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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२३)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२३)

पार्श्वभागसे इधर उधरके राक्षसोंको प्रहार करने लगी, किन्हींको शरीरकी पवनोंसे नष्ट करती हुई ॥ १७ ॥ वह राक्षसोंको भयदायक प्रलय करने लगी, किसीको अट्टहास कर पृष्ठभागसे दो टुकडे करती हुई ॥ १८ ॥

कांश्चित्केशांन्समाकृष्य निष्पिपेष महीतले ॥ सारथान्सगजान्सा-
श्वान्सगदासहतोमरान् ॥ १९ ॥ कांश्चिद्योधान्समाकृष्य मज्जया-
मास वारिधौ ॥ गले चोद्वेष्ट्य केषांचित्प्राणाञ्जग्राह जानकी ॥२०॥

किन्हींके केश पकडकर पीस डालती हुई रथ हाथी घोडे तोमरोंसहित ॥ १९ ॥ खैंचकर किसीको सागरमें डुबाती हुई, किसीका गला घोटकर जानकीने प्राण हरण कर लिये ॥ २० ॥

केषांचित्स्कंध आरुह्य शिरांस्युत्पाटितानि हि ॥ हुंकारेणाट्टहासेन
कांश्चित्प्राणानहापयत् ॥ २१.॥ कांश्चित्प्रचूर्ण्य वदनं पशुमारम-
मारयत् ॥ तान्सर्वान्निमिषेणैव निहत्य जनकात्मजा ॥ २२ ॥

किन्हींके कंधेपर कूदकर शिर तोड़ती हुई, किन्हींके प्राण अट्टहास और हुंकारसे हरण कर लिये ॥ २१ ॥ किन्हींके वदनको चूर्ण कर पशुओंके समान मार डाला. इस प्रकार एक निमेषमात्रमें जानकी उन सबको मारकर ॥ २२ ॥

तेषामंत्रेण शिरसां मालाभिः कृतभूषणा ॥ रावणस्य शिरांस्यु-
ग्राण्यादाय रणमूर्द्धनि ॥ २३ ॥ कंदुकक्रीडनं कर्तुं मनश्चक्रे मन-
स्विनी ॥ एतस्मिन्नंतरे तस्यां रोमकूपेभ्य उद्गताः ॥ २४ ॥

उनके शिरोंकी माला बनाकर धारण करती हुई और रणस्थलमें वे रावणके शिर लेकर ॥ २३ ॥ उनसे वह मनस्विनी गेंदका खेल करनेकी इच्छा करने लगी इसी अवसरमें उसके रोमकूपसे निकलकर ॥ २४ ॥

मातरो विकृताकाराः साट्टहासाः समाययुः ॥ सह कंदुकलीलार्थं
सीतया ताः सहस्रशः २५ ॥ तासां कासांचिदाख्यास्ये नामानि
शृणुसुव्रत ॥ याभिर्व्याप्तास्त्रयो लोकाः कल्याणीभिश्चराचराः । २६

विकृत आकारवाली माताएँ हँसती हुई प्राप्त हुईं, वह सहस्रों कंदुक क्रीडामें जानकीको सहायता देने लगीं ॥ २५ ॥ हे सुव्रत उनमें किन्हींके नाम मैं कहता हूं, जिन कल्याणियोंसे त्रिलोकी व्याप्त रही है ॥ २६ ॥

(१२४) अद्भुतरामायण [ त्रयोविंशति-

प्रभावती विशालाक्षी पालिता गोनसी तथा ॥ श्रीमती बहुला चैव तथैव बहुपुत्रिका ॥ २७ ॥ अप्सुजाता च गोपाली बृहदंबालिका तथा ॥ जयावती मालतिका ध्रुवरत्ना भयंकरी ॥ २८ ॥
प्रभावती विशालाक्षी पालिता गोनसी श्रीमती बहुला बहुपत्रिका ॥ २७ ॥ अप्सुजाता गोपाली बृहदम्बालिका जयावती मालतिका ध्रुवरत्ना भयंकरी २८

वसुदामा सुदामा च विशोका नंदिनी तथा ॥ एकचूडा महाचूडा चक्रनेमिश्चटीतमा ॥ २९ ॥ उत्तेजनी जया सेना कमलाक्ष्यथ शोभना ॥ शत्रुंजया तथा चैव क्रोधना शलभी खरी ॥ ३० ॥
सुदामा वसुदामा विशोका नंदिनी एकचूडा चक्रनेमि चटीतमा ॥ २९ ॥ उत्तेजनी तया सेना कमलाक्षी शोभना शत्रुञ्जया क्रोधना शलभी खरी ॥ ३० ॥

माधवी शुभ्रवस्त्रा च तीर्थसेनी जटोज्ज्वला ॥ गीतप्रिया च कल्याणी कद्रुरोमामिताशना ॥ ३१ ॥ मेघस्वना भोगवती सुभ्रूश्च कनकावती ॥ अलाताक्षी वेगवती विद्युज्जिह्वा च भारती ॥ ३२ ॥
माधवी शुभ्रवस्त्रा तीर्थसेना जटा उज्ज्वला गीतप्रिया कल्याणी कद्रुरोमा अमिताशना ॥ ३१ ॥ मेघस्वना भोगवती सुभ्रू कनकावती अलाताक्षी वेगवती विद्युज्जिह्वा भारती ॥ ३२ ॥

पद्मावती सुनेत्रा च गंधरा बहुयोजना ॥ सन्नालिका महाकाली कमला च महाबला ॥ ३३ ॥ सुदामा बहुदामा च सुप्रभा च यशस्विनी ॥ नृत्यप्रिया परानन्दा शतोदूखलमेखला ॥ ३४ ॥
पद्मावती सुनेत्रा गंधरा बहुयोजना सन्नालिका महाकाला कमला महाबला ३३ सुदामा बहुदामा सुप्रभा यशस्विनी नृत्यप्रिया परामंदा शतोदूख-मलमेखरा ॥ ३४ ॥

शतघंटा शतानंदा आनन्दा भवतारिणी ॥ वपुष्मती चंद्रसीता भद्रकाली सटामला ॥ ३५ ॥ झंकारिकानिष्कुटिका रामा चत्वरवासिनी ॥ सुमला सुस्तनवति वृद्धिकामा जयप्रिया ॥ ३६ ॥
शतघंटा शतानन्दा आनन्दा भवतारिणी वपुष्मती चन्द्रसीता भद्रकाली सठामला ॥ ३५ ॥ झंकारिका निष्कुटिका रामा चत्वरवासिनी सुमला सुस्तनम्रती वृद्धिकामा जयाप्रिया ॥ ३६ ॥