अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 804, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंहम इस श्मशान भूमि को विशेष प्रकार से नापते हैं, जिस से हमें सौ वर्ष से पहले बीच
में ही दूसरा श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (४१)
निरिमां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै. शते शरत्सु नो पुरा.. (४२)
हम दोष रहित करते हुए इस श्मशान को नापते हैं, जिस से हमें सौ वर्ष से पहले बीच में
ही दूसरा श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (४२)
उदिमां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै. शते शरत्सु नो पुरा.. (४३)
उत्कृष्ट साधन वाली नाप से हम इस श्मशान को नापते हैं, जिस से हमें सौ वर्ष से पहले
बीच में ही दूसरा श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (४३)
समिमां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै. शते शरत्सु नो पुरा.. (४४)
इस श्मशान भूमि को हम भलीभांति नापते हैं, जिस से हमें सौ वर्ष से पहले बीच में ही
दूसरा श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (४४)
अमासि मात्रां स्व रगामायुष्मान् भूयासम्.
यथापरं न मासातै शते शरत्सु नो पुरा.. (४५)
मैं ने श्मशान की भूमि को नाप लिया है, उसी नाप के द्वारा मैं इस प्रेत को स्वर्ग भेज
चुका हूं. उस कर्म से ही मैं सौ वर्ष की आयु प्राप्त करूं तथा सौ वर्ष से पहले बीच में ही मुझे
अन्य श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (४५)
प्राणो अपानो व्यान आयुश्चक्षुर्द्दशये सूर्याय.
अपरिपेरेण पथा यमराज्ञः पितॄन् गच्छ.. (४६)
प्राण, अपान, व्यान, आयु तथा चक्षु—सब आदित्य के दर्शन करने वाले हों. हे पुरुष! तू
भी यमराज के प्रत्यक्ष मार्ग के द्वारा पितरों को प्राप्त हो. (४६)
ये अग्रवः शशमानाः परेयुर्हित्वा द्वेषांस्यनपत्यवन्तः.
ते द्यामुरुदित्याविदन्त लोकं नाकस्य पृष्ठे अधि दीध्यानाः.. (४७)
जो पितर संतान रहित होने पर भी पापों का त्याग करते हुए परलोक में गए, वे अंतरिक्ष
को लांघ कर स्वर्ग के ऊपरी भाग में निवास करते हैं तथा पुण्य का फल प्राप्त करते हैं. (४७)
उदन्वती द्यौरवमा पीलुमतीति मध्यमा.
तृतीया ह प्रद्यौरिति यस्यां पितर आस्ते.. (४८)
सब से नीचे उदंचती नाम का द्युलोक है, जिस में जल रहता है. उस के ऊपर अर्थात्
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