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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-१३७ देवता—वनस्पति

यस्ते केशो ऽ वपद्यते समूलो यश्च वृश्चते.
इदं तं विश्वभेषज्या ऽ भि षिञ्चामि वीरुधा.. (३)
हे केशों को दृढ़ करने के इच्छुक पुरुष! तेरा जो केश धरती पर गिरता है तथा जो जड़
रहित काटा जाता है, मैं तेरे उन सभी केशों को, केश संबंधी रोगों का विनाश करने वाली
ओषधि से गीला करता हूं. (३)
सूक्त-१३७ देवता—वनस्पति
यां जमदग्निरखनद् दुहित्रे केशवर्धनीम्.
तां वीतहव्य आभरदसितस्य गृहेभ्यः.. (१)
जमदग्नि ऋषि ने अपनी पुत्री के केशों को बढ़ाने वाली जिस ओषधि को खोदा था, उसे
वीतहव्य महर्षि ने अपने केश बढ़ाने के लिए असित केश नामक मुनि के घर से जिसे चुराया
था. (१)
अभीशुना मेया आसन् व्यामेनानुमेयाः.
केशा नडा इव वर्धन्तां शीर्ष्णस्ते असिताः परि.. (२)
हे केशों को बढ़ाने के इच्छुक पुरुष! पहले तेरे केश अंगुलों में (दो अंगुल, चार अंगुल
आदि रूप में) नापने योग्य थे. इस के पश्चात वे दोनों हाथ फैला कर नापने योग्य हो गए. हे
पुरुष! तेरे शीश के चारों ओर केश नड नामक घास के समान बढ़ें. (२)
दृंह मूलमाग्रं यच्छ वि मध्यं यामयौषधे.
केशा नडा इव वर्धन्ता शीर्ष्णस्ते असिताः परि.. (३)
हे ओषधि, मेरे बालों की जड़ों को दृढ़ बना तथा उन के ऊपरी भाग को लंबा बना. इस
के अतिरिक्त तू मेरे केशों के मध्य भाग को दृढ़ बना. हे पुरुष! तेरे शीश के चारों ओर केश नई
घास के समान बढ़ें. (३)
सूक्त-१३८ देवता—वनस्पति
त्वं वीरुधां श्रेष्ठतमा ऽ भिश्रुता ऽ स्योषधे. इमं मे अद्य पूरुषं
क्लीबमॉपशिनं कृधि.. (१)
हे शक्तिहीन करने वाली जड़ीबूटी! तू सभी लताओं में श्रेष्ठ एवं सभी ओर प्रसिद्ध है.
आज मेरे इस शत्रु पुरुष को नपुंसक तथा स्त्री के समान बना दे. (१)
क्लीबं कृध्योपशिनमथो कुरीरिणं कृधि.
अथास्येन्द्रो ग्रावभ्यामुभे भिनत्त्वाण्ड्यौ.. (२)
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हे जड़ीबूटी! मेरे शत्रु को नपुंसक तथा स्त्री के समान बना दे. तू इसे स्त्री के समान
बड़ेबड़े केशों वाला बना दे. इस के पश्चात इंद्र इस के दोनों अंडकोषों को पत्थरों से फोड़
डालें. (२)
क्लीब क्लीबं त्वा ऽ करं वध्रे वध्रिं त्वा ऽ करमरसारसं त्वा ऽ करम्.
कुरीरमस्य शीर्षणि कुम्बं चाधिनिदध्मसि.. (३)
हे नपुंसक! मैं ने तुझे इस अनुष्ठान के द्वारा नपुंसक बना दिया है. हे षंढ अर्थात्
जन्मजात नपुंसक! मैं ने तुझे षंढ बना दिया है. हे वीर्यहीन! मैं ने तुझे वीर्य रहित बना दिया
है. मैं नपुंसक बने हुए इस पुरुष के शीश पर नारियों के शृंगार बने हुए केश समूह को उत्पन्न
करता हूं. (३)
ये ते नाड्यौ देवकृते ययोस्तिष्ठति वृष्ण्यम्.
ते ते भिनद्मि शम्यया ऽ मुष्या अधि मुष्कयो:.. (४)
तेरी ये नाड़ियां विधाता द्वारा बनाई गई हैं, जिन में वीर्य आश्रय लेता है. मैं अंडकोषों पर
स्थित तेरी उन वीर्यवाहिनी नाड़ियों को पत्थर पर रख कर डंडे से तोड़ता हूं. (४)
यथा नडं कशिपुने स्त्रियो भिन्दन्त्यश्मना.
एवा भिनद्मि ते शेपोऽमुष्या अधि मुष्कयो:.. (५)
स्त्रियां चटाई बनाने के लिए जिस प्रकार नड नामक घास को पत्थर से कूटती हैं, हे
शत्रु! मैं तेरे अंडकोषों को उसी प्रकार पत्थर के ऊपर रख कर दूसरे पत्थर से फोड़ता हूं. (५)
सूक्त-१३८ देवता—वनस्पति
न्यस्तिका रुरोहिथ सुभगंकरणी मम. शतं तव प्रतानास्त्रयस्त्रिंशन्निताना:.
तया सहस्रपर्ण्या हृदयं शोषयामि ते.. (१)
हे शंखपुष्पी! तू दुर्भाग्य के लक्षण को पूरी तरह निगलती हुई उत्पन्न होती है. तू मेरे
सौभाग्य का निर्माण करती है. हे जड़ीबूटी! तेरी सौ शाखाएं तथा तैंतीस जड़ें हैं. हे नारी! इस
हज़ार पत्तों वाली शंखपुष्पी के द्वारा मैं तेरे हृदय को कामाग्नि से संतप्त करता हूं. (१)
शुष्यतु मयि ते हृदयमथो शुष्यत्वास्यम्.
अथो नि शुष्य मां कामेनाथो शुष्कास्या चर.. (२)
हे कामिनी! मेरे विषय में तेरा हृदय संतप्त हो. तेरा मुख भी सूख जाए इस के अतिरिक्त
तू मेरे प्रति अभिलाषा करती हुई अत्यधिक संतप्त हो. तू सूखे मुंह वाली बन कर मेरे समीप
आ. (२)
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संवननीं समुष्पला बभ्रु कल्याणि सं नुद.
अमूं च मां च सं नुद समानं हृदयं कृधि.. (३)
हे पीले पत्तों वाली एवं कल्याण करने वाली जड़ीबूटी! तू वशीकरण करने वाली है. तू
फलों से युक्त हो कर उस नारी को मेरे समीप आने की प्रेरणा दे. इस के पश्चात मुझ कामुक
और कामिनी को मिला दे. (३)
यथोदकमपपुषो ऽ पशुष्यत्यास्यम्.
एवा नि शुष्य मां कामेनाथो शुष्कास्या चर.. (४)
हे कामिनी! जिस प्रकार जल न पीने वालों का मुंह सूख जाता है, उसी प्रकार तू मेरे
प्रति काम भावना से संतप्त हो. तू सूखे मुंह वाली बन कर मेरे समीप आ. (४)
यथा नकुलो विच्छिद्य संदधात्यहिं पुनः.
एवा कामस्य विच्छिन्नं सं धेहि वीर्यावति.. (५)
हे अतिशय वीर्यवर्धक जड़ीबूटी! नेवला जिस प्रकार सांप के टुकड़े कर के पुनः उन्हें
जोड़ता है, उसी प्रकार स्त्री के विमुख होने के कारण जो मुझ में कामविकार आ गया है उसे
दूर कर के मुझे मेरी पत्नी से पुनः मिला दें. (५)
सूक्त-१४० देवता—ब्रह्मणस्पति
यौ व्याघ्राववरूढौ जिघत्सतः पितरं मातरं च.
यौ दन्तौ ब्रह्मणस्पते शिवौ कृणु जातवेदः.. (१)
हे ब्रह्मणस्पति और हे जातवेद अग्नि! बाघ के समान जो दो दांत ऊपर की पंक्ति में
अतिरिक्त रूप से नीचे की ओर मुंह कर के स्थित हैं, वे मातापिता को खाना चाहते हैं. वे दांत
मातापिता का कल्याण करने वाले हों. (१)
व्रीहिमत्तं यवमत्तमथो माषमथो तिलम्.
एष वां भागो निहितो रत्नधेयाय दन्तौ मा हिंसिष्टं पितरं मातरं च.. (२)
हे पहले निकले हुए, ऊपर वाले दो दांतो! तुम गेहूं, जौ, उरद और तिल खाओ. तुम्हारे
रमणीय फल के लिए ही गेहूं, जौ आदि का भाग रखा गया है. तुम माता और पिता की हिंसा
मत करो. (२)
उपहूतौ सयुजौ स्योनौ दन्तौ सुमङ्गलौ.
अन्यत्र वां घोरं तन्व १: परैतु दन्तौ मा हिंसिष्टं पितरं मातरं च.. (३)
दोनों ऊपर वाले दांत देव के द्वारा अनुमति प्राप्त, मित्र बने हुए, सुखकारक एवं शोभन
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हों. हे दोनों दांतो! नरमादा का संकेत करने वाला चिह्न बनाओ. वह चिह्न पुत्र, पौत्र आदि के
रूप में समृद्धि करने वाला हो. (३)
सूक्त-१४१ देवता—अश्विनीकुमार
वायुरेनाः समाकरत् त्वष्टा पोषाय ध्रियताम्.
इन्द्र आभ्यो अधि ब्रवद् रुद्रो भूम्ने चिकित्सतु.. (१)
वायु देव हमारी इन गायों को एकत्र करें, त्वष्टा देव इन्हें पोषण के लिए धारण करें, इंद्र
इन के प्रति प्रेम भरी बातें कहें तथा रुद्र देव इन की संख्या वृद्धि के लिए इन की चिकित्सा
करें. (१)
लोहितेन स्वधितिना मिथुनं कर्णयोः कृधि.
अकर्तामश्विना लक्ष्म तदस्तु प्रजया बहु.. (२)
हे गोपाल! तांबे के बने हुए लाल रंग के शस्त्र से गाय के बछड़ों और बछियों के कानों में
नर और मादा होने का चिह्न बनाओ. अश्विनीकुमार भी इन के कानों में इसी प्रकार का चिह्न
बनाएं. यह चिह्न पूजा के रूप में संख्या में अधिकता प्राप्त करे. (२)
यथा चक्रुर्देवासुरा यथा मनुष्या उत.
एवा सहस्रपोषाय कृणुतं लक्ष्माश्विना.. (३)
देवों और असुरों ने पशुओं के कानों में शस्त्र से जिस प्रकार का नरमादा होने का चिह्न
बनाया, मनुष्यों ने भी इसी प्रकार चिह्न बनाया. अश्विनीकुमार गायों की असीमित वृद्धि के
लिए इसी प्रकार का चिह्न बनाएं. (३)
सूक्त-१४२ देवता—वायु
उच्छ्रयस्व बहुर्भव स्वेन महसा यव.
मृणीहि विश्वा पात्राणि मा त्वा दिव्याशनिर्वधीत्.. (१)
हे जौ अन्न! तू उगता हुआ ऊंचा हो तथा अनेक प्रकार का बन. तू अपने तेज से कुसूल,
कोष्ठ आदि सभी पात्रों को भर दे. आकाश से गिरने वाला वज्र तेरी हिंसा न करे. (१)
आशृण्वन्तं यवं देवं यत्र त्वाच्छा ऽ वदामसि.
तदुच्छ्रयस्वद्यौरिव समुद्र इवैध्यक्षितः.. (२)
सामने हो कर हमारी बात सुनते हुए जौ नामक देव की मैं इस भूमि में प्रार्थना करता हूं.
तू धरती पर आकाश के समान ऊंचा हो तथा सागर के समान क्षय रहित हो कर बढ़. (२)
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अक्षितास्त उपसदो ऽ क्षिताः सन्तु राशयः.
पृणन्तो अक्षिताः सन्वत्तारः सन्वक्षिताः.. (३)
हे जौ! तुझ से संबंधित कर्म करने वाले विनाश रहित हों. तेरे ढेर नाश रहित हों. तुझे
घर में रखने को ले जाने वाले लोग विनाश रहित हों. तुझे खाने वाले लोग भी विनाश रहित
हों. (३)

सातवां कांड
सूक्त-१ देवता—आत्मा
धीती वा ये अनयन् वाचो अग्रं मनसा वा ये ऽ वदन्नृतानि.
तृतीयेन ब्रह्मणा वावृधानास्तुरीयेणामन्वत नाम धेनोः.. (१)
प्रजापति अथवा इंद्र और अग्नि की स्तुति करने वालों ने वाणी व्यवहार के समस्त अर्थ
का ध्यान किया. जिन कहने के इच्छुकों ने देवता वाचक शब्दों के रूप में सत्य बोला, उन्होंने
तृतीय ब्रह्म अर्थात् मध्यमा नामक भाषा शक्ति के द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हुए चौथी अर्थात्
वैखरी वाणी से प्रसन्न होने वाले प्रजापति का नाम उच्चारण किया. (१)
स वेद पुत्रः पितरं स मातरं स सूनुर्भुवत् स भुवत् पुनर्मघः.
स द्यामौर्णोदन्तरिक्षं स्व १: स इदं विश्वमभवत् स आभवत्.. (२)
भलीभांति जानने वाले पुत्रों को अनर्थ से बचाने वाला प्रजापति द्युलोक तथा पृथ्वी को
जानता है. वह प्रजापति संसार के लोगों को अपनेअपने कर्म करने की प्रेरणा देता है. वह
आकाश तथा पृथ्वी को अपनी महिमा से व्याप्त करता है. वह प्रजापति ही यह दिखाई देता
हुआ विश्व बन गया है. (२)
सूक्त-२ देवता—आत्मा
अथर्वाणं पितरं देवबन्धुं मातुर्गर्भं पितुरसुं युवानम्.
य इमं यज्ञं मनसा चिकेत प्र णो वोचस्तमिहेह ब्रवः.. (१)
प्रजाओं के पालक देवों की सृष्टि करने वाले, माता के गर्भ से जन्म लेने वाले बालक को
युवा बनाने वाले एवं गर्भ के जनक को प्राण युक्त करने वाले प्रजापति से मैं अपनी
अभिलाषा की सिद्धि के लिए याचना करता हूं. उस ने इस ज्योतिहोम आदि यज्ञ को मन से
जाना है. हे ब्रह्म! उस प्रजापति को मुझे बताओ. इस बात की अभिलाषा पूर्ण करने वाले यज्ञ
कर्म में बताओ. (१)
सूक्त-३ देवता—आत्मा
अया विष्ठा जनयन् कर्वराणि स हि घृणिरुरुर्वराय गातुः.
स प्रत्युदैद् धरुणं मध्वो अग्रं स्वया तन्वा तन्वमैरयत.. (१)
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