृतक! सब की मंगलमयी माता पृथ्वी के वस्त्र से मैं तुझे ढकता हूं. जीवित अवस्था
में दान करने के लिए जो सुंदर वस्तु प्राणी के पास होती है, वह मुझ संस्कार करने वाले के
पास हो. स्वधाकार जो अन्न पितरों में होता है, वह तुझ में हो. (५२)
अग्नीषोमा पथिकृता स्योनं देवेभ्यो रत्नं दधथुर्वि लोकम्.
उप प्रेष्यन्तं पूषणं यो वहात्यज्ज्योयानैः पथिभिस्तत्र गच्छतम्.. (५३)
हे अग्नि एवं सोम! तुम पुण्यलोक के मार्ग का निर्माण करते हो. तुम ने सुख देने वाले
स्वर्गलोक की रचना की है. जो लोक सूर्य को अपने में धारण करता है, इस प्रेत को सरल
मार्गों द्वारा उस लोक में पहुंचाओ. (५३)
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पूषा त्वेतश्च्यावयतु प्र विद्वाननष्टपशुर्भुवनस्य गोपाः.
स त्वैतेभ्यः परि ददत् पितृभ्योऽग्निर्देवेभ्यः सुविदत्रियेभ्यः.. (५४)
हे प्रेत! पशुओं की हिंसा न करने वाले पशुपालक पूषा तुझे यहां से उस स्थानों से ले
जाएं. प्राणियों की रक्षा करने वाले ये दोनों तुझे पितरों को अर्पण करें. अग्नि देव तुझे ऐश्वर्य
वाले देवताओं को सौंपें. (५४)
आयुर्विश्वायुः परि पातु त्वा पूषा त्वा पातु प्रपथे पुरस्तात्.
यत्रासते सुकृतो यत्र त ईयुस्तत्र त्वा देवाः सविता दधातु.. (५५)
जीवन का अभिमानी देवता आयु तेरा रक्षक हो. पूषा देव तेरे उस मार्ग की रक्षा करें जो
पूर्व की ओर जाता हो. हे प्रेत! पुण्य आत्माओं के निवास रूप स्वर्ग में सविता देव तुझे
पहुंचाएं. (५५)
इमौ युनज्मि ते वह्नी असुनीताय वोढवे.
ताभ्यां यमस्य सादनं समितींश्चाव गच्छतात्.. (५६)
हे मृतक! भार ढोने वाले इन बैलों को मैं तेरे लिए छोड़ रहा हूं. मैं इन्हें प्राणों का वहन
करने के लिए बैलगाड़ी में जोड़ता हूं. बैलों से युक्त इस गाड़ी के द्वारा तू यम के घर को प्राप्त
हो. (५६)
एतत् त्वा वासः प्रथमं न्वागन्नपैतदूह यदिहाबिभः पुरा.
इष्टापूर्तमनुसंक्राम विद्वान् यत्र ते दत्तं बहुधा विबन्धुषु.. (५७)
हे मृतक! तू अपने पहने हुए मुख्य वस्त्र को त्याग. जिन इच्छाओं की पूर्ति के लिए तूने
अपने बांधवों को धन दिया था, उस इष्ट कर्म के फल के रूप बावड़ी, कुआं, तालाब आदि को
प्राप्त हो. (५७)
अग्नेर्वर्म परि गोभिर्व्ययस्व सं प्रोर्णुष्व मेदसा पीवसा च.
नेत् त्वा धृष्णुर्हरसा जर्हृषाणो दधृग् विधक्षन् परीङ्खयातै.. (५८)
हे प्रेत! इंद्रियों संबंधी अवयवों से तू अग्नि का पाप निवारक कवच पहन. अपने भीतर
विद्यमान स्थूल चरबी से ये अग्नि तुझे अधिक भस्म करने की इच्छा रखते हुए इधरउधर न
गिराएं. (५८)
दण्डं हस्तादाददानो गतासोः सह श्रोत्रेण वर्चसा बलेन.
अत्रैव त्वमिह वयं सुवीरा विश्वा मृधो अभिमातीर्जयेम.. (५९)
ब्राह्मण के हाथ से बांस के दंड को ग्रहण करता हुआ मैं कानों के तेज तथा उस से प्राप्त
बल से युक्त रहूं. हे प्रेत! तू इस चिता में ही रह. हम इस पृथ्वी पर सुख से रहते हुए अपने