अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (११३)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (११३)
जिस जिस देशसे आये थे उस उस देशको चले गये, जैसे जबरदस्ती चोरोंको राजसेवक गलहस्त देकर निकालते हैं ॥ ७ ॥ वे अस्त्रवेगसे अपने अपने घर आकर आश्चर्य करने लगे, हम कहां थे कहां आ गये इस प्रकार स्वप्न देखने लगे ॥ ८ ॥
प्रलयानिलवेगेन अस्त्रेण वंचिता भृशम् ॥ भरतो लक्ष्मणश्चापि शत्रुघ्नो हनुमांस्तथा ॥ ९ ॥ सुग्रीवनलनीलाद्या हरयोऽनिलरंहस ॥ विभीषणपुरोगाश्च राक्षसाः क्रूरविक्रमाः ॥ १० ॥
प्रलयकी पवनके वेगसे अत्यन्त आहत हुए भरत, शत्रुघ्न, हनुमान् ॥ ९ ॥ सुग्रीव, नल, नीलादि वानर पवनवेगसे विभीषणादि सम्पूर्ण राक्षस जो बडे पराक्रमी थे ॥ १० ॥
वानराश्च नरा ऋक्षा राक्षसा अक्षता गृहम् ॥ प्राप्यातिवि-
स्मिताः सर्वे शोचंतो राममेवपि ॥ ११ ॥ पुष्करे पुष्पकेतिष्ठन्ससीतो राघवः परम् ॥ आस्ते स्म नास्त्रवेगोऽयं रामं चालयितुं क्षमः । १२ ।
वानर, नर, रीछ, राक्षस सब अक्षत अपने घर प्राप्त हो महाविस्मययुक्त रामचन्द्रके निमित्त शोच करने लगे ॥ ११ ॥ केवल सीतासहित रामचन्द्र पुष्पक विमानमें स्थित रहे, वह अस्त्र रामको चलायमान करनेको समर्थ न हुआ ॥ १२ ॥
महर्षयोऽपि तत्रासन्किमेतदिति विस्मिताः ॥ सापि सीता महा-
भागा तत्रास्ते स्म शुचिस्मिता ॥ १३ ॥ गन्धर्वनगराकारं दृष्ट्वा रागबलं महत् ॥ स्वस्तीतिवादिनः सौम्यशांतिं जेपुर्महर्षयः ॥ १४ ॥
जो महर्षि थे वेभी यह क्या हुआ, इस प्रकार आश्चर्यमें भरकर सोचने लगे; वह महाभागा मनोहर हास्ययुक्त जानकीभी वहीं स्थित रही ॥ १३ ॥ गन्धर्वनगरके समान वह रामकी वडी भारी सेनाको देख स्वस्ति कहकर ऋषिजनशांतिका जप करने लगे ॥ १४ ॥
अन्तरिक्षचराः सर्वे हाहाकारं प्रचक्रिरे ॥ देवा अग्निमुखा विप्र किं कृतं रावणेन हि ॥ १५ ॥ गरुडस्थो यदा विष्णू रावणं हंतुमा-
गत ॥ लीलया लवणांभोधौ क्षिप्तो विष्णुः सनातनः ॥ १६ ॥
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(११४) अद्भुतरामायण [ एकविंशति-
अन्तरिक्षचारी जीव हाहाकार करने लगे, अग्निमुखादि देवता कहने लगे यह रावणने क्या किया ॥ १५ ॥ जिस समय गरुड़पर स्थित विष्णु रावणके मारनेको आये थे तो इसने लीलासेही सागरकी ओर क्षिप्त कर दिया था ॥ १६॥
साट्टहासं विनद्योच्चै रक्षसा वामपाणिना ॥ ततः प्रभृति देवाश्च गंधर्वाः किन्नरा नराः ॥ १७ ॥ गन्धमस्य न गृह्णन्ति शार्दूलस्येव जंबुकाः ॥ सोऽयं विष्णुर्दशरथाज्जातो देवः सनातनः ॥ १८ ॥
और हँसकर बाँये हाथसेही यह कार्य इसने किया था; उस दिनसे देवता गन्धर्व किन्नर अप्सरा ॥ १७ ॥ इसकी गन्धतक ग्रहण नहीं करते हैं, जैसे शार्दूलकी गन्धको जंबुक नहीं ग्रहण करते हैं, वही यह सतातन विष्णु दशरथसे उत्पन्न हुए हैं ॥ १८ ॥
अस्माकं भागधेयेन रामो जयतु रावणम् ॥ परस्परं सुराः सर्वे वदन्तोऽन्तर्हिता स्थिताः ॥ १९ ॥ ननर्द च सहस्रास्याः क्षुद्रं मत्वा स राघवम् ॥ विसिष्मिये च रामोऽपि तद्दृष्ट्वा कर्म दुष्करम् ॥ २० ॥ क्रोधमाहारयामास रावणस्य वधं प्रति ॥ ततः किलकिलाशब्दं चक्रू राक्षसपुंगवाः ॥ २१ ॥ स राघवः पद्मपलाशलोचनो जज्वल कोपेन द्विषज्जयैषणः ॥ रामं प्रहर्तुं न शशाक मेदिनी चकंपिरे वारिधयो ग्रहा अपि ॥ २२ ॥
इत्यार्षे श्रीम० वाल्मी० आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकांडे रामसैन्यविक्षेपणं नामैकविंशतितमः सर्गः ॥ २१ ॥
हमारे भाग्यसे राम रावणको जीतें, इस प्रकार अन्तरमें स्थित हुए सब देवता परस्पर कहने लगे ॥ १९ ॥ और रामचन्द्रको क्षुद्र मानकर रावण गर्जने लगा, उसका यह दुष्कर कर्म देखकर रामचन्द्रको आश्चर्य हुआ ॥ २० ॥ और रावणके वध करनेको वडा क्रोध किया, तब राक्षस किलकिला शब्द करने लगे ॥ २१ ॥ तब कमललोचन रामचन्द्र शत्रुको जीतनेके निमित्त क्रोधसे जल उठे, तब इधर रामके प्रहार करनेको समर्थ न हुआ तब पृथ्वी, सागर और सब ग्रह कंपित होगये ॥ २२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रा० अद्भु० भा०टी० रामसैन्यविक्षेपणं नामकैविंशतितमः सर्गः ॥ २१ ॥