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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (११६)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (११६)

यस्य वाजेषु पवनःफले पावकभास्करौ ।। शरीरमाकाशमयं गौरवे मेरुमन्दरौ ।। ३५ ।। पर्वस्वपि च विन्यस्ता लोकपाला महौजसः ।।
धनदो वरुणश्चैव पाशहस्तस्तथांतकः ।। ३६ ।।
जिसके पंखमें पवन, फलमें अग्नि और सूर्य, आकाशमय शरीर, गुरुतामें मेरुमंदरके समान ।। ३५ ।। जिसकी ग्रंथियोंमें लोकपाल स्थित थे, कुबेर, वरुण, पाश हाथमें लिये यमराज ।। ३६ ।।

जाज्वल्यमानं वपुषा सपुंखं हेमभूषितम् ।। तेजसा सर्वभूतानां कृतं भास्करवर्चसा ।। ३७ ।। सधूममिव कालाग्निं दीप्यमानं रविं यथा ।।
रथनागाश्ववृन्दानां भेदनं क्षिप्रकारिणम् ।। ३८ ।।
शरीरसे प्रकाशमान सुवर्णके पंख बने सूर्यके समान तेजसे सब लोकका प्रकाश करनेवाला ।। ३७ ।। धूमयुक्त कालाग्निके समान, प्रकाशमें सूर्यके समान, रथ हाथियोंका शीघ्र भेदन करनेवाला ।। ३८ ।।

परिघाणां सहस्राणां गिरीणां चैव भेदनम् ।। नानारुधिरसिक्तांगं मेदोदिग्धं सुदारुणम् ।। ३९ ।। कालाभं सुमहानादं नानाशक्तिविना-
शनम् ।। शत्रूणां त्रासजननं सपक्षामिव पन्नगम् ।। ४० ।।
सहस्रों परिघ और पर्वतोंका भेदनेवाला अनेक रुधिरोंसे सिक्त, अंग मेदसे अच्छादित ।। ३९ ।। कालके समान, बडे शब्दसे अनेक शक्तियोंका नाश करनेवाला शत्रुओंका त्रास देनेवाला, पंखयुक्त सर्पके समान ।। ४० ।।

काकगृध्रबकानां च गोमायुवृकरक्षसाम् ।। नित्यं भक्ष्यप्रदं युद्धे राक्षसानां भयावहम् ।। ४१ ।। द्विषतां कीर्तिहरणं प्रकर्षकरमात्मनः ।।
अभिमन्त्र्य ततो रामस्तं महेषुं महाभुजः ।। ४२ ।।
काक, गृध्र, बक, गोमायु (शृगाल) भेडियों तथा राक्षसोंको नित्य भक्षका देनेवाला, राक्षसोंको भयदायक ।। ४१ ।। शत्रुओंकी कीर्तिका हरने-
वाला अपनी उन्नति करनेवाले उस बाणको अभिमंत्रित कर रामचन्द्रने । ४२ ।।

वेदप्रोक्तेन विधिना कुण्डलीकृत्य कार्मुकम् ।। स रावणाय तं वेगाच्चिक्षेप शर मुत्तमम् ।।४३।। स सायको धनुर्मुक्त्तो हन्तुं रामेण रावणम् ।। धूमपूर्वँ प्रजज्वाल प्राप्य वायुपथं महान् ।। ४४ ।।
वेदके कहे विधानसे धनुषपर चढाय रावणके ऊपर बडे वेगसे छोडा ।। ४३ ।।
छोडा हुआ बाण प्रथम धूमयुक्त जल उठा और फिर वायुके मार्गको प्राप्त होकर चला ।। ४४ ।।

( १३० ) अद्भुतरामायण [द्वाविंशति-

तं वज्रमिव दुर्धर्षं वज्रपाणिविसर्जितम् ॥ कृतांतकमिवावार्यं रावणो वीक्ष्य तत्पुरः ॥ ४५ ॥ हुंकृत्य किल जग्राह बाणं वामेन पाणिना ॥ ततस्तं जानुना कृष्य बभंज राक्षसाधिपः ॥ ४६ ॥

इन्द्रके हाथसे छोडे हुए वज्रके समान महादुर्धर्ष कालके समान निवारण करनेके अयोग्य उस बाणको देखकर रावण ॥ ४५ ॥ “हूँ” ऐसा शब्द कर वाम हाथसे वाण ग्रहण कर लेता हुआ, और जंघासे खेंचकर उसको तोड डाला ४६ ।

भग्ने तस्मिञ्छरे रामो विमना इव तस्थिवान् ॥ सहस्रकन्धरः क्रुद्धः क्षुरंप्रगृह्य साय कम् ॥ ४७ ॥ विव्याध रा*घवं वक्षः सर्वप्राणेन राक्षसः ॥ वक्षो निर्भिद्य स शरो रामस्य सुमहात्मनः ॥ ४८ ॥

उस वाणके भग्न होनेसे रामचन्द्र विमन होकर स्थित हुए; तब वह सहस्र-कंधर क्रोध कर तीक्ष्ण वाणको ग्रहण कर ॥ ४७ ॥ सम्पूर्ण बलसे रामचन्द्रकी छातीमें ताडन करता हुआ ॥ ४८ ॥

भित्त्वा महीं च सहसा पाताल तलमाविशत् ॥ ततो रामो महाबाहुः पपात पुष्पकोपरि ॥ ४९ ॥ निःसंज्ञो निश्चलश्चासीद्धाहा भूतानि चक्रिरे ॥ प्राकम्पत मही सर्वा सपर्वतवनाब्धिका ॥ ऋषयः कांदिशीकास्ते हा राम इति वादिनः ॥ ५० ॥

वह बाण रामचंद्रकी छातीको भेदन कर पृथिवी फाडकर पातालमें प्रवेश कर गया; तब महाबाहु राम मूर्च्छित हो पुष्पकमें गिरे ॥ ४९ ॥ निश्चल और अचेतन हो गये, सब प्राणी हाहाकार करने लगे, सब पर्वत और वनोंके सहित पृथिवी कंपित हो गई और हा राम ! इस प्रकारके शब्द ऋषिजन करने लगे ५०

दशशतवदनो जितारिरुग्रोरणशिरसि प्रननर्त सानुयात्रः ॥ गगन-तलगता निपतुरुल्काः प्रलयमिवापि च मेनिरे जनौघाः ॥ ५१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तर कांडे रामस्वप्नायितं नाम द्वाविंशतितमः सर्गः ॥ २२ ॥

शत्रुका जीतनेवाला सहस्रमुखी रावण रणमें नृत्य करने लगा आकाशसे उल्कापात होने लगीं, सब प्राणियोंने जाना अब प्रलय हो जायगी ॥ ५१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे ज्वालाप्रसादमिश्रकृत रामस्वप्नायितं नाम द्वाविंशतितमः सर्गः ॥ २२ ॥


* रावणं राघवसम्बन्धि ।