अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 359, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंहों. हे दोनों दांतो! नरमादा का संकेत करने वाला चिह्न बनाओ. वह चिह्न पुत्र, पौत्र आदि के
रूप में समृद्धि करने वाला हो. (३)
सूक्त-१४१ देवता—अश्विनीकुमार
वायुरेनाः समाकरत् त्वष्टा पोषाय ध्रियताम्.
इन्द्र आभ्यो अधि ब्रवद् रुद्रो भूम्ने चिकित्सतु.. (१)
वायु देव हमारी इन गायों को एकत्र करें, त्वष्टा देव इन्हें पोषण के लिए धारण करें, इंद्र
इन के प्रति प्रेम भरी बातें कहें तथा रुद्र देव इन की संख्या वृद्धि के लिए इन की चिकित्सा
करें. (१)
लोहितेन स्वधितिना मिथुनं कर्णयोः कृधि.
अकर्तामश्विना लक्ष्म तदस्तु प्रजया बहु.. (२)
हे गोपाल! तांबे के बने हुए लाल रंग के शस्त्र से गाय के बछड़ों और बछियों के कानों में
नर और मादा होने का चिह्न बनाओ. अश्विनीकुमार भी इन के कानों में इसी प्रकार का चिह्न
बनाएं. यह चिह्न पूजा के रूप में संख्या में अधिकता प्राप्त करे. (२)
यथा चक्रुर्देवासुरा यथा मनुष्या उत.
एवा सहस्रपोषाय कृणुतं लक्ष्माश्विना.. (३)
देवों और असुरों ने पशुओं के कानों में शस्त्र से जिस प्रकार का नरमादा होने का चिह्न
बनाया, मनुष्यों ने भी इसी प्रकार चिह्न बनाया. अश्विनीकुमार गायों की असीमित वृद्धि के
लिए इसी प्रकार का चिह्न बनाएं. (३)
सूक्त-१४२ देवता—वायु
उच्छ्रयस्व बहुर्भव स्वेन महसा यव.
मृणीहि विश्वा पात्राणि मा त्वा दिव्याशनिर्वधीत्.. (१)
हे जौ अन्न! तू उगता हुआ ऊंचा हो तथा अनेक प्रकार का बन. तू अपने तेज से कुसूल,
कोष्ठ आदि सभी पात्रों को भर दे. आकाश से गिरने वाला वज्र तेरी हिंसा न करे. (१)
आशृण्वन्तं यवं देवं यत्र त्वाच्छा ऽ वदामसि.
तदुच्छ्रयस्वद्यौरिव समुद्र इवैध्यक्षितः.. (२)
सामने हो कर हमारी बात सुनते हुए जौ नामक देव की मैं इस भूमि में प्रार्थना करता हूं.
तू धरती पर आकाश के समान ऊंचा हो तथा सागर के समान क्षय रहित हो कर बढ़. (२)
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