अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०७)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०७)
ओष्ठ दाढोंवाले, अनेक हाथ और शिरवाले ॥ ३३ ॥ अनेक चर्मोंसे आच्छा-
दित; अनेक प्रकारके वस्त्रधारे, महापस्घिके समान भुजवाले, प्रसन्न हो
युद्ध करनेको चले ॥ ३४ ॥
दीर्घग्रीवा दीर्घनखा दीर्घपादशिरोभुजाः ॥ पिंगाक्षा नीलकण्ठाश्च
स्वर्णकर्णाश्च सुव्रत ॥ ३५ ॥ वृकोदरनिभाः केचित्केचिदंजनसं
निभाः ॥ श्वेताक्षा लोहितग्रीवाः पिंगाक्षाश्चतथापरे ॥ ३६ ॥
दीर्घगर्दन, दीर्धनख, दीर्घचरण, दीर्घ शिर और भुजवाले, पिंगाक्ष, नीलकंठ,
स्वर्णकर्णवाले ॥ ३५ ॥ कोई वृकोदरके समान, कोई अञ्जनपर्वतके
समान, श्वेताक्ष, लोहितग्रीव, पिंगाक्ष ॥ ३६ ॥
कल्माषबाहवो विप्र चित्रवर्णाश्च केचन ॥ चामरापीडकनिभाः
श्वेत लोहितकान्तयः ॥ ३७ ॥ नानावर्णाः सुवर्णाश्च मयूरसदृश-
प्रभाः ॥ पाशोद्यतकराः केचिद्व्यादितास्याः खराननाः ॥ ३८ ॥
हे विप्र ! कोई कल्माष (काली) भुजावाले, कोई चित्रवर्ण, चमरकी
पीडाके समान, श्वेत और लाल कांतिवाले ॥ ३७ ॥ अनेक वर्ण और सुवर्ण
मोरके समान कांतिवाले, कोई पाश हाथमें उठाये, कोई मुखफैलाये खरके
समान मुखवाले ॥ ३८ ॥
शतघ्नीचक्रहस्ताश्च तथा मुसलपांणयः ॥ असिमुद्गरहस्ताश्च
दंडहस्ताश्च केचन ॥ ३९ ॥ गदाभुशुण्डिहस्ताश्च तथा तोमरपा-
णयः ॥ आयुधैर्विविधैर्घोरैर्महात्मानो महौजसः ॥ ४० ॥
शतघ्नी, चक्र हाथमें लिये, मुसलहाथमें लिये; कोई असि मुद्गर हाथमें
लिये, कोई दंड हाथमें लिये ॥ ३९ ॥ गदा भुशुण्डी हाथमें लिये, तोमरे
हाथमें लिये तथा महात्मा लोग अनेक घोर आयुध हाथमें लिये ॥ ४० ॥
महाबला महावेगा असंख्याता विनिर्ययुः ॥ घंटाजालपिनद्धांगा
ननृतुस्ते रणाजिरे ॥ ४१ ॥ कोटिशो विक्रतरूक्षभाषिणो यातुधान-
गणसैन्यपालकाः॥दुद्रुवू रघुकुलावतं सकं गृह्णधावनपोथ वादिन ४२॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदि काव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे
रावणपुत्रनिर्याण नामैकोनविंश सर्गः ॥ १९ ॥
महाबली महावेगवान् असंख्यों चले और घंटाजालसे नद्ध हुए रणस्थलमें
नृत्य करने लगे ॥ ४१ ॥ असंख्य विकृत और रूखे बोलनेवाले, राक्षसोंकी
(१०८) अद्भुतरामायण [ विशंति-
सेना पालनेवाले रामचन्द्रके ऊपर धावमान हुए; और पकडो २ ऐसे कठोर वचन बोलने लगे ॥ ४२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये अद्भुतोत्तरकाण्डे भाषाटीकायां रावण-
पुत्रनिर्याणं नाम एकोनविंशः सर्गः ॥ १९ ॥
विशंति सर्ग
संकुलयुद्धवर्णन
धनूंषि च विधुन्वानस्ततो वैश्रवणानुजः ।। कोऽयं किमर्थमायातः
इति चिन्तापरोऽभवत् ।। १ ।। ततो गगनसंभूता वाणी समुपद्यत ।।
भो रावण महावीर्य रामोऽयं समुपागतः ।। २ ।।
तब वह सहस्त्रमुख रावण धनुष्यको कम्पायमान करता हुआ यह कौन कहाँसे आया है यह चिन्ता करने लगा ॥ १ ॥ तब उस समय आकाशसे वाणी हुई हे महावीर्यवान् रावण ! यह रामचन्द्र आये हैं ॥ २ ॥
राघवोऽयमयोध्याया राजा धर्मस्वरूपधृक् ।। लंकायां निहतो येन
दाराकर्शो तवानुजः ।। ३ ।। त्वद्वधार्थमिहायातो विभीषण वसुप्रदः ।।
भ्रातृभिर्वानरैर्ऋक्षै राक्षसैर्मानुषैर्युतः ।। ४ ।।
यह धर्मस्वरूपधारी राम अयोध्याके राजा हैं, यह धर्मका स्वरूप हैं जिन्होंने लंकामें रावणका वध किया है ॥ ३ ॥ यह विभीषणके राज्य देनेवाले हैं। भाई, वानर, ऋक्ष, राक्षस, मनुष्योंको साथ आये हैं ॥ ४ ॥
श्रुत्वा ह्यमानुषं वाक्यं रावणो लोकरावणः ।। क्रोधमाहारयामास
द्विगुणं मुनिपुंगव ।। ५ ।। हन्यतां वध्यतामेष मानुषो रिपुसंज्ञितः ।।
मम विश्वजितः साक्षाद्रणाय समुपस्थितः ।। ६ ।।
लोक रावण रावण यह अमानुषी वचन सुनकर दूना क्रोध करता हुआ बोला ॥ ५ ॥ इस मनुष्यसंज्ञक शत्रुको मारो, वध कर डालो, यह मुझ विश्वके जीतनेवालेसे युद्ध करनेको स्थित हुआ है ॥ ६ ॥
इत्युक्त्वा बाणजालानि चक्रपर्वततोमरान् ।। चिक्षेप सहसा
रक्षः पुष्पकोपरि सुव्रतः ।। ७ ।। राक्षसी सा चमूर्घोरा वानरानृक्ष-
'मानुषान् ।। चखादकांश्चिदपरान्पोथयामासदर्पितान् ।। ८ ।।