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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०१)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०१)

. शंकुकर्ण, पिटरक, कुटीरमुख, सेचक, पूर्णमुख, भाष, शकुलि,हरि ॥ ४९ ॥ अमाहिठ, कामठक, सुषेण, मानस, व्यय; भैरव, मुण्ड, देवांग, चोडपालक ॥ ५० ॥

ऋषभो वेगवान्नाम पिंडारकमहाहनू ॥ रक्तांगः सर्वसारंगः समृद्धः पाटवाकसौ ॥ ५१ ॥ वराहको रावणकः सुचित्रश्चित्रवेगिकः ॥ पराशरस्तरुणिको मणिस्कन्धस्तथारुणिः ॥ ५२ ॥

ऋषभ, वेगवान्, पिण्डारक, महाहनु, रक्तांग, सर्वसारङ्ग, समृद्ध, पाट, वासक ॥ ५१ ॥ वराहक, रावणक, सुत्रिच, चित्रवेगिक, पराशर, तरुणिक, मणिस्कंध, अरुणि ॥ ५२ ॥

सेनाध्यक्षा महाब्रह्मन्कीर्तिताः कीर्तिवर्धनाः ॥ प्राधान्येन बहुत्वात्तु न सर्वे परिकीर्तिताः ॥ ५३ ॥ न शक्याः परिसंख्यातुं ये युद्धाय समागताः॥नीलरक्ता सिता घोरा महाकाया महाबलाः ॥ ५४ ॥

हे ब्रह्मन् ! यह महाकीर्तिवर्द्धन सेनाध्यक्ष कहे हैं प्रधानभी बहुत हैं, विस्तारके कारण सबका वर्णन नहीं किया ॥ ५३ ॥ युद्ध करनेको आये थे उनकी संख्या नहीं हो सकती, नील रक्त सित घोर महाकाय महाबली ॥ ५४ ॥

सप्तशीर्षाद्विशीर्षाश्च पञ्चशीर्षास्तथापरे । कालानलमहाघोरा हुताशसमविग्रहाः ॥ ५५ ॥ महाकाया महावेगाः शैलशृंगसमुच्छ्रयाः । योजनायामविस्तीर्णाद्वियोजनसमुच्छ्रयाः ॥ ५६ ॥

सात शिरके दो शिरके पांचशिरके कालानलके समान महाघोर अग्निके समान शरीरवाले ॥ ५५ ॥ महाकाय महावेगवान् शैलशृंगके समान ऊंचे एक योजनके चौड़े दो योजनके ऊंचे ॥ ५६ ॥

कामरूपाः कामबला दीप्तानलसमत्विषः । अन्ये च बहवः शूराः शूलपट्टिशधारिणः ॥५७॥ दिव्यप्रहरणोपेता नानावेषविभूषिताः ॥ शृणु नामानि चान्येषां येऽन्ये रावणसैनिकाः ॥ ५८ ॥

कामरूपी कामबली दीप्त अनलके समान कान्तिमान् और भी बहुतसे शूर शूल पट्टिश लिये ॥ ५७ ॥ दिव्य प्रहारसे नाना युक्त वेषसे विभूषित थे, रावणके सेनापतियोंके नाम सुनो ॥ ५८ ॥

शंकुकर्णोनिकुम्भश्च पद्मः कुमुद एव च ॥ अनन्तो द्वादशभुजस्तथा कृष्णोपकृष्णकौ ॥ ५९ ॥ घ्राणश्रवाः कपिस्कंधः कांचनाक्षो जलन्धमः ॥ अक्षसंतर्दनो ब्रह्मन्कुनदीकस्तमोऽभ्रकृत् ॥ ६० ॥

(१०२) अद्भुतरामायण [ अष्टादश

  • शंकुकर्ण, निकुम्भ, पद्म, मुकुद, अनन्त, द्वादशभुजा, कृष्ण उपकृष्ण ।। ५९ ।। घ्राणश्रवा, कपिस्कंध, कांचनाक्ष, जलन्धम, अक्षसंतर्दन ,कुनदीक, तमोभ्रकृत् ।। ६० ।।

एकाक्षो द्वादशाक्षश्च तथैवैकजराभिधः ।। सहस्रबाहुर्विकटो व्याघ्राख्य क्षितिकंपनः ।। ६१ ।। पुण्यनामानुनामा च सुवक्त्रः प्रियदर्शनः ।। परिश्रितः कोकनदः प्रियमाल्यानुलेपनः ।। ६२ ।।

एकाक्ष, द्वादशाक्ष, एकजरा, सहस्रबाहु, विकट; व्याघ्र क्षितिकंपन ।। ६१ ।। पुण्यनाम, अनुनाम, सुवक्त्र, परिश्रित, कोकनद, प्रियमाल्यानुलेपन ।। ६२ ।।

अजोदरो गजशिराः स्कंधाक्षः शतलोचनः ।। ज्वालाजिह्वः करालश्च सितकेशो जटी हरिः ।। ६३ ।। चतुर्दंष्ट्रोष्ठजिह्वश्च मेघनादः पृथुश्रवाः ।। विकृताक्षो धनुर्वक्त्रो जाठरो मारुताशनः ।। ६४ ।।

अजोदर, गजशिर, स्कन्धाक्ष, शतलोचन, ज्वालाजिह्व, कराल, सितकेश, जटी, हरि ।। ६३ ।। चतुर्दंष्ट्र, ओष्ठजिह्व, मेघनाद, पृथुश्रव, विकृताक्ष, धनुर्वक्त्रः जाठर मारुताशन ।। ६४ ।।

उदाराक्षो रथाक्षश्च वज्रनाभो वसुप्रभः ।। समुद्रवेगो विपेन्द्रः शैलकम्पी तथैव च ।। ६५ ।। वृषमेषप्रवाहश्च तथा नंदोपनंदकौ ।। धूम्रश्वेतः कलिंगश्च सिद्धार्थो वरदस्तथा ।। ६६ ।।

उदाराक्ष; रथाक्ष, वज्रनाभ, वसुप्रभ, समुद्रवेग, शैलकंपी ।। ६५ ।। वृषमेषप्रवाह, नन्द, उपनन्द, धूम्रश्वेत, कलिंग, सिद्धार्थ, वरद ।। ६६ ।।

प्रियकश्चैकनन्दश्च बहुवीर्यः प्रतापवान् ।। आनंदश्च प्रमोदश्च स्वस्तिको ध्रुवकस्तथा ।। ६७ ।। क्षेमबाहुः सुबाहुश्च सिद्धपात्रश्च सुव्रतः ।। गोव्रजः कनकापीडो महापारिषदेश्वरः ।। ६८ ।।

प्रियक, एकनन्द, बहुवीर्य, प्रतापवान् आनन्द, प्रमोद; स्वस्तिक ध्रुव ।। ६७ ।। क्षेमबाहु, सिद्धपात्र, सुव्रत, गोव्रज, कनकापीड, महापारिषदेश्वर ६८

गायनो दमनश्चैवः बाणः खङ्गश्च वीर्यवान् ।। वैताली गतिताली च तथा कथकवातिकौ ।। ६९ ।। हंसजः पंकदिग्धांगः समुद्रोन्मादनश्च ह ।। रणोत्कटः प्रहासश्च वेतसिद्धश्च नन्दकः ।। ७० ।।