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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

About this granth

This is the Gyan Khand (ज्ञान खण्ड), the second volume of the 108 Upanishad series edited by Pandit Shriram Sharma Acharya. The series sorts the Upanishads into three thematic groups; this one brings together texts focused on knowledge of the Self, Brahman and the world.

As in the other volumes, the Sanskrit mantras are printed with a simple Hindi bhavartha, and running heads mark adhyaya, khanda and mantra numbers. The Katha Upanishad appears here with its two adhyayas and six vallis, carrying the dialogue between Nachiketa and Yama. The introduction places the Upanishads within the four layers of Vedic literature (Samhita, Brahmana, Aranyaka and Upanishad) and contrasts their emphasis on knowledge with the ritual concerns of the earlier layers.

The copy was published by Yug Nirman Yojana, Gayatri Tapobhumi, Mathura, in 2005 and runs to 505 pages, making it the largest of the three parts in this printing.

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४३८ [परिशिष्ट] आवागमन-चक्र
३०. आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक — सम्पूर्ण विषयों या ज्ञान को तीन वर्गों में विभाजित किया
गया है- १. आधिभौतिक २. आधिदैविक ३. आध्यात्मिक। अन्यान्य प्राणियों के शरीरों अथवा स्थूल भौतिक तत्त्वों
से सम्बन्धित विषय आधिभौतिक कहलाते हैं। दैवीय गुणों या देव सम्बन्धी विषयों को आधिदैविक कहा गया है।
मन अथवा आत्म तत्त्व से सम्बन्धित विषय आध्यात्मिक कहलाते हैं। केनोपनिषद् में आध्यात्मिक तथ्य (उदाहरण)
इस प्रकार है कि हमारा मन ब्रह्म के समीप जाता हुआ प्रतीत होता है, उस ब्रह्म का निरन्तर तीव्रता से स्मरण करता
है, इसी मन के द्वारा ब्रह्म प्राप्ति का संकल्प लेता है- अथाध्यात्मं यदेतद्गच्छतीव च मनोऽनेन चैतदुपस्मरत्यभीक्ष्णः
सङ्कल्पः (केन० ४.५)।
३१. आनन्द-परमानन्द — आनन्द का शाब्दिक अर्थ है- सम्यक् रूप से प्रसन्नता (आ+नन्द)। यह आत्मा अथवा
परमात्मा के तीन अनिवार्य गुणों (सत्+चित्+आनन्द) में से एक है। अतः यह आत्मतत्त्व से सम्बन्धित है। आत्मा
पञ्चकोशों के आवरण में आबद्ध है- जिनमें अन्तिम पंचमकोश आनन्दमय कोश है। यह विशिष्ट आध्यात्मिक सुख
है। उपनिषद् के अनुसार आनन्द से ही सभी भूत (प्राणी) उत्पन्न होते हैं, आनन्द से ही जीवित रहते हैं और आनन्द
में ही विलीन हो जाते हैं- आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं
प्रयन्त्यभि संविशन्तीति (तैत्ति० ३.६)। उपनिषदों में अनेक स्थानों पर आत्मा के आनन्दस्वरूप होने का उल्लेख
मिलता है- आनन्दरूपममृतं यद्विभाति (मुण्ड०२.२.७), आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् (तैत्ति० ३.६.१), आनन्द
आत्मा (तैत्ति०२.५.१)। आत्मा को परमानन्द स्वरूप भी कहा गया है। इसका तात्पर्य निरतिशय सुखस्वरूप अथवा
सर्वोच्च आनन्द स्वरूप से है। ब्रह्म की आनन्दरूपता को 'रसो वै सः' (तैत्ति० २. ७) के द्वारा भी प्रतिपादित किया
गया है। ब्रह्म अपार अथवा अनन्त आनंद का सागर है।
३२. आपः — आपः शब्द विशेषतया 'जल' के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। इसीलिए बादल के लिए आपधर और समुद्र
के लिए आपनिधि शब्द प्रयुक्त हुआ है। जल के प्रवाह या आकाश के लिए भी आपः शब्द का उपयोग किया जाता
है। आकाश में सतत संचरणशील प्रवाह या आकाशीय ईथर तत्त्व से भी इसकी संगति बिठाई गयी है। संभवतः
प्राणरूप होने के कारण आपः को तुलना अन्न से को गयी है- आपो वा अन्नम् (तैत्ति० ३.८.१)। आपः (जल)
में तेज प्रतिष्ठित है और तेज में आपः-अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम्। ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः (तैत्ति०३.८.१)। वैदिक
संहिताओं में आपः देवता को कई सूक्तों में स्तुति को गयी है, यहाँ इसका भावार्थ प्रायः सूक्ष्म आकाशीय तत्त्वों
(सृष्टि संरचना की मूलभूत इकाई) के रूप में लिया गया है। आपः को प्राणरूप में भी निरूपित किया गया है-
प्राणो ह्वापः (जैमि० ३.१०. ९)। वरुणदेव जल में प्रतिष्ठित हैं- स वरुणः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति। अप्स्विति
(बृह०३.९.२२)। सम्पूर्ण देवगणों को भी आपः से सम्बद्ध बताया गया है-आपो वै सर्वा देवताः (ना०प०३.७९)।
३३. आयतन — आयतन शब्द के पर्यायवाची शब्द हैं- स्थान, मंदिर, विश्रामालय आदि। पुराणों में पवित्र स्थान,
मंदिर आदि अर्थ में आयतन शब्द प्रयुक्त हुआ है, जैसे- देवायतन, शिवायतन आदि। विष्णु भगवान् को मङ्गल का
आयतन कहकर निरूपित किया गया है- मङ्गलं भगवान् विष्णुः मङ्गलं गरुडध्वजः। मङ्गलं पुण्डरीकाक्षो
मङ्गलायतनो हरिः ॥ छान्दोग्योपनिषद् में वर्णन मिलता है कि जो आयतन को जानता है, वह अपने बन्धु-बान्धवों
का आयतन (आश्रय) होता है। निश्चय ही मन (सम्पूर्ण इन्द्रियों का) आयतन है- यो ह वा आयतनं वेदायतनः
ह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् (छान्दो० ५.१.५)। प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन- यह चतुष्कल पाद ब्रह्म का
आयतनवान् नाम वाला है-प्राणः कला। चक्षुः कला। श्रोत्रं कला। मनः कला। एष वै सोम्य चतुष्कलः पादो
ब्रह्मण आयतनवान्नाम (छान्दो० ४.८.३)।
३४. आवागमन-चक्र — बार-बार जन्म लेना और मरना, भूतल पर आना और जाना, जीवात्मा का विभिन्न योनियों
में परिभ्रमण करना आवागमन-चक्र कहलाता है। सभी हिन्दू दार्शनिक और धार्मिक सम्प्रदायों की यह मान्यता है
कि जब तक जीव को मोक्ष प्राप्त नहीं होता, वह आवागमन-चक्र में परिभ्रमण करता रहता है। अच्छे-बुरे कर्मों के
आधार पर उसे ८४ लाख योनियों में से किस योनि में पुनर्जन्म होगा, इसका निर्धारण होता है। आवागमन-चक्र को
भव-बन्धन, संसार चक्र या जन्म-मरण चक्र भी कहते हैं। गीता में कहा गया है कि प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने
वाला और पापों को धो डालने वाला अनेक जन्मों के बाद सिद्ध होकर फिर परमगति (मुक्ति) को प्राप्त करता है-

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आशा ( परिशिष्ट ) ४३९
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः। अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥ (गी० ६.४५) जो
आकाश में स्थित निष्कल तत्त्व का ध्यान करता है, वह भवबन्धन से मुक्त हो जाता है-नभस्थं निष्कलं ध्यात्वा
मुच्यते भवबन्धनात् (ब्र०बि०२०)।
३५. आशा — किसी अप्राप्त के पाने की इच्छा को आशा कहते हैं। अभिलषित वस्तुओं के लिए भी आशा शब्द प्रयुक्त
हुआ है। ऋषि कहते हैं, पितृगण के लिए स्वधा, मनुष्यों के लिए आशा (इष्ट वस्तुएँ), पशुओं के लिए तृण और
जल का आगान करूँ-आशां मनुष्येभ्यः ( आगायानि ) (छान्दो० २.२२.२)। देवगण निश्चय ही सम्पूर्ण विश्व को
आशाओं का प्रतिरक्षण करते हैं- एता ह वै देवता विश्वा आशाः प्रतिरक्षन्ति (जैमि० १.३४.११)। जगत् में
सर्वप्रथम आशा ही थी, भविष्य में भी वही है, तब सर्वप्रथम अप् तत्त्व संन्यास हुआ-आशा वा इदमग्र आसीद्
भविष्यदेव। तदभवत् । ता आपोऽभवन् (जैमि० ४. २२. १)। उपनिषद् में आशा को पिशाचिनी कहा गया है,
जो अन्तःकरण में पाये जाने वाले आनन्द के आश्रय में रहती है-आनन्दमंतर्निजमाश्रयन्तमाशापिशाचीमवमानयन्तम्
(मैत्रे० १.१२)। मनुष्य अपनी पत्नी को तरह सम्पूर्ण जीवन भर 'आशा' की पूर्ति के लिए अपनी शक्तियों का व्यय
करता रहता है, अतः उपनिषद् में निर्देश है कि आशारूप पत्नी को त्यागने वाला तत्काल ही मुक्ति को प्राप्त होता
है- आशापत्नीं त्यजेद्भावत्तावन्मुक्तो न संशयः (मैत्रे० २.१२)।
३६. आसक्ति —द्र०- मोह।
३७. आस्तिकता — वेद, परमेश्वर और परलोक इत्यादि में विश्वास करने वाला अथवा ईश्वर के अस्तित्व को
स्वीकारने वाला अथवा ईश्वर की सर्वव्यापकता और न्यायकारिता का अनुभव करने वाला आस्तिक और उनका यह
गुण आस्तिकता कहलाता है। दर्शन ग्रन्थों में ईश्वर या वेद के प्रति विश्वास दृष्टिगोचर होता है। ईश्वर सर्वव्यापी और
न्यायकारी है, ईश्वर की इस सत्ता पर विश्वास ही आस्तिकता है। शंकराचार्य के अनुसार मोक्ष और वेद में श्रद्धा रखना
ही आस्तिकता है। मनुस्मृति में भगवान् मनु ने कहा है-नास्तिको वेद निन्दकः अर्थात् वेद का निन्दक ही नास्तिक
है। विद्वानों ने नास्तिक को व्युत्पत्तिपरक व्याख्या इस प्रकार को है-नास्ति ( परलोक ) इति मतिर्यस्य स
नास्तिकः (अष्टा० ४.४.६० की वृत्ति) 'जिसकी मति परलोक की सत्ता में विश्वास नहीं रखती, वह नास्तिक है'।
३८. इन्द्रिय दमन — शरीर के वे अंग जिनकी शक्ति हमें विषयों का ज्ञान या बोध कराती है 'इन्द्रियाँ' कहे जाते
हैं। संस्कारों के प्रभाववश मनुष्य प्रायः इन्द्रियों के माध्यम से अपनी जीवनीशक्ति विषयभोग और कायिक लिप्साओं
में गँवाता जाता है। इन्द्रियों को तुष्टि के लिए वह प्रायः फुलझड़ी की तरह अपना बहुमूल्य जीवन रस जलाता रहता
है। साधक को योग पथ पर सर्वप्रथम इन्द्रियों को दबाना या बलपूर्वक शान्त करना पड़ता है। इन्द्रियों के नियंत्रण
या निरोध की इस प्रक्रिया को इन्द्रिय दमन या इन्द्रिय निग्रह कहते हैं। इसी के द्वारा साधक शक्ति संचय करता हुआ
ईश्वर या ब्रह्म से योग प्राप्त करने की स्थिति में हो पाता है। गीता के अनुसार जिसकी इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसकी
प्रज्ञा स्थिर होती है-वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता (गी०२.६१)। उपनिषद् में इन्द्रिय निग्रह को ही
शौच (शुचिता) कहकर निरूपित किया गया है-शौचम् इन्द्रियनिग्रहः (मैत्रे०२.३)। प्रजापति ने देवों को उपदेश
किया था-हे भोग प्रधान देवो ! इन्द्रियों का दमन करो (बृह०५.२.३)।
३९. इन्द्रियाँ —द्र० - अन्तःकरण चतुष्टय।
४०. इष्टापूर्त — वेद का पठन-पाठन, अग्निहोत्र और अतिथि सत्कार इष्ट कहलाते हैं और कुआँ, तालाब खुदवाना,
देवमंदिर बनवाना, बगीचा लगाना आदि कर्म पूर्त कहलाते हैं। दूसरे शब्दों में यज्ञ-यागादि अदृश्य फल वाले कर्मों
को इष्ट कहते हैं और लोकहितकारी दृश्य फल वाले कर्मों को पूर्त कहते हैं अर्थात् लोक-परलोक के हितकारी सभी
कर्मों को इष्टापूर्त कहते हैं। आत्मज्ञान को प्रधान मानने वाली उपनिषद् में वर्णन मिलता है कि इष्टापूर्त कर्मों को ही
श्रेष्ठ मानने वाले विमूढ़ लोग उससे भिन्न यथार्थ श्रेय को नहीं जानते-इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते
प्रमूढाः (मुण्ड० १.२.१०)। कठोपनिषद् में वर्णन है कि ब्राह्मण का सत्कार न करने वाले के उत्तमवाणी के फल
और इष्टापूर्त कर्मों के फल का नाश हो जाता है (कठ०१.१.८)। मनुष्यों में जो लोग इष्टापूर्त कर्मों को ही करने योग्य
कर्म मानकर उनकी उपासना करते हैं, वे चन्द्रमा के लोक को ही जीतते हैं- तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते
ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते (प्रश्न०१.९)।

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४४० परिशिष्ट उपनिषद्
४१. ईश्वर-जीव — अद्वैत वेदान्त में 'एकमेवाद्वितीयम्' जैसे श्रुति वचनों द्वारा जिस नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, कूटस्थ,
निष्क्रिय, अविकारी आदि विशेषणों से विभूषित परम चैतन्य का प्रतिपादन है, उसी को 'ब्रह्म' कहा गया है।
'ब्रह्म' के दो रूपों की परिकल्पना वेदान्त ग्रन्थों में प्राप्त होती है-प्रथम-परब्रह्म, द्वितीय-अपरब्रह्म। 'परब्रह्म' वह
है, जो अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम् ......अर्थात् शब्दस्पर्शादिरहित, शुद्ध-बुद्ध, मुक्त स्वभाव वाला है। यह अविकारी
और कूटस्थ है। यही 'ब्रह्म' जब सृष्टि-सृजन हेतु संकल्पवान् होता है, तो माया की शक्ति से समन्वित हो जाता है,
इसे 'अपरब्रह्म' या 'सगुणब्रह्म' कहते हैं। इसी अपरब्रह्म को 'ईश्वर' भी कहा जाता है। 'माया' से परिच्छिन्न होने
पर ही ब्रह्म का ईश्वरत्व, सर्वज्ञत्व तथा जगत् कारणत्व आदि सिद्ध होता है। जैसा कि विद्यारण्य स्वामी ने लिखा है-
तच्छक्त्युपाधिसंयोगाद् ब्रह्मैवेश्वरतां व्रजेत् (पंच०३.४०)। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि माया को उपाधि से
अवच्छिन्न (संयुक्त) ब्रह्म ही ईश्वर है। माया ईश्वर के अधीन होती है और जब माया (अविद्या) चैतन्य को अपने
वशीभूत कर लेती है, तो वह अविद्याग्रस्त चैतन्य 'जीव' कहा जाता है। माया से संयुक्त, किन्तु माया को अपना
वशवर्ती बनाने वाला चैतन्य ईश्वर और माया का वशवर्ती बना चैतन्य 'जीव' कहा जाता है, वस्तुतः ये दोनों उस
परब्रह्म के ही रूप हैं।
'ईश्वर' को जगत् का निमित्त कारण माना जाता है। जैसे कुम्भकार घड़ा बनाता है, तो घड़े का निमित्त
कारण कुम्भकार हुआ, किन्तु घड़ा बनता है मिट्टी से, इसलिए मिट्टी 'उपादान' कारण है, परन्तु जगत् के निर्माण
में ईश्वर निमित्त कारण भी है और उपादान कारण भी, क्योंकि वही विविध नाम रूपात्मक जगत् के रूप में परिणत
हो जाता है, जैसे मकड़ी जाला बनाती है, तो जाला बनाने की योग्यता के कारण वह निमित्त कारण होती है और
जाला बनाने का पदार्थ भी अपने भीतर शरीर से ही निःसृत करती है, इसलिए वही उपादान कारण भी होती है।
आवरण और विक्षेप शक्ति के आधार पर ईश्वर की उपादान कारणता सिद्ध होती है। जैसे रस्सी में सर्प की प्रतीति।
आवरण शक्ति से 'रस्सी' का स्वरूप ढँक जाता है और विक्षेप शक्ति से 'रस्सी' के स्थान पर सर्प की प्रतीति होने
लगती है। इसी तरह से आवरण शक्ति से ईश्वर का स्वरूप ढँक जाता है और विक्षेप द्वारा ईश्वर जगत् के रूप में
दिखने लगता है। इस प्रकार 'ईश्वर' जगत् का निमित्त कारण तथा उपादान कारण दोनों है। जैसा कि डॉ० राधाकृष्णन्
जी ने लिखा है-'ईश्वर' बिना साधनों से सृष्टि रचना करता है। अपनी महान् शक्तियों के द्वारा वह अपने को अनेक
कार्यरूपों में परिणत कर लेने में समर्थ है।
४२. उद्गीथ — उद्गीथ शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है- उद्+गै+थक्। अमरकोश के अनुसार इसका अर्थ है-
प्रणवः सामवेद ध्वनिः इत्यरुणः (५.१९ वृत्ति)। उद्गीथ एक प्रकार का सामगान है। प्रणव अथवा ओंकार को
भी उद्गीथ कहा गया है। ॐ यह अक्षर उद्गीथ का प्रतीक है- ओमित्येतदक्षरमुद्गीथः (छान्दो०१.१.५)। साम
के भेद या विभाग इस प्रकार किये गये हैं- हिंकार, प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार, उपद्रव और निधन। यहाँ प्राण को
उद्गीथ रूप वर्णित किया गया है- मन एव हिंकारो वाक् प्रस्तावः प्राण उद्गीथः (जैमि०१.३३.३)। उद्गीथ
को देवों के लिए अमृत कहा गया है-उद्गीथं देवेभ्योऽमृतम् (जैमि० १.११.८)। जो उद्गीथ है, वही प्रणव अक्षर
है और जो प्रणव है, वही उद्गीथ है। विचरणशील सूर्य भी उद्गीथ ही है- अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः
प्रणवः स उद्गीथ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथः (छान्दो०१.५.१)। वाणी का रस ऋचा है, ऋचा का रस साम है
और साम का रस उद्गीथ है- वाचः ऋग्रसः ऋचः सामरसः साम्नः उद्गीथो रसः (छान्दो०१.१.२)।
४३. उपनिषद् — 'उपनिषद्' शब्द की व्युत्पत्ति में सद् 'षदॢ विशरणगत्यवसादनेषु' धातु के पहले 'उप' और
'नि' ये दो उपसर्ग और अन्त में 'क्विप्' प्रत्यय लगता है। जिसका भावार्थ है-गुरु के निकट गूढ़ धर्म एवं रहस्यमय
ज्ञान प्राप्ति के लिए बैठना। अमरकोश में उपनिषद् शब्द का अर्थ (धर्मे रहस्युपनिषत् स्यात् ) गूढ़ धर्म एवं रहस्य
लिया गया है। उपनिषद् में जीवन और जगत् के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन, निरूपण तथा विवेचन है।
वैदिक साहित्य के चार भाग किये गये हैं-१. संहिता, २. ब्राह्मण, ३. आरण्यक तथा ४. उपनिषद्। वैदिक
साहित्य का अन्तिम भाग होने से उपनिषद् वेदान्त भी कहा जाता है। उपनिषद् का प्रमुख विषय ब्रह्म का निरूपण
होने से इन्हें ब्रह्मविद्या भी कहा गया है। उपनिषदों में दो प्रकार की विद्याओं का उल्लेख है- १. परा और २. अपरा।
पराविद्या ब्रह्मविद्या है, जिसका प्रमुख प्रतिपाद्य विषय ब्रह्म है। अपरा विद्या के अन्तर्गत संहिताओं, ब्राह्मणों तथा

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उपप्राण [परिशिष्ट] ४४१

वेदाङ्गों का विवेचन दृष्टिगोचर होता है। उपनिषदों को कालक्रम के आधार पर दो भागों में विभाजित किया जा
सकता है-१. प्राचीन उपनिषद्, २. परवर्ती उपनिषद्। प्राचीन उपनिषद् वैदिक शाखाओं पर आधारित हैं। परवर्ती
उपनिषद् मध्ययुग के धार्मिक सम्प्रदायों की देन हैं। उस ब्रह्म विषयक (ब्राह्मी) उपनिषद् (रहस्यमयी विद्या) का
विवरण केनोपनिषद् में मिलता है। उस ब्रह्मविद्या के तीन आधार हैं- तप, दमन (इन्द्रिय-निग्रह) और निष्काम
कर्म। सम्पूर्ण वेद उसी के अङ्ग हैं और सत्यरूप परमात्मा ही उसका अधिष्ठाता है-ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति।
तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा। वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् (केन०४.७-८)। साधक यथार्थ तत्त्व को प्रकट
करने वाली (उपनिषद्) विद्या के द्वारा जो कुछ भी श्रद्धापूर्वक करता है, वही अधिकाधिक सामर्थ्ययुक्त होता है-
यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति (छान्दो०१.१.१०)।

४४. उपप्राण - द्र० - प्राण।

४५. उपाधि- जो वस्तु जिस विशेष रूप में दिखाई देती है, उस विशेष रूप को उस वस्तु को उपाधि कहते हैं अथवा
जिसके संयोग से कोई वस्तु किसी विशेष रूप में दिखाई देती है, उसे उस वस्तु की उपाधि कहते हैं। जैसे साधारण
वस्त्र जब किसी रंग विशेष में रंग दिया जाता है, तो वह उसी रंग का-लाल, नीला हो जाता है। यह लाल, नीला
रंग उस वस्त्र को उपाधि कहलाता है। वेदान्त दर्शन में माया के संयोग या असंयोग से ब्रह्म के दो भेद निरूपित किये
गये हैं- सोपाधि ब्रह्म (जीव) और निरुपाधि ब्रह्म। सोपाधि ब्रह्म की ब्रह्म का सगुणरूप तथा निरुपाधि ब्रह्म को
ब्रह्म का निर्गुण रूप स्वीकार किया गया है। वह परब्रह्म त्वं और तत् आदि उपाधियों से भी परे है। मन आदि सूक्ष्म
तत्त्वों की उपाधि जो आत्मा के साथ संयुक्त रहती है, उसे लिङ्ग शरीर कहते हैं।

४६. उपासना- जीव अपने इष्ट से एकाकार होने का अभ्यास जिस प्रक्रिया से करता है, उसे उपासना कहते हैं।
इसमें भक्त भगवान् के प्रति समर्पण का अभ्यास करता है और शनैः-शनैः तद्रूप होने लगता है। उपासना का अर्थ
पास बैठना (उप= समीप+आसन= बैठना) अथवा सेवा के रूप में विशेष रूप से लिया जाता है। कहीं-कहीं इसका
अर्थ उपवास करना भी लिया गया है। उपनिषद् में कहा गया है जो केवल अविद्या (पदार्थपरक विद्या) की उपासना
करते हैं, वे घोर अंधकार में फँस जाते हैं और जो केवल विद्या (चेतनापरक) की उपासना करते हैं, वे भी घोर
अंधकार में फँस जाते हैं (ईश०९)। उपासना को ब्रह्म साक्षात्कार का साधन स्वीकार किया गया है। उपासना से
साधक का चित्त एकाग्र हो जाता है। यह चित्त की एकाग्रता निर्विशेष ब्रह्म का साक्षात्कार कराने में समर्थ है-
सगुणोपासनमपि चित्तैकाग्र्य द्वारा निर्विशेषब्रह्मसाक्षात्कारे हेतुः (वे०परि०)।

४७. ऋत-सत्य- प्रिय भाषण या सत्य वचन के अर्थ में सामान्यतः ऋत शब्द का प्रयोग होता है। इसके अन्य
पर्यायवाची शब्द हैं- मोक्ष, जल, कर्मफल, यज्ञ, सूर्य, ब्रह्म, प्राकृतिक नियम, ईश्वरीय नियम, अनुकूल वचन। ऋत
शब्द का प्रयोग अनुकूल वचन के अर्थ में इस प्रकार हुआ है- ऋतं वदिष्यामि (तै०आ०७.१.१)। ऋतं च सत्यं
च वदत (तै०सं०३.२.७.१)। यज्ञ को भी ऋत कहा गया है- एष वा ऋतस्य पन्था यद्यज्ञः (मै०ब्रा०४.८.२),
यज्ञो वाऽ ऋतस्य योनिः (शत०ब्रा०१.३.४.१६)। ॐ तथा ब्रह्म को भी ऋत से सम्बद्ध किया गया है-
ओमित्येतदेवाक्षरममृतम् (जैमि०३.३६.५), ब्रह्म वा ऋतम् (शत०ब्रा०४.१.४.१०)। मन को भी ऋत कहकर
निरूपित किया गया है-मनो वा ऋतम् (जैमि०३.३६.५)।
वस्तुतः शाश्वत अटल नियम को ऋत कहते हैं और देश, काल के अनुसार बदल जाने वाले नियम को
'सत्य' कहते हैं। जल का नीचे की ओर प्रवाहित होना, अग्नि की लपटों का ऊपर की ओर उठना, सूर्य का उदय
पूर्व दिशा में होना इत्यादि शाश्वत नियमों को 'ऋत' कहेंगे और ठण्डक के दिनों में भारत में दिन का छोटा होना,
रात्रि का बड़ा होना, गर्मी में दिन का बड़ा होना, रात्रि का छोटा होना जैसे नियम देश, काल के अनुसार बदलते हैं,
सर्दी-गर्मी का मौसम बदलता रहता है। यह सत्य है, किन्तु ऋत नहीं।

४८. ऋत्विज्- यज्ञ कराने वाले-याज्ञिक को ऋत्विज् कहा गया है। ऋत्विजों में चार प्रमुख होते हैं-ब्रह्मा, अध्वर्यु,
होता और उद्गाता। कहीं-कहीं प्रमुख ऋत्विजों को संख्या सात मानी गई है- होता, पोता, नेष्टा, आग्नीध्र, प्रशास्ता,
अध्वर्यु और ब्रह्मा। ब्रह्मा यज्ञ की देखरेख मौन रहकर करता था। अध्वर्यु यज्ञ में व्यावहारिक कार्य-निर्देश एवं
व्याख्या करता था। होता ऋचाओं का-यज्ञमंत्रों का उच्चारण तथा देवस्तुति करता था। उद्गाता का सम्बन्ध यज्ञ में

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४४२ [परिशिष्ट] एकादशद्वार-एकादश अक्ष
गायन (सामगान आदि) से होता था। बड़े यज्ञों में इन चारों ऋत्विजों के तीन-तीन अन्य सहयोगी भी होते थे। इस
प्रकार यज्ञ में सोलह ऋत्विज् वरण किये जाते थे-षोडशर्त्विजो ब्रह्मोद्गातु होत्रध्वर्यु...... (का०श्रौ० ७.१.७)।
चत्वारस्त्रिपुरुषाः। तस्य तस्योत्तरे त्रयः (आ०श्रौ०४.१.४-५)। ब्रह्मा के सहयोगी ऋत्विज्-ब्राह्मणाच्छंसी, आग्नीध्र
एवं पोता, अध्वर्यु के सहयोगी ऋत्विज्-प्रतिप्रस्थाता, नेष्टा और उन्नेता, होता के सहयोगी ऋत्विज्-मैत्रावरुण,
अच्छावाक् और ग्रावस्तुत् एवं उद्गाता के सहयोगी ऋत्विज्-प्रस्तोता, प्रतिहर्ता एवं सुब्रह्मण्य होते थे।
४९. ऋद्धि-सिद्धि — ऋद्धि भौतिक समृद्धि का द्योतक है और सिद्धि आध्यात्मिक विभूति या सफलता आदि का
द्योतक है। दूसरे शब्दों में ऋद्धि-सिद्धि समृद्धि और सफलता का बोधक है। ऋद्धि को लौकिक सुख-सम्पदा से तथा
सिद्धि को अलौकिक शक्ति या विभूति से सम्बद्ध किया जाता है। योग की अष्टसिद्धियाँ प्रसिद्ध हैं- अणिमा, महिमा,
गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व। भगवान् ने गीता में कहा है कि मेरे निमित्त कर्मों को करता
हुआ तू सिद्धि को प्राप्त होगा-मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि (गी० १२.१०)।
५०. ऋषि — वेद मन्त्रों का द्रष्टा या उनका साक्षात्कार करने वाला या आध्यात्मिक तत्त्वों का द्रष्टा और प्रयोक्ता ऋषि
कहलाता है। वेद मन्त्रों का अनुभूतिजन्य तत्त्वदर्शन समझने वाले, त्रिकालज्ञ, दिव्यदृष्टि सम्पन्न परोक्ष द्रष्टा को भी
ऋषि कहते हैं। रत्नकोष के अनुसार ऋषि सात प्रकार के हैं-ब्रह्मर्षि, देवर्षि, महर्षि, परमर्षि, काण्डर्षि, श्रुतर्षि,
राजर्षि। भिन्न-भिन्न मन्वन्तरों में भिन्न-भिन्न ऋषि हुए हैं। इस वैवस्वत मन्वन्तर के सप्तर्षि ये हैं-कश्यप, अत्रि,
वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भरद्वाज। अपाला, विश्ववारा, घोषा, सूर्या आदि महिलाओं ने भी वैदिक
काल में ऋषित्व को प्राप्त किया था। उपनिषद् में वर्णन है कि ऋषिगण जो आसक्ति से परे विशुद्ध अन्तःकरण वाले
होते हैं, वे परमात्मा को प्राप्त होकर ज्ञान से तृप्त और परम शान्त हो जाते हैं- संप्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः कृतात्मानो
वीतरागाः प्रशान्ताः (मुंड० ३.२.५)। गीता में भी वर्णन मिलता है कि निष्पाप, छल, कपटरहित संयत आत्मा
वाले सब प्राणियों के हित में रत रहने वाले, ऋषिगण ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त करते हैं-लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः
क्षीणकल्मषाः। छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः (गी० ५.२५)।
५१. एकत्व-ऐक्य — उपनिषदों में जीव और ब्रह्म में-आत्मा और परमात्मा में एकत्व-ऐक्य (एक होने का भाव)
प्रतिपादित किया गया है। जीवो ब्रह्मैव नापरः; एकमेवाद्वितीयम् (छान्दो० ६.२.१)। ब्रह्म ही अज्ञान की उपाधि
से संयुक्त होकर जीव कहलाता है। एक ही ईश्वर (इन्द्र) माया से संयुक्त होकर विविध रूपों को प्राप्त होता है-इन्द्रो
मायाभिः पुरुरूप ईयते (ऋ० ६.४७.१८)। एक ही परमात्मा प्रत्येक प्राणी में अवस्थित होकर उसी प्रकार विविध
रूपों में दिखाई दे रहा है, जैसे चन्द्रमा एक होते हुए विभिन्न जलों में विविध रूपों में दिखाई देता है- एक एव हि
भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः। एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्॥ (ब्र० बि० १९) गीता में श्रीकृष्ण का
कथन है कि कुछ ज्ञानयज्ञ द्वारा एकत्व (अद्वैत) भाव से और पृथकत्व (द्वैत) भाव से विराट् पुरुष की उपासना
करते हैं-ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् (गी० ९.१५)।
५२. एकर्षि अग्नि — मुण्डकोपनिषद् में वर्णित है कि जो निष्काम कर्मनिष्ठ, श्रुतिज्ञान के ज्ञाता और ब्रह्म के उपासक
एकर्षि नामक अग्नि में श्रद्धापूर्वक हविष्यान्न अर्पित करते हैं, उन्हीं को विधिपूर्वक ब्रह्मविद्या का उपदेश करना
चाहिए-क्रियावन्त श्रोत्रिया ब्रह्मनिष्ठाः स्वयं जुह्वत एकर्षिं श्रद्धयन्तः। तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं
विधिवद्यैस्तु चीर्णम् (मुण्ड० ३.२.१०)। एकर्षि अग्नि का उल्लेख अन्यत्र कहीं नहीं मिलता है। कुछ विद्वज्जन
एकर्षि अग्नि की संगति आत्मज्योति रूप अग्नि से बिठाते हैं। कहीं इसे प्राणाग्नि अथवा आत्माग्नि के रूप में स्वीकार
किया गया है। कुछ विद्वानों ने एकर्षि शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार की है-एक एव ऋषति गच्छति अर्थात् जो एक
(अकेला) गतिमान् रहता है। कुछ विद्वानों के अनुसार सभी देवताओं में जो अग्नि विद्यमान रहती है, उसी अग्नि में
ही वे सभी आहुतियों को ग्रहण या धारण करते हैं, उसे ही एकर्षि अग्नि कहा जाता है।
५३. एकादशद्वार-एकादश अक्ष — मनुष्य शरीर को एकादश द्वारों वाला अथवा एकादश अक्ष कहा गया है। यह
शरीर दो आँख, दो कान, दो नासिका छिद्र, एक मुख, ब्रह्मरन्ध्र, नाभि, गुदा और उपस्थ इन ग्यारह द्वारों वाला है।
वह विशुद्ध अजन्मा परमेश्वर एकादश द्वारों वाले मनुष्य शरीर में रहता है, उसका ध्यान-अनुष्ठान करके मनुष्य कभी
शोक नहीं करता और जीवनमुक्त होकर बन्धनों से मुक्त ही जाता है- पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः।

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एषणात्रय परिशिष्ट ४४३
अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते (कठ० २.२.१)। उपनिषद् में ही मनुष्य शरीर को नवद्वार (दो आँख, दो
कान, दो नासिका, एक मुख, एक गुदा, एक उपस्थ) वाला भी स्वीकार किया गया है-नवद्वारे पुरे देही हंसो
लेलायते बहिः (श्वेता० ३.१८)।
५४. एषणा त्रय - एषणा का शाब्दिक अर्थ इच्छा, चाह, प्रार्थना, याचना आदि है। सामान्य मनुष्य त्रय एषणा के
बन्धन में फँसा होता है। ये एषणाएँ हैं-पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा। उपनिषद् में वर्णन है कि त्यागी पुरुष
पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा से ऊँचे उठकर भिक्षाचर्या करते थे- ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च
लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति (बृह० ४.४.२२)। ब्राह्मण पुरुष भी आत्मा को जानकर त्रय
एषणाओं से ऊँचे उठ जाते हैं (बृह०३.५.१)। परिव्राजक के लिए तीनों एषणाओं, तीनों वासनाओं, ममता एवं
अहंकार का परित्याग करने का निर्देश है-एषणात्रयवासनात्रयममत्वाहंकारादिकं वमनान् (प०प० २)।
५५. ओङ्कार- ओङ्कार अथवा प्रणव परमात्मा का ही नाम अथवा प्रतीक है। ॐकार-यह अकार, उकार तथा मकार
तीन वर्णों से बना हुआ है। ये तीनों अक्षर तीन शक्तियों-त्रिदेवों का बोध कराते हैं-अकारो विष्णुरुद्दिष्ट उकारस्तु
महेश्वरः। मकारेणोच्यते ब्रह्मा प्रणवेन त्रयो मताः॥ इस प्रकार ॐ को ही ब्रह्म और सब कुछ स्वीकार किया गया
है-ओमिति ब्रह्म। ओमितीदःसर्वम् (तैत्ति० १.८.१)। ओम् ही सभी मुमुक्षुओं का ध्येय है- ओमित्येकाक्षरं
ब्रह्म ध्येयं सर्वं मुमुक्षुभिः (ध्या०बि० ९)। ओम् ही उपास्य हैं, यही अपरिमित तेजरूप अग्नि आदित्य और प्राण
है-तस्मादोमित्यनेनैतदुपासीताऽपरिमितं तेजः। तत् त्रेधाऽभिहितमग्नावदित्ये प्राणे (मैत्रा० ६.३७)। तीन अक्षरों
के प्रणव के उच्चारण से योगी संसार के जन्म बन्धन से मुक्त हो जाते हैं-.....त्र्यक्षरं प्रणवं तदेतदोमिति। यमुक्त्वा
मुच्यते योगी जन्मसंसारबन्धनात् (आ०बो०१)। ॐ अक्षर को जानकर जो जैसा चाहता है, वह वैसा पाता है-
एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम्। एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् (कठ०१.२.१६)।
५६. कर्म- कर्म का सामान्य अर्थ क्रिया अथवा गति से है। दर्शन में इसे आध्यात्मिक तत्त्व कहा गया है, जिसे आत्मा
संसार में वहन करता है। संसार में कर्मचक्र सुनिश्चित तथ्य है। निखिल ब्रह्माण्ड में देव, ग्रह, नक्षत्र तथा सभी
चराचर अपने-अपने कर्म के कारण स्थित और गतिमान् हैं। उपनिषद् में इन्द्रियों द्वारा को जाने वाली क्रियाओं को
कर्म कहा गया है, जो 'मैं करता हूँ', इस प्रकार को अध्यात्म निष्ठा से किया गया हो-कर्मेति च क्रियमाणेन्द्रियैः
कर्माण्यहं करोमीत्यध्यात्मनिष्ठतया कृतं कर्मैव कर्म (निरा० ११)। गीता के अनुसार कर्म तीन प्रकार के कहे
गये हैं-सात्त्विक, राजसी, तामसी। वेदों में तीन प्रकार के कर्मों का विधान है-नित्य, नैमित्तिक और काम्य। गीता
के अनुसार सभी प्रकृति से उत्पन्न गुणों के अनुसार वशीभूत हुए कर्म करते हैं- कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः
प्रकृतिजैर्गुणैः (गी० ३.५)। गीता में नियत कर्म करने का आदेश है, क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है-
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः (गी० ३.८)। यज्ञ के लिए किये जाने वाले कर्मों के अतिरिक्त अन्य
कर्मों से यह लोक कर्म बन्धन में फँसता है, अतः आसक्ति रहित होकर यज्ञ के लिए कर्म करने का निर्देश आगे है-
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर (गी० ३.९)। कर्म की
गति अत्यन्त गूढ़ है-गहना कर्मणो गतिः (गी०४.१७)। उपनिषद् कर्म करते हुए सौ वर्ष जीवित रहने की बात
कहते हैं और यह भी कहते हैं कि इसके अतिरिक्त मनुष्य के कल्याण का और कोई मार्ग भी नहीं है- कुर्वन्नेवेह
कर्माणि जिजीविषेच्छतःसमाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे (ईशा०२)।
५७. कर्मफल - मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है, परन्तु कर्मफल भोगने में पराधीन है। उसे किये हुए कर्मों का फल
अवश्य मिलता है। अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्मशुभाशुभम् (ना०पु० ३१.७०)। पिछले जन्मों का कर्मफल ही
हमारा भाग्य या प्रारब्ध कहलाता है। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं- कर्म करने में आपका अधिकार है, फल
प्राप्ति में कभी नहीं। कर्मों के फल की इच्छा मत करो, कर्म न करने में भी आसक्ति न रखो-कर्मण्येवाधिकारस्ते
मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि (गी० २.४७)। कर्मफल को त्यागकर युक्त पुरुष
निष्ठा से भरी शान्ति को प्राप्त होता है- युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् (गी० ५.१२)। ध्यान से
भी कर्मफल का त्याग श्रेष्ठ है, त्याग से शीघ्र शान्ति प्राप्त होती है, जैसा कि भगवान् कृष्ण ने गीता में कहा है-
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् (गी० १२.१२)।

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४४४ [परिशिष्ट] क्षेत्रज्ञ
५८. कवि-मनीषी— कवि शब्द के अर्थ कोश ग्रन्थों में सर्वज्ञ, विचारवान्, प्रतिभाशाली, प्रशंसनीय, दूरदर्शी विद्वान्,
त्रिकालज्ञ पुरुष, मनीषी आदि दिये गये हैं। मनीषी शब्द के अर्थ पंडित, विद्वान्, बुद्धिमान्, मेधावी, स्तोता आदि
दिये गये हैं। उपनिषदों में उस परब्रह्म परमात्मा को ही कवि-मनीषी कहकर प्रतिपादित किया गया है- कविर्मनीषी
परिभूः स्वयंभूर्याथातथ्यतो (ईश० ८)। गीता में कहा गया है कि क्या कर्म है और क्या अकर्म, इसमें कविगण
(बुद्धिमान्) भी मोहित हो जाते हैं- किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः (गी० ४.१६)। गीता ८.९ में
परमेश्वर को कवि कहा गया है। कवि त्रिकालदर्शी एवं सर्वज्ञ होता है। परमेश्वर कवि है, तो सृष्टि उसकी कविता,
निर्माता होने के कारण भी उसे कवि कहते हैं। उस पुराण पुरुष, सर्वेश्वर, सब देवों के उपास्य देव को कवि कहकर
उपन्यस्त किया गया है-कविं पुराणं पुरुषं सनातनं सर्वेश्वरं सर्वदेवैरूपास्यम् (महो० ४.७१)।
५९. कामधेनु— यह मान्यता है कि समुद्र मंथन के चौदह रत्नों में एक रत्न कामधेनु भी थी, जिससे जो माँगा जाय,
उसकी पूर्ति हो जाती थी। सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ति करने वाली इस धेनु (गाय) को कामधेनु कहा गया। वसिष्ठ
ऋषि के पास भी ऐसी ही एक कामधेनु थी, जिसे शबला या नंदिनी नाम से जाना जाता था। जमदग्नि ऋषि के पास
भी एक कामधेनु थी, जिसके बल पर उन्होंने हैहयराज का भव्य स्वागत किया था।
६०. कूटस्थ— 'कूटस्थ' शब्द के अर्थ हैं- सर्वोच्च स्थित, गूढ़ स्थित अथवा गुप्त रूप में स्थित, अन्तर्व्याप्त, अन्तर्यामी,
परमेश्वर, जीवात्मा, सर्वोपरि स्थित, अचल, अविनाशी। न्याय दर्शन में परमेश्वर को कूटस्थ कहा गया है, जो जन्म-
गुण से रहित है। सांख्य दर्शन की मान्यता के अनुसार कूटस्थ आत्मा-पुरुष है, जो परिमाणरहित है तथा जाग्रत्,
स्वप्न एवं सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं में एक समान है, निर्लिप्त और द्रष्टा मात्र है। शाक्त परम्परा के अनुसार सर्वोच्च
अन्तिम अवस्था में विष्णु या शिव एक ही परमात्मा है। केवल सृष्टिकाल में ये भिन्न होते हैं। कूटस्थ पुरुष
जीवात्माओं का समष्टिगत रूप है। अव्यक्त पुरुष को भी कूटस्थ कहा गया है। जड़ प्रकृति के संसर्ग से परे अपने
स्वरूप में स्थित मुक्त आत्मा कूटस्थ है। गीता के अनुसार इस लोक में क्षर और अक्षर दो प्रकार के पुरुष हैं। सब
प्राणियों के शरीर तो क्षर हैं और कूटस्थ (आत्मा-पुरुष) अक्षर कहा जाता है-द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव
च/क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते (गी० १५.१६)। उपनिषद् ज्ञान के अनुसार ब्रह्मा से लेकर चींटी
तक सब प्राणियों की बुद्धि में रहने वाला और उनके स्थूल-सूक्ष्म आदि देहों का नाश होने पर जो शेष रहा दिखाई
देता है, वह कूटस्थ कहा जाता है-ब्रह्मादिपिपीलिकापर्यन्तं सर्वप्राणिबुद्धिष्वविशिष्टतयोपलभ्यमानः
सर्वप्राणिबुद्धिस्थो यदा तदा कूटस्थ इत्युच्यते (स०सा० १०)।
६१. क्रतु— क्रतु शब्द के पर्याय कोश ग्रन्थों में यज्ञ, अश्वमेध, विवेक, प्रज्ञा, संकल्प, इच्छा आदि मिलते हैं। वह
परम पुरुष क्रतुमय (संकल्पमय) ही है- अथ खलु क्रतुमयः पुरुषः (छान्दो० ३.१४.१)। उपनिषद् में लिखा है-
छन्द, यज्ञ, क्रतु, (अग्निष्टोम आदि विशिष्ट यज्ञ कर्म), व्रत जो भी वेद वर्णित हैं, उनका अधिष्ठाता वह मायावी पुरुष
है- छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति। अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत् तस्मिंश्चान्यो
मायया संनिरुद्धः (श्वेता० ४.९)। वह परम पुरुष सम्पूर्ण क्रतुओं द्वारा यजन किया जाता है-
स सर्वैः क्रतुभिर्यजते (अव्यक्तो० ७.१)।
६२. क्षेत्रज्ञ— शरीर रूपी क्षेत्र का ज्ञाता, सर्वसाक्षी अथवा जीवात्मा के अर्थ में क्षेत्रज्ञ शब्द प्रयुक्त हुआ है। शरीर के
अधिष्ठाता, आत्मा अथवा परमात्मा के पर्याय रूप में भी क्षेत्रज्ञ प्रयुक्त हुआ है। उपनिषद् के अनुसार शरीर में जो
प्रकाशमान चैतन्य स्वरूप है, वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है- तत्र यत् प्रकाशते चैतन्यं स क्षेत्रज्ञ इत्युच्यते (स०सा० ८)
उस परमात्मा का अंश ही सब चेतन, प्राणियों में जीवात्मा बना है। वही प्रत्येक शरीर में क्षेत्रज्ञ रूप में विद्यमान
है- अस्यांशोऽयं यश्चेतनमात्रः प्रतिपुरुषं क्षेत्रज्ञः (मैत्रा० २.५)। यही क्षेत्रज्ञ लिङ्ग शरीर में संकल्प, अभिमान
तथा अध्यवसाय के रूप में प्रतिष्ठित है। यह विशुद्ध, नित्य, मुक्त, असंग तथा प्रजापति रूप है। गीता में भगवान्
कहते हैं- यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है, इसे जानने वाले को तत्त्वज्ञाता, विद्वान्, क्षेत्रज्ञ कहते हैं। सब क्षेत्रों का मुझे
ही क्षेत्रज्ञ जान। क्षेत्र क्षेत्रज्ञ के भेद का जो ज्ञान है, वही यथार्थ ज्ञान है-इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं
मतं मम (गी० १३.१-२)। शरीर रूपी क्षेत्र का पूरा-पूरा ज्ञान रखने वाला तथा इसका अधिकारी ही क्षेत्रज्ञ है।

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गन्धर्व परिशिष्ट ४४५
६३. गन्धर्व— देवों के एक भेद अथवा अर्धदेवों के रूप में गन्धवों को स्वीकार किया गया है। निरुक्त के अनुसार
'गा' या 'गो' की धारण करने वाला होने से इन्हें गन्धर्व कहा गया है। यहाँ 'गा' या 'गो' का भावार्थ पृथ्वी, किरण,
वाणी इत्यादि ग्रहण किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि ये देवों के पास गाने वाले हैं, अतः वाणी या कण्ठ की धारण
करने वाले हैं। वेदों में दो प्रकार के गन्धवों का उल्लेख हुआ है- एक द्युस्थानीय, दूसरे अन्तरिक्ष स्थानीय।
द्युस्थानीय गन्धर्वों को दिव्य गन्धर्व कहा गया है। ये सोम के रक्षक, रोगों के चिकित्सक, सूर्य अश्वों के वाहक तथा
स्वर्गीय ज्ञान प्रकाशक माने गये हैं। अन्तरिक्ष स्थानीय गन्धर्व नक्षत्रों के प्रवर्त्तक और सोम के रक्षक माने गये हैं।
उपनिषद् तथा ब्राह्मण ग्रन्थों में गन्धर्वों के दो भेद उल्लिखित हैं- देव गन्धर्व और मनुष्य गन्धर्व। शब्दार्थ चिन्तामणि
में गन्धर्वों के दो भेद-दिव्य तथा मर्त्य वर्णित हुए हैं। अग्निपुराण में गन्धर्वों के बारह गण माने गये हैं- अभ्राज्य,
अंधारि, रंभारि, सूर्यवर्चा, कृधु, हस्त, सुहस्त, स्वन्, मूर्धवान्, महामना, विश्वावसु और कृशानु। गंधर्वों का लोक
गुह्यक लोक के ऊपर और विद्याधर लोक के नीचे वर्णित हुआ है।
६४. गायत्री— उपनिषद् के अनुसार तत्राणांस्तत्रे तद्यद्गयांस्तत्रे तस्माद्गायत्री (बृह० ५.१४.४); अर्थात्
इसने प्राणों का त्राण किया, इसी से यह गायत्री है। 'गयान् (प्राणान्) त्रायते इति गायत्री' व्युत्पत्ति के अनुसार
प्राणों का त्राण करने वाली शक्ति की गायत्री कहा गया है। इसीलिए गायत्री की प्राणोपासना भी कहा गया है। गायत्री
को प्राणरूप में स्वीकार किया गया है- गायत्री वै प्राणः (शत०ब्रा० १.३.५.१५)। गायत्री को अग्नि, तेज और
ब्रह्मवर्चस भी कहकर उपन्यस्त किया गया है- गायत्री वाऽग्निः (शत०ब्रा० १.८.२.१३), तेजो वै गायत्री (तै०सं०
३.२.९.३), गायत्री ब्रह्मवर्चसम् (मै०ब्रा० ४.३.१)। आठ-आठ अक्षरों के तीन पदों वाले छन्द को गायत्री छन्द
कहा गया है। गायत्री को छन्दों में सर्वोत्तम माना गया है- गायत्री वै छन्दसामग्रं ज्यैष्ठ्यम् (जै०ब्रा० २.२२७)।
त्रिकाल संध्या में इसी मंत्र के जप का विधान रहा है। गायत्री को ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों शक्तियों का रूप कहकर
प्रतिपादित किया गया है- गायत्र्येव परो विष्णुर्गायत्र्येव परः शिवः। गायत्र्येव परो ब्रह्मा गायत्र्येव त्रयी ततः
(स्कं० पु०काशी खं०पू०४.९.५८)। उपनिषद् का वर्णन है कि यह जो भी कुछ है, वस्तुतः वह गायत्री ही है-
गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किंच (छान्दो० ३.१२.१) यह सम्पूर्ण पृथ्वी भी गायत्री ही है, जिसमें समस्त
प्राणी प्रतिष्ठित हैं- या वै सा गायत्रीयं वाव सा येयं पृथिवी। अस्यां हीदं सर्वं भूतं प्रतिष्ठितम् (छान्दो०
३.१२.२)। गायत्री को वेदमाता, देवमाता तथा विश्वमाता कहा गया है। इनकी उपासना से व्यक्ति आयु, प्राण, प्रजा
(सन्तान), पशु, कीर्ति, धन एवं ब्रह्मवर्चस की प्राप्ति का अधिकारी बन जाता है-
स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम्। आयुः प्राणं प्रजां पशुं कीर्तिं द्रविणं ब्रह्मवर्चसम्।
मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम् (अथर्व० १९.७१.१)।
६५. गुरु-शिष्य- गायत्री मंत्र का उपदेष्टा गुरु कहलाता है। अध्यात्म विद्या या ब्रह्म विद्या प्रदान करने वाले आचार्य
भी गुरु कहलाते हैं। गुरु जिस पुरुष की गायत्री या अन्य मन्त्र की दीक्षा देता है, वह शिष्य कहा जाता है। गुरु शिष्य
परम्परा भारतवर्ष में अनादि काल से रही है। जिसका कोई गुरु नहीं होता था, उसे 'निगुरा' कहकर तिरस्कृत किया
जाता था। गुरु सामान्य मनुष्यों के गृहस्थान से बहुत दूर एकान्त स्थान में जहाँ विद्यार्थियों को पढ़ाते थे- वह स्थान
गुरुकुल कहा जाता था। गुरु तप-तितिक्षा द्वारा अपने व्यक्तित्व में प्रखरता-भारीपन या गुरुता के कारण यह प्रतिष्ठा
पाता था। मनुस्मृति के अनुसार जो विप्र निषेक (गर्भाधान) आदि संस्कारों को यथाविधि कराता है और अन्न से
पोषण करता है, वह गुरु कहलाता है- निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि। सम्भावयति चान्नेन स
विप्रो गुरुरुच्यते। (म०स्मृ०२.१४२) इस परिभाषा से माता-पिता पहले गुरु हैं, फिर पुरोहित आदि। युक्तिकल्पतरु
में अच्छे गुरु के अनेक लक्षण वर्णित हैं। चाणक्यनीति के अनुसार द्विजातियों के गुरु अग्नि, वर्णों के गुरु ब्राह्मण,
स्त्रियों के गुरु पति और अतिथि सबके गुरु हैं- गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः।
पतिरेको गुरुः स्त्रीणां सर्वेषामतिथिर्गुरुः (चा०नी०)। एक शिष्य के अन्दर सच्चे गुरु की प्राप्ति की जितनी
उत्कंठा होती है, उससे कहीं अधिक एक गुरु के अन्दर सच्चे शिष्य की तलाश की व्याकुलता रहती है। अतः शिष्य
की निरन्तर अपनी पात्रता के विकास का उद्यम करते रहना चाहिए। गुरु ग्रन्थ साहिब के अनुसार चाहे सौ चाँद चढ़
आयें, चाहे सहस्र सूर्यों का उदय हो जाये, तो भी गुरु के बिना अँधेरा ही रहता है। उपनिषद् ज्ञान के अनुसार समस्त

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४४६ [परिशिष्ट] चतुर्युग

शरीरों में स्थित चैतन्य ब्रह्म की प्राप्ति कराने वाला गुरु ही उपास्य है और विद्या प्राप्त कर संसार के प्रपञ्चों का नाश
होकर गम्भीर ज्ञानरूप जो ब्रह्म (अन्तर) में शेष रहे, वह शिष्य है- सर्व शरीरस्थ चैतन्यब्रह्म प्रापको गुरुरुपास्यः।
शिष्य इति च विद्याध्वस्तप्रपञ्चावगाहित ज्ञानावशिष्टं ब्रह्मैव शिष्यः (निरा० ३०-३१)
६६. गृह्यसूत्र — गृह का शाब्दिक अर्थ है- गृह संबंधी या गृहस्थी से संबंधित। अत्यन्त थोड़े अक्षर वाले, सारगर्भित,
व्यापक, अस्तोभ तथा अनवद्य (वाक्य या वाक्यांश) सूत्र कहे जाते है- स्वल्पाक्षरमसंदिग्ध सारवद् विश्वतो
मुखम्। अस्तोभनवद्यञ्च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ॥ गृह्यसूत्र वैदिक पद्धति के वे शास्त्र हैं, जिनमें गृहस्यों के लिए
मुंडन, यज्ञोपवीत, विवाह आदि षोडश संस्कारों के नियम-निर्देश और यज्ञादि कार्यों का वर्णन है-गृह्यन्ते संगृह्यन्ते
वेदविहितानि कर्मकाण्डानि यत्र। गृह्यसूत्रों में प्रसिद्ध गृह्यसूत्र निम्न है-१. आश्वलायन, २. पारस्कर, ३. शांखायन,
४. मानव और ५. गोभिल। इनमें प्रतिपाद्य विषयों की तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-प्रथम भाग में
छोटे पारिवारिक यज्ञों का वर्णन है। दूसरे में षोडश संस्कारों की विधि-व्यवस्था तथा तीसरे में श्राद्ध, पितृयज्ञ तथा
गृहनिर्माण आदि का वर्णन है। वैदिक शाखाओं के उपलब्ध गृह्यसूत्रों का वर्णन इस प्रकार है-ऋक् सम्बन्धी- १.
शाङ्खायन, २. शाम्बव्य, ३. आश्वलायन, साम सम्बन्धी- ४. गोभिल, ५. खादिर, ६. जैमिनि; शुक्ल यजुर्वेद
सम्बन्धी- ७. पारस्कर; कृष्णयजुर्वेद सम्बन्धी- ८. आपस्तम्ब, ९. हिरण्यकेशी, १०. बौधायन, ११. भारद्वाज, १२.
मानव, १३ वैखानस, १४. काठक, १५. वाराह; अथर्ववेद सम्बन्धी-१६. कौशिक।
६७. ग्रह-नक्षत्र — आकाशमण्डल के तारे जो अपने सौरमण्डल में सूर्य की परिक्रमा करते हैं, ग्रह कहलाते है। दूसरे
शब्दों में किसी निर्धारित कक्षा में किसी सूर्य की परिक्रमा लगाने वाले तारे ग्रह कहे जाते हैं। फलित ज्योतिष् के
अनुसार अपने सौरमण्डल में नौ ग्रह हैं- सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु। किसी-
किसी बड़े ग्रह के साथ उपग्रह भी हैं, जो अपनी कक्षा में अपने ग्रह की परिक्रमा करते हैं।
नक्षत्र तारों के वे समूह या गुच्छक हैं, जो चन्द्रमा के पथ में (चन्द्रमा के सापेक्ष) किन्तु अपने सौरमण्डल
मे बहुत दूर दिखाई देते हैं। चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा २७-२८ दिनों में करता है, इस रीति से चन्द्रमा का पथ २७
नक्षत्रों में विभाजित किया गया है। चन्द्रमा के पथ की तरह सूर्य पथ की १२ राशियों में विभक्त किया गया है। नक्षत्र
या तारे ग्रहों की तरह छोटे-छोटे पिण्ड नहीं हैं, वे बड़े-बड़े सूर्य है, जो हमारे सूर्य से बहुत दूरी पर हैं।
६८. चतुराश्रम — ऋषियों ने मनुष्य जीवन के लिए चार आश्रम निर्धारित किये थे- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और
संन्यास। मनुष्य के जीवनकाल की लगभग १०० वर्ष मानकर प्रत्येक आश्रम की अवधि २५ वर्ष रखी गयी थी।
उपनयन के अनंतर २५ वर्ष आयु तक की अवधि बालक ब्रह्मचर्य आश्रम में गुरुकुल में वास करता था। यह अवधि
वेद, वेदाङ्ग आदि सम्पूर्ण ज्ञान संचय और शक्ति संचय के लिए थी। गुरुकुल में ब्रह्मचर्य आश्रम पूरा करने पर घर
में उसे गृहस्थ आश्रम में प्रवेश दिया जाता था। यह अवधि प्राप्त हुए ज्ञान का समाज में व्यावहारिक प्रयोग हेतु और
सेवा-सत्कार द्वारा पुण्य संचय के लिए थी। तदनन्तर वानप्रस्थ आश्रम में, वनों में रहकर इन्द्रिय निग्रह तथा
मानसिक पुरुषार्थ किया जाता था। यह अवधि कठोर आत्म साधना के लिए थी। वानप्रस्थ के २५ वर्ष पूरा करने
के बाद व्यक्ति घर और स्वजनों को छोड़कर परिव्रज्या के लिए निकल पड़ता था। यह अवधि आत्म उत्कर्ष और
मोक्ष प्राप्ति के प्रयासों के लिए थी और जीवन के व्यावहारिक अनुभवजन्य ज्ञान के द्वारा गृहस्यों के मार्गदर्शन के
लिए थी। ये चारों आश्रम जीवन की चारों अवस्थाओं-बाल्यावस्था, यौवनावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था से
सम्बद्ध थे। आश्रमों का सम्बन्ध जीवन के चार उद्देश्यों-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष मे भी था। ब्रह्मचर्य का सम्बन्ध
धर्म से था। गृहस्थ का अर्थ और काम से, वानप्रस्थ का उपराम और मोक्ष की तैयारी से और संन्यास का सम्बन्ध
मोक्ष से था। आश्रमोपनिषद् में ब्रह्मचारियों, गृहस्थों, वानप्रस्थों तथा संन्यासियों के चार-चार निम्न भेद वर्णित हैं-
ब्रह्मचारी-गायत्री, ब्राह्माण, प्राजापत्य तथा बृहन्। गृहस्थ-वार्ताकवृत्ति, शालीनवृत्ति, यायावर और घोर संन्यासिक।
वानप्रस्थ-वैखानस, उदुम्बर, बालखिल्य और फेनप तथा संन्यासी-कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस।
६९. चतुर्युग — सृष्टि के कालचक्र की चार युगों में विभक्त किया गया है- कृतयुग या सत्युग, त्रेतायुग, द्वापरयुग एवं
कलियुग। इसमें कलियुग ४,३२०००, द्वापरयुग ८,६४,०००, त्रेतायुग १२,९६,००० एवं सत्युग १७,२८,००० वर्षों
का माना जाता है। चारों युगों को मिलाकर ४३,२०,००० वर्षों की एक चतुर्युगी होती है। एक हजार चतुर्युगी का

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चतुर्वर्ण \hfill [परिशिष्ट] \hfill ४४७

ब्रह्मा का एक दिन और इतनी ही बड़ी एक रात होती है। एक मान्यता यह भी है कि कलियुग १२०० वर्ष, द्वापरयुग
२४०० वर्ष, त्रेतायुग ३६०० वर्ष और सत्युग ४८०० वर्षों का होता है। एक चतुर्युगी १२००० वर्षों की होती है। ७१
चतुर्युगी का एक मन्वन्तर तथा १४ मन्वन्तरों का एक कल्प होता है। सत्युग में धर्म का प्रायः पूर्णांश, त्रेतायुग में
त्रिगुण चतुर्थांश, द्वापर युग में अर्धांश तथा कलियुग में चतुर्थांश ही रह जाता है। सत्युग में सत्त्वगुण की प्रधानता
तथा कलियुग में तमोगुण की प्रधानता होती है। महाभारत के अनुसार कृतयुग में नारायण का वर्ण श्वेत होता है, त्रेता
में पीत वर्ण, द्वापर में रक्तवर्ण तथा कलियुग में कृष्णवर्ण होता है।
७०. चतुर्वर्ण— मनुष्य मात्र को कर्म के अनुसार चार विभागों में बाँटा गया- १. समाज में ज्ञान बाँटने वाले- ब्राह्मण,
२. समाज की रक्षा करने वाले-क्षत्रिय, ३. समाज में द्रव्य साधन की पूर्ति करने वाले-वैश्य, ४. समाज में अपनी
शारीरिक सेवा देने वाले-शूद्र। इस विभाजन को वर्ण व्यवस्था कहा गया। शतपथ ब्राह्मण में भी इस तथ्य की पुष्टि
होती है- चत्वारो वै वर्णाः। ब्राह्मणो राजन्यो वैश्यः शूद्रः (शत०ब्रा० ५.५.४.९)। महाभारत के शान्तिपर्व में
वर्णन है कि वर्णों में कोई ऊँच-नीच का भेद नहीं है, क्योंकि यह सारा संसार ब्रह्ममय है। ब्रह्मा ने सम्पूर्ण सृष्टि को
रचना की और फिर कर्मों के अनुसार वर्ण बनते गये- न विशेषोऽस्ति वर्णानां सर्व ब्राह्ममिदं जगत्। ब्रह्मणा
पूर्वसृष्टं हि कर्मभिर्वर्णतां गतम् (१८८.१०)। गीता में भगवान् ने कहा है कि गुण-कर्म के विभाग के अनुसार
मैंने चार वर्ण बनाये हैं- चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः (गी०४.१३)।
७१. चतुर्व्यूह—चार पदार्थों या मनुष्यों का समूह चतुर्व्यूह कहलाता है। जैसे- १. राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न एवं
२. कृष्ण, बलदेव, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध । पुराणों में वर्णन है कि ब्रह्मा ने सृष्टि कार्य हेतु वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न
और अनिरुद्ध, इन चार रूपों में अवतार लिया था; अतः उन्हें चतुर्व्यूह कहते हैं। मुद्गलोपनिषद् में तीन मन्त्रों द्वारा
चतुर्व्यूह भगवान् के स्वरूप का वर्णन है- एतेनैव च मन्त्रेण चतुर्व्यूहो विभाषिताः (मुद्ग०१.४)।
७२. चमस—चमस सोमपान करने या सोम वितरण करने का एक यज्ञपात्र होता था, जो चम्मच के आकार का तथा
पलाश, उदुम्बर, खदिर आदि लकड़ी का बनता था। यह घृताहुति देने में भी प्रयुक्त होता था। वाचस्पत्यम् में चमस
को सोमपान पात्र के रूप में स्वीकार किया गया है- पलाशादिकाष्ठ जाते यज्ञीयपात्रभेदे तलक्षणभेदादिकं
यज्ञपात्रे। सोमपानपात्रभेदे च (वाच०)। अच्छावाक्, उद्गाता तथा अध्वर्यु द्वारा उपयोग में लाये जाने वाले चमस
क्रमशः अच्छावाक् चमस, उद्गातृ चमस तथा चमसाध्वर्यु कहलाते हैं।
७३. चातुर्मास्य-आग्रयण— चार मासों में पूरा किया जाने वाला एक विशेष श्रौत याग चातुर्मास्य कहलाता था।
वसन्त और शरद् ऋतुओं में नवीन अन्न की इष्टि की जाती है, यह आग्रयण यज्ञ कहलाता है। वैदिक कल्प के
अनुसार चार मास के प्रमुख तीन मौसमों के आरम्भ में चातुर्मास्य यज्ञ किया जाता था। प्रथम वैश्वदेव फाल्गुनी
पूर्णिमा को, द्वितीय वरुण प्रघास आषाढ़ी पूर्णिमा को तथा तृतीय साकमेध कार्त्तिकी पूर्णिमा को होता था। वर्ष भर
सभी संधियों में यज्ञ द्वारा संधिकाल को ठीक किया जाता था। रात-दिन की संधियों में अग्निहोत्र, पूर्णमासी तथा
अमावस्या की संधियों में दर्श-पूर्णमास और ऋतु के आरंभ की संधियों में चातुर्मास्य यज्ञ किया जाता था
(शत०ब्रा०१.६.३.३६)। जो चातुर्मास्य यज्ञ करता है, उसका पुण्य कभी नाश नहीं होता- अक्षय्यं ह वै सुकृतं
चातुर्मास्ययाजिनो भवति (शत० ब्रा०२.६.३.१)। जो चातुर्मास्य यज्ञ करता है, वह परमधाम और परमगति को
प्राप्त होता है- स परममेव स्थानं परमां गतिं गच्छति चातुर्मास्ययाजी (शत०ब्रा०२.६.४.९)।
७४. चित्त— अन्तःकरण की चार वृत्तियों- मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार में से एक वृत्ति, जो अनुसंधानात्मक कही गयी
है, चित्त कहलाती है। महर्षि पतञ्जलि के अनुसार मन, बुद्धि और अहंकार तीनों से मिलकर चित्त बनता है। योग
दर्शन के अनुसार चित्त की पाँच वृत्तियाँ होती हैं- प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति। चित्त की पाँच प्रकार
की भूमियाँ मानी गयी हैं- क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, निरुद्ध एवं एकाग्र। योग के लिए निरुद्ध एवं एकाग्रचित्त होना
चाहिए। चित्त वृत्तियों के निरोध को योग कहते हैं। मैत्रेय्युपनिषद् में चित्त की महत्ता वर्णित है कि चित्त ही संसार
है, अतः उसे प्रयत्नपूर्वक शुद्ध करना चाहिए। जिसका जैसा चित्त होता है, वह वैसा ही बन जाता है, यह सनातन
रहस्य है। चित्त के शांत होने पर शुभाशुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं। चित्त जितना इन्द्रियों के विषयों में आसक्त होता है,
उतना यदि परमेश्वर में हो जाय, तो बन्धन से कौन मुक्त न हो जाय (मैत्रा०४.३-५)। चित्त वृत्तियों के विनष्ट होने

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४४८ [परिशिष्ट] जरा
पर चित्त अपने उत्पत्ति स्थान में स्वयमेव ही शान्त हो जाता है (मैत्रा०४.१)। बुद्धि विषय ग्रहण करने से, चित्त
चेतना से, अहन्ता अहंकार से अद्भुत (विशिष्ट) है- बुद्ध्या बुद्ध्यति। चित्तेन चेतयति। अहंकारेणाहंकरोति
(ना०प०६.३)। उपनिषद् में चित्तशुद्धि के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए कहा गया है कि राग-द्वेष आदि से युक्त
चित्त ही संसाररूप है, उसके दोषों से मुक्त हो जाने पर मोक्ष की प्राप्ति होना कहा जाता है- चित्तमेव ही संसारो
रागादिक्लेशदूषितम्। तदेव तैर्विनिर्मुक्तं भवान्त इति कथ्यते (महो० ४. ६६)।
७५. छन्द - अक्षरों की गणना के अनुसार वैदिक वाक्यों का जो भेद किया गया है, वह छन्द कहलाता है। ऋषियों
के अन्तःकरण में प्रस्फुटित मन्त्रों को मूर्त रूप देने का कार्य जिन वर्ण समूहों द्वारा सम्पन्न हुआ, वह छन्द कहलाया।
वर्ण समूहों का यह निश्चित परिमाण ही छन्द है। इसके मुख्य सात भेद हैं- गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति,
त्रिष्टुप् और जगती। इनमें प्रत्येक के आठ-आठ भेद नियत किये गये हैं-आर्षी, दैवी, आसुरी, प्राजापत्या, याजुषी,
साम्नी, आर्ची और ब्राह्मी। यजुर्वेद को कण्डिकाओं में सात मुख्य छन्द के अतिरिक्त भी कुछ छन्दो को परिगणना
की गयी है- अतिजगती, शक्करी, अतिशक्करी, अष्टि, अत्यष्टि, धृति, अतिधृति, कृति, प्रकृति, आकृति, विकृति,
संकृति, अभिकृति और उत्कृति। इन वैदिक छन्दों का निर्धारण वर्ण गणना के आधार पर ही हुआ है, इसमें मात्रा
अर्थात् लघु-गुरु का विचार नहीं किया गया है। आगे चलकर काव्य में प्रत्येक पाद में मात्राओं के आधार पर छन्दों
की व्युत्पत्ति भी हुई है। इन भेदों के आधार पर संस्कृत और हिन्दी भाषा के अनेक छन्दों के अनेक भेदों का वर्णन
मिलता है। छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार एक समय देवताओं ने मृत्यु के भय से तीनों वेदों में प्रवेश किया और
भिन्न-भिन्न छन्दों से अपने को आच्छादित किया। अतः जो आच्छादन करे, वही छन्द है, यही 'छन्दस्' शब्द की
व्युत्पत्ति है- देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्रविशंस्ते छन्दोभिरच्छादयन्द्येभिराच्छादयंस्तच्छन्दसां
छन्दस्त्वम् (छान्दो० १.४.२)।
७६. जगत् - परमात्मा की बनायी यह दुनिया अथवा यह संसार जगत् कहलाता है। यह दृश्य जगत् है, इससे परे
अदृश्य जगत् उससे अनन्त गुना व्यापक है। परमात्मा को जगत् ईश, जगत् पति या जगत् पिता भी कहते हैं। जगत्
का कारण भी वह ब्रह्म ही है। सूर्य की इस जगत् की आत्मा कहकर निरूपित किया गया है- सूर्य आत्मा
जगतस्तस्थुषश्च (साम०६२९)। यह सब (जड़-चेतन) की आत्मा (शरीर) जगत् है- सर्वं वा इदमात्मा जगत्
(शत०ब्रा०४.५.९.८)। आचार्य शंकर के अनुसार ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है। यह जगत् मिथ्या और मायावी है-
ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या। जब तक मनुष्य संसार में लिप्त है, तब तक संसार की सत्ता है। जब मोह नष्ट हो जाता है,
तब संसार भी नष्ट हो जाता है। आचार्य रामानुज के अनुसार ब्रह्म का शरीर यह जगत् ही है। ब्रह्म ही जगत् रूप में
परिणत हुआ है। जगत् सत्य है, मिथ्या नहीं है। दर्शन ग्रन्थ के अनुसार यह जगत् तीन गुणों (सत्, रज, तम) के
संयोग का परिणाम है। इस जगत् को अग्निषोमात्मक (अग्नि तथा सोम के संयोग से उत्पन्न) माना गया है-
अग्नीषोमात्मकं जगत् (बृ०जा०२.७)। यह सम्पूर्ण जगत् ही ब्रह्म है, इनसे भिन्न कुछ भी नहीं है- सर्वं खल्विदं
ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन (निरा० ९)।
७७. जड़-चेतन - जगत् में हलचल और वृद्धि करने वाले प्राणियों, जीवों आदि को चेतन कहा गया है। निर्जीव
तथा निश्चेष्ट पड़े रहने वाले पदार्थों को अचेतन या जड़ कहा गया है। पञ्च भौतिक तत्त्वों से बनी इस सृष्टि को जड़
जगत् कहते हैं। जड़ पदार्थ चेतना विहीन होते हैं। वह परम पुरुष-परमात्मा चेतन है, उसके अंश आत्मा या
जीवात्मा भी चेतन हैं। चैतन्यता इसका गुण है। भोजनादि को चेष्टा करने वाले चेतन प्राणियों को 'साशन' और जड़
को 'अनशन' कहा गया है। इन्हें ही जङ्गम और स्थावर कहा जाता है। अचल तथा अपने स्थान पर स्थित रहने वाले
पदार्थ स्थावर कहे जाते हैं। इसका विपरीतार्थक जङ्गम है। जड़-चेतन की ही अचर और चर कहा जाता है। जड़
या अचर पदार्थों का एक गुण जड़त्व है, जिसके कारण वे जहाँ के तहाँ पड़े रहते हैं, हिल-डुल नहीं पाते।
७८. जरा - मनुष्य के जन्म के बाद शैशव अवस्था और यौवन अवस्था प्राप्त होती है। यौवन बीतने पर जरा (जीर्णता-
शिथिलता) आने लगती है। तत्पश्चात् अन्त में मृत्यु के रूप में शरीर समाप्त होता है- देहिनोऽस्मिन् यथा देहे
कौमारं यौवनं जरा (गी०२.१३)। गीता में भगवान् कहते हैं कि जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि ये जीव के चार दुःख हैं,
इनका तथा अपने दोषों का अनुदर्शन मनुष्य की करना चाहिए- जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् (गी०१३.८)।

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जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति [परिशिष्ट] ४४९
जब मनुष्य के बाल सफेद होने लगते हैं, तो उसे जराबोध होने लगता है, परन्तु पुण्य कर्मों (यज्ञादिकों) के परिणाम
स्वरूप प्राप्त स्वर्गलोक में किञ्चित् मात्र भी भय नहीं है, वहाँ मृत्यु या जरा का भय नहीं रहता - स्वर्गे लोके न भयं
किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति (कठ०१.१.१२)।
७९. जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति — व्यक्ति का जीवन जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति- इन तीन अवस्थाओं में होता हुआ व्यतीत
होता है। व्यक्ति का अधिकांश समय जाग्रत् अवस्था में विविधविध कार्यों की सम्पन्न करते हुए व्यतीत होता है। वह
जब जागरूक स्थिति में ज्ञानेन्द्रियों (आँख, कान आदि), कर्मेन्द्रियों (हाथ, पैर आदि) से कार्य करता हुआ, सुख-
दुःख, कर्त्ता-भोक्ता की अनुभूति करता है, तो यही जाग्रत् अवस्था कहलाती है।
जाग्रत् अवस्था में कार्य करते हुए जब व्यक्ति थककर सो जाता है, उस स्थिति में बाह्य जगत् से उसका
कोई सम्बन्ध नहीं रहता; किन्तु अचेतन मन की सक्रियता से वह 'स्वप्न' लोक में विचरण करता है, तरह-तरह के
स्वप्न देखता है- यह 'स्वप्नावस्था' है। स्वप्नावस्था में देखे गये दृश्य आदि की स्थिति जगने के बाद समास हो जाती
है। इस स्थिति में स्थूल शरीर सक्रिय नहीं होती; किन्तु सूक्ष्म शरीर सक्रिय रहता है, वही स्वप्नावस्था के भय-शोक-
आनन्द आदि की अनुभूति करता है।
तीसरी अवस्था दोनों से भिन्न होती है। स्थूल शरीर की सक्रियता तो होती ही नहीं, सूक्ष्म शरीर भी सक्रिय
नहीं होता-स्वप्न का अभाव होता है, उस स्थिति में प्रगाढ़ निद्रा रहती है, जिसमें स्वप्न आदि भी नहीं आते, परन्तु
उठने के बाद तृप्ति की अनुभूति होती है, व्यक्ति की सहज अभिव्यक्ति होती है-आज खूब सोया, खूब आनन्द आया,
कुछ भी ज्ञात न हुआ। कुछ न ज्ञात होने के बावजूद जो तृप्ति-आनन्द की अनुभूति होती है, यही 'सुषुप्ति' अवस्था
है। इस समय कारण शरीर की आनन्द की अनुभूति होती है। इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों की
सक्रियता की स्थिति ही जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति की अवस्था है।
८०. जातवेदा — यह अग्नि का ही पर्याय है। कहीं-कहीं सूर्य के पर्याय में भी जातवेदा शब्द का प्रयोग हुआ है।
अरणियों में जातवेदा अग्नि सन्निहित है- अरण्योर्निहितो जातवेदाः (कठ०२.१.८)। केनोपनिषद् में अग्निदेव की
ही जातवेदा सम्बोधन प्रदान किया गया है-
तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेद एतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति (केन०३.३)।
८१. जीवन्मुक्त — भारतीय दर्शन जगत् में 'मोक्ष' की मानव-जीवन का चरम पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) माना
गया है। वेदान्त दर्शन 'मोक्ष' की ज्ञान साध्य मानता है। ज्ञान (आत्मज्ञान-ब्रह्मज्ञान) के अभाव में मोक्ष की प्राप्ति
नहीं होती- ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः । जीव द्वारा यथार्थरूप से अपने स्वरूप की जान लेना ही मोक्ष है। जब तक जीव
माया-अविद्या की (आवरण-विक्षेप) शक्तियों से बँधकर अपने की संसारी समझता रहता है, तब तक इस
भवसागर-संसार में इधर-उधर भटकता रहता है। जब श्रवण-मनन-निदिध्यासन द्वारा अपने आत्म स्वरूप-
ब्रह्मस्वरूप का साक्षात्कार कर लेता है, तब वह मुक्त हो जाता है। ज्ञान के उदय और अज्ञान के विनाश का ही दूसरा
नाम मोक्ष है।
वस्तुतः जीव (आत्मा) स्वभाव से ही शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वरूप वाला होता है। मुक्ति की न उत्पत्ति होती है,
न प्राप्ति। जब कोई सद्गुरु मिल जाता है और ज्ञान का उपदेश करता है, तो साधक का भ्रमात्मक अज्ञान दूर हो जाता
है और विवेक-ज्ञान का उदय हो जाता है, यही मुक्ति की अवस्था है। वेदान्त ग्रन्थ में इसे 'ग्रीवेयकन्याय' द्वारा
समझाया गया है। गले में पड़ी सुवर्ण-जंजीर की भ्रमवश बाहर ढूँढ़-ढूँढ़कर परेशान हुए व्यक्ति की जब कोई
बुद्धिमान् गले में होने का संकेत करता है, तो उसे ध्यान आता है और सुवर्ण-जंजीर पाकर बड़ा प्रसन्न होता है।
इस प्रकार 'मुक्ति' के आनन्द में डूबा हुआ साधक सांसारिक हर्ष-विषाद से ऊपर उठकर प्रसन्नतापूर्वक
जीवन -यापन करता है, यही 'जीवन्मुक्त' की स्थिति है। दूसरों के देखने में वह सामान्य व्यक्तियों जैसा आचरण
करता दिखता है; परन्तु वस्तुस्थिति उससे भिन्न होती है। वह कर्त्ता-भोक्ता के भाव से ऊपर उठ जाता है, उसके
कर्म का पाप-पुण्य के रूप में कोई प्रतिफल नहीं होता, जो प्रारब्ध कर्म हैं, उन्हीं के अनुसार जीवनक्रम चलता
रहता है। दग्ध बीज की तरह उनसे नये कर्म का अंकुरण नहीं होता। कुलाल चक्र (कुम्हार के चक्र) की तरह
जीवन क्रम, पहले की गतिशीलता के क्रम में गतिशील रहता है। प्रारब्ध कर्मों के क्षीण हो जाने पर उसका हाड़-

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४५० [परिशिष्ट] तद्वन
मांस का शरीर अपने पंचतत्त्वों में विलीन हो जाता है और फिर उसका पुनर्जन्म नहीं होता, क्योंकि पुनर्जन्म में जिस
कर्म बीज की अनिवार्यता होती है, वह ज्ञानाग्नि से दग्ध हो गया होता है।
इस प्रकार वह पूर्ण मुक्त होकर परब्रह्म के साथ एकाकार हो जाता है- यह अवस्था 'विदेह-मुक्त' कहलाती
है। इस प्रकार मोक्ष (मुक्ति) के दो रूप होते हैं-१. जीवन-मुक्त तथा २. विदेह मुक्त।
८२. ज्ञान, भक्ति और कर्मयोग- गीता में प्रमुखतः योग को तीन भागों में विभक्त किया है- १. ज्ञानयोग, २.
भक्तियोग और ३. कर्मयोग। इस व्यापक, प्रकाशक, प्रेरक परमात्मा को पा लेना ही योग है। ज्ञान, भक्ति और कर्म
ये योग के विविध साधन हैं। परमात्मा को न्यायकारी और सर्वव्यापी अनुभव करना ज्ञानयोग है। परमात्मा के प्रति
श्रद्धा-विश्वास तथा प्रेम-आत्मीयता के सूत्रों से जुड़ना भक्तियोग है। फलाकांक्षा को त्यागकर परमात्मा की प्रसन्नता
के निमित्त प्रत्येक कर्म को करते रहना कर्मयोग है। कर्मयोग को महत्ता गीता में इस प्रकार दो गई है कि संन्यास
और कर्मयोग दोनों निःश्रेयस प्रदान करने वाले हैं, परन्तु उन दोनों में कर्म-संन्यास से कर्मयोग श्रेष्ठ है- संन्यासः
कर्मयोगश्च निःश्रेयस्करावुभौ । तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ (गी०५.२)
कुछ विद्वान् कर्म को बन्धन का कारण मानते हैं, परन्तु जो कर्म ज्ञानपूर्वक, भक्तिभाव पूर्वक तथा आसक्ति
से रहित होकर किया जाता है, उसे बन्धन रूप नहीं माना गया है, वह तो मुक्ति का आधार स्वरूप है। श्रुति कहती
है- कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत १४ समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे । (यजु०४०.२)
८३. ज्ञान-विज्ञान - मनुष्य में अनेक अपूर्णताएँ होती हैं, इन्द्रिय लिप्सा-लालसा, विषय-विकार आदि होते हैं,
ज्ञान से विकारों, लालसाओं से निवृत्ति और पूर्णता को प्राप्ति होती है। ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं मिल सकती । ( ऋते
ज्ञानान्नमुक्तिः)। गुरु के प्रति श्रद्धा भाव और सेवा से तथा स्वयं के अध्यवसाय से ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान के
सदृश पवित्र वस्तु कोई नहीं है, यह गीता का निर्देश है- न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते (गी० ४.३८)।
सांसारिक वस्तुओं से सम्पन्न होने वाले यज्ञ से ज्ञानरूप यज्ञ सब प्रकार से श्रेष्ठ है- श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः
परंतप (गी०४.३३)। ज्ञान की नौका द्वारा सारे पापों को पार किया जा सकता है- सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं
संतरिष्यसि (गी०४.३६)। ज्ञानरूप अग्नि समस्त कर्मों को भस्म कर देती है- ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते
तथा (गी०४.३७)। तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष श्रद्धावान् होकर ज्ञान को प्राप्त करता है-श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः
संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति (गी० ४.३९)।
विज्ञान से तात्पर्य विशिष्ट ज्ञान से है। किसी विशिष्ट विषय के तत्त्वों या सिद्धान्तों का क्रमबद्ध संगृहीत ज्ञान,
विज्ञान कहलाता है। विषय ग्रहण के कारण को विज्ञान कहा गया है-गृह्णन्ति विषयान् येन विज्ञानं हि तदुच्यते।
आज जिसे हम 'विज्ञान' के नाम से जानते हैं, वह हमें विविध विषयों का क्रमबद्ध कार्य- कारणता से युक्त ज्ञान
कराता है, इसलिए 'विज्ञान' कहा जाता है। तर्क, तथ्य, प्रमाण को कसौटी पर खरा उतरने वाला ज्ञान 'विज्ञान' है।
८४. तद्वन - वेदान्त दर्शन का यह शब्द 'ब्रह्म और उसके प्रति कर्त्तव्य भाव' को प्रकट करता है। केनोपनिषद् खण्ड
चार के छठें मन्त्र में यह शब्द प्रयुक्त हुआ है। आचार्य शंकर ने इस शब्द का भाष्य करते हुए लिखा है- तद् ब्रह्म
ह किल तद्वनं नाम तस्य वनं तद्वनं तस्य प्राणिजातस्य प्रत्यगात्मभूतत्वाद्धनं वननीयं संभजनीयम्। अर्थात् वह
'ब्रह्म' निश्चय ही 'तद्वन' नाम वाला है। उसका वन-तद्वन, यह उस प्राणि-समूह का प्रत्यगात्मस्वरूप होने के
कारण वन- वननीय- है, भजनीय है। वस्तुतः जहाँ यह शब्द प्रयुक्त हुआ है, उसके पूर्व यह बतलाया गया है कि
साधारण लोग जिस ब्रह्म को उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है, इससे लोग यह न समझें कि ब्रह्म की उपासना
हो ही नहीं सकती; इस कारण ऋषि इस स्थल पर यह दिखलाते हैं कि उस परमब्रह्म परमात्मा को 'वन' रूप में
समझा जाए अर्थात् वह ब्रह्म ऐसा है कि जिसका सम्यक् रूप से अच्छी तरह से भजन (अनुभव) किया जा सकता
है। परमशान्ति देने वाला अर्थात् वननीय वही है।
'वन' का एक अर्थ जल भी है। जो गर्मी को - ताप को शान्त करता है, हृदय को शान्ति देता है- वह
जल है, रस है- 'रसोऽहमप्सु कौन्तेय' (गी०७.८) अर्थात् जल में जो रस है, वह मैं हूँ। तैत्तिरीय उपनिषद् में भी
ब्रह्म को रस रूप कहा गया है- रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति (तैत्ति० २.७)। अतः ऐसा प्रतीत
होता है कि उसी (दिव्य) रस को -आनन्द को -'वन' अर्थात् प्राप्त होने योग्य वस्तु रूप में कहा गया है।

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तप (परिशिष्ट) ४५१
८५. तप—विषयों से, राग से शरीर और मन को दृढ़ता पूर्वक मुक्तकर योग की स्थिति के लिए तैयार करना ही तप
है। शरीर तथा मन की विविध विषयों में प्रयुक्त होने वाली शक्ति की संयमित करना और उनकी शक्ति की उड्डीस
करना भी तप कहलाता है। तप के द्वारा मनुष्य असाधारण तेज सम्पन्न होता है। साधन की दृष्टि से तप की तीन प्रकार
का माना गया है-१. शारीरिक, २. वाचिक, ३. मानसिक। महापुरुषों, देवगणों आदि की पूजा आराधना, ब्रह्मचर्य,
अहिंसा की शारीरिक तप माना गया है। वेद पठन, सत्य, प्रिय और हितकर वचन बोलना वाचिक तप है। मनो-
निग्रह, वासनाओं का निरोध, मौन और भावशुद्धि की मानसिक तप कहा गया है।
फलाकांक्षा से रहित होकर श्रद्धापूर्वक किये गये ये तीनों तप सात्त्विक तप कहे गये हैं। भावों की दृष्टि से
इस प्रकार भी तप के तीन भेद किये गये हैं- १. सात्त्विक, २. राजस और ३. तामस। तप से विद्या, योग, मन्त्र आदि
की इष्ट सिद्धि मिलती है। उपनिषद् में तप और स्वाध्याय तथा उपदेश की मनुष्य के कर्त्तव्यों में अभिहित किया गया
है- तपश्च स्वाध्याय प्रवचने च (तैत्ति० १.९)। तप से ही ब्रह्म वृद्धि-विस्तार की प्राप्त होता है- तपसा चीयते
ब्रह्म (मुण्ड० १.१.८)। तप से ही ब्रह्म की जानने की तीव्र इच्छा करें, तप ही ब्रह्म है- तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व।
तपो ब्रह्मेति (तैत्ति०३.२)। तप के द्वारा ज्ञान प्राप्त होता है, ज्ञान होने से 'मन' वश में आता है। मन वश में आने
से आत्मा की प्राप्ति होती है और आत्मा की प्राप्ति होने पर संसार से मुक्ति मिल जाती है-तपसा प्राप्यते सत्त्वं
सत्त्वात्संप्राप्यते मनः। मनसा प्राप्यते त्वात्मा ह्यात्मापत्त्या निवर्तत इति (मैत्रा० ४.३)। तप के प्रति एकनिष्ठ रहने
वाले को तपोनिष्ठ तथा तप की विपुल पूँजी संचय करने वाले की तपोनिधि कहा गया है।
८६. तुरीय-तुरीयातीत- वेदान्त में प्राणियों की चार अवस्थाएँ वर्णित हैं- जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय। तुरीय
(चतुर्थ अवस्था) की मोक्ष की अवस्था भी कहा गया है। उक्त तीनों अवस्थाओं की उत्पत्ति और लय की जानने
वाला और स्वयं उत्पत्ति-लय से परे रहने वाला जो नित्य साक्षी चैतन्य है- वह तुरीय चैतन्य है और यह अवस्था
तुरीय है- अवस्थात्रयभावाभावसाक्षी स्वयंभूभावरहितं नैरन्तर्यं चैतन्यं यदा-तदा तुरीयं चैतन्यमित्युच्यते (स०
सा०४)। जाग्रत् अवस्था मे वैश्वानर संज्ञक आत्मा नेत्र में रहता है, स्वप्नावस्था में तैजस आत्मा कण्ठ में रहता है,
सुषुप्ति अवस्था में प्राज्ञ संज्ञक आत्मा हृदय में रहता है और तुरीय (चतुर्थ- तीन अवस्थाओं से परे की) अवस्था
का आत्मा ब्रह्मरन्ध्र में रहता है-नेत्रस्थं जागरितं विद्यात्कण्ठे स्वप्नं समाविशत्। सुषुप्तं हृदयस्थं तु तुरीयं मूर्ध्नि
संस्थितम् (ना०प० ५.१)। तुरीय अवस्था की विजित करने वाले संन्यासियों की एक श्रेणी तुरीयातीत कहलाती
है। उस जन्म-मरण, धर्म और मोक्ष की तुरीय अवस्था से परे उस विशुद्ध परमात्मा या परब्रह्म को भी तुरीयातीत
कहा गया है।
उपनिषद् में सूर्य की भी तुरीय या दर्शात पद कहा गया है। जो (आदित्य) तपता है, जो चतुर्थ होता है, वही
तुरीय या दर्शात पद है- य (आदित्य) एष तपति यद्वै चतुर्थं तत्तुरियं दर्शातं पदमिति (बृह० ५.१४.३)। यह
तुरीय दर्शात पद या परोरजा (सभी लोकों से परे) किसी के द्वारा प्राप्य नहीं है, क्योंकि इतना प्रतिग्रह कोई कैसे कर
सकता है- एतदेव तुरीयं दर्शातं पदं परोरजा य एष तपति नैव केनचनाप्यं कुत उ एतावत् प्रतिगृह्णीयात् (बृह०
५.१४.६) यह निर्गुण ब्रह्म ही तुरीयातीत तत्त्व है, इसमें अवस्था-भेद नहीं है- अवस्थाः न त्वेवं तुरीयातीतस्य
निर्गुणस्य (ना०प० ६.१)।
८७. तैंतीस देवता-निरुक्तकार यास्कमुनि के अनुसार देव शब्द की व्युत्पत्ति दान, दीपन, द्योतन आदि अर्थों में की
गयी है। वास्तव में देव शब्द विश्व की प्रकाशक और कल्याणकारी शक्तियों का प्रतीक है। इन्हें तैंतीस कोटि
(करोड़) या श्रेणियों का माना गया है। तैंतीस संख्यक देवों में अष्टवसु, एकादशरुद्र, द्वादश आदित्य, पृथ्वी और द्यौ
को परिगणित किया गया है। इसकी पुष्टि शतपथ ब्राह्मण में होती है- अष्टौ वसवः। एकादश रुद्रा द्वादशादित्या
इमेऽएव द्यावापृथिवी त्रयस्त्रिंश्यौ त्रयस्त्रिंशद्वै देवाः (शत० ब्रा० ४.५.७.२)। निरुक्त (३.७.४) के अनुसार
ये सब देवता एक ही अद्वय आत्मा के प्रत्यंगरूप हैं- एकस्यात्मनोऽन्ये देवाः प्रत्यङ्गानि भवन्ति।
८८. तैजस- यह वेदान्तदर्शन का पारिभाषिक शब्द है। सृष्टि विकास क्रम मे कारण रूप ईश्वर से उनकी इच्छानुसार
सृष्टि सृजन के संकल्प के साथ ही सृष्टि-प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। इसी क्रम में सूक्ष्म तन्मात्राएँ, पंचभूत,
पंचज्ञानेन्द्रियाँ, पञ्चप्राणादिकों के प्रादुर्भाव का क्रम सम्पन्न होता है। पंचीकरण एवं त्रिवृत्करण सिद्धान्तों के आधार

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४५२ [परिशिष्ट] दक्षिणा
पर सूक्ष्म शरीर का निर्माण होता है। सूक्ष्म शरीर सत्रह अवयवों वाला है-पंचज्ञानेन्द्रियाँ, पंच कर्मेन्द्रियाँ, पंच प्राण
तथा मन और बुद्धि। दूसरे शब्दों में इसे विज्ञानमय कोश (पंचज्ञानेन्द्रियाँ तथा बुद्धि), मनोमय कोश (पंच ज्ञानेन्द्रियाँ
तथा मन) तथा प्राणमय कोश (पंचकर्मेन्द्रियाँ तथा पंच प्राण) का समुच्चय कहा जा सकता है।
सूक्ष्म शरीर की दो स्थितियाँ होती हैं- एक समष्टिगत, दूसरी व्यष्टिगत। सूक्ष्म शरीर की समष्टि से उपहित
चैतन्य को 'हिरण्यगर्भ' तथा व्यष्टि से उपहित चैतन्य को 'तैजस' कहा गया है। समष्टिभूत 'चैतन्य' हिरण्यगर्भ के
अतिरिक्त सूत्रात्मा प्राण, प्रजापति तथा ब्रह्मा आदि संज्ञाओं से भी अभिहित किया गया है। व्यष्टिभूत चैतन्य 'तैजस'
है। दोनों में प्रमुख अन्तर यह है कि समष्टिभूत चैतन्य अपरिच्छिन्न (अनावृत-असीम) होता है और व्यष्टिभूत
चैतन्य 'परिच्छिन्न' (आवृत-ससीम) होता है। यह सूक्ष्म देहाभिमानी 'तैजस' सूक्ष्मतर विषयों का ही आहार ग्रहण
करने वाला होता है। यह स्थिति 'स्वप्नावस्था' में आती है। वेदान्त की मान्यतानुसार वन और वृक्ष की तरह
हिरण्यगर्भ (वन) और तैजस (वृक्ष) में अभेद है।
८९. त्रयताप-त्रिविध दुःख - 'दर्शन' जगत् में यह शब्द अति प्रसिद्ध है। दर्शन का एक प्रयोजन तीनों तापों-तीनों
दुःखों से मुक्ति दिलाना माना गया है। सांख्य दर्शन के प्रणेता महर्षि कपिल ने मानव जीवन का परम पुरुषार्थ त्रिविध
दुःखों का अत्यन्ताभाव माना है-अथ त्रिविधदुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्त पुरुषार्थः (सां० १.१)। सभी प्राणी जिन
अनेकानेक दुःखों-कष्टों से विनिवृत्ति चाहते हैं, उन्हें तीन वर्गों में बाँटा गया है- १. आध्यात्मिक २. आधिभौतिक
३. आधिदैविक। जो दुःख शरीर-मन से जुड़े होते हैं, उन्हें आध्यात्मिक दुःख कहा जाता है, जैसे- रोग, शोक,
लोभ- मोह, ईर्ष्या-द्वेष, आदि। जो दुःख अन्यान्य प्राणियों के संसर्ग से उत्पन्न होते हैं, उन्हें आधिभौतिक-दुःख
कहा जाता है, जैसे-सर्प-बिच्छू, सिंह आदि हिंस्र जन्तुओं तथा मनुष्यों के लड़ाई-झगड़े से उत्पन्न दुःख। जो दुःख
दैवी आपदाओं के रूप में प्राप्त होते हैं, उन्हें आधिदैविक दुःख कहा जाता है। जैसे- अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प,
विद्युत्पात आदि। दर्शन का प्रयोजन मुख्यतः इन्हीं त्रय तापों से मुक्ति प्रदान करने का है। इसी उद्देश्य से इनके
अध्ययन, चिन्तन, मनन, की आवश्यकता होती है। त्रयतापों की निवृत्ति के बाद ही परमानन्द प्राप्ति का पथ-प्रशस्त
होता है।
९०. त्रय-शरीर - शास्त्रों में मनुष्य शरीर के तीन भेद किये गये हैं। स्थूल, सूक्ष्म और कारण। दृश्यमान अंग-
अवयवों या पञ्चभूतों से निर्मित शरीर स्थूल शरीर कहलाता है। स्थूल का शब्दार्थ भौतिक, मूर्त, अन्न तथा भोग्य
से लिया जाता है। सूक्ष्म से तात्पर्य अभौतिक, अमूर्त, अग्नि, भोक्ता तथा अदृश्य से लिया जाता है। पञ्च तन्मात्राओं,
पञ्च ज्ञानेन्द्रियों, पञ्चकर्मेन्द्रियों, मन, बुद्धि-इन सत्रह के समूह को सूक्ष्म या लिङ्ग शरीर कहते हैं। भावनाओं,
इच्छाओं, आकांक्षाओं से सम्बद्ध आन्तरिक शरीर को कारण शरीर कहा जाता है। ऐसा भी वर्णन आता है कि स्थूल
शरीर स्वयं से विराट् सूक्ष्म शरीर में तथा सूक्ष्म शरीर स्वयं से विराट् कारण शरीर में समाया हुआ है। इन तीनों शरीरों
को प्रेरित करने वाला वह परम पुरुष अर्थात् आत्मा इनसे भिन्न है। स्थूल शरीर को अन्नमय कोश, सूक्ष्म शरीर को
प्राणमय, मनोमय एवं विज्ञानमय कोश तथा कारण शरीर को आनन्दमय कोश से सम्बद्ध माना जाता है। स्थूल, सूक्ष्म
एवं कारणरूप जो विश्व, तैजस एवं प्राज्ञ ईश्वर है, उनके साथ सब अवस्थाओं में एक ही साक्षी (ब्रह्म) स्थित है-
स्थूल सूक्ष्मकारणरूपैर्विश्वतैजसप्राज्ञेश्वरैः सर्वावस्थासु साक्षी त्वेक एवावतिष्ठते (ना०प० ६.१)।
९१. दक्षिणा - यज्ञ करने वाले पुरोहितों को दिये गये दान को दक्षिणा कहते हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम की समाप्ति पर शिष्य
अपने आचार्य को गुरु दक्षिणा देता था। गृह्यसूत्रों में इसका विधान वर्णित है। प्रत्येक धार्मिक या माङ्गलिक कार्य की
समाप्ति पर पुरोहितों, ऋत्विजों को दक्षिणा देना आवश्यक समझा जाता था। इसके बिना शुभ कार्य का सुफल नहीं
मिल पाता। श्रुति के अनुसार दक्षिणादाता स्वर्ग में उच्चस्थ पदों पर प्रतिष्ठित होते हैं- उच्चा दिवि दक्षिणावन्तो
अस्थुर्ये (ऋ० १०.१०७.२)। छान्दोग्य० के अनुसार जो तप, दान, आर्जव (सरलता), अहिंसा और सत्यवचन हैं-
ये आत्मयज्ञ की दक्षिणारूप हैं-यत्तपो दानमार्जवमहिंसा सत्यवचनमिति ता अस्य दक्षिणाः (छान्दो०३.१७.४)।
याज्ञवल्क्य और शाकल्य संवाद में वर्णित है कि यज्ञ किसमें प्रतिष्ठित है ? दक्षिणा में। दक्षिणा किसमें प्रतिष्ठित है ?
श्रद्धा में; क्योंकि पुरुष में जब श्रद्धा होती है, तभी दक्षिणा देता है- कस्मिन्नु यज्ञः प्रतिष्ठित इति दक्षिणायामिति
कस्मिन्नु दक्षिणा प्रतिष्ठित इति श्रद्धायामिति यदा ह्येव श्रद्धद्धेऽथ दक्षिणां ददाति (बृह०३.९.२१)।

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दमन [परिशिष्ट] ४५३
९२. दमन — इन्द्रियों को वश में रखना और चित्त को दुष्प्रवृत्तियों से बचाना-यह दमन कहलाता है। दबाने अथवा
रोकने की क्रिया को भी दमन कहा गया है। उपनिषद् के अनुसार प्रजापति के अनुशासन को दैवी वाणी मेघगर्जना
के सदृश गूँजती रहती है- द,द,द। देवों के लिए दमन करो, मनुष्यों के लिए दान करो, असुरों के लिए दया करो।
अतः दम, दान और दया इन तीनों को सीखें-तदेतदेवैषा दैवी वागनुवदति स्तनयित्नुर्द द द इति दाम्यत दत्त
दयध्वमिति। तदेतत्त्रयँशिक्षेद् दमं दानं दयामिति (बृह० ५.२.३)। उपनिषद् में शास्त्रों के अध्ययन-अध्यापन
के साथ दमन को भी कर्त्तव्य निरूपित किया गया है- दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च (तैत्ति० १.९.१)।
९३. दर्श-पूर्णमास — अमावस्या-पूर्णिमा के दिन यज्ञ आदि द्वारा देवों का विशिष्ट पूजन किया जाता है। शास्त्रों में
इसका माहात्म्य मिलता है कि जो विद्वान् दर्शपूर्णमास (अमावस्या-पूर्णिमा) में यजन करता है, वह परम गति को
प्राप्त होता है- य एवं विद्वान् दर्शपूर्णमासौ यजते परमामेव काष्ठां गच्छति (तैत्ति०सं० १.६.९.३)। इसकी तुलना
देवयान मार्ग से की गई है। जो विद्वान् इसका पूजन करता है, वह देवयान मार्ग पर आरोहण करता है-
एष वै देवयानः पन्था यद् दर्शपूर्णमासौ य एवं विद्वान् दर्शपूर्णमासौ यजते य एव देवयानः पन्थास्तँ
समारोहति (तैत्ति०सं०२.५.६.२)।
९४. दुःख-सुख — अप्रिय अथवा प्रतिकूल परिस्थितियों में जो मन में वेदना होती है, उसे दुःख कहा जाता है।
इसके विपरीत अनुकूल परिस्थितियों में मन में उत्पन्न आह्लाद की अवस्था को सुख कहते हैं। इसके दो भेद माने
गये हैं। स्वकीय और परकीय। सांख्य दर्शन में तीन प्रकार के दुःखों का वर्णन किया गया है-आध्यात्मिक,
आधिभौतिक एवं आधिदैविक। इन्हें ही त्रयताप कहा गया है। इन्द्रियभोग ही दुःख-सुख के हेतु कहे गये हैं-
सुखदुःखबुद्धया श्रेयोऽन्तः कर्त्ता यदा तदा इष्टविषये बुद्धिः सुख बुद्धिरनिष्ट विषये बुद्धिर्दुःखबुद्धिः ।
शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः सुखदुःखहेतवः (स०सा०६)। इन्द्रियों के संयम में सुख तथा असंयम में दुःख भरा है।
उपनिषदों में कहा गया है, जो अनित्य और नश्वर है, वह सब दुःख ही है, केवल नित्य और शाश्वत ही सुख स्वरूप
है। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है कि सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान भाव से ग्रहण
करना चाहिए- सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ (गी० २.३८)। सच्चिदानन्द परमात्मा के स्वरूप
बोध से जो आनन्द युक्त स्थिति होती है, उसे उपनिषद् में सुख कहा गया है और अनात्म रूप विषयों के सङ्कल्प
की स्थिति को दुःख कहा गया है- सुखमिति च सच्चिदानन्दस्वरूपं ज्ञात्वानन्दरूपा या स्थितिः सैव सुखम्।
दुःखमिति अनात्मरूप विषय सङ्कल्प एव दुःखम् (निरा० १५)।
९५. देवता—'देवता' शब्द देव का ही वाचक स्त्रीलिङ्ग है, हिन्दी में पुंल्लिङ्ग में प्रयुक्त होता है। तीन देवता प्रधान माने
गये हैं- ब्रह्मा, विष्णु और महेश। ये क्रमशः सृष्टि, स्थिति और संहार के नियामक देव हैं। मूलतः ३३ देवता माने
गये हैं- १२ आदित्य, ८ वसु, ११ रुद्र, द्यावा और पृथिवी। इन देवों को परिवार क्रम से तीन भागों में विभाजित किया
गया- १. द्वादश आदित्य, २. एकादश रुद्र, ३. अष्टवसु। आगे देवमण्डल का विस्तार ३३ करोड़ भी माना गया है।
इन्हें स्थानक्रम से तीन भागों में विभाजित किया गया है- द्युस्थानीय, अन्तरिक्ष स्थानीय और पृथ्वी स्थानीय। यास्क
प्रणीत निरुक्त में देव शब्द को व्युत्पत्ति दान, दीपन अथवा द्योतन आदि अर्थों में की गयी है। देव शब्द जगत् की
प्रकाशमान और कल्याणकारी शक्तियों का प्रतीक है। निरुक्त (७.१.४) के अनुसार सभी देवताओं को उत्पत्ति
आत्मा से ही मानी गयी है- एकस्यात्मनोऽन्ये देवाः प्रत्यङ्गानि भवन्ति अर्थात् एक आत्मा के ही सब देवता
प्रत्यङ्ग रूप हैं। एक ही परम देव सभी प्राणियों में व्याप्त हैं, सभी प्राणियों के अन्तरात्मा रूप हैं-एको देवः
सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा (श्वेता०६.११)।
९६. देवयान-पितृयान मार्ग— जीवात्मा के शरीर से उत्क्रमण के बाद परलोक गमन के दो मार्गों में से एक मार्ग,
जिससे वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है, वह देवयान मार्ग और जिससे वह चन्द्रमा को प्राप्त होता है, वह पितृयान मार्ग
कहलाता है। अन्य मतानुसार वह मार्ग जिससे जीवात्मा ब्रह्म को प्राप्त होता है, देवयान मार्ग और वह मार्ग जिससे
जाकर जीवात्मा स्वर्गादि सुख भोगकर पुनः संसार में लौटता है, पितृयान मार्ग कहलाता है। देवयान का सम्बन्ध
उत्तरायण से और पितृयान का सम्बन्ध दक्षिणायन से है, इसीलिए उत्तरायण में मरना मोक्षदायक समझा जाता है।
देवयान मार्ग में जाने वाले सर्वप्रथम अर्चि को पाते हैं। अर्चि से अह, अह से शुक्ल पक्ष, शुक्ल पक्ष से उत्तरायण

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के षण्मास, उत्तरायण से संवत्सर, संवत्सर से आदित्य, आदित्य से विद्युत् को प्राप्त होते हैं। पितृयान मार्ग से जाने
वाले मनुष्य इसी प्रकार धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष, दक्षिणायन के षण्मास, फिर पितृलोक और वहाँ से चन्द्रमा को प्राप्त
होते हैं। स्वर्ग सुख भोगने के अनन्तर किसी योनि में पुनः जन्म ग्रहण करते हैं। उपनिषद् के अनुसार जो पितृयान
मार्ग है, वही यह रयि है- एष ह वै रयिर्यः पितृयाणः (प्र०१.९)। देवयान मार्ग सत्य से परिपूर्ण है, जिससे
आप्तकाम ऋषिगण गमन करते हैं, जहाँ उस सत्यस्वरूप परमेश्वर का परमधाम है- सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन
पन्थाविततो देवयानः। येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् (मुण्ड०३.१.६)।
९७. धर्म-अधर्म - धर्म शब्द 'धृ' धातु से निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ है- धारण करना। दर्शन शास्त्र के अनुसार
जिससे जीवन में अभ्युदय और निःश्रेयस (मोक्ष) की प्राप्ति होती है, वह धर्म है-यतोऽभ्युदय निःश्रेयससिद्धिः
स धर्मः (वै०द०१.१.२)। मीमांसा दर्शन के रचयिता महर्षि जैमिनि के अनुसार 'वेदों द्वारा निर्दिष्ट कर्म ही व्यक्ति
का धर्म है'- (मी०द०१.१.२)। न्यायदर्शन में २४ गुणों में से एक गुण धर्म भी वर्णित है। गीता में चारों वर्णों के
लिए भिन्न-भिन्न धर्म निर्धारित है। धर्म के चार वर्गीकरण इस प्रकार भी प्रतिपादित हैं- नित्य, नैमित्तिक, काम्य और
आपद् धर्म। स्मृति ग्रन्थ में धर्म के दस अङ्गों का वर्णन मिलता है- धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह,
धी, विद्या, सत्य और अक्रोध। उपनिषद् में धर्म का आचरण करने और उसमें प्रमाद न करने का निर्देश दिया गया
है- धर्मं चर। धर्मान्न प्रमदितव्यम् (तैत्ति०१.११.१)। गीता में कहा गया है कि धर्म का थोड़ा आचरण भी महान्
भय से मुक्त कर देता है- स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् (गी०२.४०)। धर्म ही प्रजा को धारण करता
है-'धारणाद् धर्ममित्याहुः धर्मो धारयते प्रजाः' (महा०कर्ण० ६९.५८)। इस प्रकार धर्म का जो प्रतिपादन हुआ,
उससे विपरीत अधर्म है। व्यास जी ने संक्षेप में धर्म (पुण्य) और अधर्म (पाप) को परिभाषा बताते हुए लिखा है-
अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्। परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्। परोपकार ही धर्म है, परपीडा
(दूसरों को कष्ट देना) अधर्म है। गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है-
परहित सरिस धर्म नहिं भाई। परपीड़ा सम नहिं अधमाई॥
९८. धर्मसूत्र - वेदाङ्ग में 'कल्प' के अन्तर्गत सूत्र ग्रन्थ चार प्रकार के हैं- श्रौत, गृह्य, धर्म और ऐन्द्रजालिक (रचना
सम्बन्धी)। ये मनुष्य के व्यावहारिक तथा धार्मिक जीवन के लिए अत्यन्त महत्त्व के हैं। धर्मसूत्र वे ग्रन्थ हैं, जिनमें
चारों वर्णों तथा चारों आश्रमों के कर्त्तव्यों, मर्यादाओं तथा आचरण, व्यवहार आदि का निर्देश है। ये धर्मसूत्र प्रमुख
रूप से पाँच हैं- १.आपस्तम्ब, २. हिरण्यकेशी, ३.बौधायन, ४. गौतम और ५. वसिष्ठ। इनमें अपराध आदि के दण्डों
के विधान तथा प्रायश्चित्त भी वर्णित हैं।
९९. धाता - द्र० - विधाता।
१००. धारणा - चित्तवृत्तियों को चारों ओर से हटाकर किसी एक स्थान या विषय में लगाना धारणा है। मन के
विचारों-संकल्पों को आत्मा में लय करते रहना और आत्मा या परमात्मा के चिन्तन में स्थित रहना धारणा कहलाता
हैं। मन की वह स्थिति जिसमें ब्रह्म चिन्तन के अतिरिक्त अन्य कोई भाव या विचार नहीं ठहरता, धारणा कहलाती
है। इसमें मन में वासना नहीं रह जाती। उपनिषद् के अनुसार मन को संकल्पात्मक मानकर उसे आत्मा में लय करते
हुए उसे परमात्म चिन्तन में धारण करना 'धारणा' को स्थिति है- मनः संकल्पकं ध्यात्वा संक्षिप्यात्मनि
बुद्धिमान्। धारयित्वा तथात्मानं धारणा परिकीर्तिता (अमृ०१६)। योगसूत्र के अनुसार चित्त को एक स्थान पर
दृढ़ करना धारणा है- देशबन्धः चित्तस्य धारणा (यो०द०३.१)। प्राणायाम के द्वारा इन्द्रियों के दोषों को तथा
धारणा के द्वारा पापों को जलाते हैं-प्राणायामैर्दहेद् दोषान् धारणाभिश्च किल्बिषम्। किल्बिषं हि क्षयं नीत्वा
रुचिरं चैव चिन्तयेत् (अमृ०८)।
१०१. ध्यान - चित्त को चारों ओर से हटाकर किसी एक विषय पर सतत स्थिर करना ध्यान कहलाता है। बाह्य इन्द्रियों
के बिना केवल मन में किसी विषय या व्यक्ति को लाना या बिठाना भी ध्यान है। ध्यान में ध्याता अपने चित्त को
ध्येय में स्थिर या एकाग्र करता रहता है। यही ध्यान जब चरमावस्था को पहुँचता है, तब समाधि कहलाता है। सांख्य
दर्शन के अनुसार चित्त का राग से विमुक्त होना ही ध्यान है- रागोपहितिर्ध्यानम् (सां०द०३.३०)। इसी तथ्य को
उपनिषद् कहता है कि मन का विषयों से मुक्त होना ही ध्यान है- ध्यानं निर्विषयं मनः (मैत्रे०२.३)। गीता में कहा

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ध्रुव (परिशिष्ट) ४५५
गया है कि कितने ही पुरुष ध्यान के द्वारा शुद्ध अन्तःकरण से अपने में ही परमात्मा को देखते हैं- ध्यानेनात्मनि
पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना (गी०१३.२४)। ज्ञान से ध्यान की महत्ता अधिक मानी जाती है- श्रेयो हि
ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते (गी० १२.१२)।
१०२. ध्रुव— ध्रुव शब्द के पर्याय इस प्रकार हैं- स्थिर, अचल, निश्चित, अटल, नित्य, शाश्वत। अनश्वर पदार्थों के लिए
ध्रुव शब्द प्रयुक्त होता है। कहीं-कहीं परमात्मा के पर्याय रूप में भी दृष्टिगोचर होता है। स्थिरता का प्रतीक होने के
कारण हिन्दू विवाह के अवसर पर दाम्पत्य जीवन की स्थिरता के लिए वधू को ध्रुव (तारे) का दर्शन कराया जाता
है। कठोपनिषद् का प्रतिपादन है कि कर्मफल रूपनिधि अनित्य है, क्योंकि अनित्य पदार्थों से ध्रुव (नित्य-
परमात्मा) तत्त्व की प्राप्ति नहीं हो सकती- जानाम्यहं ꣳ शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत्
(कठ०१.२.१०)। ब्राह्मण ग्रन्थ के अनुसार जो स्थिर है, जो प्रतिष्ठित (आकाश में) है, वही ध्रुव है- यद्वै स्थिरं
यत्प्रतिष्ठितं तद् ध्रुवम् (शत०ब्रा०८.२.१.४)।
१०३. नाचिकेताग्नि — कठोपनिषद् की यम-नचिकेता की कथा विख्यात है। उस कथा में 'नचिकेता' ने यमराज से
द्वितीय वर के रूप में उस अग्निविद्या को माँगा है, जो समस्त दुःखों को दूर करके स्वर्ग (परमसुख) प्रदान करने
वाली है- स त्वमग्निंꣳ स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वंꣳ श्रद्दधानाय मह्यम्- हे मृत्यो! आप स्वर्ग के साधनभूत
अग्नि को जानते हैं, सो मुझ श्रद्धालु के प्रति उसका वर्णन कीजिए (कठ०१.१.१३)।
यमराज ने विस्तारपूर्वक अग्निविद्या का रहस्य नचिकेता को बताया, तदुपरान्त नचिकेता ने यमराज द्वारा
बताई गई अग्निविद्या को-उसकी इष्टिकाओं, उसके चयन की प्रक्रिया आदि को- यथावत् सुना दिया। उससे प्रसन्न
होकर यमराज ने उस अग्निविद्या का नामकरण नचिकेता के नाम पर ही कर दिया-तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा वरं
तवेहाद्य ददामि भूयः। तवैव नाम्ना भवितायमग्निः ....(कठ० १.१.१६)। इस प्रकार वह अग्निविद्या 'नाचिकेताग्नि'
के नाम से प्रसिद्ध हो गई। यमराज ने इस नाचिकेताग्नि के चयन की फलश्रुति बताते हुए आगे कहा-
त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू। ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमाꣳ
शान्तिमत्यन्तमेति (कठ० १.१.१७)। अर्थात्- त्रिणाचिकेत अग्नि (तीन बार नाचिकेत अग्नि का चयन करने वाला
अथवा ज्ञान, अध्ययन और अनुष्ठान करने वाला) का तीन बार चयन करने वाला मनुष्य (माता-पिता और आचार्य-
इन) तीनों से सम्बन्ध को प्राप्त करके जन्म और मृत्यु को पार कर लेता है तथा ब्रह्म से उत्पन्न हुए ज्ञानवान् और
स्तुति योग्य देवों को जानकर-साक्षात्कार करके परमशान्ति प्राप्त करता है।
१०४. नाद — नाद का सामान्य अर्थ है- शब्द या ध्वनि। संगीत शास्त्र के अनुसार आकाशस्थ अग्नि और मरुत् (वायु)
के संयोग से नाद उत्पन्न होता है। सम्पूर्ण जगत् नाद से भरा हुआ है। इसे 'नाद ब्रह्म' कहा गया है। नाद दो प्रकार
का माना गया है- आहत और अनाहत। योगी योग साधना से ब्रह्म में अनवरत गुञ्जायमान अनाहत नाद का श्रवण
करते और उसकी मस्ती में लीन रहते हैं। प्राणाग्नि के आघात से शरीर के अन्दर ध्यान स्थिर करने पर एक नाद सुनाई
देता है। इसमें विविध ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। अभ्यास के प्रारम्भ में नाद बहुत जोर से और नानाविध सुनाई पड़ता
है। अभ्यास के बढ़ जाने पर वह सूक्ष्म से सूक्ष्मतर रूप में सुनायी पड़ता है- श्रूयते प्रथमाभ्यासे नादो नानाविधो
महान्। वर्धमाने तथाभ्यासे श्रूयते सूक्ष्मसूक्ष्मतः (ना०बि० ३३)। जिस प्रकार पुष्परस का पान करता हुआ भ्रमर
पुष्पगन्ध की अपेक्षा नहीं करता, उसी प्रकार नाद में सदा आसक्त रहने वाला चित्त विषयों की आकांक्षा नहीं करता
मकरन्दं पिबन्भृङ्गो गन्धान्नापेक्षते यथा। नादासक्तं सदा चित्तं विषयं न हि कांक्षति (ना०बि० ४२)। नाद
मनरूपी मृग के बाँधने में जाल का कार्य करता है तथा मनरूपी तरङ्ग को रोकने में तट का काम करता है-नियमन
समर्थोऽयं निनादो निशिताङ्कुशः। नादोऽन्तरङ्गसारङ्गबन्धने वागुरायते (ना० बि०४५)।
१०५. नारायण — अनंत सृष्टि की स्थिति, स्थापक तथा पोषण कर्त्ता के रूप में नारायण भगवान् का स्मरण किया जाता
है। पुरुष सूक्त में उसी विराट् नारायण पुरुष की महिमा का प्रतिपादन है। मुद्गलोपनिषद् में भी उनकी महिमा
अभिव्यक्त हुई है। नारायण पुरुष तीनों कालों में अवस्थित रहते हैं। वे सभी महिमावानों से श्रेष्ठ हैं, उनसे बढ़कर
कोई नहीं है। वे इन सब प्राणियों के लिए मोक्ष प्रदान करने वाले हैं- पुरुषो नारायणो भूतं भव्यं भविष्यच्चासीत्।
स एष सर्वेषां मोक्षदश्चासीत्। स च सर्वस्मान् महिम्नो ज्यायान्। तस्मान्न कोऽपि ज्यायान् (मुद्ग० २.३)।

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नारायण से ही समष्टिगत प्राण उत्पन्न हुआ है, मन और सम्पूर्ण इन्द्रियाँ भी उन्हीं से प्रकट हुई। आकाश, वायु, तेज,
जल तथा सम्पूर्ण विश्व को धारण करने वाली पृथ्वी की उत्पत्ति भी उन्हीं से हुई। ब्रह्मा और रुद्र भी नारायण से ही
उत्पन्न होते हैं- नारायणात्प्राणो जायते। मनः सर्वेन्द्रियाणि च। खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी।
नारायणाद्ब्रह्मा जायते। नारायणाद्रुद्रो जायते (नारा० १)। नारायण देव ही एकमात्र निष्कलङ्क, निरञ्जन,
निर्विकल्प, अनिर्वचनीय एवं विशुद्ध हैं, उनके सिवा दूसरा कोई नहीं है- निष्कलङ्को निरञ्जनो निर्विकल्पो
निराख्यातः शुद्धो देव एको नारायणो न द्वितीयोऽस्ति कश्चित् (नारा०२)। महोपनिषद् में भी इसी तथ्य की पुष्टि
होती है कि आदि में एकमात्र नारायण ही थे, न ब्रह्मा, न रुद्र-एको ह वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानो
(महो०१.१)। आदि पुरुष भगवान् नारायण के नामोच्चारण मात्र से मनुष्य कलि के सब दोषों का नाश करता है-
भगवत आदिपुरुषस्य नारायणस्य नामोच्चारणमात्रेण निर्धूतकलिर्भवतीति (कलिसं० १)।
१०६: निःश्रेयस -द्र०- अभ्युदय।
१०७. निःस्पृह—स्पृहा का तात्पर्य है - इच्छा, कामना, लालसा, अभिलाषा। जो कोई भी लौकिक इच्छा, कामना न
रखता हो, उसे निःस्पृह कहते हैं। निःस्पृह व्यक्ति ही एकमात्र आध्यात्मिक उत्कर्ष की महत्त्वाकांक्षा की रखते और
महिमावान् बनते हैं। ऐसे महामना अपने कर्त्तव्य पथ पर अविचल खड़े रहते हैं और प्रतिष्ठा एवं देव कृपा के सुयोग
को पाते हैं। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि रजोगुण के बढ़ने पर लोभ प्रवृत्ति, कर्मों का आरम्भ, अशान्ति
और स्पृहा (विषय भोगों को इच्छा)- ये सब बढ़ते हैं- लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा। रजस्येतानि
जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ (गी० १४.१२)। बन्धु-बान्धवों आदि की बढ़ाने की स्पृहा से दीनता के दोष की वृद्धि
होती है- दैन्यदोषमयी दीर्घा वर्धते वार्धके स्पृहा (महो० ३.३६)। सब कामनाओं से निःस्पृह चित्त ही युक्त
(नियंत्रित) कहा जाता है- निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा (गी० ६.१८)।
१०८ ध्रुवा — कोश ग्रन्थों में ध्रुवा-नित्या का पर्याय पार्वती, मनसा देवी, एक शक्ति बताया गया है। नित्या का एक अर्थ
ध्रुवा अर्थात् स्थिर है। ब्राह्मणग्रन्थों में पृथ्वी, आत्मा आदि की ध्रुवा कहकर उपन्यस्त किया गया है- पृथिवी ध्रुवा
(तै० ब्रा० ३.३.१.२), आत्मा ध्रुवा (तै०ब्रा० ३.३.१.५)। ब्रह्माण्ड पुराण (४.१९.५९) में अविनाशी देवियों के
एक समूह को नित्या कहा गया है। उपनिषद् में वर्णित है कि आहारशुद्धि होने पर अन्तःकरण की शुद्धि होती है
और अन्तःकरण की शुद्धि होने पर निश्चल (स्थिर) स्मृति प्राप्त होती है- आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ
ध्रुवा स्मृतिः (छान्दो० ७.२६.२)।
१०९. निर्गुण-सगुण— परब्रह्म के दो रूप माने गये हैं। निर्गुण और सगुण। उसके सगुण रूप से दृश्य जगत् की
उत्पत्ति हुई है। अनन्त सृष्टि की रचना करने वाला वह परमेश्वर वास्तव में अनन्त और निर्गुण ही है। निर्गुण का
तात्पर्य है- गुण रहित। परमात्मा की बनायी सृष्टि सत्त्व, रज और तम तीनों गुणों से युक्त है, लेकिन परमात्मा स्वयं
इन तीनों गुणों से परे होने से निर्गुण कहा जाता है। निर्गुण ब्रह्म अव्यक्त और केवल ज्ञान गम्य हैं। सगुण व्यक्त तथा
गुणों से संयुक्त है। गीता के कथनानुसार निर्गुण की उपासना क्लिष्ट है और सगुणोपासना सरल है। आदि शंकराचार्य
ने ब्रह्म को निराकार, निर्गुण, समस्त भेदों से रहित, सर्वोपाधि विनिर्मुक्त और नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वभाव वाला
स्वीकार किया है। उपनिषद् में भी इसी तथ्य की पुष्टि होती है। उस ब्रह्म को शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध से
रहित नित्य तथा अविनाशी स्वरूप वाला वर्णित किया गया है- अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च
यत् (कठ० १.३.१५)। ब्रह्म के निराकार, निर्गुण स्वरूप की मुण्डकोपनिषद् में उपन्यस्त किया गया है। वह ब्रह्म
अदृश्य, अग्राह्य, अगोत्र, अवर्ण तथा चक्षुः, श्रोत्र और हाथ-पैरों से रहित हैं- यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुः
श्रोत्रं तदपाणिपादम् (मुण्ड०१.१.६)। ब्रह्म का निर्गुण स्वरूप अनिर्वचनीय है, अतः उपनिषदों में उसका निरूपण
करते हुए 'नेति-नेति' (बृह० २.३.६) कहा गया है। सगुण ब्रह्म को माया की उपाधि से युक्त माना गया है। सगुण
उपासना में अवतारों की प्रधानता है। ईश्वर ही जब मायोपहित देह के द्वारा आविर्भूत होते हैं, तो उसे अवतार कहते
हैं। यह दृश्यमान जगत् भी सगुण ब्रह्म का रूप माना जाता है।
११०. निर्विकल्पक - द्र०-समाधि।
१११. निष्काम कर्म — शास्त्रों में निष्काम कर्म की महत्ता विशेष रूप से प्रतिपादित हुई है। निष्काम कर्म का तात्पर्य

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है- कामना रहित कर्म। श्रीमद्भगवद्गीता में निष्काम कर्म का आदेश है। इसमें फल की इच्छा के बिना कर्म किया
जाता है। अपने कर्म को अपने उपास्य के चरणों में अर्पित कर दिया जाता है। निष्काम कर्म करने वाले के हृदय
में परमात्मा प्रवेश करता है तथा उसे भक्ति एवं मोक्ष प्रदान करता है। सांख्य दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण कर्म प्रकृति
के द्वारा होता है, पुरुष के ऊपर कर्म का आरोप मिथ्या है। जब यह ज्ञान प्राप्त हो जाता है, तब मनुष्य बन्धन में नहीं
पड़ता। मनुस्मृति के अनुसार संसार में कहीं भी कामना के बिना कोई क्रिया नहीं दिखाई देती। मनुष्य कामनाओं
की प्रेरणा से ही कर्म करता है (मनु०स्मृ०२.४); परन्तु कामनाओं के पथ पर भटकते मनुष्य भगवत्प्राप्ति जैसे दिव्य
उद्देश्य को प्राप्ति नहीं कर पाते, उसके लिए तो निष्काम कर्म ही प्रतिपादित किया गया है।
११२. पञ्चकोश — वेदान्त में मनुष्य शरीर के पाँच कोशों का वर्णन किया गया है- अन्नमय, प्राणमय, मनोमय,
विज्ञानमय और आनन्दमय कोश। स्थूल शरीर में अन्नमय कोश, सूक्ष्म शरीर में प्राणमय कोश, मनोमय एवं
विज्ञानमय तथा कारण शरीर में आनन्दमयकोश अवस्थित है। मन के साथ पंच ज्ञानेन्द्रियों के संयोग से मनोमय
कोश तथा बुद्धि के साथ पंच ज्ञानेन्द्रियों के संयोग से विज्ञानमय कोश बनता है। पाँच प्राणों तथा कर्मेन्द्रियों के मेल
से प्राणमयकोश बनता है। प्राणमय कोश क्रियाशक्ति से सम्पन्न तथा कर्मरूप है। मनोमय कोश इच्छाशक्ति से सम्पन्न
और कारण रूप है। विज्ञानमय कोश ज्ञानशक्ति से सम्पन्न और कर्तृरूप है। आनन्दमयकोश में मनुष्य समाधि का
अभ्यास करके अपने मूल स्वरूप में आ जाता है। सर्वसारोपनिषद् के अनुसार अन्न से बनने वाले कोशों के
समूहरूपी शरीर को अन्नमय कोश कहते हैं। प्राण आदि चौदह प्रकार को वायु इस अन्नमय कोश में संचार करते
हैं, तब उसे प्राणमय कोश कहते हैं। इन दो कोशों के भीतर मन आदि चौदह इन्द्रियों द्वारा जब आत्मा शब्दादि
विषयों का विचार करता है, तब उसे मनोमय कोश कहते हैं। आत्मा इन तीनों कोशों के साथ संयुक्त होकर बुद्धि
द्वारा जो कुछ जानता है, उसका बुद्धियुक्त स्वरूप विज्ञानमय कोश है। इन चारों कोशों के साथ आत्मा बरगद के बीज
के वृक्ष की भाँति अपने कारण स्वरूप अज्ञान में रहता है, उसे आनन्दमय कोश कहते हैं। अन्नमय कोश को
विकसित करने के उपाय १. उपवास, २. आसन, ३. तत्त्व शुद्धि और ४. तपश्चर्या मुख्य हैं। प्राणमय कोश के लिए
१. बन्ध, २. मुद्रा तथा ३. प्राणायाम किया जाता है। मनोमय कोश को साधना हेतु १. ध्यान, २. त्राटक, ३. जप
और ४. तन्मात्रा को साधना करते हैं। विज्ञानमय कोश की पुष्टि के लिए १. सोऽहम् साधना २. आत्मानुभूति, ३.
स्वर-संयम और ४. ग्रन्थि भेदन करने हैं। आनन्दमय कोश के विकास के लिए १. सहज समाधि, २. नाद साधना,
३. बिन्दु साधना तथा ४. किरण या कला साधना का प्रयोग करते हैं।
११३. पञ्चप्राण — द्र० - प्राण।
११४. पञ्चविध मुक्ति — जीवात्मा जब इष्ट देव या ब्रह्म के लोक, रूप, योग, निकटता या एकत्व को प्राप्त करता है,
तो यह मुक्ति की अवस्था कही जाती है। यह मुक्ति पञ्चविध मान्य है- सालोक्य, सारूप्य, सामीप्य, सायुज्य और
कैवल्य। मुक्त जीव जब इष्टदेव के साथ एक लोक में वास करता है, इसे सालोक्य मुक्ति कहा गया है। उपासक जब
अपने उपास्य के रूप में रहते हुए उसी के रूप को प्राप्त कर लेता है, इस समान रूप होने के भाव या सरूपता को
सारूप्य मुक्ति कहते हैं। मुक्त जीव जब भगवान् के पास वास करता है, तो उस मुक्ति को सामीप्य कहा गया है और
जिसमें जीव परमात्मा में लीन हो जाता है या योग को प्राप्त करता है, तो यह मुक्ति सायुज्य कही जाती है। अविद्या,
त्रिविध दुःखों तथा अहंकार आदि से निवृत्ति की विशुद्ध स्थिति को कैवल्य मुक्ति कहा गया है। मुक्तिकोपनिषद् में
भगवान् श्रीराम का कथन है कि दुराचार में लगा हुआ व्यक्ति भी मेरा नाम स्मरण करते से सालोक्य मुक्ति को प्राप्त
होता है, वहाँ से वह अन्य लोकों में नहीं जाता- दुराचारस्तो वापि मन्नामभजनात्कपे। सालोक्य मुक्तिमाप्नोति
न तु लोकान्तरादिकम् (मुक्ति० १.१८-१९)। पाप समूह के नष्ट होने पर वह मेरे सारूप्य-समान रूप को प्राप्त
होता है-निर्धूताशेषपापौघो मत्सारूप्यं भजत्ययम् (मुक्ति० १.२१)। जो द्विज सदाचार में रत रहकर नित्य अनन्य
भाव से मेरा ध्यान करता है और सर्वात्म भाव से मेरा भजन करता है, वह मेरे सामीप्य को प्राप्त होता है-
सदाचाररतो भूत्वा द्विजो नित्यमनन्य धीः। मयि सर्वात्मके भावो मत्सामीप्यं भजत्ययम् (मुक्ति०१.२२-२३)।
वह द्विज जब भ्रमरकीट के समान सम्यक् रूप से मेरे सायुज्य को प्राप्त होता है, तब वह कल्याणकारी और ब्रह्मानंद
को प्रदान करने वाली सायुज्य मुक्ति को प्राप्त होता है- मत्सायुज्यं द्विजः सम्यग्भजेद्भ्रमरकीटवत्। सैव सायुज्यमुक्तिः